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25 जून 2011

कुछ तस्वीरें सिक्किम में ..









पहली तस्वीर न्यू जलपाईगुडी की और जाता हुआ तीत्सा नदी से गुजरते रस्ते की है ...

दूसरी तस्वीर छान्गू लेक की है ......

तीसरी तस्वीर बाबा मंदिर के बाहर की है ...ये एक सैनिक की याद में बनाया गया है ...इसमें आज भी सालो के बाद उस सैनिक की आत्मा है ऐसा कहा जाता है और वहां पर पानी की बोतल ले जाते है भोग चढाने के लिए ...



सिक्किम की ओर रुख करें तो !!!

माय ड्रीम डेस्टिनेशन ......अ विजिट टू सिक्किम .......
हम गुजराती लोग को दार्जिलिंग चाय कुछ जचती नहीं है ...बिलकुल फिक्की लगे ...क्योंकि दूध से भरपूर कड़क मीठी पिने की आदत ठहरी ...लेकिन हां उसे लेमन टी बनाकर पिने का मजा भी हमने दार्जिलिंगमें सिखा ....तीन दिनमें तो सारा दार्जिलिंग घूम लिया ....फिर बाज़ार में घूमते घूमते पता चला गंगटोक यहाँसे सिर्फ चार घंटे के रस्ते पर है ...और वहां से जलपाईगुडी आरामसे जा सकते है ...कभी सुना या देखा नहीं था वो जगह पर हम तीनो अकेले जाने के लिए रवाना गए चौथी सुबह को ही ....टेक्सी मिलती है पर हेड उस वक्त सिर्फ सवा सौ रूपये चार्ज किया था .....जैसे स्टेट बदला पहाड़ोका रूप भी बदल गया ...अब स्टेप पर बने खेत आ रहे थे ....पेड़ भी बदलने लगे ...बोर्डर पर वेल ड्रेस जवानोने स्वागत किया .......
दोपहरमें पहुचे गंगटोक के टेक्सी स्टैंड पर .....पतिदेव एक अच्छे होटलमें ठहराने का इंतजाम करके आये ...मजे की बात तो ये है की यहाँ स्टिप ढलान पर बनी होटल जितनी ऊपर दिखती है उतनी है अन्दर यानि की हमारी भाषा में तहखानेमें भी निकलती है ...हमें पेंट हाउस जैसा कमरा मिला ......पहले नहाना धोना हुआ ....फिर बाहर शाम पॉँच बजे ही अँधेरा होने लगा ...जब बत्तियां जली तो लगा अरे वाह !!! ये तो हम सितारोंके बीच ही रहने को आ गए यार !!!!फिर खाना नाश्ता करके निकले तब पता चला राजकोटसे आया एक गुजराती फेमिली भी यहाँ ही ठहरा है ...सच कहे हमें वतनसे तक़रीबन ढाई से तीन हजार किलोमीटर पर वो हमारे स्वजनसे बिलकुल कम नहीं लगे ...फिर हमने दुसरे दिन का प्लान बनाया ...वहां से बाबा मंदिर देखने का प्लान किया ...फिर निकल पड़े तीनो गंगटोक की सैर को ....बाप रे एक रोड से दुसरे रोड पर जाने को भी चढ़ाई थी ....वहां रिक्शा तो मिलने से रहा ...चढ़ते रहो बच्चू .....एक होटल पर लिखा था गुजराती थाली ......हँसी आ गयी ....पहुच गए ...पता था दो सब्जी पंजाबी दाल और रोटी एक थाली में परोसे जायेंगे ...और हो जाएगी गुजराती थाली ....पंजाबी पकवान गुजराती नाम ....फिर भी मजा आया ...सफ़र का येही तो मजा है ...गुजराती लोग का ये प्रवास प्रेम ही था की ये गुजराती थाली की खोज नहीं करनी पड़ती ...खाना खाकर एंवे घूम रहे थे ...रस्ते और लोग दोनों डिसिप्लिन वाले थे ...उस दिन दीवालीका अगला दिन काली चौदस थी ...सब दुकान पर लाईट लगा रहे थे ...चहल पहल बिलकुल नहीं थी ....

उस दिन मुझे गुजरात ...मेरा सूरत ...और मेरा वड़ोदरा बहुत याद आ गया ...इस दीवाली कितने दूर थे हम ...कितनी रौनके लगती है गुजरात में पर यहाँ लगता ही नहीं था की दीवाली कल है ....फिर रात आठ बजे मुझे चाय पिने की इच्छा हो गयी ...एक छोटे से होटल के बाहर लिखा था चाय मिलेगी ...मजे की बात तो ये है की मेरे परिवार में सिर्फ मैं ही चाय पीती हूँ ...पर वहां तीनो पहुंचे ...चाय बनाने को कहा और थोड़ी कड़क भी ....बाहर अचानक एक गुजरातकी बोली में आवाज सुनी ....अरे अहिं चा बा मलवानी के नहीं ??? मेरे पति देव ने अन्दर से ही आवाज लगाईं ....आवी जाव अहिं मली जशे ....एक बुजुर्ग उसके डॉक्टर बेटे के साथ आये ....ना जान पहचान पर एक बोली ने बांध दिया हमको ....हमने साथ चाय पी और जैसे कोई दोस्त हो ऐसे वो हमें उनके होटल के रूम पर ले गए ....बातें ऐसे हुई जैसे बरसों से जान पहचान हो ......आज भी मेरे पति उनसे फोन पर बात करते है ...मिया बीवी डॉक्टर थे ...उनका फंडा अच्छा लगा ...पूरा दिन घुमने के लिए महंगे होटल में ठहराने की कोई जरुरत नहीं .....वो लोग प्रवास का असली लुत्फ़ लेने के लिए हमेशा सेकण्ड क्लास में ही घूमकर आनंद लेते है ....

दुसरे दिन सुबह हमारे साथ ठहरे राजकोट के फेमिली के साथ हम बाबा मंदिर देखने रवाना हुए ...ड्राईवरने कहा ऊपर बर्फ वर्षा हो रही है ...दीवाली का सबसे बड़ा त्यौहार था .....उस दिन मैंने सुमो की खिड़की से जो नज़ारे देखे वो मैं शब्दोंमें बयाँ नहीं कर सकती ....ये एरिया पूरा मिलिटरी के कब्जे में है ...पत्थर पर बने रस्ते में जितने ऊंचाई उतनी ही गहराई ...बीचमे बादल के ऊपर हम ...बादल नीचे हम ऊपर ...लगता था वेनीला आइसक्रीम बिछा है ....वहां से छान्गू लेक पहुंचे ...वहां पर हमें किराये पर और कपडे जेकेट ,जूते वगैरह लेने थे क्योंकि ऊपर बारह हज़ार फीट पर बर्फ वर्षा हो रही थी ....नाथुला पास जहाँ पर चाइना बोर्डर है वहां जाने को एक दिन पहले अनुमति लेनी पड़ती है जो वक्त हमारे पास नहीं था तो सिर्फ बारह हजार फीट के बाबा मंदिर पर बरफ की वर्षा को देखते हुए पहुंचे .....सांस थोड़ी फूल रही थी ....पर मजा आ गया ....बर्फ को महसूस की बारिश के रूप में .....चार चार गर्म कपडे पहन कर भी ठण्ड लग रही थी ....दोपहर तक वापस लौटे ...शाम को हमसब ने दीवाली पर्व पर समुह्भोजन किया ..मैं चूरमा के लड्डू ले गयी थी ...उस लड्डू को खाते हुए सब खुश हो गए की चलो दीवाली सच्चे अर्थ में मनाई गयी ......
दूसरी सुबह न्यू जलपाईगुडी के लिए निकलना था ...सुबह बारिश हो रही थी फिर भी निकल पड़े ...सामने लिखा था गुजराती ढोकला मिलेगा ....गए तो कहा थोड़े आगे एक और दुकान है ...बारिश में ढोकले को ढूँढने का ये ट्रेजर हंट भी मजेदार रहा ...गए तो वो तो खमण था ...हँसे फिर भी खाने की मजा ली ....दोपहर एक अच्छी जर्नी के साथ फिर कोलकाता के लिए ट्रेन पकड़ने टेक्सीमें रवाना हो गए .......
वैसे सिर्फ सिक्किम भी जाओ तो वहां युम्ठुम वेल्ली भी है ..और कई हसीं जगह है ...पर हमारे पास सिर्फ एक दिन था तो हम येही देख पाए ...गंगटोक शहर भी अच्छा लगा .....जहाँ नाम तक ना सुना हो उसके बारे में कुछ भी ना सुना हो ऐसी जगह पर जाने का रोमांच ही कुछ और होता है ....गर मौका मिला तो जरूर एक बार सिर्फ गंगटोक जाना चाहूंगी ....आई लव हिमालय अ लोट .........
लोग भी अच्छे ...और प्यारे ...भारत सचमुच हर कौने में अपना अलग सौन्दर्य बिखेरता है ....जाकर महसूस करो ....

25 मई 2011

तो आप है दार्जिलिंगमें ....

मेरी जिंदगीके सफ़र का सबसे अच्छा जो पड़ाव था चलो आज उसकी सैर करें ....
ये बात है सन २००३की ....हम वड़ोदरासे दिल्ही और वहांसे न्यू जलपाईगुडी पहुंचे ...दिल्हीमें छ घंटे का होल्ट था तो हम सामने लालकिला और चांदनी चोककी सैर करके आये ..फिर सफ़र शुरू हुआ यु पी और बिहारसे गुजरता रास्ता ....बिहारमें देखा की रिजर्वेशनकी धज्जियाँ उड़ जाती है ...और बर्थ पर पैर रखकर बन्दर की तरह बेलेंस करते टॉयलेट तरफ सफ़र कैसे होता है ....जब रातमें ट्रेन गुजरी थी तो कोई प्लेटफोर्म पर बत्ती नहीं .....डर भी लगता था ....दो रात और दो दिन के सफ़र के बाद रात साढ़े तीन बजे हम न्यू जलपाईगुडी पहुंचे तब राहत की सांस ली ...दो घंटे बाद दार्जीलिंग की ओर यात्रा शुरू हुई .....मेरी जिंदगी का सबसे स्वप्निल सफ़र .....
राजेश खन्ना की आराधना देखी होगी तो मेरे सपनों की रानी गाना याद होगा ...वही रास्ता ....कितने बड़े पहाड़ ....मसूरी की छोटी छोटी चोटियाँ यहाँ पर बहुत ही बड़े बड़े पहाड़में तब्दील हो चुकी थी ....और क्या बयाँ करें हम उन वादियोंकी खूबसूरती को !!!! शब्द कम ही पड़ेंगे ...रस्ते में बिलकुल छोटे छोटे पर बेहद सुन्दर आकर के घर ...वो छोटे छोटे खुबसूरत स्कुल जाते बच्चे ....बस टेढ़े गोलाई वाले रास्तो से गुजरता कारवां .....बाजु में छोटी तोय्य ट्रेन का रास्ता ....बाप रे दार्जिलिंग ....
भाई आप को चलने की आदत है ...आपकी पैर की पिंडिया वर्जिशकी आदत रखती है ??? यहाँ रिक्शा नहीं मिलेगी ...क्योंकि रास्ता सड़क भी एकदम सीधी ऊँचाइयों का है ...अरे पॉँच बजे सूरज सर पर आ जाता है और शाम को पॉँच बजे तो घना अँधेरा ...दो दिन तो ये सब एडजस्ट करने में ही जाता है ...वहां पर देखने वाली हर जगह पर आप को टेक्सी करके ही जाना पड़ता है ...शेरिंग में सौदा अच्छा रहता है ....कलिंगपोंग पासमे अच्छा स्थल है पर वहां नहीं जा पाए ...मशहूर टी गार्डन की सैर कर सकते हो ....तेनसिंह रोक पर रोक क्लाइम्बिंग का मजा भी लो ....वहां सुन्दर रोक गार्डन भी है जहाँ कुदरती झरनोंसे धोध बने है ...पर आप अगर मैदानी इलाको से गए हो तो चढ़ाई काफी तकलीफदेह सिध्ह हो सकती है ......खाना बहुत स्वादिष्ट नहीं मिलता ....वहां पर एक गौतम बुध्ध की मूर्ति काफी अच्छी है ...अगर मौसम साफ़ रहा तो वहां से कंचनजंगा शिखर भी दीखता है ....
वहां सूर्योदय देखने का रिवाज और मजा है ...सन राइज पॉइंट पर आपको सुबह साढ़े तीन बजे पहुंचना जरूरी है क्योंकि अक्तूबरमें वहां सुबह पौने चार बजे सूरज महाशय पधारते है ....वैसे हम गए उस दिन बरसात का मौसम था तो बादल की वजह से उदय देखना संभव नहीं हुआ ......सोचो होटलसे रात ढाई बजे निकलके एक घंटे का सफ़र करके खाली हाथ लौटना !!! खैर बीच रस्ते में आने वाले बगीचे और दो बौध्ध मंदिर खुबसूरत मंदिर देखे ....उस वक्त हम बिलकुल बादलों के बीच से गुजर रहे थे ...हमें बादल स्पर्श करके गुजर रहे थे ....कितना हसीं एहसास था बयाँ नहीं कर सकते उसका .......बादलों के बीच से गुजरना था या लगता था आज कल पांव नहीं पड़ते जमीं पर ....रस्ते टेढ़े टेढ़े जलेबी जैसे ....बस ये एहसास जहाँ में बाकी है .....
चार दिन वहां रहेनेके बाद एक अचानक की गयी सबसे खुबसूरत जगह की सैर करेंगे फिर एक बार ...अगले भ्रमण में ....आप चलेंगे ना मेरे साथ !!!!!

18 अक्टूबर 2009

मथुरा वृन्दावन =पावन श्रीकृष्णधाम

मथुरा वृन्दावन !!!!

ये दोनों नाम सुनते ही हर आस्थावान का सिर श्रध्दा से जुक जाता है ।आँखों के आगे माखन चोर नन्हें नटखट कनैया से लेकर कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता ज्ञान देते श्री कृष्ण की छवि राम जाती है ....

सौभाग्य से इस परम पावन भूमि पर दो बार मैं जा चुकी हूँ ...

इस वक्त की समग्र यात्रा का वर्णन मेरी १९८२ की यात्रा पर आधारित है ।जब मैं अपने माताजी और पिताजी के साथ गई थी .पिताजी ने बहुत ही अद्भूत और रोचक संस्मरण लिखा है जिसका हिन्दी में भावानुवाद आपके समक्ष पेश कर रही हूँ ,मेरी कलम आज विराम लेगी :

यमुनाजी के घाट पर विश्राम घाट पर आरती के दर्शन के लिए जाना यही एक अविस्मरनीयअनुभव है ।यमुना का नीर मट्टी से मिला हुआ था पर आस्था उन सबसे ऊपर है .यहाँ पर अधिक गुजराती यात्री आने के कारण यहाँ के चौबे ,महंत , गाईड सभी शुद्ध गुजराती भाषा में बातचीत करते थे ...

वासुदेव मध्यरात्रि को कृष्ण के जन्म के बाद इसी यमुना से गुजरकर सामने वाले किनारे गोकुल पहुंचे थे ये कल्पना जहन में साकार होने लगी ...

हाँ यही यमुना थी जहान पर कृष्ण ने कालीय नाग का दमन किया था ,वह ग्वालों के साथ खेले थे ।गोपियों की मटकियां फोडी थी ,माखन चुराया करते थे ...

द्वारकाधिश के बड़े मन्दिर में दर्शन करे ।बाज़ार बंद था .मन्दिर के मैदान में ही बैठ गए .बहुत ही प्राचीन मन्दिर पर इतना लुभावना !!इसके बड़े से घुम्मत पर श्री कृष्ण के जीवन प्रसंग चित्र स्वरूप में बनाये गए थे ...

दूसरा है कृष्ण जन्मस्थान का मन्दिर ।उसके पीछे एक मस्जिद बनी हुई है .कहा जाता है कौमी दंगो के दौरान दोनों ने एक दूसरे के धर्म स्थानों को सात बार नष्ट किया था .आख़िर कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ये मन्दिर बन गया . (२००५ में अति भव्य स्वरूप हमने दोबारा देखा .ये अति भव्य मन्दिर है जो हमें श्री कृष्ण जन्म के वक्त टी वी पर लाइव टेलीकास्ट में दिखाया जाता है ).उस वक्त डोंगरे महाराज ,बिरला और दाल मियां ने २२-२२- लाख रुपये दान में दिए थे .दूसरे दानों का तो कोई हिसाब नहीं ...

कृष्ण जन्म वाली जेल को यथा स्वरूप रखा गया है ।वहां पर मेरी ऑंखें अश्रु से भर गई . मेरा जीवन धन्य हो गया ...ये ऐसी जगह है जहाँ पर हम आस्था के साथ जाते है तो कृष्ण जन्म के समय को भी अनुभूत कर सकते है ...हमारा रोम रोम जैसे एक बिजली जैसे कंपित हो जाता है .... यहाँ से आधे घंटे की दूरी पर वृन्दावन है ।पुरी जगह श्री कृष्ण लीला के साथ गूँथ ली गई है ।यहाँ पर गौ चराने वाले ग्वाले की लीला अब तक अमर हो चुकी है .वहां पर अनेक गौशालाएं है . यहाँ पर बूढी गायों का वध नहीं होता ,उन्हें पाला जाता है .मथुरा की बेटियाँ मथुरा में ही हो सके वहां तक ब्याही जाती है ...

वृंदावन है मंदिरों की नगरी ।अगर आप सप्ताह भर भी रुके तो मन न भरे .गाईड ने हमें मुख्य मन्दिर ही दिखाए ...

रुगनाथका मन्दिर ॥आगे बड़ा सा आँगन और विशाल कमाने ..अन्दर दाखिल होते ही कृष्ण भक्त मीरा बाई की मूर्ति जो डोल रही थी उसका सुंदर पुतला ।पीछे रेकॉर्ड बज रही थी "मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई ..."

एक बेहद खूबसूरत जगह ।मीरा बाई के पदों की पंक्ति याद आती रही .जीवन से जिसे वैराग्य हो चला था वो कृष्ण में लीन हो चुकी थी .भक्ति जब दिल की गहरायिओं से जागती है तो मोह माया के सारे आवरण से मुक्ति मिल जाती है .जो प्रभु के शरण में जाता है उसका कोई कुछ बिगाड़ नही सकता .आज कृष्ण और मीरा कहाँ है ????रह गई है उनकी भक्ति की अमर गाथाएं ...

एक के बाद एक मन्दिर देखते चले गए ।हर जगह आराम से बैठ ने को दिल करता था लेकिन वक्त की पाबन्दी थी ...

वृंदावन के रस्ते बिल्कुल कुञ्ज गली कहलाने के लायक ही है ।संकरी गलियों में से होकर गुजरते रहो .यहाँ पर बांसुरी की धुन पर गोपियाँ कैसे दौड़ी होगी ! कैसे रासलीला करते होंगे कृष्ण !!! बस एक कल्पना ही आती रहती है . कहा जाता है अभी भी पूर्णिमा की रात को वृन्दावन के जंगल में कृष्ण का महारास होता है . जो उसे देखने की कोशिश करता है वह जिंदा वापस नहीं आता है ...

रस्ते में एक विधवा आश्रम भी आया । यहाँ निराधार २००० विधवाओं का पालन पोषण किया जाता है . उन्हें प्रातः थोड़ा काम करके पूरे दिन भक्ति में बिताना होता है .यहाँ पर दान भी मिलता रहता है ...

एक और दाउजीका बड़ा मन्दिर है जो भक्त गण के जाने पर खोला जाता है । अब तो २००५ में और भी कई सुंदर मन्दिर बन गए है पर वक्त की पाबन्दी फ़िर बिच में आ गई थी ...

श्री कृष्ण जिसका महात्म्य अब पूरे जगत ने स्वीकार किया है वहां पर जाने पर दोनों बार मैंने देखा अभी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । सरकार ने इन पुरी जगह के रखरखाव और धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा के हिसाब से कोई ध्यान नहीं दिया है . यहाँ जाने के लिए आस्था ही बड़ा काम करती है पर जगह की दुर्दशा को देख कर मन थोड़ा भारी हो जाता है ....

कल हमारा नव वर्ष है और फ़िर भाई दूज ...अब दो दिन के विराम के बाद मिलना होगा ...

आप सबके लिए आने वाला नव वर्ष हर खुशी लेकर आए ये मंगल कामना करते हुए ...

आप सबको मेरा नूतन वर्षाभिनंदन ......

17 सितंबर 2009

चलो गरबा जोवा .....

चलो आज हमारे शहर वडोदरा की ही सैर कराती हूँ ...एक छोटी सी जगह है पर एक सुकून सी उसको गले लगाने वालो के लिए ....हम सब जानते है की शनिवार से देवी पूजा का पर्व नवरात्री शुरू हो रहा है ....दुर्गा ,काली, अम्बिका ,वैष्णो देवी और कितने नाम है ...पर जैसे की सब जानते है गुजरात की धरती पर ये गरबा उत्सव के रूप में मनाया जाता है और आज ये गरबा महोत्सव की सैर पर ले चलती हूँ ....

एक छोटा सा छेदवाला मिटटी का घडा ..उसमे एक दीपक प्रगटाकर उसे माँ अम्बा के तस्वीर के सामने रखा जाता है ...इस घडे को गरबा कहते है ...रात को सभी औरत और मर्द इसके इर्द गिर्द गोला बनाकर माँ की स्तुति करते हुए जो गीत गाते है उसे गरबे के नामसे जाना जाता है ...दो एक घंटे तक इस तरह नौ दिन तक आराधना की जाती है ...अंत में आरती होती है और प्रसाद बांटा जाता है ....आज भी गुजरात के छोटे छोटे गाँवमें इसी रूपसे गरबा गाया जाता है ....ये गरबाका प्रारंभिक रूप है ...

लेकिन वर्तमान में ये रूप बदल चुका है ...इसे भी ग्लोबलायिज़शन का रंग चढ़ चुका है ...इसे पुरी तरह कोमर्सिअल कर दिया गया है ...पर फ़िर भी ये गरबा एक जूनून लेकर आता है यहाँके लोगोंके दिलो दिमाग पर ...गणपति उत्सव के तुंरत बाद इसकी तैयारी में युवा जुट जाते है ....यहाँ नवा बाज़ार करके एक खास बाज़ार है जहाँ पर गरबे के लिए खास पोशाक और गहने मिलते है ...लड़कियां हो या औरते यहाँ पर गरबा घुमने के लिए चनिया -चोली और चुनर का परंपरागत पोशाक पहनती है ...और बिल्कुल गांवठी किस्म के गहने पहने जाते है ...लड़के एवं पुरूष कुरता चूड़ीदार पजामा ,या धोती , पगड़ी तक बांधते है .... छोटी सी एकडेढ़ साल की बच्ची से लेकर हर व्यक्ति गरबेमें येही ड्रेस कोड अपनाता है ....बनाव श्रृंगार और ब्यूटी पार्लर वालों की तो निकल पड़ी है .....रोज नया ड्रेस और पुरा माहौल एक रंगों की बारिश सा बन जाता है ...

ये गरबा गाने के लिए भी ग्रुप होते है ...उसके सिंगर्स कई महीनों से नए और प्राचीन गरबोंको सूरों में बांधते हुए नए गरबे गाने की होड़ में लगे रहते है ...जिसका गरबा सबसे सुरीला होता है उस मैदान पर भीड़ गाने वालों की और देखनेवालों की सबसे अधिक जमा होती है ....जिसमे प्रमुख नाम है अतुल पुरोहित और अचल मेहता ...ये लोग भी पॉँच आंकडे में अपना मेहनताना लेते है ...गरबे के स्पोंसरार्स होते है ...वहां पर खाने पिने के भी स्टाल्स लगते है ....रात दस बजे से रात के एक बजे तक ये रात को हम दिन में तब्दील कर देते है ....

ये जो गरबा नृत्य किया जाता है वह स्टेप्स और हिंच कहा जाता है ...उसके स्टेप्स को ताली और बिना ताली के सिर्फ़ एक्शन के साथ सभी खेलने वाले एक ही ले में करते है गरबा गान के साथ साथ ....और एक के अन्दर एक ऐसे कई वर्तुल गोलाकार में गाया जाता है ...अंत में होता है भांगडा और गाड़ी भी ...आज कल ये गरबे बड़े मैदानों में आयोजित होते है ...और बहुत ही देश विदेश तक मशहूर हुए है ...इसमे युनैतेद वे ऑफ़ वडोदरा ,आर्की , अम्बालाल पार्क,मेहसाना नगर ,आदि गरबों में तो एक साथ बीस से चालीस हज़ार तक युवा एक साथ गरबा करते है ....अम्बालाल पार्क का गरबा मेरे घर के ठीक सामने वाले मैदान पर ही होता है ...इस जश्न की मैं हर साल साक्षी बनती रही हूँ ....

वैसे शेरी गरबे यानी की छोटी सोसाइटी या शहर की गलियों के गरबे का भी अपना अलग अंदाज़ होता है ...शहर की सडकों पर भी ऐसे गरबे आयोजित होते है ...जहाँ ड्रेस कोड की पाबन्दी नहीं होती है ....पर ज्यादातर लोग चनिया चोली और कुरता पजामा ही पहनते है ......इसे शेरी गरबा कहते है ...जो प्राचीन गरबों से मिलता जुलता लगता है ...

यहाँ पर छोटे छोटे बच्चों के लिए भी अलग आयोजन का दौर शुरू हुआ है ..जहाँ बिल्कुल छोटे बच्चे जो रात को जग नहीं सकते उनके लिए शाम सात से दस बजे तक ये आयोजन गरबा के मैदान पर होता है ...पता है ऐसा लगता है फ़िर कृष्ण भगवान और गोप ग्वाले और गोपियाँ पधारे है ...ऐसे ही एक मशहूर गरबा अदुकियो ददुकियो का आयोजन मेरे घर के सामने होता है .....

यहाँ मांडवी नाम की जगह है जहाँ पर अम्बा माता का अति प्राचीन मन्दिर है वहां पर शाम आठ बजे से दस बजे तक सिर्फ़ पुरूष ही गरबा करते है ...बिना माइक या ढोल के ...ख़ुद ही गाते है ...वहां औरतों को गरबा करना वर्ज्य है ..यहाँ पर गायकवाड महाराजा ने दो मन्दिर बनवाये है ...एक बहुचाराजी और दूसरा पादरा कसबे के पास रानू गाँव में तुलजा भवानी का मन्दिर ...नवरात्री के दिनों में यहाँ पर बहुत ही भीड़ होती है .....

यहाँ के लोग व्रत अनुष्ठान भी करते है ..नौ दिन तक उपवास और विशेष आराधन और यग्य किए जाते है ...गायत्री माँ के अनुष्ठान होते है ...कई लोग गरबेके घडे का और जवारा का स्थापन करते है ...दसवे दिन उन्हें पुरे सम्मान से विदा करते है ....

भक्ति के रंग के साथ यौवन का उन्माद यानी की विश्व का सबसे लंबा चलने वाला ये त्यौहार नवरात्री ...

हर अच्छी चीज़ के साथ कुछ दूषण आ ही जाते है ...रात को देर तक लड़कियां बेफिक्री से घुमती हुई सिर्फ़ गुजरात में ही नज़र आती है .जो सभी के लिए एक आश्चर्य ही होता है ....जवानी के साथ कुछ जातीय स्वछंदता भी देखी जा सकती है ...उसके दुष्परिणाम भी आते है पर ऐसे कुछ किस्सों के कारण ये महोत्सवको बदनाम नहीं कर सकते क्योंकि ये पुर्णतः भक्ति से भरा होता है ...हमारी परम्पराओं को जिन्दा रखता है ...हमारे गरबे को विश्व के नक्शे पर नाम देता है ...रात को निरंतर तेज गति के नृत्य करने के बाद भी थकन नहीं होती ...दूसरे दिन सभी इतने ही उत्साह में नजर आते है ...ये माँ की भक्ति का ही प्रताप होता है ....

कभी मौका मिले तो इस महा उत्सव को देखने का आनंद जरूर लें ....

केसरियो रंग तने लाग्यो अला गरबा ......

तारा विना श्याम माने एक्लादु लागे ...

2 जुलाई 2009

वाह ताज !!!!!

दुनियाके नए सात अजूबों में जिसका शुमार हो चुका है उस ताज को अगर आप देखना चाहते हो तो आपको आगरा जाना ही पड़ेगा। संयोगसे मैं आगरा दो बार जा चुकी हूँ . एक बार १९८२ में और दूसरी बार गई २००५ में . लेकिन दोनों बार वह एक पैकेज टूर ही था .तो सिर्फ़ इस बार जट-पट घूमना भी देख लेते है .२००५ में दिल्ही में गुजराती समाज से ही सुबह जल्दी जाने वाली आगरा-मथुरा -वृन्दावन की टूर पर हम निकल पड़े .२०० किलोमीटर का सफर तय करने के बाद तकरीबन साढे बारह बजे के बाद आया आगरा . जहाँ पर सीधे ही लाल किले पर हम लोग पहुँच गए .
इस लाल किले की बनावट दिल्ही के लालकिले से ज्यादा बेहतर लगी । शाहें शाह अकबर ने इसे बनवाना शुरू कर दिया था .शाही गेट के सामने नोबत खाना और सलामी के लिए खड़े होने की जगह है .नीचे से ऊपर जाने के लिए एक सीधी चढाई का रास्ता है . वह इस लिए बनाया गया है की अगर दुश्मन ऊपर तक आए उससे पहले ही रोलर चलाकर उन्हें खत्म किया जा सके .आगे चलकर बादशाहों के शाही स्नान की जगह भी आती है .दीवाने आम ,दीवाने खास , मोती महल , बेगम के रहने के लिए सुंदर जनान खाना , बेटी जहाँआरा और रोशनआरा के लिए दो अलग कमरे ,मीना महल ,बस बेहतरीन वास्तुके इन नमूनों को देखते ही जाओ . बादशाह के ख़ुद के कमरों के तो क्या कहने ?!! शाही बेगम और बादशाह के नमाज पढने के लिए अलग से बनी मस्जिद ,शीश महल ,बैठने की बेंच भी जो संगेमरमर से तराशकर बनाई गई है . बादशाह के दीवाने आम में बैठने का सिंहासन जहाँ पर कभी मयुरासन ही हुआ करता था वह ऐसी जगह पर रखा है की वहां से दो दरवाजे जो प्रवेश करने के लिए है उनमेंसे किसीसे भी प्रवेश करने वाले व्यक्ति पर बादशाह की निगाह पड़ जाए .खम्भे और कमाने कुछ इस तरह बनाई गई है की किसी भी जगह से एक जैसे है नजर आती है . बेटे औरंगजेब ने शहंशाह शाहजहाँ को कैद करके आखरी वक्त तक इधर ही रखा था . वहां पर एक खास झरोखा भी बनवाया था जहाँ से शाहजहाँ ताजमहल को अपनी मरहूम बेगम मुमताज की याद को जो सामने वाले किनारे पर बनी हुई है उसे देख सके . कहते है शुरू शुरू में वहां पर हीरे और कांच को इस तरह से जड़ा हुआ था की जिस तरफ़ से देखे सिर्फ़ ताज ही नजर आए ....
लालकिले के उस जरोखे से हमने पहली बार ताज के दर्शन किए ।अब चलते है दुनिया के अजूबों में जिसका शुमार हो चुका है उस मोहब्बत के बेमिसाल कहानी ताज को देखने के लिए .......
एक बार याद रखे दिल्ही और आगरा के लालकिले और ताज दोनों शुक्रवार को बंद होते है ।बसों को काफी दूर लगभग ३ किलोमीटर दूर खड़ा किया जाता है .वहां से आपको बेटेरी से चलनेवाली बसों में ताज के मुख्य दरवाजे तक ले जाते है इससे प्रदुषण पास के इलाके मैं थोड़ा कम हुआ है . वहां से टिकर लेकर अन्दर जाते है तो हर एक व्यक्ति की पुरी तरह सामान के साथ जांच पड़ताल की जाती है . सुरक्षा का इंतजाम है .एक और लंबे रस्ते पर चलकर अब हम आ चुके है लाल पत्थर से बने एक विशाल दरवाजे के सम्मुख ...और सामने है ताजमहल ....!!!
क्या देशी क्या विदेशी ? ताज उन सब के लिए एक अप्रतिम आकर्षण बना हुआ है जिनके सीनेमें एक प्यार भरा दिल धड़कता है ।न भी धड़कता हो पर वह इंसान ये देखने जरूर आता है की ऐसी तो कैसी दीवानगी थी जिसके चर्चे सारे जहाँ में हो रहे है ....थोडी सी सीढियाँ चढ़कर बस रुकिए सामने ताज नजर आता है .वह ताज जो हमारे देश की पहचान का प्रतीक है .व्यावसायिक फोटो ग्राफर आपको घेर लेते है अलग अलग पोज़ में खींची हुई तस्वीर के एल्बम दिखाते है .निजी केमेरा वाले लोग अब जूट जाते है ताज को तस्वीर में कैद करके याद को अपने साथ ले जाने के लिए .आप फिल्मों में ,तस्वीरों में तो ताज की सैर करही चुके हो पर आज उसके बगीचे की मुलायम घास पर चलते हुए फव्वारों को देखते हुए ताज के निकट ....
एक छोटे से दरवाजे के बाहर जूते उतारकर ताज में प्रवेश कीजिये ।कुछ अल्फाज ताज की शान में :
ताज !!
एक दास्तान है तू ...!!
संगेमरमर पर तराशी हुई ...
मोहब्बत -इश्क -प्यार जिस नाम से पहचाने वह कहानी है तू ...!!
शाहजहाँ और मुमताज की ये दास्ताने मोहब्बत है ,
श्वेत संगेमरमर की पाक रूह की तरह ...
नक्काशी उसकी कोई शायर की रुबाई है ...!!!
नजाकत है ऐसी ...
सूरज से तप जाता है और ठंड उसे और सर्द बनाती है ....!!
सदियाँ बीत गई बस तू तो यूँही खड़ा रहा ...
दो प्यार भरे दिलों की दास्ताँ अपनेमें समेटे हुए ....
अय मुमताज तेरी तारीफ मैं जो कसीदे पढे होंगे शाहजहाँ ने ,
फूलों की बेलें बनकर आज भी ताझा है ....!!!
अय चाँद तेरी चाँदनी जब पूरे शबाब पर होती है ....
जैसे तुममें ही घुल कर रह जाती है ताज...!!!
तब कुछ यूं लगता है ...
ताज सिर्फ़ मुमताज-शाहजहाँ की नहीं है कहानी .....
प्यार मैं धड़कते हर दिल की दास्ताँ है यह ...!!!
पयमाना है जो हरदम यूँही छलकता रहेगा ...
इंसान की हस्ती रहेगी इस जहाँ में जब तक ....!!!
ताज सिर्फ़ देखने के लिए नहीं अहसास को महसूस करने की भी जगह है ।हो सके तो पूर्णिमा की रात को जाए .उस वक्त टिकट शायद ५०० रूपये होती है . ताज के विशाल आते में बैठ कर तकरीबन आधे घंटे तक जमुना नदी को निहारा .यहाँ पर सबसे ज्यादा विदेशी लोग पाए गए ...
ताज में जो ऊपर के मजले पर कब्र बनी हुई है वह नकली है ,असली कब्र तहखाने में है जो अब देखने के लिए बंद किया जा चुका है। मैं जब unmarried थी तब १९८२ में वहां पर गई थी तब मैंने उस असली कब्र को भी देखा था . आज २००५ में जब अपने पतिदेव के साथ गई तब ताज को समज पाई ...
इसके अलावा यहाँ पर राधास्वामी का मन्दिर है जो बरसों से बन ही रहा है ॥पर हम वहां पर नहीं गए थे ।पैकेज टूर होने के कारण बाज़ार देखने का मौका नहीं मिला .डेढ़ घंटे ताज महल पर रुकने के बाद हम वापस चल दिए ...
हाँ आप इधर से ताज की प्रतिकृति जैसे छोटे ताज को जरूर ले जाए .और पेठे भी खाए जो मोहब्बत की मिठाश लिए होते है .....
-मेरे ताज !!! तुम ही रहोगे सरताज !!!

18 मई 2009

भारत का दिल : राजधानी दिल्ही .....

जहाँ हमारे देशमे नई सरकार केन्द्र में बनने जा रही है उस देल्हीकी सैर पर चलें ????दिल्ही हमारे देश की राजधानी और भारत का दिल !!!! ठीक उसी जगह पर बसा हुआ है जैसे इंसानी जिस्म में दिल जहाँ पर बसा है । ऋषिकेश से हम बस यात्रा करते हुए निकले . रस्ते में ज्वालानगर ,रुड़की ,सहारनपुर ,मेरठ आदि शहरों के मध्य से होकर हमारी बस गुजरी. उन जगहों की झलक देखते हुए हम आखिरकार दिल्ही पहुँच ही गए . कश्मीरी गेट के पास अंतर्राज्य बस अड्डे पर हम उतर गए . वहां से पास ही 'गुजराती समाज' एक रुकने का सबसे बढ़िया विकल्प है . वहां पर रूम तो नहीं मिला पर door metary में जगह मिल गई . सामान सारा क्लोक रूम में रख कर हम थोड़ा नाश्ता पानी करके फ्रेश हो गए और निकल पड़े घूमने को . पैदल चलके दिल्ही -हरियाली दिल्ही को देखने का लुत्फ़ ही कुछ और है . बशर्ते यहाँ के ठग और गुंडा गर्दी से अवश्य सतर्क रह कर ही . थोड़ा थक जाओ तो साइकिल रिक्शा में घूमने का भी आनंद आता है . मेट्रो स्टेशन में जा कर हमने चार स्टेशन दूर शहादरा की टिकट लेली .बस हमें तो वह चमचमाती ट्रेन में एक बार घूमने का आनंद लेना था . यह ट्रेन कोलकाताकी तरह भूगर्भमें नहीं चलती पर जमीं से ऊपर चलती है . स्टेशन पर कदम रखो तो किसी विदेश में आ गए हो ऐसा महसूस होता है .कोई टिकट चेकर नही . अन्दर जाने के लिए मशीन में टिकट डालते ही अन्दर चली जाती है और दरवाजे से हम अन्दर जा सकते है .दूसरे छोर पर टिकट बाहर आ चुकी होती है उसे लेकर अन्दर चले जाओ .बहुत ही सुंदर और साफ सुथरी जगह है . नियत समय पर आई गाड़ी में सवार हुए . centrally airconditioned and throgh out pasaage वाली गाड़ी है . शहादरा उतर कर बाहर जाकर फिर वापस आए . फिर कश्मीरी गेट पहुँच गए . वहां पर तब भूगर्भ रेलवे मेट्रो का मार्ग बन रहा था . वहां पर खाली खाली ऐसे ही चढ़ने उतरने का बड़ा आनंद आया . फिर लौट गए . वहां पर परिसर मैं ही एक travel agency है जहाँ से हमें दिल्ही दर्शन ,वन डे टूर -आगरा ,मथुरा ,वृन्दावन के लिए जाने की सुविधा मिल जाती है . इस जगह परिसर में ही किफायती रूम में ठहरने की व्यवस्था के अलावा पूर्णतः गुजराती खाने की थाली ,चाय नाश्ता सबका प्रबंध है . इधर से आप उत्तरांचल जा रहे हो तो गुजराती नाश्ता भी अच्छा और सस्ता मिल जाता है .हमने दूसरे दिन सुबह की छोटी सी मिनी बस में दिल्ही दर्शन के लिए बुकिंग करवा ली . रात में डोरमेटोरीमें सोने का अनुभव कुछ अलग ही रहा . हमेशा सुविधा जनक स्पेशल रूम में रहते थे इस लिए थोड़ा अटपटा सी लगा पर अगर प्रवास में कोई असुविधा का सामना न करना पड़े तो मजा भी नहीं आता है .

दूसरी सुबह हमें रूम मिल गया । हम वहां पर तैयार हो कर दिल्ही दर्शन के लिए निकल पड़े . पहला पड़ाव था लाल किला . लाल किला -मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की एक ऐतिहासिक देन -भेंट भारत भूमि को .२००३ में हम यहाँ पर सिर्फ़ ६ घंटे के लिए ही रुके थे तभी हमने यह देख लिया था . दीवाने आम , दीवाने खास , रानियों के महल , राज सभा का स्थान , मयुरासन का स्थान , कला कारीगरी से भरपूर स्थापत्य , एक छोटा संग्रहालय, मीना बाज़ार सब देख लिया था अतः हम बाहर ही घुमते रहे .

यहाँ पर हमारा देश स्वतंत्र हुआ तबसे हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज तक के सब प्रधानमंत्री हमारे देश की शान तिरंगे के हमारे स्वतंत्रता के दिन फहराते है । उस गौरव पूर्ण पल की परिकल्पना कर रहे थे . ठीक सामने है चाँदनी चोक , वहां पर एक मन्दिर बहुत ही सुंदर है . अगर आप बार्गैनिंग में होशियार हो तो अच्छी और सस्ती चीजे यहाँ से खरीद सकते हो .पुरानी दिल्ही का अक्स आपको यहीं पर नजर आएगा . दिल्ही की चाट से लेकर छोले भटूरे तक का असली स्वाद आप यहाँ पर पा सकते हो . यहाँ पर हम लगभग पांच छ घंटे तक हमारे यहाँ के पड़ाव के अन्तिम दिन घुमे थे .

उसके बाद बाहर से ही जुम्मा मस्जिद को देखा । हमारे सभी महापुरुषों के समाधि स्थल पर भी गए तब मुझे यही ख्याल आया :

रहने को घर नहीं ,सोने को बिस्तर नहीं , खाने को नहीं पेट भर अन्न ॥ऐसे कई लोगों की जरूरत बन सके ऐसी हजारों एकर जमीं यहाँ पर मृत नेताओं की समाधि के पीछे लगाई गई है । बहुमूल्य पानी का उपयोग यहाँ पर हरियाली बनाये रखने किया गया है .?!!! हाँ महात्मा गांधीजी ,पंडित नेहरू , लालबहादूर शाश्त्रीजी की समाधि तक तो ठीक है की उन्होंने हमारी स्वतंत्रता के लिए मुख्य योग दान दिया था ..पर बाकी के ????

अब हमने इंडिया गेट का रूख किया , संसद भवन ,नॉर्थ ब्लोक ,साउथ ब्लोक , राजपथ को पैदल चलके बाहर से ही देखा । दिल्ही की शोभा यहाँ देश की राजधानी के अनुरूप ही है .उसके बाद सुप्रीम कोर्ट भवन , आकाशवाणी भवन बाहर से ही देखा . एम्बेसी मार्ग भी देखा . १,सफदरगंज ॥हमारी स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी का निवास स्थान जो हम अब राष्ट्रीय स्मारक के रूप में देख सकते है .सुंदर घर ,फर्नीचर और अलभ्य तस्वीरें देखने को मिली . उनकी हत्या हुई थी उस स्थान को भी देखा जिसे चारों बाजु से सुरक्षित कर दिया गया है .

तीन मूर्ति भवन - एक विशाल जगह में बना एक विशाल और आलीशान भवन जो हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का सत्तावर निवासस्थान था वो देखा । अत्यन्त सुंदर है . वहां इन्दिराजी के बचपन की यादें फर्नीचर के साथ सुरक्षित है .

हमारा अगला पड़ाव था बिरला हाऊस-महात्मा गांधीजी की उसी जगह हत्या कर दी गई थी । उनकी अन्तिम यात्रा चरणों को उभार कर दर्शाई गई है . हत्या के स्थल को भी ..... एक महान विभूति को मेरा कोटी कोटी वंदन !!!!

गाँधी स्मारक -महात्मा गाँधी के जीवन से जुड़ी हर चीज का एक अलभ्य संग्रहालय है । वहां पर गांधीजी के जीवन की हर दुर्लभ तस्वीर मौजूद है . लेकिन मैं अभिभूत हो गई गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद की तस्वीर से जहाँ देश की अखंडता और एकता के लिए एक इंसान ने अपने बहुमूल्य जीवन की आहुति दे दी और उसका नाम इतिहास के स्वर्ण पृष्ठ पर अंकित हो गया . एक इतिहास लिखने वाला इंसान इतिहास की गर्ता में विलीन हो गया ...

कुतबुद्दीन ने बनाया कुतुब मीनार हम कैसे भूल सकेंगे । पुरातत्व विभाग ने पुरा ध्यान देकर उसके रख रखाव का कार्य संभाला है . प्राचीन इमारत की तवारीख में दिल्ही के इतिहास के साथ इसका नाम भी अमर रहे उतनी आसमान को छुलेने वाली बुलंदी है इसकी ॥ पास में ही लोह स्तम्भ ४०० वर्ष पुराना लोहे का स्तम्भ पर आज तक जंग नहीं लगी है . बड़ा अच्छा ऐतिहासिक स्मारक है . रात में यहाँ पर लायिटिंग की जाती है तब ये और भी भव्य लगता है .

जब हम वहां गए थे तब वहां पर स्वामिनारायण मन्दिर का कम अभी पूर्ण नहीं हुआ था । पर अब ये भव्य मन्दिर भी एक दर्शनीय स्थलों की लिस्ट में शामिल हो चुका है . जंतर मंतर भी देख ही लो . ग्रह दशा में ऐसे घूमना-फिरना लिखा है या नहीं ???

भवानी गंज का कात्यायनी माता की शक्ति पीठ मन्दिर देखा । वहां पर एक द्वार ऐसा है जो सिर्फ़ चैत्र और अश्विन माह की नवरात्रि में अपने आप ही खुलते है और नवरात्रि के समाप्त होते ही बंद भी हो जाते है ।

एक भव्य इमारत जिसे हम लोटस टेम्पल कहते है वह भी देखा । खूब सुंदर और अवर्णनीय इमारत !! आखिर मैं हम इस्कोंन मन्दिर गए . वहां की भव्य संध्या आरती की . वहां के लाईट और साउंड शो को देखा . बहुत ही रोचक लगा . दिल्ही के भव्य मार्ग पर होते हुए रात को हम वापस आ गए हमारे पड़ाव पर .

एक दिन हमने स्वेच्छा विहार भी किया जब हम गए पालिका बाज़ार के airconditioned market और कोनोट प्लेस । खूब पैदल घुमे . लीची के फल का आनंद भी ले लिया . रिच और फेमस लोगों की यह शोप्पिंग की जगह है .

दिल्ही के लंबे चौड़े रस्ते , भव्य फ्लाई ओवर भुलाए नहीं भूलते ।खूब हरियाला शहर है ये नई दिल्ही . बस अगर न देखा हो तो एक बार तो देख कर आओ ...

नोट :आप इस जगह के चित्र गूगल इमेज सर्च से जाकर देख सकते है ...

9 मई 2009

सौन्दर्य की परिभाषा :गंगोत्री ...महेसूस कीजिये ...

जानकी चट्टी से होते हुए फ़िर एक बार लौट कर बारकोट आना पड़ता है. रात ठहर कर फ़िर सुबहमें हमारी यात्रा प्रारंभ हो जाती है .यमुनोत्री की चढाई थकानवाली रही .रात भर सभी बेखबर सो गए . एक और हसीं सुबह शुरू हो गई नए सफर के साथ .गंगोत्री तक जाने का रास्ता शुरू से ही बड़ा ही सुहाना है .उसके पेड़, रस्ते और पहाड़ की एक नई ही तासीर देखी.सूरज की मस्त किरणे हमारे शरीर को यहाँ जला नहीं सकती क्योंकि सर्द हवाएं उसे नर्म बनती रहती है . नीरव शान्ति का साम्राज्य है . मन के भीतर और खिड़की के बाहर .रस्ते में एक छोटा मन्दिर पड़ा . थोडी देर उतरकर पैदल चले . थोड़े और दूर जाने पर गुप्त गंगा का मन्दिर आता है ।छोटी सी चढाई है . बाद में एक छोटे से द्वार में होकर गुफा के अन्दर शिवलिंग है .पुरी जगह घुटनों तक पानी से भरी हुई है . ये पानी कहाँ से आता है और कहाँ जाता है यह रहस्य ही है . अन्दर टोर्च लेकर जाना पड़ता है . अँधेरा ही है . बाहर आकर सूखे पत्तों की बिछी कालीन पर चलते हुए और निर्मल बहते झरने का पानी पीते हुए हम फ़िर आगे चल पड़ते है .थोड़ा और आगे ....थोड़ा और आगे ... आगे चलने पर पहली बार गंगा का दर्शन हुआ .श्वेत प्रवाह ....जमुना का प्रवाह तो पुरा नीला था . और ये सफ़ेद ......बोलो गंगा मैया की जे !!!!!!!!

अब एक मैदान नुमा जगह आती है और ये है उत्तरकाशी ।थोड़े साल पहले यहाँ पर भूस्खलन के कारण एक पुरा चार मंजिला होटल खँडहर मैं तब्दील हो गया था .आगे एक पॉवर हाऊस आता है .

एक बार फ़िर प्रकृति करवट लेती है । हरी भरी वादी बड़ी बड़ी चट्टानों में बदल जाती है .तीव्र मोड़ ॥पथरीला रास्ता . दो विदेशियों को मोटर साइकिल पर जाते हुए देखा . उत्तरकाशीसे ३९ किलोमीटर की दुरी पर गंगनानी नामक जगह आती है .यहाँ पर गर्म पानी के कुंड है . अच्छी तरह पक्की बंधी हुई जगह है . महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था है . चाय नाश्ता भी कर सकते है . यहाँ नहा धोकर गंगोत्री जाना बेहतर है . और आगे का रास्ता फ़िर पथरीला है . एक शिला १०' x १०' के साइज़ की ऊपर लटक रही थी जाने का रास्ता ठीक निचे है . बाप रे ....एक बार तो सोच ही लेते है ..कहीं गिरी तो ?

हमारी गंगा तो पूरे मस्ती के माहौल से गुजर रही है। कहीं पर २५फ़ीत् तक चौडी तो कहीं पर चार फीट में सिमट कर १० फीट ऊँचे से छलांग लगाती है . बस देखते ही जाओ ...कहीं तीन चार अलग धारा में बंट जाती है और कहीं एक हो जाती है . अब शुरू होता है सात पहाड़ का सफर . रास्ता एक के बाद एक सात पहाड़ से गुजर कर आगे बढ़ता है . और उसके बाद शुरू होती है देवदार के ऊँचे पेडोंकी कतारें ...पहाडी हुश्न का एक और मकाम .कहीं कंही बर्फ बिखरी पड़ी है ॥ गंगा तो दिल खोल के गाती रहती है .

हमारे ड्राईवर ने कहा इस जगह का नाम हर्षिल है । ये जगह गंगनानी से ३२ किलोमीटर की दूरी पर है . यहाँ पर राज कपूर की प्रसिध्ध फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली ' की हिमालय के दृश्य वाला पुरा हिस्सा फिल्माया गया है .अब अगर सो रहे हो तो जाग भी जाओ . एक पुरानी फ़िल्म का सुंदर मुकेश वाला केसेट निकालो और बजाओ .प्रकृति की ये सुन्दरता के दर्शन बड़ी किस्मत के बाद मिलेंगे . भैरों घाटी ये इस सुंदर जगह का नाम .नीली जहान्वी और सफ़ेद गंगा का संगम है . मेरे इस लेख का शीर्षक यहाँ पर सार्थक होता है . यह पुरी वादी सौंदर्य की एक परिभाषा है ......

और अब हम पहुँच चुके है गंगोत्री .......

यमुनोत्री की कठिन चढाई यहाँ नहीं है । सीधे ही मन्दिर के द्वार के पास वाहन ठहरता है .अगर थोड़े जल्दी पहुंचे तो रात तक उत्तरकाशी लौट सकते है .गंगा का जो सौंदर्य आप यहाँ देखते है वह कहीं पर भी नहीं है .यहाँ पर गेस्ट हॉउस के अलावा इशावास्यम नामक जगह है जहाँ पर आप निशुल्क ठहर सकते है और भोजन भी निशुल्क ही मिलता है जाते हुए आप कुछ भी रकम स्वेच्छा से दान में दे सकते है . हम प्रायः गेस्ट हॉउस में ही रुके . फ्रेश होने के बाद गंगोत्री मन्दिर दर्शन करने गए . हमारा होटल गंगा प्रवाह और मन्दिर के दुसरे किनारे पर था . एक सुंदर पुल पार करके हम गए . बहुत ही खूबसूरत मन्दिर है . प्रसाद वगैरह लेकर भोजन के लिए इशावास्यम में गए . ये स्थान सुमुद्रतल से १०००० फीट से भी ऊपर है . पुरी बर्फ से लिपटी हुई ....आंखो से देखो और रूह से महसूस करो ....

अगर आप गौमुख तक जाना चाहते है तो रात्रि मुकाम के बाद दूसरी सुबह ५ बजे ही घोडे वाला तय करके निकल जाए तो शाम तक लौट सकते है । गौमुख यहाँ से १८ किलोमीटर दूर है . हमारे साथी कोई तैयार नहीं थे . दो दिन रुकना किसीको गवारा न था . अतः हमें तो इधर से ही दुखी मन से लौटना पड़ा था . लेकिन हम दोबारा यहाँ पर जरूर आयेंगे और पुरी यात्रा करेंगे .यहाँ पर दही एक छोटी कटोरी २० रुपये और गर्म पानी १५ रुपये ....

प्रकृति प्रेमी और ट्रेकिंग के शौकीन लोग के लिए एक टिप है ।गंगोत्री से ९ किलोमीटर चिरबासा (११८०० फीट ) , वहां से ५ k.m. (भोजवासा), और ४ k.m. गौमुख जरूर जाएं .यहाँ से आगे लगभग १४ k.m. लगभग उतने ही दूर है तपोवन नामक जगह (१४८०० फीट ) है जिसकी सुन्दरता को आप अल्फाजोंमें बयां नहीं कर सकते .

सुबह गंगोत्री मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम उसके किनारे पर गए । गंगा जल का आचमन किया . बड़े बड़े पत्थरोंसे बहती इस नदी का शीतल तम जल और अपार फैला हुआ विराट सुन्दरता का साम्राज्य ....!!!!जल को सर ऊपर चढाते वक्त में रो पड़ी . भगवान् को कहा THANK YOU GOD !!! मुझे आपने इतनी खुश नसीबी दे दी की मैं गंगा को उसके उदगमस्थान से देख पायी हूँ !!!! आप को मैंने यहाँ पर देख लिया है इस अप्रतिम शोभा के रूप में !!

वापसी में हम लौटे हर्षिल रुके लगभग डेढ़ घंटे । सेब के बागीचे है . और सुंदर झरनों के समान गंगा . रात में उत्तरकाशी लौटे . रुकने के लिए सुचारू इंतजाम है . जरूरत की सभी चीजें यहाँ पर उपलब्ध है . सुंदर बाजार है ....दूसरे दिन हम यहाँ के प्राचीन मन्दिर में दर्शन करने के बाद हमारे साथियों को अलविदा कहते हुए ऋषिकेश लौट चले ....

उत्तरांचल की यात्रा यहीं पर समाप्त .... लेकिन हमारा भ्रमण अभी ख़त्म नहीं हुआ है . और भी साथ घूमेंगे हम सब ...

29 मार्च 2009

हिमालय के हँसी नजारे : यमुनोत्री

अबकी बार हरिद्वार से टाटा सूमो किराये पर लेकर एक और परिवार के साथ हम निकल पड़े है . गर्म कपडे अबकी बार एक एक करके धीरे धीरे बाहर आ रहे है ...
अब हम सब जा रहे है श्रीकृष्णलीला में अपना नाम अमर कर जाने वाली और हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक हिमालय के चार धाम में एक धाम यमुनोत्री ....यमुना नदी का जन्मस्थान ...एक बार फिर मसूरी की वादियों से होकर हम कम्प्टी फालवाले रस्ते होते हुए गुजर रहे थे . पहाडों का कद अब बड़ा होने लगता है . कभी अपने घने जंगलों के लिए मशहूर हिमालय के पेड़ विलुप्त हुए दिखाई दे रहे है .कम्प्टी फाल से १५ किलोमीटर दुरी पर यमुना पुल से गुजरते हुए हम पहली बार यमुना नदी का दर्शन कर पाते है .चंचल बच्चों की तरह उछलने वाली और पहाडी राग में अपना गाना गति हुई नीले रंग के पानी वाली यमुना का जल श्रीकृष्णके सांवरे रंगसे मेल खाता दिखाई देता है .हरी भरी वादियाँ बस्ती से दूर जाते ही फिर लौट आती है . यहाँ के पेड़ पौधों की भी हर जगह अपनी अलग ही पहचान है . बर्फसे ढंके हुए हिमशिखरसे हम अभी बहुत दूरी पर है ...
यहाँ पहाडोमें रात्रि के आठ बजे के बाद ड्राइविंग वर्जित है . उस वक्त हम वहां के छोटे से कसबे बारकोट में पहुँच गए . यहाँ यात्रिओं के ठहरने के लिए होटल एवं धर्मशालाओं का पुख्ता इंतजाम है . रात्रि विराम वंही पर हुआ .यहाँ पर एक खास बात मैं उन लोगों के लिए बताना चाहूंगी जो मैदानी इलाकों से पहली बार पहाडों में आ रहे है .यहाँ का वातावरण मैदानी इलाकों से बिल्कुल भिन्न किस्म का होता है .यहाँ मोटर मार्ग से जाना पड़ता है और उस वक्त ऊंचाई पर जाते हुए घुमावदार रस्ते पर जब वाहन चढ़ते है तब कई लोगों को उलटी , वायु प्रकोप या जी मचलने की शिकायत हो जाती है . उसके लिए आप यात्रा के प्रारंभ से ही अपने फेमिली डॉक्टर से योग्य दवाएं आदि साथ रखे .सुबह के वक्त थोड़े नाश्ते के साथ वे दवाईयां लेले और रस्ते में खाना टाल दे .फ़िर रात्रि मुकाम के वक्त ही भरपूर भोजन कर लें .क्योंकि पहाड़ की आबोहवा से संतुलन बनने में हमारे शरीर को तकरीबन दो दिन का वक्त लग जाता है . अपने साथ पोलीथिन की बैग का बड़ा पैकेट ले ले ताकि अचानक ही उलटी आते वक्त आप उसमें ही उलटी कर सकें और बाहर फेक दे ताकि दूसरे यात्री को असुविधा या गंदगी न होने पाए .बारकोट से बड़ी सुबह हम लोग नाश्ता करके हम छोटी छोटी पहाडियों से गिरते हुए और निचे बहती यमुनामें मिलते हुए छोटे छोटे जरनोंको देखते हुए आगे बढ़ने लगे .हम एक जगह पर हम रुके . वहां एक छोटा सा प्रपात था जो ऊँची पहाडी से गिर रहा था . थोड़ा ऊपर चढ़कर हम उसके पास गए . चारों और पहाडोसे घिरे उस जरनेकी शोभा कभी न भुलाने लायक थी .वहां पर एक छोटी सी झोपडी में वहां के लोगों ने झरने के पानी को मोड़ दिया था और उसके प्रवाह से एक आटा पीसने की घंटी को चलाया जाता था . क्या कमाल था ये इंसानी दिमाग और उसके इस अनुठे उपयोग का !!
हरी भरी वादियों के साथ जूमते हुए हम पहुंचे स्यानाचट्टी नाम की जगह पर . वहां रुकने की व्यवस्था भी है . थोडी ही दूरी पार करने पर अब हम लोग पहुँच चुके है हनुमानचट्टी नामक जगह पर . ये बड़ी बसों के लिए अन्तिम स्थान है . यहाँ से १४ किलोमीटर की दूरी पर यमुनोत्री है . यहाँ से यात्रीओं के लिए टट्टू, जीप की सुविधा है . अगर आप निजी वाहन से जाते है तो और ७ किलोमीटर तक आप वाहन से जा सकते है . यहाँ एक और बात बताती हूँ की निजी वाहन किराये पर लेते वक्त आप यह जरूर तय कर लें की गाड़ी जानकीचट्टी तक जायेगी वरना ड्राईवर लोग यहांसे आगे जाने के लिए अतिरिक्त पैसे ऐंठते है . यहाँ से सात किलोमीटर पर जानकीचट्टी है . वहां पर रहने की सुचारू व्यवस्था होती है . मोबाइल धारक के लिए सिर्फ़ यहाँ पर बीएसएनएल टावर की सुविधा उपलब्ध है . यहाँ पर कोई नेटवर्क काम नहीं आता है . एस टी डी बूथ हर जगह होते है ...
हम पहुंचे उसके दूसरे दिन यमुनोत्री मन्दिर के द्वार अक्षय तृतीय के दिवस पर खुलने वाले थे . हम वहीं पर रुक गए . पास में ही यमुना नदी एक तूफानी झरने के समान बह रही थी उसे भी देखने चले गए . यहाँ के घर इस तरह से बने है की उसके अन्दर कम से कम ठंड लगे .लोग भी काफ़ी सीधे और मिलनसार होते है .इधर आते वक्त रास्ते में पहली बार बर्फ से आच्छादित हिमशिखर के दर्शन हुए . कैमरे बाहर आने लगे थे . कमरे के बरामदे से ही बड़े हिमशिखर के दर्शन हो रहे थे . जगह चारों और से ऊँचे पहाड़ से घिरे हुई थी . उस नयनाभिराम नजारों को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द भी कम पड़ रहे है. वह बन्दर पुच्छ की चोटी थी .यहाँ पर आप व्यक्ति दीठ कमसे कम तीन से चार गर्म कपडे रखे तो उचित होगा ...
आप किस्मत को मानते हो ? यहाँ पर मैंने अपनी जिन्दगी का सबसे अदभुत नजारा रातके वक्त देखा .ठंड बहुत ही थी .मेरे पतिदेव की नींद रात में अचानक खुल गई .वे बाहर गए और थोडी देर में वापस आकर मुझे जगाकर बाहर ले गए .वहां पर हमने जो आसमान का अदभुत नजारा देखा वह शायद में कभी भी भुला न सकूं !!! सारे सितारें जैसे सिर्फ़ एक एक फ़ुट की दूरी पर ही सजाये गए थे .उनकी चमक भी बहुत ही ज्यादा थी और वे हमारे एकदम ही नजदीक नजर आ रहे थे . हम जैसे सितारों की इस बारात में ही शामिल हो गए थे .पीछे बर्फ के आच्छादित हिमशिखर भी एकदम स्पष्ट नजर आ रहा था .मध्यम रौशनीवाली इतनी सुंदर रात मैंने कभी भी न देखि थी न देखूंगी शायद !!!! सिर्फ़ एक शब्द ही जुबान पर था !! लाजवाब !!
हम दर्शन के लिए सुबहमें रवाना हुए . मेरे पतिदेव और बेटीने पैदल जाने का फ़ैसला किया और मैंने आगे चलकर कंडी ले ली .सात किलोमीटर तक की ये चढाई बिल्कुल सीधी है .रास्ते की चौडाई सिर्फ़ पांच फीट तक की है .इसी में से टट्टू , पालखीवाले , कंडीवाले , और पैदल यात्री आने और लौटने वाले गुजरते रहते है .सरकारने पेवर ब्लाक वाले रस्ते बनाना तब शुरू कर दिया था .बीचमें पानी से भीगे पत्थरवाले चिकने मार्ग पर भी चढ़ना पड़ता है .ये चढाई को चारों धाम में सबसे कठिन चढाई गिना जाता है. अंत में हम यमुनोत्री पहुँच ही गए . ग्यारह बजे उत्तरांचल के राज्यपाल पहली पूजा के लिए आनेवाले थे . वे सब हेलिकोप्टर में आए थे .मन्दिर के ठीक बाहर गर्म पानी का तप्त कुंड सूर्य कुंड था जिसकी अभी सफ़ाई हो रही थी .यहाँ पर भाप निकालता पानी नजर आता है जिसमे आप चावल पका सकते है और पुडी तल सकते है .हमने नजरों से देखा था .कुदरत का एक और करिश्मा भी यहाँ है . यमुना नदी का मुख्य प्रपात तो अभी बर्फ की तरह जमा हुआ ही था किंतु उससे सिर्फ़ दस फीट के दूरी पर ही उबलते दिखते गर्म पानी का झरना बहता था जिसमे सभी स्नान करके दर्शन के लिए जा रहे थे . पर इसके स्पर्श से हमे जलन बिल्कुल ही नही होती है .ये जगह ६ महीनों तक बर्फ से ही ढकी रहती है तब माताजी की मूर्ति को नीचे जानकीचट्टी ले जाकर पूजा की जाती है .हमारे सामने ही ६ महीने के पश्चात् मन्दिर के द्वार खुले . दर्शन से हम धन्य हो गए ...ये जगह समुद्रतल से १०००० फीट की ऊंचाई पर है . अगर आप ब्लड प्रेशर या एनिमिक है तो दवाई का इंतजाम साथ ही रखे . यहाँ पर साँस में लेने वाली ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम होती है इसी लिए कभी कभी साँस लेते हुए दिक्कत पड़ सकती है .यहाँ पर कुछ हल्का फुल्का खाते रहना चाहिए ..अब अचानक ही साफ दिखनेवाला मौसम बदलने लगा . बादल घिरने लगे . हम दर्शन कर चुके थे इस लिए लौटने लगे . वापसी में थोड़े दूर पहुँचते ही शुरू हो चुकी थी बर्फ की बरसात .बर्फ के टुकड़े मेरी ढंकी हुई कंडी पर छोटे छोटे पत्थरों के समान महसूस हो रहे थे .मज़ा तो मेरे पतिदेव और बेटी ने खूब लिया इस बरसात का . दोनों रास्ते में बर्फ के गोले बनाकर खेलते हुए ही आए . आप सिर्फ़ कल्पना ही कीजिये हमारा कितना सुंदर अनुभव रहा होगा ये!!!! हम लौट चले थे जानकीचट्टी सुंदर और थोड़े भयानक भी लगने वाले रस्ते से गुजरकर !!!!!!!!अब जायेंगे ....थोड़ा और इंतज़ार कर लो ...यात्रा अभी जारी है ...!!!!

13 मार्च 2009

ये हँसी वादियाँ : मसूरी ...!!!

ये मन बहुत चंचल होता है ...जाना था जापान पहुँच गए चीन समज गए ना ...!!!
देहरादून पहुँच कर हम ऋषिकेश, मुनी की रेती और देवप्रयाग तक घूम कर फिर वापस आ गए है अपने अगले पड़ाव पर जाने के लिए ...देहरादून के पहाडों में जाने वाली बसों के अड्डे से हमने मसूरी जाने के लिए बस ली । इस सुंदर शहर देहरादून को छोड़ते हुए हम कब पहाडों के रस्ते पर चल पड़ते है उसका पता ही नहीं चलता .हरी भरी वादियों में बहती हुई ठंडी हवाएं हमारे कानों में जैसे कुछ कहने लग पड़ती है .प्रकृति के गीत गाने लगती है .जिग जाग बनाते हुए सड़क पर गुजर रही बस की खिड़की के बाहर नजारा हरदम बदलता है... कभी दिल को जोरों से धड़का देने वाली खाई की गहराई नजर आती है तो कभी बादलों को चूमते हुए पहाडों की ऊँचाई ... मैदान का दामन छोड़ कर कब हम पहाडों की आगोश में आ जाते है कुछ पता ही नहीं चलता .अगर आप निजी वाहन से जा रहे हो तो रस्ते में एक बड़ा सा सुंदर मन्दिर पड़ता है जहाँ आप थोडी देर रुक कर वादियों से मन ही मन में कुछ संदेश दे सकते हो ......
धीरे धीरे छोटी छोटी बस्तियों को पार करते हुए हमारी बस मसूरी पहुँच ही गई ।ये वृतांत मेरे २००१ के दौरे का है . मेरी कम्पनी में से आबंटित होली डे होम में हम रुके . हमारा कमरा होटल के सबसे ऊपर वाले मजले पर था . खिड़की से परदा हटाते ही बाहर दूर देहरादून वेली नजर आई . रात में जब पूरे देहरादून की बत्तियां रोशन हो चुकी तो ये नजर कुछ ऐसा लग रहा था की चाँद पुरी सितारों की बारात लेकर जमीं पर आ गया था . यादें कितनी सुहानी हुआ करती है ना ? हम सुबह में ही वहां पहुँच चुके थे . फ्रेश हो कर नीचे माल रोड की सड़क पर के बाज़ार में टहलने निकल पड़े . महीना मई का होने के बावजूद यहाँ की सर्दी वडोदरा की दिसम्बर की सर्दी के बराबर थी . इस में आइसक्रीम या सोफ्त्टी खाने का मजा कुछ और ही है . कसमसे बिल्कुल सर्दी नहीं होगी ...
कैमल बेक और मॉल रोड की सड़क की खास विशेषता ये है की एक और ही मकान है और दूसरी और सुंदर और मजबूत रैलिंगें बनी हुई है जहाँ से आप पुरी वेली का नजारा ले सकते हो . एक खास अन्तर पर बैठ के देखने के लिए भी सुचारू व्यवस्था है . हर जगह से दृश्य लगातार बदलते नज़र आयेंगे ..बड़ा साफ सुथरा ,ध्वनि और वातावरण के और प्रदुषण से मुक्त एक सुंदर खामोशी का एक अलग ही अंदाज़ देखा गया ...महसूस किया गया ...कभी साफ सुथरी दिखती पहाड़ की वादी पल भर में ही जैसे बादलों की चुनर से अपना चेहरा छुपा लेती है । अभी तेज चमकती धुप होती है तो दोपहर बाद जोरदार बारिश भी हो सकती है . पहाडों के वातावरण की ये तासीर आप सभी जगह पर महसूस कर सकते हो ...हो सके तो बड़ी सुबह ही घूमने निकल जाओ और दोपहर तक वापस भी आ जाओ ...
दूसरे दिन हम साइकिल रिक्शा में बैठ कर मुनिसिपल गार्डन गए ।तकरीबन दो तीन किलो मीटर की दूरी पर यह सुंदर उद्यान है . जिसमे एक ग्लास हाऊस है . सुंदर पेड़ पौधे लगे है . बोटिंग की भी सुविधा मौजूद है .लेकिन सबसे रुचिकर तो यहाँ तक पहुँचने का रास्ता ही है .बस्ती पीछे छुट जाती है . इक्के दुक्के प्राइवेट बंगलो ही दिखाई देते है .होती है सिर्फ़ हरी भरी वादी और उसकी बोलती हुई खामोशी ...शाम एक फिर टहलते हुए गुजारी ...मकानों की बनावट गौर करने लायक है .पहाडों की ढलान पर ऊपर से नीचे तक बने मकान बहुत सुंदर लगते है .जिग जाग सडकों पर गुजर रहे वाहन यहाँ से खिलोनोके समान छोटे दिखाई देते है .....
यहाँ पर मुख्य राज्य परिवहन के बस अड्डे से दो छोटे प्रवास की सुविधा है । एक कम्प्टी फाल के लिए है . दिन में दो बार जा सकते है . सुबह में आठ बजे जो दोपहर तक वापस ले आती है . दूसरी दोपहर में चलती है जो शाम को वापस ले आती है . हम सुबह में ही चल दिए .मसूरी से तकरीबन १५ किलोमीटर की दूरी पर और समुद्र की सतह से ४५०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित ये जल प्रपात हम देखने के लिए चलते है .मसूरी तक आता हुआ नजारा यहाँ कुछ अपनी तासीर बदल लेता है . इस चकराता मार्ग पर पहाड़ थोड़े बड़े होने लगते है और पेड़ थोड़े कम .पहाड़ की चोटी से छलांग लगाकर एक जरना सीधे नीचे गिर रहा है ...यही है कम्प्टी फाल .काफी नीचे तक चल कर जाना पड़ता है .अच्छी खासी पैरों की कसरत हो जाती है . नीचे एक बड़ा सा तालाब बन जाता है और नीचे जाकर फिर वह यमुना नदी में विलीन हो जाता है . नहाने के शौकीन लोग यहाँ ये शौक भी फरमाते है . किराये पर स्वीमिंग के कपडे मिल जाते है ॥अब ऊपर चढ़ते हुए समज आती है कि हम कितना नीचे गए थे जब साँसे फूलने लगती है ..ब्रावो आगे कदम बढाओ .....
बेक टू पवेलियन मसूरी ...शाम को माल रोड के केबल कार में बैठ कर मसूरी कि सबसे ऊँची जगह गन हिल पहुंचे ...चारों दिशाओं से मसूरी का विहंगावलोकन किया . ये हँसी वादियाँ ये खुला आसमान ...आ गए हम कहाँ ?....दूसरी सुबह उसी परिवहन कि बस से हम जा रहे है एक कम जाना माना पर अलौकिक सौंदर्य कि मिसाल धनौलती.मसूरी से २५ किलोमीटर पर स्थित इस जगह से हमें हिमालय क्या चीज है उस चीज का सही मायने में परिचय होता है . सब कुछ मानों कि विशाल हुआ चला जाता है चाहे वो पहाड़ हो या गहरी खाई या पेड़ ....हर मोड़ पर धड़कनें तेज होने लगती है .यहाँ मौसम की सबसे पहली बर्फ पड़ती है . सेब के बागान है .बिल्कुल शांत फिर भी रमणीय ,बिल्कुल भीड़ भाड़ नहीं ...नितांत सौंदर्य की बौछार ..निजी वाहन में यहाँ पर आकर दो तीन दिन रुक सकते है ...यहाँ से १० किलोमीटर दूर एक और स्थान है . सुर खंडा देवी का मन्दिर . पहाडी पर स्थित है . तीन किलोमीटर पैदल चलकर जा सकते है . घोडे भी उपलब्ध होते है . चलो वर्जिश का एक और मौका मिला .चोटी पर पहुँच कर एक और सुंदर नजारा देखिये . यहाँ से बर्फ से ढकी बन्दर पूंछ जगह साफ दिख जाती है अगर वातावरण साफ हो ..हम गए तो बादल हमें छू कर जा रहे थे और ऊपर तो हम ऊपर थे और बादल नीचे थे ...सोचो ..सोचो ज़रा ...बादल की बूंदों की ठंडक हमारे गालों को सहला कर भाग रही थी ..लेकिन जब नीचे पहुंचे तो वातावरण एकदम साफ ....वापसी में जोरों की बारिश हो रही थी .धीरे धीरे चलती हुई हमारी बस मसूरी की तरफ़ बढ़ रही थी . प्रकृति का ये अनुपम सौंदर्य आँखों में समाकर हम पहुंचे मसूरी जील ..एक मनोरम स्थान . बोटिंग की सुविधा है . सुंदर पिकनिक स्पॉट है .यहाँ के गर्म कपड़े बड़े ही स्टाइलिश होते है .यहाँ बोर्डिंग स्कूल भी बहुत है . होटल्स की तो भर मार है .केमरेमें कैद करके जो ख़ूबसूरत पल में लायी थी आज फिर आपके साथ एक बार फिर सहला रही हूँ ........हम कितने प्रदुषण युक्त वातावरण में रहते है , कितनी ज़हरीली सांसे लेते है ,और प्रकृति ने हमारे लिए बनायी हुई इस दुनिया की विकास के नाम पर हमने क्या दुर्गति की है उस भूल को आप महसूस कर सकते हो धनौलती में ....कम जानी पहचानी होने के बावजूद दिल में बस गई है ....

21 फ़रवरी 2009

यहांसे मेरा नाम गंगा है :देवप्रयाग



हमारा प्रोग्राम कुछ ऐसा बना की दो दिन के बाद दिल्ही जाना है ।अब क्या किया जाय ? हमारे पास एक नकशे की किताब थी .कुछ नया ॥कुछ अनसुना सा ..मन्दिरवाले महाराज से भी पूछ लिया .जगह तय हो गई जाने के लिए . सुबह थोड़ा नाश्ता साथ लेकर पहुँच गए पहाड़ों में जानेवाली बसों के अड्डे पर .इन बसों में बैठने का नशा भी अनोखा होता है . जब ऊँचे नीचे जाते रास्तों पर चल पड़ती है ,बल खाती है तब हम पूरे के पूरे इधर से उधर हिलने डोलने लगते है .गर अगली सिट का हैंडल न पकड़ा हो तो लुढ़कना तो लगभग तय ही है . लेकिन ड्राइवर बहुत ही चौकस और होशियार होते है . पहाडियों की ये बसें काफी छोटी होती है .उनमे जीतनी सीटें हो उतने ही यात्री लिए जाते है ...


मुनीकी रेती से बदरीनाथ वाले रस्ते पर हम आगे जा रहे थे ।यहाँ से अब सचमुच हिमालय की गोद में आ जाने का एहसास होता है . ठंड महसूस होती है .रस्ते की एक और है हरेभरे पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ और दूसरी और है गहरी खाईमें नीचे लचकती , बल खाती चाल से चलती हुई गंगा नदी ॥कभी ऊपर तो कभी नीचे देखते हुए प्रकृति के इस नज़ारे को देखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे .रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमियों के पड़ाव बीच बीच में आते रहते थे .यहाँ गंगा और दूसरी कोई और पहाड़ी नदी में खास अन्तर नहीं नजर आता है .उछलते कूदते पानी की तरंगों से जो ध्वनि उठती है उस ध्वनि का अनंत गान सुनते हुए हम आज जा रहे है देव प्रयाग ....


बदरीनाथ केदारनाथ की यात्रा पर जाने वाले सभी पंच प्रयाग के नाम से परिचित होते है ।उन्ही में से एक है देवप्रयाग . इन प्रयागों में विभिन्न नदियों का संगम होता है जो सब आगे चल कर गंगा नदी में विलीन हो जाती है .तीन घंटे का बस का सफर अब समाप्त होता है .बस से उतरकर हमने गाँव में जाने का रास्ता पूछा .वहाँसे नीचे की ओर जाने वाली एकदम छोटी -संकरी गलियों में हम चलने लगे .एक छोटी सी पुलिया आई . वहां पर खड़े रहकर नीचे की और जरा देखो ...हमारे ठीक नीचे थी भागीरथी नदी और उसका तुफानी समुन्दर की तरह उछल के वादियों में गूंजने वाला रौद्र गान .....उस प्रचंड ध्वनि और प्रचंड गति वाली दूधिया सफ़ेद रंग की भागीरथी वही है जो गौमुख से निकलकर अपने में रास्तें में मिलने वाली कई और नदियों को समाकर इधर तक आई है .प्रतिमाके समान ! इस नज़ारे को देखकर मैं स्तब्ध ही रह गई और अनिमेष नयनों से उसे ताकती रही ...वहां से हम दुसरे छौर की और बढ़ गए .सुबह का नाश्ता तो बल खाती बस में कबका हजम हो चुका था . एक छोटी सी दुकान में चाय नाश्ता करके पतले रस्ते पर गुजरते हुए हम आगे बढ़ने लगे ...


उस पतली गली के छौर पर एक बहुत नीचे उतरके जाने वाला घाट का रास्ता आया ।उसकी बहुत ही बड़ी सीढियाँ उतरते हुए हम नीचे triangle जैसे स्थान पर पहुंचे तो हमारे दायीं ओर थी रुद्र स्वरूप भागीरथी और बायीं ओर थी उसको आके यहाँ मिलने वाली अलकनंदा ॥दूर से तो ऐसा ही भ्रम हुआ की यह कोई नदी नहीं है पर एक हरा सपाट शीशे की सतह की तरह एक जगह है . दोनों ओर काले ऊँचे पहाड़ .बिल्कुल स्थिर दिखने वाला पानी का प्रवाह जिसकी गति शायद भागीरथी से भी तेज थी .दोनों नदियाँ मिलती नहीं है पर प्रचंड वेग से यहाँ पर टकराती है .दूध जैसे सफ़ेद झाग वाली प्रचंड वेग से उछलती हुई भागीरथी और प्रचंड वेगको अपने गर्भमें समाकर सतह पर चिकने घड़े की तरह शांत दिखती हुई अलकनंदा यहाँ पर मिले और ये बन गया देवप्रयाग ....


किसी गुजराती दानवीरने यहाँ पर पक्का घाट बनवाया है । यहाँ पर आप अपने पितृओं का तर्पण भी कर सकते है . यहाँ का गंगाजल शायद सही मायने में शुद्ध गंगाजल की तरह आप किसीको प्रसाद की रूप में दे सकते है .बद यहाँ से दोनों गले मिलकर ( या एक दूसरे से भिड़ कर ) हंसते हुए आगे बढती ये हमारी नदियाँ ...वहां पर तिकोने घाट पर बैठकर दोनों को लिपट के आगे जाते हुए देखना एक विरल अनुभव है .ये जगह सड़क से काफी नीचे उतरकर आती है .सड़क पर चलने वाले वहां यहाँ से खिलौने की तरह नजर आते है . आगे बड़ी सी बस्ती भी है .यहाँ पर दोनों प्रवाहों के मिलन के स्थान पर पानी पैर रखकर दो घंटो तक हम बैठे रहे तब जैसे हमें आनंद की समाधि सी लग गई .यहाँ लोगों की ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं होती है ...


किंतु मैं ये कहूँगी की दिखने में बिल्कुल आम नजर आनेवाली इस जगह पर मुझे वह खुशी मिली जिसे शायद शाश्वत शान्ति , या अलौकिक आनंद कह सकते है . सबसे अहम बात यह है की उदगमस्थान से यहाँ तक गंगा को सिर्फ़ भागीरथी के नाम से ही पुकारा जाता है और इस संगम स्थान के बाद उसे गंगा के नाम से पहचाना जाता है जो कोलकातामें गंगा सागर से मिलती है .(कोलकाता में इसे हुगली कहते है ) .इस जगह पर सुभाष घई की फ़िल्म 'किसना' का एक गीत भी फिल्माया गया है .वापसी में ढलती हुई शाम के साथ फिर वोही अदभुत नजारोंको देखते हुए हम ऋषिकेश की और लौट पड़े .नक़्शे में देखकर हम इस जगह पर गए थे . हमारे प्रवास में यह एक सीप में छुपे मोतीकी तरह बंद हो गई जैसे की मैंने आपको मुनी की रेती वाले अंक में बताया था .एक सुखद अनुभव , एक शांत परिचर्या ,एक अदभुत और अलौकिक आनंद की अनुभूति ..........

5 फ़रवरी 2009

ऋषिकेश : २ (मुनि की रेती )






चलो दोस्तो आज हम ऋषिकेश की मुख्य सड़क पर अब आ गए है और हमारा अगला पड़ाव होगा मुनीकी रेती ॥

यहाँ से हमे डीजल से चलने वाले ऑटोरिक्शा बड़े आराम से मिल जाते है जो पांच रुपये प्रति व्यक्ति किराया लेकर हमे अपने गन्तव्य स्थान की ओर ले जाते है ।आप पहले लक्ष्मण जुला और फ़िर रामज़ुला या इससे विपरीत विकल्प ले सकते है . अब आप दिल को थाम लीजिये और आँखों में गंगा एवं हिमालय के अप्रतिम सौंदर्य को भरने के लिए तैयार हो जाओ .रास्ता अभी एकदम से ऊंचाई तो नहीं पकड़ता दिखता है पर फिरभी हिमालय के साम्राज्य में आप अपना पहला कदम बढ़ा रहें हैं . उसकी हसीं वादियाँ आपको मंत्रमुग्ध कर देगी ...


हम सीधे लक्ष्मण जुला ही पहुचते है ।वहां उतरकर आप अपने आपको सुंदर पहाड़ों से घिरे हुए पाओगे .रिक्शा छोड़कर हम रस्ते पर चल देते है .बीचमे एक बड़ी हनुमानजी की मूर्ति आती है और पीछे भव्य शिवमंदिर है . दर्शन करते हुए हम आगे चलते है .आजुबाजू कतारों में दुकाने लगी हुई है .पहाड़ के चढ़ते उतरते रस्ते पर आगे बढ़ते हुए हम पहुँच जाते है लक्ष्मण जुला के एक छोर पर .दिल फ़िर थाम लो नीचे हिमालय पुत्री गंगा का चुलबुला अठखेलियाँ करता ये नए रूप का नज़ारा देखो .कहते है ये पूल गंगा नदी से १५० फ़ीट की ऊंचाई पर बना हुआ है [मैंने मापने की कोशिश नहीं की है !!].ब्लू ॥हेवन ली ब्लू ...बस अब निहारते ही रहो .पूल पर चलने से वह हिलता रहता है और इसीलिये शायद इसका नाम लक्ष्मण जुला है .बराबर मध्य में जाकर तनिक ठहर जाइये . चारो दिशा में एक बार घूम कर देखिये .अपनी आंखों को एक पल के लिए मुंद के ठंडी हवाओं की ताज़गी को अपने अन्दर भर लीजिये .हौले के आंखें खोलो और हिमालय के साम्राज्य के रूबरू होने के इस जश्न में शामिल हो जाओ. ये लिखते हुए भी मैं अभी अपने आप को वहां पर ही महसूस कर रही हूँ ...

यहाँ बन्दर बहुत है .एक शौक़ीन बन्दर तो आइस क्रीम खाते हुए भी देखा गया .आते जाते लोग कुछ न कुछ देते रहते है .पूल के दुसरे छौर पर विशाल मन्दिर खड़े है . बायीं और के चौदह मंजील वाले मन्दिर में आपको भारत देश के सभी भगवान के दर्शन हो जायेंगे . एक बार ये वर्जिश कर लो और ऊपर जाकर गंगा को भी निहारों . आस पास के मन्दिर में दर्शन करते हुए यहाँ से बने सीधे रस्ते पर ही रामज़ुला जाने के लिए पैदल ही चल पड़ते है .गंगाकी गूंज की ध्वनि हमारे कानों में पड़ती रहती है . रस्ते के दोनों तरफ़ आमके बगीचे है .सीधे पहुँच जाते है हम रामज़ुला के पास बाबा काली कमली वाले के आश्रम के पास...

फ़िर वही मन्दिर की कतारें ॥वहां लगभग एक से डेढ़ फ़ीट की सीधी चोटीवाले दो महाशय ऊँची कुर्सी पर बैठे घंटी बजाते हुए नज़र आते है ।शरीर पर सफ़ेद धोती और चेहरे पर जोकर नुमा मेक अप .cool ads का ये नवीनतम तरीका है यहाँ की विख्यात चोटी वाला रेस्तोरा का .भूख लगी हो तो थोड़ा नाश्ता करके आगे बढ़ जाते है .अब शुरू होता है गंगाके किनारे से लगा हुआ रास्ता .जहाँ पर एक से बढ़कर एक भव्य मंदिरों की शृंखला है और विशाल घाट . साफ सीढियोंवाले इस घाट पर आप गंगा स्नानका आनंद ले लीजिये .यहाँ भी ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं है ....

आगे चलकर आता है गीता भवन एक भव्य मन्दिर परिसर । अन्दर जाकर परिभ्रमण करने पर अवश्य आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है .यहाँ अगर आप कुछ दिन ठहरना चाहते हो तो इसका इंतजाम भी है .एडवांस बुकिंग होती है .यहाँ पर बारह बजने से पहले पहुँच जाओ तो सिर्फ़ दस रूपये में शुद्ध शाकाहारी ,सात्विक ,कम मसालेवाला फ़िर भी स्वादिष्ट खाने की थाली मिलाती है . परमार्थ निकेतन बाजु में ही है. उसे में आश्रम नहीं पर एक शांत आध्यात्मिक अलौकिक अनुभव ही कहूँगी .कितनी पावन और शांत जगह है ये .एक सुंदर सीढियों वाला साफ सुथरा घाट .गंगा के प्रवाह के अन्दर बनी शिवजी की विशाल भव्य प्रतिमा .यहाँ पर कुछ घंटों तक बैठ कर आप थोड़ी उछल कूद करती, अंगडाई लेती शरारती गंगा नदी से मूक वार्तालाप भी कर सकते है ....

रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमिओं की नौकाएँ भी आपको लहरों पर उछलती नज़र आएगी ।आप अगर ये शौक रखते है तो इधरसे आपको पन्द्रह बीस मिल की दूरी पर जीप में ले जाते है जहाँ से रिवर राफ्टिंग करते हुए लौटा जा सकता है . बहुत सारे विदेशी लोग यहाँ पर योग विद्या के लिए आते है और शान्ति से यहाँ ठहरते भी है .यहाँ से रामज़ुला लौट आओ और या तो नौका विहार का आनंद लेते हुए सामने के घाट पर जाओ या फिर पैदल रामज़ुला पर चलते हुए . वहां पर गीता प्रेस गोरखपुर की दूकान भी है और पुरा अच्छा बाज़ार भी नौका विहार के दौरान मध्य में गंगा के निर्मल जल को छूने का एहसास अवर्णनीय है .हाँ एक और बात काली कमली वाले बाबा के आश्रम के नजदीक से जीप के जरिये नीलकंठ महादेव के मन्दिर जा सकते है जो बारह किलो मीटर की दूरी पर स्थित है , वैसे हम लोग वहां नहीं जा पाए थे किंतु वहां का महात्म्य भी अधिक है ....

जब हम यहाँ से वापस चलते है तो हमारी आत्मा जैसे इधर ही ठहर जाती है और शरीर ऋषिकेश के और गति करता है .हिमालय और गंगा के इस सफर को जारी रखते हुए अगली बार आपको मैं ले चलूंगी एक सीप में छुपे हुए मोतीके पास . बस थोड़ा और इन्तजार .........

29 जनवरी 2009

ऋषिकेश



अब हम जा रहे है अपने इस भ्रमणके तीसरे पड़ाव की ओर ....


जैसे की आपसे मैंने पहले भी बताया था की मेरी सबसे पसंदीदा जगह है ऋषिकेश हरिद्वारसे तकरीबन २०-२५ किलोमीटर की दूरी पर है रेल का एक सिरा जाता है देहरादून की ओर पहाडोंमें और दूसरा ऋषिकेश की ओर ...लेकिन हरिद्वारमें हरकीपौडी के किनारे से लगे शटल रिक्षाएँ भी एक बेहतरीन जरिया है ऋषिकेश पहोंचनेकागंगा नदी का साथ कुछ पलों के लिए जरूर रहता है आगे चलकर आती है गंगा की मुख्य धारा जहाँ से उसका हरिद्वार की ओर रुख होता है इस जगह से समयानुसार उसकी गति को भी संतुलित करने की ओर कभी जरूरत पड़ने पर प्रवाह को साफ सफाई के लिए बंध करने की भी व्यवस्था है आगे चलकर मन्दिर एवं आश्रमों की कतारों को भी आप देख सकते हो आगे जाने पर बांयी ओर शान्तिकुञ्ज -माता गायत्री का धाम है यहाँ भक्त जन साधना करने आते है जिनके रुकने की सुचारू व्यवस्था है ...


अगर आप रिक्शा में सवार है तो दायें बांये देखने का सिलसिला जारी रखिये क्योकि यंही से शुरू हो रहा है पर्वताधिराज हिमालय का साम्राज्य बहुत ही हलके से वह अपने पंख पसारना शुरू करते है अगर पैकेज टूर में आए लोगोंसे आप पूछेंगे की ऋषिकेश में आप कन्हा गए ? तो ज्यादातर जवाब होंगे -लक्ष्मण जुला , रामज़ुला,गीता भवन .... पर यह सब जगह ऋषिकेश से थोड़ी सी दूरी पर है और उस जगह का एक खास नाम है "मुनि की रेती "॥


हम आ गए है ऋषिकेशमें अगर आप दौड़ती हुई शहरी जिन्दगी से थकान महसूस कर रहे हो तो यह जगह आराम का अच्छा पर्याय बन सकती है यहाँ यात्रिओं की धूम नहीं मचती , कुछ घंटे के लिए आते है और हरिद्वार या बदरीनाथ के लिए चल पड़ते है यहाँ हम माया कुण्ड नामक जगह पर एक हनुमानजी के मन्दिर में ठहरे थे एक छोटा सा कमरा मिलता है मन्दिर के नीति नियमों का पालन श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए सुबह और शाम भव्य आरती होती है मन को शान्ति देने वाली सुंदर जगह है यहाँ से पैदल सिर्फ़ पाँच मिनट की दूरी पर पतित पावनी गंगाजी की धारा है ...


एक पक्के बंधे हुए विशाल घाट पर सीढियाँ चढ़कर जब ऊपर आते है तो दर्शन होते है गंगामैया के ... यह जगह का नाम है त्रिवेणी घाट एक छोर पर है शिवजी की जटासे निकलती गंगा की मनोहर प्रतिमा और मध्य में है अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए श्री कृष्ण की मनोहारी विशाल मूर्तियाँ एक रथ में सवार और एक विशाल गंगा माता का मन्दिर घाट पर चलते हुए दुसरी और की सीढियाँ उतरते है तो आ जाती गंगानदी यहाँ आपको गंगा का प्राकृतिक रूप देखने को मिलेगा प्रवाह की गति तो तेज है ही लेकिन यहाँ ये आम नदियोंकी तरह ही बहती है उसके शीतल जल में पाँव रखते ही मन प्रसन्न हो जाता है यहाँ पर ऋतू अनुसार शाम सात से साढे सात के बीच गंगा माता की भव्य आरती होती है प्रवाह में दीप बहाए जाते है काफी भीड़ रहती है पर विशाल किनारे पर सब शान्ति से देख सकते है लगभग सात बड़े बड़े आरती के पित्तल के दिए से निकलती हुई परम ज्योत की तो आप कल्पना कर के देखिये ....


यहाँ से बांये हाथ पर ही पहाड़ों की शृंखला शुरू हो जाती है सुबह के वक्त भी साढ़े सात का वक्त आरती के लिए होता है यहाँ स्नान करने का महिमा और आनंद ही कुछ ओर है यहाँ का स्नान तेज प्रवाह और जंजीरों से जकडा हुआ नहीं है पास में ही साफ सुथरे बाथ रूमों मैं कपडे बदलने की व्यवस्था है शामके वक्त आरती में यहाँ कई विदेशी लोगों को भी शामिल होते हुए देखा जा सकता है ...


यहाँ मेरी मुलाक़ात दो विदेशी महिलाओं से हुई जो अमेरिकासे आई थी काफी कुछ बातें हुई वे भारत से काफी प्रभावित थी ऋषिकेश की एक देखने लायक जगह है भरत मन्दिर शांत ,सुंदर और सुरम्य है जो कोई राजा भरतकी याद में बांधा गया है वहां सब लिखा हुआ है एक ओर अय्यपा मन्दिर है जो बहुत सुंदर है पूरे ऋषिकेश में हमें कोफ़ी पिने ढूँढते हुए यहाँ तक आना पड़ा था अगर फुर्सत हो तो ऐसी जगह पर हमें तीन चार दिन ठहरना चाहिए यहाँ टहलते हुए सिर्फ़ चलकर ही घूमने का मज़ा ही कुछ और है हम यूँही टहलते हुए रेलवे स्टेशन के अन्दर तक घूमने निकल पड़ते थे एक अनजानी जगह पर जहाँ हमें कोई पहचानता न हो वन्हा बेफिक्र होकर घूमना एक अनोखा अनुभव है बाज़ार में सभी चीज वस्तुएं उपलब्ध हो जाती है हिमालय में बसे हुए विभिन्न स्थानों के लिए बस भी यंही से चलती है मॆं चाहूंगी की आप भी ऋषिकेश में कभी मेरी तरह गंगा नदी को सही मायने मॆं महसूस करें साफ गंगा[थोड़ी सी गंदगी हैं जो माफी के लायक है ],प्राकृतिक गंगा ,तेज गंगा , शीतल गंगा जहाँ हम हर सुबह और शाम तकरीबन दो दो घंटे उसे निहारते हुए बैठे रहते थे ....


तो अब अगली बार हम मिलेंगे मुनिकी रेती पर ....

9 जनवरी 2009

सहस्त्रधारा....!!!






हमारा दूसरा पड़ाव है सहस्त्रधारा ...

हरिद्वारसे हिमालय के चरणस्पर्श कर के थोड़े और आगे चलते है आगे राजाजी नेशनल पार्क पडता है राष्ट्रीय अभियारान्य का गौरव प्राप्त है जीप में बिठाकर सैर कर सकते है जो वहीं किराये पर मिलती है वैसे हम समयके अभावके कारण वहां जा नही पाए पर वाइल्डलाइफ के चाहक इधर जरूर जाए ।

देहरादून की ओर चलते रास्ते पर आती है यह सहस्त्रधारा॥

हाँ ,यहाँ एक सुंदर प्राकृतिक सौंदर्य की धारा है जगह पर जाते वैसे कोई खूबी तुरंत नज़र नहीं आती है पर यह पुरी जगह अपने आप में एक अजूबा है एक पहाड़ी से गिरते हुए जल को एक प्राकृतिक तरीके से ही संचित किया गया है कहा जाता है की यह जल गंधक मिश्रित होता है जिसके उपयोग से चमडी के दर्द ठीक हो सकते है थोड़े से दूर पहाड़ी पर आगे चलते है वंही है असली अजूबा पहाड़ी के अन्दर प्राकृतिकरूप से तराशी हुई कई छोटी छोटी गुफा है जो बाहरसे तो स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती किंतु इन गुफा में जब प्रवेश करते है तो उनकी छत अविरत रिमज़िम हलकी बारिश की बौछारों की तरह टपकती रहती है यही सहस्त्रधारा है ।

वहां कई माता पिता अपने पोलियो ग्रस्त बच्चों को गंधक के पानीमें नहलाते हुए नजर आए यह जगह छोटी सी जगह है जहाँ हम कुछ घंटे जरूर रुक सकते है चाय पानी नाश्ते का भी सुचारू रूप से इंतजाम है थोड़ी हस्तकलाकी चीजों की दूकान भी है एक बात हम अवश्य कहना चाहेंगे की हुन्नर और हस्तकला में हर राज्य की एक अपनी पहचान -विशेषता ऊभर कर सामने आती है ।

यहांसे तकरीबन ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर उत्तरांचल की राजधानी देहरादून बसी हुई है यहाँ कई महत्व की संस्थाओं के मुख्यालय भी है जैसे की ongc ltd यहाँ का दून स्कूल जगविख्यात है जहाँ हमारे कई महानुभाव पढे हुए है हिमालय की गोद में बसा हुआ ये स्थल पर्यावरण के सुचारू रखरखाव की अच्छी मिसाल है हराभरा है ,प्रदूषण से मुक्त है यहाँ के चावल उसकी अनोखी खुशबू के कारण जगमशहूर है हिमालय में यह एक प्रवेशद्वार है यहांसे मसूरी जा सकते है ।

लेकिन मसूरी से पहले हम चलेंगे ऋषिकेश जो मेरी सबसे मनपसंद जगह भी है हमारी अगली मुलाक़ात में ..............

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...