31 जुलाई 2009

एक सुबह तुम्हारी याद आ गई ...

आज सुबह का हँसी समां था ,

ऐसे ही बैठे थे उगते सूरज का नजारा था ,

हाथमें खुली डायरी थी, कोरे पन्ने थे ,

दांतों तले कलम दबाये शब्द को पढ़ रही थी .....

खुले आसमानके रंगों की भाषामें लिखे थे ,

हसीं वो तस्वीरें कुछ फरमा रही थी

और मुझे तुम्हारे साथ गुजरे वो हँसी पलोंकी

बड़ी शिद्दतसे याद आ रही थी ....................

अनजानेमें ये नटखट आंखोंसे कुछ अश्क बेकाबूसे बह गए ,

उस कोरे पन्ने पर तुम्हारी तस्वीर बना गए ,

मेरी सहर तुम हो, मेरी शाम तुम हो ,

मेरी जिंदगीकी इब्तदा से इन्तेहाँ तक का सफर तुम हो .......

30 जुलाई 2009

शमा .....

एक मोमबत्ती हूँ ....

रौशनी को समेटे हूँ अपनी आगोशमें ,

बस एक चिनगारी के इंतज़ारमें

बैठती हूँ अपलक ...........

जब तक अँधेरा नहीं मेरे वजूद का क्या मतलब ?

बिजली की चकाचौंधमें मेरा अस्तित्व कहाँ ?

हाँ ...शायर की महफ़िल में जलती रहती हूँ मोम के आंसू लिए ,

परवानों का इंतज़ार करती हुई ............

29 जुलाई 2009

एक कश्ती ..एक साहिल ...!!!

याति !!
आज वह तैयार हो रही थी ।एक काला जींस पेंट और लाल कढाईवाली कुर्ती ...उसका मासूम रूप और निखर रहा था ।होठो पर लिपस्टिक लगाकर उसने बड़े गौर से आयनेमें अपने आप को देखा .दो नोट बुक्स एक फेशनेबल झोले में डालकर ऊँची एडी के सेंडल पहन लिए .....
आज शायद अपनी जिंदगी के एक नए अनजान मोड़ पर पहला कदम रखने जा रही थी वह !स्कूल के युनिफोर्म को अलविदा कह चुके है । काले जूते और सफ़ेद जुराब अलविदा ...लम्बी चोटियों में काले रिबन तौबा आजसे!!! अब तो स्टेप कम लेयर कट हेयर स्टाइल बहुत फब रही थी उस पर ....बारहवी कक्षा में ८०% मार्क्स लेन के बाद याति ने हिन्दी साहित्य के विषय के साथ जब बी ।ऐ . करने की सोची तो सबको बड़ा ही आश्चर्य हुआ लेकिन ये तो याति थी दुनिया से अलग हमेशा अपनी डगर चुनने वाली और चुनौतियों का सामना करने वाली .....
मेहता आर्ट्स कॉलेज !!फर्स्ट यर बी ऐ ॥रंग बिरंगी कपडों का मेला लगा हुआ था ।कॉलेज के पहले दिन को लेकर सभी के चेहरे पर उत्साह छलक रहा था .
डॉ।प्रतिमा देसाई पहला लेक्चर लेने आई उसी वक्त हडबडाकर अखिलेश जल्दी जल्दी आकर पहली बेंच पर आकर बैठ गया जहाँ पर याति बैठी हुई थी .
एक हलकी सी मुस्कान के साथ दोनों ने एक दूसरे को हेल्लो कहा ।
तीन लेक्चर के बाद कॉलेज के बाद याति पार्किंग में स्कूटी लेने के लिए आई तब अखिलेश दौड़ता हुआ आया ," अय !हेलो !! आपका मोबाइल छोड़ आई थी।"
" धन्यवाद !!" याति ने कहा ।
"क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ ?" अखिलेश ने पूछा ।
" ये हेलो अच्छा है ॥ जब अपना नाम बताना मुनासिब लगेगा तब बता दूंगी ।"किक लगाकर याति हवा से बातें करती हुई चली गई .
पहले टर्मिनल टेस्ट में याति और अखिलेश दोनों क्लास में प्रथम आए ।और अब उनके बीच शुरुआत हुई दोस्ती की जो आगे चल कर प्यार में बदल गई .पढाई में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा लेकिन उतनी ही गहरी दोस्ती .
तीसरे साल की शुरुआत में अखिलेश को रोड एक्सीडेंट हुआ ।हाई-वे पर उसकी मोटर साइकिल एक ट्रक से टकरा गई .अखिलेश का बहुत ही ज्यादा खून बह गया . बोत्तले चढानी पड़ी . तीन माह के बाद वह स्वस्थ हो गया .याति ने पढ़ाई में उसकी भरपूर मदद की .तीसरे साल इम्तिहान में सुवर्ण चंद्रक दोनों को संयुक्त रूप से दिया गया .याति आई .ऐ .एस .अफसर बनना चाहती थी .अखिलेश हिन्दी साहित्य में डॉक्टरेट करके प्राध्यापक बनना चाहता था .
दोनों के परिवार के बीच भी दोनों की वजह से गहरा रिश्ता बन चुका था ।और सभी उन दोनों की शादी के लिए भी सहमत हो गए थे .
याति आई ।ऐ.एस .के इम्तिहान में पास हो कर उदयपुर में नायब कलेक्टर बनकर चली गई .यहाँ पर अखिलेश भी डॉक्टरेट पुरी करने पर था .इंटरनेट और टेलीफोन के जरिये दोनों एक दूसरे के निरंतर सम्पर्क में थे .रोज रात १० से ११ बजे तक फोन पर बातें करना उनका क्रम था .
याति एक महीने की छुट्टी पर सूरत अपने घर पर आई ।अखिलेश को मिलकर वह दूसरे दिन साहित्य सभा में मिलने कह कर चली गई .दूसरे दिन उसने पारले पॉइंट पर अखिलेश का इन्तजार किया पर वह नहीं आया तो वह उसके घर पहुँच गई .वहां पर उसे पता चला की अखिलेश को बुखार था अतः वह अभी डॉक्टर के पास गया हुआ है .याति वहां पर पहुँची . पांच दिन तक दवाईयां लेने पर बुखार कम नहीं हो रहा था .इस वक्त याति उसके साथ ही पुरा दिन गुजारती थी . डॉक्टर ने कुछ एडवांस टेस्ट करने के लिए सलाह दी .ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया .HIV positive ...
उस वक्त याति उसके साथ ही थी । अखिलेश और याति के सामने उनके सपनों का महल ढह कर खंडहर हो रहा था .दोनों घर जाने की जगह तापी नदी के के पूल के किनारे खड़े होकर बहती हुई नदी को निहारने लगे .अखिलेश को उसके घर छोड़कर याति अपनी कारमें घर गई .अखिलेश की रिपोर्ट की बात सभी को बताई . पूरे घर को मायूसी ने घेर लिया . दो महीने बाद जहाँ पर शादी की शहनाई बजनी थी वहां पर मातम छ गया .रात भर कोई सो नही पाया .खामोशी की चादर ने पूरे परिवार को अपने पहलू में लपेट लिया .
लेकिन ये याति गहरी नींद सोयी हुई थी !!!!
सुबह नाश्ता करने सभी खाने की मेज पर बैठे थे ।मौन !! याति बोली ,"पापा मम्मी , हालात चाहे बदल गए हो मैं अपने फेसले पर अटल ही हूँ .मेरी शादी तय किए गए दिन पर अखिलेश के साथ ही होगी ."
फटाफट नाश्ता करके वह तो चली गई और पीछे छोड़ गई सबके जहन में एक सवाल !!!एक बात तो साफ थी याति की समजदारी पर सब को पुरा विश्वास था ।पर उसके इस निर्णय में शामिल होना सभी के लिए मुश्किल था .
याति सीधी पहुँची अखिलेश के घर !!!
वहां पर अखिलेश और उसके माता पिता के आगे उसने वही बात दोहरा दी ।उसकी आवाज में निर्णय की मजबूती साफ ज़लकती थी .
अखिलेश ने कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहा तो याति ने अपनी हथेली उस पर धर दिया और कहा ,"अखिलेश , मुझे तुम्हारा एक्सीडेंट याद है ।और ये चढाई गई खून की बोत्तले का परिणाम ही हो सकता है .अगर शादी के बाद ये बात सामने आती तो ? तो सब क्या करते ?"
"अखिलेश मैंने तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व को अपनाया है ...हर खुशी हर गम को .....इसी लिए मैं तुमसे तय हुए दिन पर ही शादी करके तुम्हारी दुल्हन बन कर आ रही हूँ ।यार !! और अभी जरूरी दवाई लेकर स्वस्थ जिया जा सकता है तो डर कैसा ?? अब तो A R T की चिकित्सा उपलब्ध है .संयम बनेगा हमारे प्यार का साक्षी .नामुमकिन कुछ भी नहीं ...."
दो महीने बाद याति दुल्हन बनकर उस घर में आ गई ।
दो साल के बाद दोनोंने मीरा नाम की एक साल की लड़की को अनाथालय से गोद लिए जिस के साथ उनकी जीवन बगिया में बहार आ गई ....
( एड्स एक खतरनाक बीमारी है पर उसके हजारो मरीजों को समर्पित है ये कहानी ...... उनको अपनाओ ...)

28 जुलाई 2009

गुजारिश

आज कुछ बोलने का दिल नहीं करता ,

आज मन कहता है बस तुम्हे सुनते ही रहे ,

डर है वक्त चला जाएगा हमसे दूर ,

और बात करते हुए शाम ढल जाए ......

वक्त को बाँध देती हूँ मौनकी डोर से ,

रेतको थाम लेती हूँ हाथसे फिसल न जाए ,

मंज़र ये हँसी है ढलती हुई शाम का

वक्त को गुजारिश है कुछ देर और ठहर जाओ ......

27 जुलाई 2009

अय जिंदगी गले लगा ले ....

आ जाया करो चुपकेसे इस तरह की आने पर आहट न हो ,

ठहर जाओ इस तरह जैसे हवामें भीगी खुशबू हो ,

जाओ मत जिंदगीसे मेरी, मेरी जिंदगी बनकर रुक भी जाओ ,

जिन राहों पर तुम कदम बढ़ाओ हम चले तुम्हारे साथ परछाईं बनकर ....

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बादलकी बून्दोंसे ऑस बनने की ख्वाहिश की मैंने ,

एक पत्थरदिल सनमसे प्यार की गुजारिश की मैंने ,

फूलों की राह कांटे चुभे फ़िर भी तुमसे आशिकी की मैंने ,

फ़ना तो होना था मुझे आपके ही प्यार में तय किया था जब ,

इश्क न सही नफरत बनकर ही आपके दिलमें ,

दो पल के लिए ही सही रिहाईश की मैंने ......

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25 जुलाई 2009

अर्ररर ! ये क्या हुआ !!!!

बारिश की बुँदे नजाकतसे फिसल रही थी चेहरेसे

रूमानी खयाल भी अपने शबाब पर थे मुंदी हुई पलकोंमें

जब आँखें खुली तो राज़ खुला और माज़रा आया समजमें

मुशायरेमें ये हम पर अंडे और टमाटर थे फेंके गए ........

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मुझे यूँ लगा मुझे मिलने वो बेताबीसे नंगे पाँव दौड़कर आई है ,

पास आकर बोली जाकर सिलवा दो मेरी सेंडल जो अभी टूट गई है ......

24 जुलाई 2009

बंधन

सूरज की लगाम होती है दिन की बेडियों के साथ

चाँद और सितारे गुलाम है रात के अंधेरोंके हाथ

आजाद है हमेशासे रौशनी जिसे बंधन नहीं कोई

वो रात हो या दिन सूरज- चाँद- सितारोंसे मिलती है ,

जो घने बादलोंको चीरकर भी हम तक पहुंचती है ....

रोशन शमाएँ होती है ख़ुद को जलाकर

अंधेरों को चीरकर जहाँको रोशन कर देती है .....

23 जुलाई 2009

बुँदे ...

घने बादलों के पार से कुछ उम्मीद दिखाई दे रही थी ,

मैं सोचता रहा क्यों पास नहीं आ रही ?

बैठे बैठे सोचता रहूँ तो क्या खाक पास आएगी ,

बस कदम बढ़ा लूँगा उसकी ओर तो ही वो करीब दिखाई देगी ...

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आज पत्तो पर सोयी कुछ बारिशकी बुँदे मिल गई ,

हथेली पर सजा कर उसमे मेघ धनु ढूंढ़ना चाहा ,

बारिश की वह चंचल बुँदे हंसकर फिसल गई ,

मेरे चेहरे पर एक मुस्कान का मेघ धनु छोड़ गयी.....

22 जुलाई 2009

वक्त




वक्त को बहता पानी कहें ? या हथेलीसे फिसलती रेत?

काश यूँ ही नींद एक बार फिर आ जाये

और हमें कोई प्यार से फिर सहलाता रहें ....

रेत घडीकी रेत एक बार फिसलना भूल जाए ........


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ख्वाबोंसे ताबीर तक का सफर बड़ी टेढी गलियों से गुजरता होगा ,

बस हम तो चलते ही गए बहते पानीकी तरह वक्त के साथ ,

खुबसूरत सी राहोंसे रेत की तरह फिसलते हुए वक्त की हथेली से ,

जब मंजिलके सामने आकर रुके तो लगा ये राहे कुछ और लम्बी होती .....

21 जुलाई 2009

खुदाया .......

आज खुदासे कुछ दुआ मांगने को दिल हुआ मेरा ,

दर पर जाकर उसके सजदेमें सर झुका दिया ,

बंदगी को हाथ उठे जब मेरे तो ये क्या हुआ ,

तेरे प्यारमें ही मैंने खुदा पाया अय मेरी दिलनशीं ..........

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तपते शोलों परसे राख की परत फूंकसे उडाना चाहा ,

कुछ जर्रे उड़कर आँखमें गिरे ,बंद हो गई पल के लिए ,

लेकिन सर्द रातोंको अपनी तपिशसे गरमाने की ख्वाहिश ,

मेरी ये चंचल हरकतोंने पुरी कर दी अनजानेमें ......

20 जुलाई 2009

तन और मन

पाँव थक जाते है कभी लंबा चलते हुए ,

मन कभी थकता नहीं पाया ....

हाथ छालोंसे भर गए मेरे पर

दिल को जलता नहीं पाया मैंने .......

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जवां रहता है इंसान अपने तरोताजा मनसे ,

तन पर ज़ुर्रियाँ चाहे कितनी ही पड़ जाए ......

कठिन काम हो कितना ही मगर

हौसलेसे जवां लोगको उम्र का तकाज़ा न रुका पाए .......

19 जुलाई 2009

आज तुझे कहती हूँ जिंदगी ...

चलते चलते कदम कुछ देर रुक गए

रुक कर पीछे मुड कर देखा तो

जवानीकी हँसी यादें थी और बचपनकी अठखेलियाँ भी ,

मैं मुस्कुराकर आगे चलता गया नए मकाम तक .......

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जिंदगी चलने का नाम है

हम रुक जाए वो तो चलती रहती है ,

घड़ी बिगड़ जाए तो वक्त नहीं रुकता ,

सहर से शाम का सफर तो चलता ही रहा है ......

18 जुलाई 2009

दीवानगी

तुम्हारी यादोंमें कुछ ऐसे खो गए थे

ये दिल दीवाना धड़कना भी भूल गया ,

दुनियाने समजा हमने दुनिया छोड़ दी

हम अपनी चितासे जब उठे तो भुत कहकर भाग गई ..........

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दीवानगी क्या होती है ये तो नहीं मालूम

बस इतना ही जानते है की आयनेमें हम आपको देखते है हरदम ....

17 जुलाई 2009

तस्वीर

बाहें फैलाकर बह रहे थे बादल

शब्दोंके कैमरेमें कैद कर

उनकी एक तस्वीर भेज रही हूँ

इस मौसममें चुपकेसे एक खुबसूरत खता कर रही हूँ ......

हर दिशा मचलकर भूरासा भेस पहनकर

सूरजको समेटकर छुपाकर अपनी पनाहोंमें

एक बिरहनसी अपने आँखोंकी बूंदों से

इस प्यासी धरती पर बेपनाह स्नेह बरसा रही थी .....

लगता है आसमांने भी खुली बाहोंमें

समुन्दरको बादल बनाकर समेटा हो

बिजुरी बनाकर उसकी मांग भरी हो

मेघधनुकी चुनर ओढ़कर गरजकी शहनाई बज रही हो .....

बादलोंकी लकीरोंसे एक तस्वीर

उभरकर आँखोंमें बन आई है

और मुझे मेरे परदेसी पियुकी

फ़िर याद आई है .......

16 जुलाई 2009

एक पंखने कहा मुझसे ...

हथेली पर एक टुटा पंख सहलाकर देखा

एक पुरे सफरकी कहानी सुनाई दी हमें ........

अंडेकी कैदसे आजाद होकर

घोंसलेमें करते थे दानों का इंतज़ार

माँ उड़ना सीखा गई

जमें हुए परोंको फडफडाकर खोल गई

फ़िर तो धरतीसे गगन का सफर

यूँ शुरू हुआ जैसे पवन .....

कभी डाली डाली कभी पात पात

कभी दाना दाना ,कभी कोरी ही घास घास

धरती के प्रेम संदेस आकाश को पहुँचाना ....

सुबहमें पर फैलाकर उड़ना ,दाना चुगकर शामको लौट आना

धरती पर झूमना और गगनमें गाना ...

15 जुलाई 2009

महफिल

आपको मुबारक हो महफिलें

हमें हमारी तन्हाई मुबारक हो ...

किस जुबांसे करें बयां कि साथ क्यों छुटा ?

पूछा होता तो बता देते पंख कट गए है हमारे ....

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एक लंबा सफर तय किया था

एक लम्बी गुमनामी को झेला था

अब मंजिल सामने है खड़ी मेरे

तब क्यों ये लग रहा कि राह थी ग़लत चुनी ?

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बड़े हलके फुल्केसे लग रहे थे रुई से

आज मैंने बादलको निचोड़ कर देखा

उसकी ऊँची उड़ानके राज़ को जाना

ढूँढता था महबूबाको और आंसू थे भरे भरे ....

14 जुलाई 2009

ये एक मजेदार इ मेल आया है ....

१ पत्ते गिर सकते है पेड़ नहीं ,सूरज डूब सकता है आसमां नहीं ,

धरती सुख सकती है दरिया नहीं ,दुनिया सुधर सकती है आप नहीं ....

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२ आना फ्री जान फ्री ,

पकडे गए बिना टिकेट के तो खाना फ्री ....

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३ वो आज भी हमें देखकर मुस्कुराते है ,

हम आज भी उन्हें देखकर मुस्कुराते है

ये तो उनके बच्चे ही कमीने है

जो हमें मामा कहकर बुलाते है ...

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४ तेरी गलियों के चक्कर काटते हुए

काटते कुत्ते भी मेरे यार हो गए

तू तो हमारा न हुआ पर

हम कुत्तों के सरदार हो गए ....

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५ आज कुछ घबराए हुए से लगते हो

ठण्डसे कपकपाये से लगते हो

निखर आई है सूरत आपकी

बहुत दिनों के बाद नहाये से लगते हो

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६ जिसे कोयल समजा वो कौवा निकला

दोस्ती के नाम पर हौवा निकला

जो रोका करते थे शराब पिने से

उसीकी जेबसे पौवा निकला ....

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७ तेरी जुल्फें है या घना अँधेरा

कटवा दे बाल और करदे सवेरा

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८ फूलोंकी महक को चुराया नहीं जाता

सूरजकी किरणों को छुपाया नहीं जाता

कितनी भी सुंदर गर्ल फ्रेंड हो अपनी

दूसरों की गर्ल फ्रेंड को भुलाया नहीं जाता

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९ आपकी यादों को पेप्सी बनाकर पिया करेंगे

बेवक्त आपको मिस किया करेंगे

मर भी गए तो क्या हुआ

यमराज के मोबाइल से आपको एस एम् एस किया करेंगे

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१० जो हमेशा से होता आया है

वो रिपीट कर दूंगा

तू न मिली तो अपनी जिंदगी

कंट्रोल + आल्टर + डिलीट कर दूंगा

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११ प्यार तो हमें भी करना था

पर कुछ खास नहीं हुआ

ताज महल तो हमें भी बनवाना था

पर अफ़सोस !!! लोन पास नहीं हुआ ....

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ये इ मेल पर आई कुछ मजेदार शायरी है ...

13 जुलाई 2009

मेरी प्राण प्रिया .....

प्रिय चाय ,

जबसे मुझमें समजदारी आई है तब से मेरी सुबह में तुम्हारी जगह बचपनसे पायी थी ...जब किचनमें सुबह चीनी मिटटी के कप की खनक सुनाई देती थी तब मेरी आँख खुलती थी ...मुंदी आंखोसे ब्रश करना और सीधे चाय के पास प्रस्थान ...तेरा पहला घूंट जैसे जान की पहली किरण देता था और दिन की शुरुआत हो जाती थी ...शाम जब स्कुल से लौटती थी तब शाम पॉँच बजे पापा के लिए बनी चाय के साथ एक और कप ढँककर रख दिया जाता था और वो ठंडी चाय भी ...तुम मुझे हर रूपमें प्यारी लगी थी मेरी राम प्यारी .........

शादी के बाद मेरे पतिदेव् की एक बात मुझे झटका दे गई ...उन्होंने कभी चाय चख्खी भी नहीं थी और मेरी सुबह चाय के बगैर हुई न थी ...शुरूआत के दिनमें तो उनको प्रभावित करनेके चक्करमें घरमें नहीं पीती थी पर ऑफिसमें जाकर दो तीन बार तुम्हारे बगैर रहना नामुमकिन था ...खैर पतिदेव समजदार थे उन्होंने ख़ुद लाकर चायकी पत्ती घर में रख दी और मेरा तुमसे अब तक अटूट नाता जुड़ सा गया ...मेरे बचपन का प्यार जीत गया और जिन्दा हो चला ...

बीमारीमें एक दिन मुझे एक कप ऐसी चाय मिली जिसमे एक कप की पत्ती ,चीनी ,थोड़ा सा दूध और चार कप का पानी ....उस दिन एक शपथ ले लिया चाय पीनी हो तो घर में ख़ुद ही बनाने की ...अब तक ये शपथ जारी है ...चाहे १०३ डिग्री बुखार हो तो भी ख़ुद ही बनाने की ....

वैसे हम गुजराती लोग दूध पाक ( पतली खीर ) जैसी मीठी ,दूध से भरपूर ,खूब उबली हुई चाय पीते है ....शरबत और चाय एक साथ .....साथ में चायका मसाला ,अदरख ,पुदीना या तुलसी भी चले ...हाँ चाय में भी भिन्नता पसंद ...चिनाई मट्टी के कप प्लेटमें प्लेट में चाय डालने की और एक लम्बी सुदूप करके चुस्की मारने मजा ही कुछ और होती है ...कांच के गिलास का स्वाद नहीं पसंद आता ....

दार्जिलिंग की चाय होती है वह बहुत ही लाइट होती है ...उसे बनाते वक्त चीनी वाले पानी में पानी उबल जाने पर थोडी पत्ती डालकर ढककर उसे रखलो और जब थोडी देर हो जाए तो छान कर उसमें थोड़ा दूध मिलालो क्या खुशबू आएगी!!!!!!ऊटी की चाय भी ऐसे ही पि जाती है ...अगर दूध की जगह नीबू के दो तीन द्रोप्स दाल कर काली चाय पि जाए तो सच एक अलग ही अनुभव है ....वैसे आम चाय की भी काली चाय अच्छी लगती है ...जब खूब थक जाती हूँ तब मैं तुम्हे यूँ काली ही पि जाती हूँ ...

ऑफिसमें काम के टेंशन में मैंने एक साथ ७/ ८ कप तक भी चाय पि है ...पर अब तो दिन में दो कप ही ...

कहते है ...ये उबला पानी एक नशा है जो जायज भी है ...अब तो बाज़ार में अनगिनत वेराइटी मिलाती है ..हर्बल से लेकर जाने कितनी ही ....पर वो सुबह की चाय ...क्या कहने !!!!

चाय तेरे बगैर जिए तो क्या जिए !!!!!

तुम मेरे सुख और दुःख में साथ ही रही हो ...तुम्हे आज ये ख़त यानी की लव लैटर लिख कर मेरा प्यार जताती हूँ ...

तुम्हारी ही ,

सलोनी ......

12 जुलाई 2009

आया मौसम खिला खुला सा

छींटाकशी करके आपकी हँसी वादियों को गूंजसे भरती है ,

पास न होते हुए भी दुरियोंके अहेसास ख़त्म कर देती है ,

कल खुली खिड़की के पास यूँही खड़े रह कर

एक भीगी सड़क पर नज़रें यूँ फिसल रही थी ....

अनजानेमें वह आपके आशियाँ के रास्ते पर चल रही थी ,

आपकी नज़र नहीं पड़ी अपनी मस्तीमें भीग रहे थे

नज़र हमारी कुचली गई आपकी एडियोंके तले

भीगे चेहरे पर उलझी जुल्फोंके बादलने मेरे दर्द की कसकको मरहम दिया ......

औसकी भीगी बूंदोंकी शबनममें नहाने का मौसम आ गया ,

सहराओं को बहार बनने का मौसम आ गया ,

पहले प्यारमें किसीके घायल होने का मौसम आ गया ,

बिछडे हुए प्यारकी यादोंमें खोकर

अश्कसे दामन भिगोने का मौसम आ गया ......

11 जुलाई 2009

कागज़ की नाव

पुराने छातेके छेदसे कुछ बारिश हो रही थी ,
मैंने उस छोटी बारिशमें भीग रही थी ...
अपनी मशरूफ जिंदगीमें कुछ ऐसे छेद बना दो ,
पल दो पल मेरे लिए निकालकर मेरी जिंदगी भीगा दो ....
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बादामी आँखोंका समुन्दरमें हिचकोले लेकर लहरे झूम रही ,
अपने प्रियतम बादलकी बूंदोंको घूंट घूंट कर पी रही ,
आज इस आँखोंके समुन्दर को कुछ सिमटा कर झील बना दी
और उसमे अपने सपनोके कागज़ की नाव बनाकर तैरा दी ......

10 जुलाई 2009

मेरे प्यारे छाते के नाम एक पैगाम ...

छाता पड़ा अलमारी में आज बहुत मुस्कुरा रहा था ,

छुप गया था पुराने कपडों के पीछे मजे से ,

और एक घंटेसे मुझे रुला रहा था ....

रेन कोटके बटन टूटे पाए थे तब हमें छाता महाशय याद आए थे .........

लुका छिपी हमारी फ़िर ख़त्म हुई

कहीं पीछे से छाते महाशय की डंडी दिख गई ...

उत्सुकतासे हमने उन्हें खींचना चाहा

और इसी कोशिश में ढेरों कपड़े अलमारी के बाहर गिरा दिए ...

लो अब एक और काम हमने बढ़ा दिया

और इल्जाम छाते महाशय पर लगा दिया ....

बाहर निकाल कार हमने खोलना चाहा

तो जमीं जंग को बात रास न आई ,

खोलने पर नाराज होकर उसकी तिल्लिया कुछ ऐसे गुर्राई

और तीन तिल्ली तो टूटकर हाथमें आई ....

फ़िर भी हमारी हिम्मत पर फख्र था हमें ,

हमने भी छाते की चेलेंज उठा ली

और टूटी छतरीसे ही काम निकलवानेकी ठान ली ,

आया एक मनचला झोंका तेज हवाका कहींसे बहुत खूब

और हमारी छतरीने अदासे बातें की हवासे कौवा बनकर....

चलो मौसमकी पहली बारिश थी तो हम मन को मना लिए

और भीगते हुए एक ठेले पर चाय और पकोडे खा लिए .....

9 जुलाई 2009

प्रकृति के नाम एक सुबह ...

मुझे एक आदत है ..सुबहमें जब छ: बजे के करीब आंखे खुलती है तो मैं सीधी अपने टेरेस पर जाकर बस थोड़ा टहलती हूँ ,रुकती हूँ , थोडी देर झूले पर बैठती हूँ ....

मेरी निगाहें हमेशा आकाश पर ठहरी होती है ...मैंने कभी भी इस आकाश को एक ही रूप में नही देखा ..और ये हाल बरसों से है ...न कभी सूरज एक पैटर्न में निकलता है न चाँद .....पंछियों का उड़ना भी सीज़न के ताल्लुकात रखता है ...जाड़ेमें छोटी छोटी चिडिया एक बड़े हुजूम में निकलती है ..इधर से उधर चक्कर लगाती है लेकिन जैसे ही सूर्योदय का वक्त होता है वे सब एक मकानके टेरेस पर या लंबे कोई केबल के वायर पर बैठ जाती है ...उस वक्त ऐसा लगता है की वो महाराजा सूरज के आगमन पर झुककर सलाम कर रही है ...जैसे ही सूरज महाशय बहार आ जाते है कुछ ही सेकंडमें वहां खाली वायर या टेरेस होता है .....गर्मी में लंबे और धीरी उड़ानवाले पंछी देखने मिलते है ...एक लम्बी कभी तिकोनी कतारमें हमेशा बारी बारीसे आगे पीछे होकर उड़ते है ...सबसे आगे वाला पंछी हवाओं को काटकर पीछे वाले पंछी के लिए रास्ता आसां बनाता है ...और थोडी थोडी देर मैं पोजीशन बदलते चलते है ...ताकि कोई ज्यादा न थके ॥

उनको घड़ी देखनी तो नहीं आती पर उनका अपने स्थान पर जाने का या लौटनेके वक्त में कोई फर्क नहीं पाया जाता है ..और हम !!!!!!!!घड़ी का उपयोग हम कितने देरी से या जल्दी चलते है ये देखने को करते है ...

अब बारिश शुरू हो चुकी होती है तो कोयल की कुक या मोर के गहेंकका भी समय एक सा रहता है ...बस लगता है हम मनुष्य ही प्राकृतिक तरीके से जीना भूल रहे है ....एक चिडिया दूसरी चिडिया को अलग अलग आवाज देकर किसी सुचना देती है ...उनके भी सांकेतिक शब्द होते है ....

हमें स्कुल में पढाया गया है की सूरज कर्क वृत से मकर वृत तक गति करता है ...२२ सितम्बर से २१ जून तक उसकी उत्तर की गति होती है ..हर रोज थोड़ा खिसकता नज़र आता है ...और फ़िर दोबारा दक्षिण की गति करता है ..ये सब मैं ख़ुद इतने सालसे देखती हूँ ...हाँ अब बारिश के दिनोंमें बादल के कारण देख पाना सम्भव नहीं हो सकता ......

सुबह से शाम तक रोज प्रकृति अपना रंग हरदम बदलती है पर हमने इस प्रकृति के साथ इतना खिलवाड़ किया है की अब शाम ढलने के बाद ऊँचे आकाशमें धुएँका होना साफ़ दीखता है ....

यहाँ पर मैंने जो कहा है वह हमारी जिंदगी में कितना उल्टा है ...शायद इसी लिए कोई पंछी या पशु हार्ट एतेक से नहीं मरता होगा या बी पि का या मधुमेह का प्रॉब्लम भी नहीं होता होगा ...

अरे हम मनुष्य है ...इस भ्रमांड का सबसे बुध्धिशाली जिव ....हमें भला इनसे क्या सिखने की जरूरत है ? हमें बीमारी के साथ दवाई बनाना आता है ...हम सर्वोच्च है ......पुरे आलोक और परलोक में छाये हुए ....हम चाँद पर जा सकते है ,मंगल पर आशियाँ भी बना सकते है ...पर हम एक और इंसान के लिए वक्त नहीं निकाल सकते ...बहुत बिजी है .....हाँ हमें फुर्सत नहीं है .....

8 जुलाई 2009

मौसम की पहली बरसात आ ही गई

आज रात बहुत ही आंधी और तूफ़ान के साथ तेज बारिश हुई ...

प्रकृति का हर रंग अपनी उफान पर था , और चाँद पर कदम रखने वाला इंसान लाचार उसका तांडव नृत्य देखता रहा ...बिजली ने जम कर फोटो खींचे इस दुनिया के ..बादल ने गरजकर अपना राग मेघ मल्हार का आलाप कर लिया ...बहुत ही प्रतीक्षा के बाद ये बारिश आई तो सही लेकिन उसने भी मन भर कर नृत्य किया तो इंसान डर सा गया .....जब बारिश थमी तो जरा देर के लिए नींद आ पाई ...कहते है की बहु और बारिश दोनों को कोसा जाता है ...आए तो भी न आए तो भी ...रात को डेढ़ बजे कोयल डर के मारे चीख रही थी ...मोर भी चुपचाप कहीं पेड़ के निचे छुप गया होगा ...मेंढकके मौसम के अभी थोडी देर सी है ...और हरी घास की जमीं के निचे दबी कोंपलको इंतज़ार है बस फुटने का ....

आप कभी बारिश में बहार निकलो एक बार सभी के चेहरों को देखने का लुत्फ़ ले कर देखो ...सबसे अच्छी जगह है ट्रैफिक सिग्नल ..जब वेहिकल रुकते है तब देखो ...मोटर कार बस को छोड़कर हर चेहरे पर जैसे कुदरत अपने हाथों से चेहरा धोने आई हो इस तरह बारिश की बुँदे उसके चेहरे से फिसलती है ..इंसान का एकदम सच्चा चेहरा जो ब्यूटी पार्लर में लिपा हुआ नहीं होता आप देख सकते हो ....कभी बिना रैन कोट पहने रिमज़िम बारिश हो रही हो तब लॉन्ग ड्राइव पर स्कूटर या साइकिल या मोटर साइकिल पर अकेले ही सैर पर निकल जाओ ...अकेले ही ...मैं तो हर सीज़न में एक बार ये जोय रायिद कर ही लेती हूँ ...वापस आकार अदरख की चाय पी लो ...हजारों रूपये खर्च करने के बाद भी ऐसा आनंद शायद ही मिले ....

बस यूँही सुबह छत पर से निचे झाँख कर देखा तो प्रकृति रात के हंगामे के बाद बिल्कुल नि: शब्द थी । उसका हर हरा पत्ता एक नया निखार लिए खुश था ...झूम रहा था ...और हम घर में आए पानी को निकलने मैं व्यस्त थे ...

7 जुलाई 2009

गुरुपूर्णिमा ......

आज गुरु पूर्णिमा है ...

माँ हमारा पहला गुरु है ।

पिता और माता के दिए गए संस्कार हमारे जीवन को सही दिशा देते है ।

विद्यापीठ के गुरु ज्ञान के दरवाजे हमारे लिए खोलते है ।

लेकिन जिंदगी से बड़ी यूनिवर्सिटी कोई नहीं जिसका हर दिन उगने वाला सूरज हमें कुछ न कुछ नया सिखाता है और अपने संस्कार से आधार पर हम अपने जीवनको बना या बिगाड़ सकते है ।

हमारी अंतरात्मा हमारी राहबर है जिसे सही ग़लत की पहचान होती है ........

ज्ञान और गुरु को कोई उमर का बंधन नहीं होता ...एक छोटा सा बच्चा जब चलना सीखता है तो कई बार गिरता है और फ़िर उठकर कोशिश जारी रखता है और जब तक चलना नहीं सिखाता तब तक रुकता नहीं .जिंदगी का पहला सबक तो वही सिखाता है ...किसी भी हालत में वह दिल से हसता है या रोता है ...बनावट कहीं नहीं होती ...

आज एक बात बताती हूँ :

पिछले हफ्ते एक बच्चे ने ये कहा था :

हम कुछ भी कर सकने को सक्षम है ....हम भी कामियाब हो सकते है ...जो कोशिश करते है उनकी कभी हार नहीं होती ....हम जो थान लेते है वह कर सकते है ...

बड़े आम लगने वाली बात है पर ये कही वो अठारह साल का बच्चा है ...उसे सेरेब्रल पालसी हुआ था जन्म के वक्त ही ...ब्रेन की नस दब गई और वह अपाहिज हो गया और मेंटली चेलेंज भी ...उसने तीसरी ट्रायल में दसवी कक्षा का बोर्ड इम्तेहान पास किया ....ठीक से चल नहीं सकता ..पर खेलते वक्त उसके नाम की चिठ्ठी में ५ बार कूदने का आया तो उसने कहा मैंने कूद लगाऊंगा ...मैं ये जरूर कर सकता हूँ ...और उसने ये सफलता से किया ...

इस बच्चे ने एक ऐसा सबक दिया जो किसी पाठशाला में शायद पढाया जाता होगा ...गुरु देवो भव .....!!!

पिछले एक महीने से मैं ये मंद बुध्धि के बच्चों के स्कुल में स्वयंसेवक के तौर पर जाती हूँ ...सोचा था मैं उन्हें कुछ सिखा सकती हूँ ...पर मैं हर रोज उनसे कुछ सीखकर आती हूँ ....

ये दुनिया सबसे बड़ी पाठशाला है और जिंदगी हमारी शिक्षक ...!!!!

5 जुलाई 2009

इन्तहा इंतज़ार की ....

हमें आदत थी इंतज़ार करने की

उन्हें इंतज़ार करवाने की आदत थी

इस बार उनका इंतज़ार बन जाएगा उम्रभरका

जो फूल लेकर आयेंगे पेश करने वो हमारी कब्रको नसीब होगा .......

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हमने एक नई दुनिया बसा ली है अब आपका इंतज़ार करते हुए

कुछ नए अहेसास का आलम रहा इंतज़ार का मज़ा लेते हुए

अब तुम्हे मिलने का लुत्फ़ भी कम सा लगता है

जो मज़ा आता है तुम्हारा इंतज़ार करने में .............

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इंतज़ार करते हुए एक नई दुनिया किसीने बसा ली

इंतज़ार करते हुए ख्वाबों की दुनिया किसीने सजा ली

इंतज़ार करते हुए सब कुछ कोई पा जाता है

इंतज़ार करते हुए कभी महबूबाकी डोली उठ जाती है .........

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इंतज़ार करते हुए हम तो नहीं रूठे कभी आपसे

आज हमारा आ न पाना आपको क्यों ना गवार गुजरता है ?

तडपाने का लुत्फ़ लेते रहे आज तक आप भी

तड़पने की सूरतमें हमारा प्यार ही आपको जूठ लग रहा है ?

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हमने तो हर वादा निभाया बड़ी शिद्दत से जो आपसे किया

हमने तो हर जखम सह लिया जो आपने हमें दिया

हमने तो इंतज़ार भी कर लिया आपका आखरी साँस तक

अब इंतज़ार बन गए हम आपके लिए उम्र भर का किस्मतसे ............

4 जुलाई 2009

शायद ....

गुजरते थे आपकी गलीसे भी हम

दरवाजे पर आपके दस्तक भी देते थे

कोई और ही किवाड़ खोलता था

और हम खामोश ही लौट जाते थे ...........

आपकी क्या मजबूरी है

ये हमें मालुम तो नहीं

पर किसी और से दुआ सलाम करना

ये हमें नागवार गुजरता था .........

जश्नमें शायद ऐसा भी हुआ हो

की सिर्फ़ एक पलके लिए भी

आपने याद भी कर लिया हो गलतीसे

और हमें बेवफा भी समजा होगा ..........

आए थे हम हर वक्त की तरह

और आज भी किसी औरने ही दरवाजा खोला

हाथके गुलदानको हमारे अश्क ने ही सींच दिया

और हम टुटा दिल लिए दहलीजसे लौट गए ...........

अब हमें बेवफा समजा करो या फ़िर नादान

अब हमें कोई फर्क नहीं

आयेंगे न सामने कभी आपके

बस गर गुजरो कभी यादों की गलियों से कभी

शायद वहीं तुम हमें पाओगे .........

3 जुलाई 2009

दोस्ती को ख़त

एक ख़त एक दोस्त के नाम :

"प्रिय आदित्य,

कैसे हो ? बहुत अरसे के बाद तुम्हारा ख़त मिला .पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई.

आदि ,मुझे लगा था की छ महीने बहुत ही होते है किसीको भूल जाने को ...पर तुम्हारे ख़त ने मुझे भावुक बना दिया ....

बीस साल पहले की मुझे आज भी वह ट्रेनमें अपनी पहली मुलाकात याद है .चाय के लिए मेरे पास छूटे पैसे नहीं थे तब तुमने पैसे दे दिए और उस वक्त के साथ शुरू हुई मुलाकात खतोंका सिलसिला बनकर चलती रही ...तुम्हारे घर भी मैं आया ..ये सब कुछ कैसे भुला पाऊं ?

पर जब तुम मुझे मिले तब मुझे नहीं पता था की मैं एक बहुत ही बड़े भावी उद्योगपति के सामने बैठा हूँ जो आने वाले एक सालमें पुरे देश के आर्थिक नक्शे को बदल डालेगा ...दिन प्रतिदिन जब तुम्हारे चर्चे पत्रिका में पढ़े , अखबारों में पढ़ा ...टी वी पर देखता गया ...सच मुझे इतनी खुशी मिलती थी ...पर दोस्त , अब तो तुम्हारे पास न तो वक्त रहेता होगा किसी एक आम दोस्त के लिए , कितने सारे काम होते होंगे तुम्हे ? तुम्हारे पास कितने लोगों का हुजूम रहता होगा ...और शायद तुम्हे अब मैं याद भी आता होगा या नहीं ? तुम तो आसमां के आफताब बन गए हो ..और हम यूँही जमीं की धूल ही है ....क्या मेल होगा ? तुम्हारा और हमारा ? बस येही सोच कर तुम्हे ख़त न लिख पाये ...

तुमने आज मुझे याद कर लिया बस इतना ही काफ़ी है मेरे लिए ...तुम दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करो ये ही भगवान से प्रार्थना करता हूँ ....

एक छोटी सी कहानी :

एक कमरा था ...पुरा दुनियाभर के लोगों से भरा हुआ था ...वहां पर दुनिया का एक नामी चित्रकार बैठा हुआ था .जिसके सारे जहाँ में चर्चा थी ...और कई अवार्ड उसे मिले थे । एक आम आदमी वहां पर आया ....उसे अन्दर आने नहीं दिया गया ...तो वहां पर गेट के पास बैठ गया ....अचानक शोर्ट सर्किट से होटल के सबसे ऊपर वाले मजले पर आग लग गई ....फायर अलार्म बजा ....कमरे में अँधेरा हो गया ...सब भाग गए ..पर आग पर तुंरत काबू पा लिया गया ।बिजली भी तुंरत वापस आई ...कमरा खाली था ....बस एक कुर्सी पर एक इंसान बैठा था .चित्रकार उसके पास गया .गौरसे देखा तो वह उसके बचपन का दोस्त था जिसने उसके हर बुरे वक्त में उसका साथ दिया था .स्कुल में अपने होम वर्क की कॉपी उसे देखर ख़ुद मास्टरजी की मार खायी थी । एक सीधे सादे कपडों में लिपट कर आज एक बार फ़िर दोस्ती सामने खड़ी थी ......

और क्या कहूँ ?

तुम्हारा दोस्त

विजय

मेरे दोस्त .....

वो बात कहनी है मुझे,
किसे बताऊं ? मम्मी ,डांटेगी....
पापा? उहूं शर्म आयेगी ...
ये बात जिसे मैं बेधडक कह पाऊं..
निगाहें ढूंढ रही उसे आज क्यों...
कौन है ? जिसे मैं दिलकी बात बता पाऊं?
हां, वह है जिसे कहती हूं मेरा दोस्त....
आयना है मेरे लिये मुझे जो अक्स दिखाता है...
चेहरे पर पडा ये घावका निशान तेरी दोस्तीकी याद दिलाता है...
और तुम हमेशा अपने रुमालसे
आजभी अपनी दोनोंकी तसवीर परसे धूल पोंछते हो....
मेरी उदासी उसके गमकी वजह बन जाती है,
उसके आंसूसे मेरी रातोंकी नींद उड जाती है...
न खूनका रिश्ता है कोई फिर भी इसका बंधन मजबूत है...
ये जादूगर तो मेरा दोस्त है...
जो खुशी बनकर हंसीके तोहफे दे जाता है...
अश्कको मेरे खुद रुमाल बनकर पोंछ जाता है....
मैं छूप जाऊं तो गली गली ढूंढने जाता है..
चिटींग करके जीतता हूं तो खफा हो जाता है....

मूंह फूलाकर फिर घूमते थे दो दिन .
फिर दोनोंके सेलफोन पर एक मिस्ड कोल आता है...
शामको चाइनीज नुडल्स खाने के बाद,
फिर एक सिनेमा देखने का प्रोग्राम बन जाता है....
आज इस उम्रमें भी मुझे वो दिन याद दिलाकर...
तु मुझे हंसाता भी है ...रुलाता भी है.......

2 जुलाई 2009

वाह ताज !!!!!

दुनियाके नए सात अजूबों में जिसका शुमार हो चुका है उस ताज को अगर आप देखना चाहते हो तो आपको आगरा जाना ही पड़ेगा। संयोगसे मैं आगरा दो बार जा चुकी हूँ . एक बार १९८२ में और दूसरी बार गई २००५ में . लेकिन दोनों बार वह एक पैकेज टूर ही था .तो सिर्फ़ इस बार जट-पट घूमना भी देख लेते है .२००५ में दिल्ही में गुजराती समाज से ही सुबह जल्दी जाने वाली आगरा-मथुरा -वृन्दावन की टूर पर हम निकल पड़े .२०० किलोमीटर का सफर तय करने के बाद तकरीबन साढे बारह बजे के बाद आया आगरा . जहाँ पर सीधे ही लाल किले पर हम लोग पहुँच गए .
इस लाल किले की बनावट दिल्ही के लालकिले से ज्यादा बेहतर लगी । शाहें शाह अकबर ने इसे बनवाना शुरू कर दिया था .शाही गेट के सामने नोबत खाना और सलामी के लिए खड़े होने की जगह है .नीचे से ऊपर जाने के लिए एक सीधी चढाई का रास्ता है . वह इस लिए बनाया गया है की अगर दुश्मन ऊपर तक आए उससे पहले ही रोलर चलाकर उन्हें खत्म किया जा सके .आगे चलकर बादशाहों के शाही स्नान की जगह भी आती है .दीवाने आम ,दीवाने खास , मोती महल , बेगम के रहने के लिए सुंदर जनान खाना , बेटी जहाँआरा और रोशनआरा के लिए दो अलग कमरे ,मीना महल ,बस बेहतरीन वास्तुके इन नमूनों को देखते ही जाओ . बादशाह के ख़ुद के कमरों के तो क्या कहने ?!! शाही बेगम और बादशाह के नमाज पढने के लिए अलग से बनी मस्जिद ,शीश महल ,बैठने की बेंच भी जो संगेमरमर से तराशकर बनाई गई है . बादशाह के दीवाने आम में बैठने का सिंहासन जहाँ पर कभी मयुरासन ही हुआ करता था वह ऐसी जगह पर रखा है की वहां से दो दरवाजे जो प्रवेश करने के लिए है उनमेंसे किसीसे भी प्रवेश करने वाले व्यक्ति पर बादशाह की निगाह पड़ जाए .खम्भे और कमाने कुछ इस तरह बनाई गई है की किसी भी जगह से एक जैसे है नजर आती है . बेटे औरंगजेब ने शहंशाह शाहजहाँ को कैद करके आखरी वक्त तक इधर ही रखा था . वहां पर एक खास झरोखा भी बनवाया था जहाँ से शाहजहाँ ताजमहल को अपनी मरहूम बेगम मुमताज की याद को जो सामने वाले किनारे पर बनी हुई है उसे देख सके . कहते है शुरू शुरू में वहां पर हीरे और कांच को इस तरह से जड़ा हुआ था की जिस तरफ़ से देखे सिर्फ़ ताज ही नजर आए ....
लालकिले के उस जरोखे से हमने पहली बार ताज के दर्शन किए ।अब चलते है दुनिया के अजूबों में जिसका शुमार हो चुका है उस मोहब्बत के बेमिसाल कहानी ताज को देखने के लिए .......
एक बार याद रखे दिल्ही और आगरा के लालकिले और ताज दोनों शुक्रवार को बंद होते है ।बसों को काफी दूर लगभग ३ किलोमीटर दूर खड़ा किया जाता है .वहां से आपको बेटेरी से चलनेवाली बसों में ताज के मुख्य दरवाजे तक ले जाते है इससे प्रदुषण पास के इलाके मैं थोड़ा कम हुआ है . वहां से टिकर लेकर अन्दर जाते है तो हर एक व्यक्ति की पुरी तरह सामान के साथ जांच पड़ताल की जाती है . सुरक्षा का इंतजाम है .एक और लंबे रस्ते पर चलकर अब हम आ चुके है लाल पत्थर से बने एक विशाल दरवाजे के सम्मुख ...और सामने है ताजमहल ....!!!
क्या देशी क्या विदेशी ? ताज उन सब के लिए एक अप्रतिम आकर्षण बना हुआ है जिनके सीनेमें एक प्यार भरा दिल धड़कता है ।न भी धड़कता हो पर वह इंसान ये देखने जरूर आता है की ऐसी तो कैसी दीवानगी थी जिसके चर्चे सारे जहाँ में हो रहे है ....थोडी सी सीढियाँ चढ़कर बस रुकिए सामने ताज नजर आता है .वह ताज जो हमारे देश की पहचान का प्रतीक है .व्यावसायिक फोटो ग्राफर आपको घेर लेते है अलग अलग पोज़ में खींची हुई तस्वीर के एल्बम दिखाते है .निजी केमेरा वाले लोग अब जूट जाते है ताज को तस्वीर में कैद करके याद को अपने साथ ले जाने के लिए .आप फिल्मों में ,तस्वीरों में तो ताज की सैर करही चुके हो पर आज उसके बगीचे की मुलायम घास पर चलते हुए फव्वारों को देखते हुए ताज के निकट ....
एक छोटे से दरवाजे के बाहर जूते उतारकर ताज में प्रवेश कीजिये ।कुछ अल्फाज ताज की शान में :
ताज !!
एक दास्तान है तू ...!!
संगेमरमर पर तराशी हुई ...
मोहब्बत -इश्क -प्यार जिस नाम से पहचाने वह कहानी है तू ...!!
शाहजहाँ और मुमताज की ये दास्ताने मोहब्बत है ,
श्वेत संगेमरमर की पाक रूह की तरह ...
नक्काशी उसकी कोई शायर की रुबाई है ...!!!
नजाकत है ऐसी ...
सूरज से तप जाता है और ठंड उसे और सर्द बनाती है ....!!
सदियाँ बीत गई बस तू तो यूँही खड़ा रहा ...
दो प्यार भरे दिलों की दास्ताँ अपनेमें समेटे हुए ....
अय मुमताज तेरी तारीफ मैं जो कसीदे पढे होंगे शाहजहाँ ने ,
फूलों की बेलें बनकर आज भी ताझा है ....!!!
अय चाँद तेरी चाँदनी जब पूरे शबाब पर होती है ....
जैसे तुममें ही घुल कर रह जाती है ताज...!!!
तब कुछ यूं लगता है ...
ताज सिर्फ़ मुमताज-शाहजहाँ की नहीं है कहानी .....
प्यार मैं धड़कते हर दिल की दास्ताँ है यह ...!!!
पयमाना है जो हरदम यूँही छलकता रहेगा ...
इंसान की हस्ती रहेगी इस जहाँ में जब तक ....!!!
ताज सिर्फ़ देखने के लिए नहीं अहसास को महसूस करने की भी जगह है ।हो सके तो पूर्णिमा की रात को जाए .उस वक्त टिकट शायद ५०० रूपये होती है . ताज के विशाल आते में बैठ कर तकरीबन आधे घंटे तक जमुना नदी को निहारा .यहाँ पर सबसे ज्यादा विदेशी लोग पाए गए ...
ताज में जो ऊपर के मजले पर कब्र बनी हुई है वह नकली है ,असली कब्र तहखाने में है जो अब देखने के लिए बंद किया जा चुका है। मैं जब unmarried थी तब १९८२ में वहां पर गई थी तब मैंने उस असली कब्र को भी देखा था . आज २००५ में जब अपने पतिदेव के साथ गई तब ताज को समज पाई ...
इसके अलावा यहाँ पर राधास्वामी का मन्दिर है जो बरसों से बन ही रहा है ॥पर हम वहां पर नहीं गए थे ।पैकेज टूर होने के कारण बाज़ार देखने का मौका नहीं मिला .डेढ़ घंटे ताज महल पर रुकने के बाद हम वापस चल दिए ...
हाँ आप इधर से ताज की प्रतिकृति जैसे छोटे ताज को जरूर ले जाए .और पेठे भी खाए जो मोहब्बत की मिठाश लिए होते है .....
-मेरे ताज !!! तुम ही रहोगे सरताज !!!