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6 मार्च 2010

शुरुआत यहीं से हो

इंसानको सबसे ज्यादा ख़ुशी होती है जब उसकी जिंदगीमें उसके अपने खुनसे सिंची हुई प्रतिकृति उसकी संतान का आगमन होता है ...बहुत सपने सजाते है हम उस संतानके लिए ...अपनी ढेर सारी उम्मीदोंको जोड़ते है उसके साथ ...पर ....हाँ ...पर ....

आज ये बच्चे क्या हमें भविष्यमें एक सुरक्षित मुकाम पर नज़र आते है क्या ???क्यों ??? हम सब अख़बारमें आते समाचारसे वाकिफ तो है ही पर कभी उचित कारण जाननेकी कोशिश की है ???

ना !!!!

एक बात जो मैं कई बार दोहरा चुकी हूँ की संतान अपने खूनसे पैदा होनेके बावजूद वह एक स्वतन्त्र व्यक्ति है उसका स्वीकार करो ...अपनी सोचको उस पर लादनेसे पहले उसकी सोच को समजने की कोशिश करो ...एक दिन का बच्चा भी अपनी रोने की आवाजसे समजा देता है अपनी माँको समजा देता है की उसे भूख लगी है या फिर सु सु करदी है ....तो फिर उसकी जिंदगीका निर्णय उसे करने की आज़ादी क्यों नहीं देते हम ??? खुद तो डरे होते है पर ये डर अगले वक्त तक आगे ले जाते है ...

अगर आपके बच्चे छोटे है तो ये जरूर पढ़ें :

१...उसको चलते वक्त गिरने की आज़ादी दे ...वो समज जायेगा की वह क्यों गिर रहा है और गौर से देखोगे तो ना गिर पड़े उसके कई विकल्प वो खुद ढूंढ लेगा ...

२...उसे रेत के ढेरमें खेलने की गंदे होने की आज़ादी देना ...सर्दी हो जाएगी ऐसे कहकर उससे बारिशमें भीगकर कागज़की नाव तैराने की आज़ादी मत छीन लेना .......सच बात तो ये है की अगर वह गर्मी और सर्दी को सहन करना सीखेगा तो उसका शरीर उसका मुकाबला करना सीखेगा ...खूब ढँक कर रखने से उसके शरीर की स्वरक्षाकी प्रणाली होती है वो कमजोर पड़ जाती है ...

३....दीवार पर पेन्सिलसे और क्रेयनसे उसकी कल्पनाके चित्र बनानेके लिए घर का एक कमरा या दीवार उसके लिए खाली रखना ...देखना उसे गौरसे कहीं ना कहीं उसके ख्यालोंकी तस्वीर उसमे नज़र आही जायेगी ...

४....होमवर्क ना करे तो कोई बात नहीं पर उसे आसपास के बच्चोके साथ हमउम्र लोगो के साथ खेलने की आज़ादी मत छिनना ...शायद उनमे कोई सचिन या सानिया नज़र आ जाए ....

५.....उसे स्कुलमें सिखाई गयी कवितायेँ या रेडियो टी वी सुने गाने जोरोंसे गानेकी आज़ादी देना ...क्योंकि जब ये बड़े हो जायेगे ...बड़ी क्लासमें पढेंगे तब उन्हें ये सब के लिए वक्त नहीं होगा ..और आपके घर की ख़ामोशी ये दिन याद करके चुपके से रो पड़ेगी ....

६....कोई अन्यायके लिए वह लड़ता है तो अगर ये बात जायज हो तो उसे न्याय जरूर दिलवाए तो उसके दिल में असुरक्षितताकी भावना बचपनसे घर नहीं करेगी ....

७... आप दोनों मिया बीबी व्यावसायिक हो तो भी रोज अपने बच्चे के लिए एक घंटा किसी भी हिसाब से जरूर निकाले ...उसे सलाह देने के लिए नहीं पर सिर्फ उसके साथ बच्चे बनकर खेलने के लिए ...आपकी ये छोटी सी कोशिश आपको उसके और अपने आगेके जीवनमें देखना कितनी सफल नज़र आएगी ...शाम को नहीं तो सुबह में सही ...कमसे कम हफ्तेमें छुट्टी का पूरा दिन उनके नाम कर दो ....

८....सबसे अहम बात अब आती है की जब वो इम्तिहानमें फेल होकर आये तो उसे डांटनेकी जगह उससे सहानुभूति से पेश आओ ..उसे ये सिखाओ की बेटे /बेटी ,जिंदगी में एक इम्तिहानमें फेल होते है तो कोई बात नहीं ,अगली बार आप उसमे ज्यादा ध्यान दो और दिल लगाकर मेहनत करोगे तो जरूर कामियाब होगे ...और उतना ही नहीं इस बार उसकी नकामियाबी की वजह आप ढूंढो उसे दूर करने में उसकी मदद करो ....चाहे खेल हो या पढ़ाई असफल होने पर कभी अपने बच्चे को नीचा दिखाने की कोशिश मत करो ...उसे मदद करो उसकी मुश्किल को समजो ....उसे अपने पंख फेलानी की आज़ादी दो .....अगर वो गणितमें तेज है और इतिहासमें कमजोर हो तो कहो बेटे इस विषयमें आप मेहनत करो ताकि थोड़े और अच्छे नंबर आये ....उसकी मुश्किल में दोस्त बनो ताकि वो अपनी हर बात आपसे बांटे और सही मार्गदर्शन पा सके ...उसे ये समजा दो की सिर्फ पढाई नहीं उसका निजी कौशल्य भी जिंदगीमें कामियाब होने के लिए बहुत मायने रखता है ....

९...उसे घर का ही नहीं, दोस्तों का ही नहीं पर रिश्तेदारों का भी जीवनमें अहम् स्थान है ये समजने दो ....

ये छोटी छोटी बातें जो बहुत कम समय मांगती है पर अमल में ला पाओगे तो कोई बच्चा इम्तिहान के डर से आत्महत्या नहीं करेगा ...उसके सपने को pura karne के लिए घर से नहीं भागेगा ....

4 मार्च 2010

ये परीक्षा ...ये वेकेशन ....

आजसे बोर्डके इम्तिहान शुरू हो रहे है ...

अब लगता है होली का गुलाल रंगहीन बन गया है और माँ सरस्वतीकी आराधना अत्र तत्र सर्वत्र की जाने लगी है ..आज के ऐनक लगे, कंधो पर भारीभरकम बेग मजदूर जैसे किताबों का बोजा लादकर जा रहे मासूमोकी दया उसके माँ बाप को भी नहीं आ रही वो आने वाले दिनोंमें दिखने वाले कुछ धुंधले भविष्यके नज़ारे है .....

आजसे दो साल पहले मेरी बेटीने जब अपने करियरको लेकर मेरी राय मांगी तब मैंने उसे बेहिचक येही कहा बेटे तुम क्लिनिकल सायकोलोजीमें डिग्री ले लो ...क्योंकि आने वाला युग ये है की ये लोगोंकी जरूरत लोगों को सबसे ज्यादा पड़ने वाली है ...क्योंकि अब तो दसवी बोर्ड की एक्साम को भी लोगोने महाभारत के रणसंग्राम से भी ज्यादा गंभीर समजना शुरू कर दिया है ...खैर बेटीने तो अपने पसंदके विषय में आगे पढना बेहतर समजा ...पर मेरी बात को गौर से समजो तो वजूद नजर आ जाएगा ...

एक अच्छी स्कुलमें के जी में एडमिशनसे लेकर ही स्ट्रेस शुरू होता है जो जीवनके आखरी सांस तक पीछा नहीं छोड़ता ...और बहुत ही खेद जनक बात ये है की इसके लिए जिम्मेदार हम खुद है और कोई नहीं ...कोई कोई इक्के दुके माँ बाप तो जब तक संतानकी जान नहीं चली जाती तब तक ये बात नहीं समज पाते की संतान उनके जिस्म का एक अंश होने के बावजूद उसका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व है ....

पहले के जमानेमें वेकेशन का इंतज़ार हुआ करता था ...मामा चाचा के घर जाकर हुडदंग मचाना हर बच्चे का हक़ हुआ करता था ...फिर सब हमारे यहाँ भी आते थे तब उनको अपने शहर का चिड़ियाघर दिखाने ले जाते वक्त कभी थकान नहीं महसूस होती थी ...ममेरे चचेरे भाई बहन में कोई फर्क नज़र नहीं आता था ...चाचा चाची ,मामा मामी का दुलार अभी भी याद आता है ...ये रिश्ते हमारी साँसों के जितने ही कल भी जरूरी थे और शायद आज तो ज्यादा जरूरी बन गए है और अफ़सोस ! अनदेखे भी !!!

आज कल आई. क्यू जितना जरूरी है उससे भी थोडा ज्यादा जरूरी बन चूका है इ. क्यू ...याने की इमोशनल कोशंत्त ....और इसके लिए जरूरी होते है रिश्ते ...आज कोई मेहमान आता है तो भी उसका हंसकर बुलाना तो दूर पर उसके जाने का इंतज़ार पहले होता है इस हद तक शहरी इंसान स्वार्थी हो चूका है ...हाँ महेंगाई जरूर बढ़ गई है पर ये दिल का कोरापन खल रहा है ...इंसान इंसान से कट रहा है ...रिश्तो से दूर भागता है -करियर को इतनी ज्यादा अहमियत दी जा रही है ...और आखिर कर ये उसकी महत्वकांक्षा ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी ये बात उसे तब समजमें आती है जब वो पूरी तरह से टूट जाता है ...

बचपनमें हमें कोई स्ट्रेस नहीं था उसका एक जरूरी कारण ये भी था ...हम गम ख़ुशी को बाँट लेते थे और दिल पर कोई बोज नहीं पड़ता था ...वेकेशनके दो महीनोमें हमारे बच्चोको पूरी तरह उनकी इच्छा से ही गुजारने की इजाजत दे दो ..उनकी पसंद की हरकते ,एक्टिविटी करने दो ...और पढ़ाई से तो बिलकुल दूर रखो ...हाँ टीवी ,वीडियो ज्यादा करीबी मत रखने दो ......खुद मेहमान बनो और मेहमानों को बुलाओ ...हाँ पहले पंद्रह दिन के लिए जाते थे अब तीन चार दिन के लिए तो आ जा सकते हो ....ये शुरुआत अभी करोगे तो थोड़े बरसोके बाद ये जरूर लगेगा की हमारा स्ट्रेस हमारे पडोसीके स्ट्रेस से कितना कम है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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