दृष्टिकोण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दृष्टिकोण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

1 अक्टूबर 2014

ये कहने को तो तस्वीरें है दो …



ये कहने को तो तस्वीरें है दो  … 
पर नजर आते है मुझे जीवन के रस्ते दो  … 
एक पहाड़ी ऊँचा नीचा टेढ़ा मेढ़ा चढ़ता उतरता  … 
एक मिलों तक देखें बस एक ही नजरमे सीधे सीधे ,
दूसरे में अगले मोड़ पर क्या होगा क्या है का पता नहीं  … 
एक में चढ़ते हुए आहिस्ता आहिस्ता ,
उतरते भी पैनी नज़र से ,
दूसरा तो चंद  मिनट या घंटे लेता ,
अभी इधर से अभी उधर तक  … 
सफर तेज तर्रार और वक्त की  तेज रफ़्तार  ,
गति में जीवन कहीं पीछे छूट जाता है ,
न रास्ता न मंज़िल दिलचस्प नज़र आता है  … 
और ये टेढ़े मेढ़े रस्ते ठीक हमारे जीवनसे है  ,
कब क्या हो ये भी नहीं खबर  ,
अनजाने से डर के साथ भी लगती खूबसूरत ये डगर  … 
सुस्त होता है एक्सीलेटर पर बड़ा ही चुस्त इंसान अपने अंदर  ,
ये कठिन डगर का मौसम हमें जच जाता  है  ,
पर फिर न जाने क्यों हमें जीवनमे एक्सप्रेस हाइवे ही भाता है  ???
तेज गति सफर का मज़ा कहाँ देती है ,
पता नहीं कौनसी मंज़िल की तलाश में जिंदगी दर ब दर दौड़ती रहती है ???
न हो कठिनाई तो जीवन बेस्वाद बन जाता है ,
सरल रस्तेसे मंज़िल पर जाने का मज़ा भी अधूरा सा रह जाता है  …
(ये तस्वीरें मैंने माउन्ट आबू के रस्ते पर खींची थी और दूसरी एक्सप्रेस हाइवे पर। …)

17 सितंबर 2012

आगे आने वाले दिनों की एक झलक

दो दिनसे अख़बारकी एक खबरने दिलो दिमाग पर हलचल मचा दी है ...वो ये है की रसोई गेसकी सिर्फ छ सिलेंडर सबसिडीके दामों पर मिलेगी ...तो मुझे वो सुनहरे दिन याद आने लगे ..पचास रूपये में ढाई लीटर पेट्रोल भरवाती थी ..और चालीस रूपये में पुरे दस दिनकी सब्जी आती थी ...बारह रूपये एक लीटर दूध मिलता था ....अब तो पांच दिनकी सब्जी सौ रूपये खा जाती है और पैतीस रुपये होने जा रहा है ....पेट्रोल की तो पूछो मत ...
तो आगे आने वाले दिनों की एक झलक :
लोग सिर्फ पब्लिक ट्रांसपोर्टका प्रयोग कर रहे है ..और उसमे भीड़ के कारन पैदल चलने का चलन बढ  गया है ..सड़के खाली दिख रही है ....प्राइवेट वाहन जो नहीं चल रहे है ....सायकलकी बिक्री देशका सबसे बड़ा कर प्राप्त करने का साधन बन चूका है ....लोग अब पत्ते और घासफूस खाना वो भी कच्चा ही शुरू कर चुके है ...ताकत बढ़ गयी है पैदल चलने की कसरत से और सब दुबले पतले है घासफूस खाने के कारन ...गेस सिलेंडरकी जरुरत ही नहीं पड़ती ..सोलर का चलन बढ़ गया है .......
पता नहीं अब सांस लेने पर भी टेक्स न लग जाए !!!! एक आम आदमी ख़ुदकुशी कर ले उसके लिए एक प्लेटफोर्म बन चूका है .....अब ऐसा दिन भी दूर नहीं जब इंसान सिर्फ एक बार खायेगा और एक बार नहायेगा ...और जंगल ढूंढेगा घासफूस के चक्कर में ....और हम जहाँ से शुरू हुए थे वहां पर पहुँच जायेगे ...!!!!!!

5 फ़रवरी 2012

....एक छोटा सा सपना

आज वक्तको पंख बांधकर उड़ाना है जल्दी जल्दी ... बस इंतज़ार है की वो वक्त वो घडी मेरे सामने आ जाए अभी अभी ...पर वक्त की अपनी रफ़्तार है ...जो अभी मुझे जरुरतसे ज्यादा धीमी लग रही है .....
एक लम्बे अरसे के बाद मैं मेरी जन्मभूमि पर जा रही हूँ ...सिर्फ दो घंटेभर का रास्ता है पर ये दूरी तय करने में मुझे शायद तेईस साल लग गए ...एक्का दुक्का जाना हुआ पर उसकी गलियोंमें घुमने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पाया ...उसे नजदीकसे देखने का महसूस करने का वक्त नहीं था ...पर इस वक्त मुझे वक्त छिनना है ...वक्तके हाथो से ....मुझे मेरी जन्मभूमि को बदला हुआ देखना है ....
उस मिटटी पर मेरी पहली सांस थी जहाँ पर एक कुत्ते पर सस्सा चढ़ आया था और बादशाहने शहर बसाया था ...हाँ अहमदाबाद .....बहुत जल्द चार पुरे दिनका वक्त बटोर कर सिर्फ घुमने के लिए ..एक बंजारे की तरह घुमने के लिए ...कंधे पर जोला लटकाकर , उसकी बसोंमें घूमते हुए शहर को देखने ....
बहुत सी यादें है वहां की मेरे जहनमें ...पर मैं और मेरी दोस्त ....गर वो मशरूफ रही तो अकेले ही ....
बस ...मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते है ..एक छोटा सा सपना सच हो जाए तो !!!!!

17 मई 2011

एक शाम खुद के नाम ..

एक शाम कुछ अलगसी थी ...जो जिन्दगीका मतलब समजा गयी ....
बस कल यूँही फॅमिलीके हमउम्र ग्रुपके साथ यहाँके लोकप्रिय स्पोट कमाटी बाग़ जाना हुआ ...छोटे बड़े मिलकर सत्रह का ग्रुप था .....वेकेशन है ...कड़ी धुप जो बादलोंके चादर ओढ़कर कुछ और गर्मी बढा रही थी ...पर कहते है ना की बचपन हर गम से बेगाना होता है ......
छोटे छोटे बच्चे ...कुछ याद और कल्पना आये ...अपनी मम्मीको कितना तंग किया होगा ना !!! ये कपडे ही पहनेंगे !!! ये जूते के साथ ये जुराबे चाहिए ...कितनी शर्तें रखी होगी ...आप हमें इस राइड में बिठाओगे ...हमें आइसक्रीम भी खिलाओगे ना !!! और फिर वो ख़ुशी राइडमें बैठकर मम्मी पापा के सामने हाथ हिलाना !!!
बहुत छोटी बातें है ये पर हमें उम्र के वो पड़ाव पर फिर ले गयी या ले जाती है ......पिकनिक का पूरा माहौल था ...फिर लॉन पर बैठकर वो सब चीजों को खाना ...और बड़ोका बच्चे बनकर खेलना ...मैंने भी कुछ खेल खेले ...खास तो प्लास्टिक का हवा भरा हुआ बोल उछालने का आनंद ही कुछ और होता है ...थोडा बेडमिन्टन भी ....
कुछ भी खाने पिनेमें मेरी दिलचस्पी नहीं रही ....पर हां वो छोटे छोटे बच्चो को केंडी खिलाने का मजा ही कुछ और था ....

कल एक अजीब अनुभूति भी हुई ...जब झूले और राइड वाले हिस्से में गयी तो मैं अपनी कल्पना में ही सही हर राइड पर बैठकर खुद को देख रही थी ...चीख और चिल्लाने का शोर मुझे नहीं सुनाई देते थे ...बस भीड़ में तनहा होने का आनंद वहीँ मिला .....ऊपर लिखी सारी बातें उधर ही मैंने महसूस किया .....
सच बचपन और वेकेशन मुझे बिना कहीं जाए वहीँ मिला खुश होकर मेरे गले लग गया ......


आई लव यु वेकेशन ....आई मिस यु वेकेशन .....

8 मई 2011

माँसे मैं तक का सफ़र ....

माँ से मैं तक का सफ़र ........
माँ के गर्भमें उसके खून मांससे सींचकर बनता हुआ एक पिंड ....जिसमे जान है उस माँकी ....ये जानते हुए भी की इस अंशको धरती पर लाते हुए उसकी जान तक का जोखिम है फिर भी वो परवाह नहीं करती ...उसके जीवनका सर्वोत्कृष्ट पल है माँ बनना है ....
बस उसी माँ को एक दिनके लिए लाड दुलार जतानेकी लिए पश्चिमी संस्कृति की ये इजाद है ...मधर्स डे .....मे महीने का दूसरा रविवार ......हम भी इसी रंगमें रंगकर एक दिन उसके नाम कर देते है ...और ये तोहफा हम उसे देते है जिसने अपनी जिंदगी हमारे नाम कर दी है ...उसकी एक संतान हो या दस उसने कभी फर्क नहीं किया ...उसका प्यार कभी नहीं बांटा गया ....उसने हमें अपने वजूद का एहसास दिलाया ...अपने दूधसे हमें सींचा जब हमारे मुंहमें दांत और पेटमे आंत नहीं थे ...कोई संतान इस दूध का कर्ज चुकाती है और किसीके मुंह से ये दूध सुख जाता है ....लेकिन माँ के लिए ये कुछ भी मायने नहीं रखता है ...उसके लिए उसकी संतान की हँसी ही सब कुछ है ...चाहे वो माँ को भूले या याद रखे .....
माँने हमें मैं बनाया ...मैं प्रीति ..मैं ख़ुशी ...मैं राज ...मैं राहुल ...मैं गुड्डी ...मैं आशा ....ये मैं .......
हमें मैं बनाने के लिए कितनी जद्दोजहदसे गुजरना पड़ता है वो हम तभी जान पाते है जब हम खुद माँ या बाप बनते है ....साडी में लिपटी माँ से जींस और कुर्ती पहनी मोम के एहसासमें कोई अंतर नहीं होता ....और धोती कुरता पहने पिताजी से शोर्ट्स और टी शर्ट पहने डेडके एहसासों में भी नहीं होता ....हां पहले के माँ बाप कितने ही मशरूफ क्यों ना हो वो अपने संतानों को खास करके माँ अपना पूरा वक्त देती थी ...लेकिन आजकी वर्किंग वुमन और महत्वकांक्षी डेड ये प्यार खिलौने ,पिज़ा ,बर्गर ,मल्टी प्लेक्स ,पॉकेट मनी में देते है .....लेकिन संतान को तब भी एक लोरी की जरूरत थी माँ के होठोसे निकली और आज भी जरूरत है उन कहानी की जो दादी रात को सुलाते सुलाते परियोंके देश में ले जाया करती थी ...वो बहेन जो भाई को बापू की मार से बचाया करती थी ......वो सायकल जो पिताजी कर्ज लेकर बेटे के लिए ला देते थे .......
आज मैं की अपनी निजी जिंदगीमें फ़ोकट की दखलअन्दाजी करती हुई माँ को वृध्धाश्रम आश्रय देते है ....लेकिन खुद का नाम भी वहां एडवांसमें दर्ज करा दो .....क्योंकि आज कल हर जगह बुकिंग का जमाना है ......जो हमें अपने माँ बाप को देते हुए देखा है हमारे संतानोंने वही वो लोग हमें देंगे ....कांटे बो कर आप फूलों की आशा मत रखना उनसे ....गर चाहते हो उनसे भी प्यार जो बुढ़ापे में सबसे ज्यादा जरूरी है अपनी संतानसे तो अपनी माँ को जरूर प्यार दे ...और हां हमारी माँको अपने पति का स्वाभिमान भी प्यारा है ....पिताजी की इज्जत नहीं करोगे तो माँ चाहते हुए भी तुम्हे कभी प्यार नहीं दे पाएगी .....
माँ से मैं तक का सफ़र हमारी जिंदगी के अंत तक चलेगा जो माँ के बगैर संभव नहीं .........

5 मई 2011

नाम : निनाद ....

कभी कभी कुछ नाम ऐसे होते है की जो अचानकसे हमारे जहनमें गूंजने लगते है ...एक बहुत ही अलग एहसास जुडा हुआ होता है .....
एक ऐसा ही नाम है निनाद ....बहुत कम याद आता है ...पर जब भी याद आता है मेरी सोच उसके इर्दगिर्द ही घुमती है ...और ऐसे नामकी कोई भी व्यक्ति मेरे जीवनसे ना जुडी हुई है और नहीं आई है ...फिर भी मुझे ये नाम बेहद पसंद है ....निनादका मतलब ऊँचा पहाडी स्वर ...जो सम्पूर्ण लागु कर सकते है पहाडीसे बहते हुए झरनेके सूर पर ... एक एकताल पर बजता हुआ संगीत जो कभी एक सूर भी नहीं चुकता ....वो सारे नज़ारे मेरे जहन में उभरते है जो मैंने देवप्रयाग और कश्मीरके प्रवासमें देखे है ...पहलगामके बीचोबीच बहती लिद्दर नदी उसका उदाहरण है .....निनाद को कभी सुनकर देखो ...जब आधी रात को आप नींदसे जागते हो ...पूरा वातावरण मौनकी चादर लपेटे हुए होता है ...तब आँखे बंदकर खुद के अन्दर झांककर देखो ...अन्दर धीर गंभीर एक आवाज सुनाई देगी ...ॐ ..................
षड्ज ....सारेगामाके साथ सुर का पहेला सूर ..........सूरोंका सरताज है ये .... और निषादमें मुझे विषाद सुनाई देता है ...इस लिए वो नाम कुछ कम पसंद है पर षड्ज आज भी दिल के करीब .....
उतना ही पसंद है दो और नाम ...स्वर और स्वरा ........संगीत मेरे लिए हर मर्ज़ का इलाज है ...जब खूब दुखी हो जाती हूँ तो मेरे पसंदीदा गीत पुरे जोश से पुरे सुर के साथ गाना मुझे पसंद है ...गाने भी मूड से मेच होते है पर लगता है कोई मिल गया एक खुबसूरत साथी सा .......संगीत खनकता है उसमे .....जो लोग मुझे पसंद है उसे मन ही मन में कहती हूँ स्वर या स्वरा .....
प्रीति .......ये मेरा खुद का नाम है ....जिसका अर्थ है प्यार ...दुनिया को आज उसकी जरूरत है ...जिसे देने में ज्यादा मज़ा आता है ...लेकिन सबको ख्वाहिश होती है की वो सबसे मिले और वो भी किसीको दिए बिना .....लेकिन प्रीति ...प्रेम का एहसास है जो हरदम मेरे वजूद के साथ है ......और कहता है मुझे
हर पल यहाँ जी भर जियो जो है समां कल हो ना हो ......

हाँ एक और नाम पसंद है मौन .........
ख़ामोशी ....जहाँ कोई आवाज नहीं होती ..होती है एहसासकी गूंज ...उस गूंज को सुनकर देखो कभी ...उसमे बांसुरी से लेकर वायोलिनके जलवे होते है ....और शोर में कभी खुद में खो जाओ तो आपको जरूर सुनाई देगी ये ख़ामोशी की सदा .....मौन नितांत मौन ......

3 मई 2011

गुलमहोर

गुलमहोर
शायद इस गर्मीमें मुझे इससे प्यार हो गया ....बचपनसे उसके साये में चली थी ...कूदती मचलती चलती रही थी ...पर आसमांमें देखनेकी आदत ना थी उन चुलबुली राहों पर ....छोटी छोटी तितलियाँ लुभाती थी मुझे बेतहाशा ...बड़ी बड़ी झाड़ियोंमें बिना सांप बिच्छुके डरे बस तितलियोंके पीछे दौड़ना .......
पर हां इस गर्मी में पसीनेसे तर होकर मैं बस थोडा सामान भरा हुआ थैला लेकर सड़क पर गुजर रही थी ...मेरी नज़र सामने एक गुलमहोर के पेड़ पर पड़ी ...उसके ऊपर गुलमहोरके एक नहीं कई गुलदस्ते खिले हुए हँसते हुए नज़र आये ...मेरे कदम कुछ पल के रुक गए ...मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी ....लेकिन फिर मेरे पिताजी के घर में छत पर बैठे हुए मेरी नज़र फिर एक ऐसे ही पेड़ पर ठहर गयी ...सुबह उठकर उससे नज़र से बात करती ...वो बहती हवा के साथ अपनी टहनी झुलाते हुए मेंरा सलाम कुबूल कर लेता .....
एक सोच आई उस वक्त .......
हम ग्लोबल वोर्मींग जैसे मसलो को चर्चा का विषय बनाकर एक वातानुकूलित कमरेमें बहस करते है....पर ये गुलमहोरके खिलने का तो वक्त ही है ये कड़ी धुप ही है ...जितनी कड़ी धुप उतना ही उसका हुस्न निखरता है ....खट्टे स्वादकी उसकी पंखुड़िया कभी कभी रस्ते पर से चुनकर खाने का मजा भी लिया है .....उसके कई पेड़ मेरे घर के पाससे गुजरते रास्तों पर थे वो याद आ गए ......
वैसा ही हमारे बीच रहते कुछ इंसानोंके साथ भी होता है ....वो जिंदगीकी कड़ी धुप जैसी परीक्षा की घडी में भी हमेशा हसते रहते है ...जिंदगी की कड़ी धुपसे वो और खिल जाते है ...हम उनके जैसे बनना जरूर चाहते है पर उन कड़ी धुप को झेलना नहीं चाहते ....
जिंदगीकी गर्मी से कड़ी धुपसे कुछ ऐसे लड़ा जाए ,
कड़ी धुपमें एक हरे भरे पेड़ की टहनी पर गुलमहोर बनकर खिला जाए ....

29 नवंबर 2009

२०१२- प्रलय ....फ़िल्म रिव्यू ...

२०१२ -प्रलय .....

हिन्दीमें डब की गई ये फ़िल्म परसों देखी ...एक कल्पनातीत फ़िल्म ....तकनिकी दृष्टिसे सराहनीय ...और जिस तरहसे पर्यावरणके साथ बेख़ौफ़ होकर हम खिलवाड़ कर रहे है उसका दुष्परिणामका सही चित्रण ....ज्यादातर फ़िल्में हकीकत के बीज पर बनती है ...पर पुरी दुनियाका विनाश हो रहा है ये कल्पनाका इस फ़िल्ममें चित्रण है जिसकी ज्यादातर छूट पुट घटना तो अभी भी हो ही रही है ...ऑस्ट्रेलियाके जंगल की महीनो तक न बुझने वाली आग ...भूकंपके प्रचंड झटके ...और सुनामी ...फ़िर भी हमारी आँखें नहीं खुली है ....

मुझे बात करनी है मनुष्य स्वभाव का चित्रण ...

१.... एक घने जंगलमें एक मोबाइल वान में रेडियोस्टेशन चलने वाला सर फिरा इंसान ...जिसे बचाव के ठिकानो का पता है ...नकशा और सारी जानकारी होने के बावजूद वह ज्वालामुखी के विस्फोटका आंखों देखा हाल देखते कहता है की ये नज़ारे का मैं साक्षी हूँ ....और मौत को गले लगा लेता है ....

२...फ़िल्म का हीरो जिसका तलाक हो चुका है उसका अपनी पत्नी ,बच्चे और पत्नी के नए बॉय फ्रेंड के साथ जान बचाने का जुगाड़ भी दिलचस्प ...कभी कभी आधी अधूरी जानकारी होनी भी जान पर खेल जाते वक्त कितनी उपयुक्त साबित हो सकती है इस बात को उस बॉय फ्रेंडके प्लेन चलानेके ज्ञानसे जोड़ सकते है ...

३...सभी विकसित राष्ट्रप्रमुख का सुरक्षित जगह रवाना होना ...और आम आदमी का हतप्रभ होकर अपने को इस प्रलय में विलीन होते देखना ..हमें विचलित कर देता है क्योंकि हम भी उसी आम आदमीके हुजूममें शामिल है .सिर्फ़ पैसे वालों को ही जान बचाने का हक़ मिलता है ...आदमी का स्वार्थी होना ...और वक्त के अनुसार रंग बदलना बखूबी दिखाया है ....

४... पर हर हाल में जान बची तो लाखों पाये इस उक्तिको सार्थक करता हीरो आख़िर तक जो संघर्ष करता है उसी कारण हमारी सभ्यता बच सकती है .....

अगर हम आज से इस बात को समजें तो आने वाली पीढ़ी को कुछ और साँसे दे सकेंगे ....

देखिये एक बार जरूर ...

6 जनवरी 2009

औरत : एक दृष्टिकोण

हम हमेशा यही कहते हैं की औरत को हमेशा दुसरे स्तरकी नागरिक समजा गया है .उसे पुरुष सामान हक्क नहीं मिल रहे है .इससे जुड़ी हुई समस्याओं की बात तो बहुत ही हो चुकी है पर ये समस्या क्यों सुलज़ नहीं पाती है उसकी वजह मेरी दृष्टि से ये है की :


क्या इस के लिए सिर्फ़ पुरूष ही जिम्मेदार है ? हम औरतें नहीं ?क्या कभी किसी औरत ने अपना हक़ मांगने की कोशिश भी की है ?नहीं !! आगे से जो चली आ रही चलने दो ...मैंने और आपने ये भी देखा है की कई मुश्किलों का सामना करते हुए जिस औरत्ने पुरूष वर्ग को चुनौती दी है और अपनी काबिलियत दिखाई है उसे समाजने पूरे सम्मान से उसका सही स्थान दिया ही है । झाँसी की रानी से लेकर पेप्सिकी सी यी ओ इन्द्रानूयी ही क्यों न हो ???


लिस्ट बहुत लम्बी है ...कहना सिर्फ़ इतना है की दुनिया झुकाती है झुकाने वाला चाहिए फ़िर चाहे वह पुरूष हो या स्त्री ....

शुरुआत करते है स्त्री भ्रूण हत्या से ... क्या ये भ्रूण हत्या के लिए केवल पुरुषवर्ग ही जिम्मेदार है ? स्त्री बिल्कुल बेकसूर है ? पहली बात स्त्री भ्रूण हत्या के लिए तैयार ही क्यो होती है ...घर वालों के दबाव से ? ये हमेशा सही नहीं ..ज्यादा तर पाया गया है की स्त्री ख़ुद पुत्र की लालसा लिए होती है चाहे वह सास हो ,माँ हो ,बीवी हो या बहन !!!दहेज़ के लिए जिन्दा जलाई जाने वाली लड़की किसी सास या ननद की त्रासदी का शिकार पायी जाती है ...जब वह अपने मायके में इस बात की इत्तिला करती है तो ज्यादातर माँ बाप ये मांग के आगे झुक जाते है या अब तो पति का घर ही तेरा घर है कहकर उसे वापस भेज देते है और ये काम माँ ही करती है ..जरूरत है अपने उस बेटी को पनाह दो .क़ानून की मदद लेकर लड़ लो अपने हक़ के लिए ..शुरुआत में तकलीफ जरूर होगी पर धीरे धीरे ये बड़ी जायेगी जरूर ...इस लिए अपनी बेटी को शिक्षित बनाये ,स्वावलंबी बनाये और अपने हक़ के लिए लड़ना भी सिखाये ....

अब एक और सवाल :

क्या स्त्री अपने अस्तित्व के लिए जागरूक है ? हमें अपने स्त्री होने पर गर्व होना चाहिए .बेटी को जन्म देने वाली हर माँ को तहे दिल से खुशी होनी चाहिए .और ये सबके लिए मशाल ख़ुद स्त्री को ही उठानी है ...

हमारी सामाजिक संस्थाएं जो ये काम करती है वहां के कार्यकर्त्ता क्या ख़ुद स्त्री जागृति के बारे में अपने जीवन में अमल करते है या दो दो मुखौटे भी पहनते है ? ये जानना भी जरूरी है .सरकार ने तो स्त्री पर होने वाले अत्याचारका सामना कर पाए उसके लिए कायदे बनाये है पर उनका लाभ लेने की आम औरत की हिम्मत नहीं होती ....कारन सिर्फ़ सामाजिक अस्वीकृति ???

औरत हमेशा डरती है क्योंकि वह आर्थिक रूप से स्वायत्त नहीं होती ..दूसरा कारन उसकी परवरिश ही बचपन से दुसरे दर्जे के नागरिक की तरह होती है .पुत्र और पुत्री में ख़ुद माँ ही भेद करती है ।

एक औरत दूसरी औरत का हाथ थाम लेगी तब ही स्त्री न्याय पा सकेगी । बलात्कार से उत्पीडित स्त्री की सबसे बड़ी उलाहना तो दूसरी स्त्री वर्ग से ही होती है .जहाँ उसे प्यार और साथ की जरूरत होती है ,आश्वासन की जरूरत होती है वहां पर उसे नकारा जाता है । यहाँ पर माँ बहन पड़ोसी सब मिलकर प्यार से उसके साथ खड़े होकर एक जिंदगी को मुर्जाती बचा सकते है ...

ये चर्चा बहुत लम्बी हो सकती है पर समापन की और बढ़ते हुए मैं कहूँगी :

१ मैं एक रुढिवादी परिवार से आई लड़की थी पर मैंने लंबा संघर्ष करके पोस्ट ग्रेज्युएट तक की पढ़ाई पुरी की ।

२ मेरे ख़ुद एक बेटी ही संतान है वह भी मेरी इच्छा से ही ...मेरे परिवारमें भइया के भी सिर्फ़ एक बेटी है और मेरे मायके में मेरे भाई के भी सिर्फ़ एक बेटी ही है ...क्योंकि हम सब मानते है की हमें एक संतान की जरूरत है न की बेटा या बेटी की .....

३ हमें हमारे आने वाले कल का पता नहीं होता तो हम मृत्यु के बाद के नर्क या स्वर्ग की फिकर क्यों करे ?

हम औरतें ही औरत की राह और चाह बन सकती है :

कोमल स्पर्श ,कोमल ह्रदय और कोमल भावना है मेरी पहचान जो हर कठिन कार्य को मक्खन सा मुलायम बनाकर आसानी से मंजिल तक पहुंचाने की क्षमता रखती है ....

हाँ मैं औरत हूँ : फूल से भी कोमल और वज्र से भी कठोर ...

आपकी जिंदगी की पहली साँस से आखरी साँस तक आपके साथ अलग अलग रिश्तों के रूप में मिलने वाली एक संजीवनी यानी की मैं एक औरत .....

मुझे नाज़ है अपने नारी होने पर ...

मुझे गौरव है नारीत्व का ...

गरिमा मेरे आत्मगौरव की अब बनेगी पहचान ......

5 जनवरी 2009

औरत : एक दृष्टिकोण

कल से आगे ............

बस ये एक बात है जो आजके जेट युग में हर व्यक्तिको सोचने की खास जरूरत है .हम पूरी दुनिया के बारेमे जानने का दावा करते है पर क्या हम ख़ुद को बराबर जान पाये है ?कभी ये कोशिश भी की है ?

चलो आज कुछ बिल्कुल सीधे सादे इन सवालों को अपने आप से पूछे .इसे रेपिड फायर राउंड बनाये .ध्यान रहे जिस पल ये सवाल ख़त्म हो तुरंत ही जवाब मनमे आ जाना चाहिए ,एक सेकंड भी ना छूटे बिचमे ......

१.मुझे कौनसा फूल पसंद है ?

२.मैं कौनसी चीज सबसे अच्छी कर सकती /सकता हूँ ?

३.मुझे कौनसा रंग पसंद है ?

४.मैं क्या नहीं कर सकती/सकता हूँ ?

५.मैं किस बात से बेहद खुश होता /होती हूँ ?

६.मुझे क्या करना कभी पसंद नहीं होगा ?

७.मुझे किस बातसे बेहद गुस्सा आता है ?

८.मेरी जिंदगी का मकसद क्या है ?मैं जिंदगी से क्या चाहता हूँ ?

९.क्या मैं अपने आपको पूरी तरह से सही मायने में जानता /जानती हूँ ?

जवाब आपने ख़ुद को देने है । पर मेरे कहने का मतलब इतना है की ये छोटी सी लगने वाली बातें आप ठीक तरहसे सोच सकते हो ,समज पाते हो ,और हो सके तो उसका अनुसरण भी करते हो तो आप की सोच धीरे धीरे ही सही पर एक सही दिशा में जायेगी .और इस तरह सही दिशामे सही वक्त पर कदम रखते है तो असफलता का विकल्प बहुत ही कम आएगा आपके सामने .आप सफलता को तो पा ही सकते है पर अगर कभी असफल होते है तो भी आप जल्द ही अपने आप को संभाल कर जल्दी आगे बढ़ सकते है ,निराशा से उबार सकते है ....

और यदि एक बार हम अपने आपको समज लें तो फ़िर दूसरी व्यक्ति को भी समजने में आसानी हो जाती है .और ग़लतफहमी भी कम ही होती है ।

इसके साथ दूसरी एक चीज़ भी समजानी बेहद जरूरी है :

क्या आपकी सोच किसी व्यक्ति विशेष ,कोई अन्य चीज जैसे की टी वि ,अखबार ,नोवेल ,लेखक की विचारधारा से प्रभावित है या स्वतन्त्र है ?

अगर आप ज्यादातर स्वतन्त्र सोचते है तो ठीक है ।

पर अगर हमेशा किसीसे प्रभावित होकर चलते है तो पहले अपनी सोचको स्वतंत्र बनाओ .भले मामूली हो पर ख़ुद की हो ऐसी सोच हो ,मामूली सा ही सही पर अपना स्वतन्त्र व्यक्तिव हो ये जरूरी है ।

आज का मूल सवाल अब आता है :

इस दुनिया में औरतका एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह स्वीकार कितने लोग कर पाये है ? हम में से ही !!!! आपको ये जान कर जरा भी ताज्जुब नहीं होना चाहिए की इस बात से ज्यादातर औरतें कभी नहीं सोच पाती है ...क्यों ?

...........................................चर्चा जारी रहेगी ..अगले प्रकरण तक इंतज़ार ...!!!

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...