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3 जनवरी 2013

वो सवाल का जवाब

 मेरी हथेली एक सैलाब बंद है ....हथेली गर्म हो जाती है ..और अन्दरसे लावा बहने लगता है ..सुलगती हुई आग  है जो मुझे नहीं जलाती ...क्या मेरा भीतर संवेदनशून्य तो नहीं हो चूका ???? डर - कसमसाहट बस भीतर ही भीतर ....कहाँ कौन चुक गया ??? कारण ढूँढने निगाहें दूर तलक जाकर वापस लौटने लगी है ....हर जहाँ पर गंदगी का माहौल नज़र आया ....नज़र भी थक गयी ..कहीं सुकून ढूँढा जाय .......
पर एक जगह बाकी रह गयी है .....फिर ख्याल आया ...मेरा भीतर ....मैंने उसे कभी कोई सवाल क्यों नहीं किया ?????? सारे सवालों के जवाब शायद वहीँ होंगे .........
= चलो सेलफोन छोड़ कर एक दोस्तके साथ गली के नुक्कड़ पर कटिंग चाय पी जाए ...उसकी उठती भापके साथ एक गर्म चुस्कीमें ताजगी का एक घूंट ....बहुत अच्छा लगा ...वो आधा घंटा .......पत्नीने आज पांव भाजी बनायीं थी ...पर आज स्वादिष्ट लगी ......
= टी वी का रिमोट नहीं ढूँढा .....दुसरे कमरे में गुड्डू और सोनिया पढ़ रहे थे ..गुड्डू तीसरी कक्षामे और सोनिया पहली कक्षामे ...उनके पास बैठकर उनकी पुस्तकें खोलकर देखी ...सोनिया ने गणित के सम्स के लिए माँ को आवाज लगायी तो मैंने उसकी नोटबुक लेकर उसे मदद की ...सबके चेहरे पर ताज्जुब देखा ...रातका खाना खाकर सबको स्कूटर बैठाकर आइस क्रीम खाने ले गया .....
शायद मेरा परिवार के साथ आज की शाम मैं सबसे ज्यादा खुश था ......
= क्रिसमस की छुट्टी में गाँवमें माँ पिताजी के पास परिवार सहित गया ....दोनों बच्चोको अपने बचपनकी सारी बातें बता रहा जैसे ये बीते हुए कल की बात हो ..अपने रघु चाचा और जमुना चाची ,हुसेन चाचा और आबिदा चाचीसे मिलाया ...भैंस का  ताज़ा दोहा गया दूध ,मक्खन और छाछ के स्वाद ,खेत से कटी ताज़ी सरसों की साग और मक्के की रोटीने बच्चोंको पिज़ा का स्वाद भुला दिया ....इस वक्त उन्होंने कहा अब तो हर वेकेशन गांवमे ..नीम पीपल की छाँवमें .....
= उनको याद  रह गयी मेरी माँ के कमरे में लालटेन के उजाले में सुनाई गई वो कहानिया जिसमे आसमान में चरखा चलाती बुढ्ढी नानी चाँद से बतियाती थी और एक राजकुमार उसकी  बेटी ब्याहकर ले जाता है ...उसमे राम भी आये ,हनुमान भी आये , भीम भी आये और कृष्णा भी आये .....कार्टून चेनल के सुपरमेन ,स्पाइडर में कहीं दूर रह गए .....
.................................................जब धुल उड़ाती हुई बस में बैठे तब मेरी माँ और मेरे पिताजी के चहेरे की हर जुर्रियों को ख़ुशीने भरकर लाल लाल कर दिया था ..........
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आज यहाँ पर वो सवाल का जवाब है जो हमारे भीतर तो है ...थोडा पीछे हटकर ...थोडा लक्ष्मी पूजा छोड़कर चला जाय तो फिर हर दिल में पनपता हुआ अकेलापन किसी भी बेहुदगी का लिबास पहनकर वहशी दरिंदा नहीं बन पायेगा .........

22 सितंबर 2012

यादों के शहर में

पता नहीं ये क्यों सोच रही हूँ की आजकल वक्त बहुत मिल रहा है ...हाँ पूरी दुनिया वक्तकी कमी की शिकायत कर रही है तब मेरे पास ढेर सारा वक्त है ....हाँ सब काम करने के बाद का बहुत सारा वक्त जहाँ पर मुझे कुछ करने का वक्त नहीं ...बस ये वक्तमें एक खास जगह है वहां अनायास ही पहुँच जाती हूँ ..यादों के शहर ...
ये शहर ऐसा है की जहाँ की हर गली नुक्कड़ ,स्टेशन ,हवाई अड्डा सब कुछ मेरा परिचित है ....जहाँ पर हर वक्त एक नया लम्हा जुड़ता रहता है पर उसकी सरहदोंमें समाता जाता है ...पर उसका कोई कद नहीं बदलता है ..बस उतना है ..नए चेहरे नया वक्त रोज जुड़ता है पर वहां आल्बममें फिर भी कोरे पन्ने है ...
शायद मैंने जिंदगीमें कुछ और नहीं सिखा हो पर एक चीज बड़ी अच्छी सीखी होगी ..टाइम मेनेजमेंट .....एक साथ मल्टी टास्किंग करते हुए मगजकी अच्छी खासी कसरत करती थी ....
सुबह दूध उबलने के साथ रोटी का आंटा  गूँथ लेना ..मशीनमें कपडे चलते रहते और सब्जी कट जाती है ....सब जगह कोल्हू के बैल की तरह भागना ...फिर चाय बनाते हुए डब्बे पेक करना ....एक औरत जिन्दा थी हर वक्त ...
फिर अचानक एक टीचर बन गयी ..जिंदगी की पाठशाला की टीचर ..मेरी संतान की टीचर ...उसे सिखाया ...कभी रोटी कभी सब्जी बनाना ...कभी बाज़ारसे चीजे खरीदने भेजना ..फिर उसकी गलती के लिए डांटना नहीं पर धीरे से उसे समजाना ..उसकी पढाई करिअर सबके बारे में चर्चा करना रोटी करते हुए ...
एक दिन बीमार हुई एक महीने तक बिस्तर नहीं छुटा ...तब बेटीने पूरा घर संभाला तब जाकर पता चला की हा  एक एक करके उसको सिखाया था और जो भी उसने सिखा ये दोनोकी इम्तिहान की घडी थी ...जिसमे कोई क्लास नहीं मिला फिर भी दोनों पास हो गए ....बस संतान को जूझते सिखाते है तब सिर्फ गाइड बनकर जीना पड़ता है ..रोजमर्रे के काम वो करते है और हम वक्त के साथ बैठे हुए उसका मुआयना करते है ....
ये होता है ढेर सारा वक्त जो दुनिया को नहीं मिलता ....आपकी सही मायने में परीक्षा आपके संतान कैसे दुनिया के मैदानमें आते है तब होती है ...ये सवाल इनके अभ्यास और नौकरी या कमाई सम्बन्धी नहीं पर एक इंसान के तौर पर कैसे खरे उतरते है उस पर निर्भर रहता है ....याद रखो की आप पर कोई चौबीस घंटे नज़र न रखते हुए भी नज़र रखता है ...हर छोटी बड़ी बातें मैंने उसे रसोई घर में बतायी हती ...यादों के शहर का ये अहम् हिस्सा था ....वो किसीको नहीं मिली पर मेरे भुतकाल के अहम् किरदारोंसे शाब्दिक परिचय करवाया था ...अब फेसबुक के जरिये वो भी सबसे मिली है  ..उसकी भी रिश्तो की दुनिया बढती गयी है ...मेरी तरह मल्टी टास्किंग करती हुई मेरे लिए फुर्सतके पल छोड़ देती है ....
इन लम्हों को बहाकर जिंदगी ले जाती है आगे ...फिर भी इंसान हूँ कुछ लम्हे को रोक लेने को जी करता है मेरा ...यादों के शहर में एक घर जो अभी चहचहाता है ...एक गोरैया के साथ ....

10 सितंबर 2012

कभी कभी

कभी कभी फिल्मे जिंदगी जैसी लगती है ,कभी कभी जिंदगी फिल्मे जैसी लगती है ...कहते है कहानी का बीज फिल्मोंमें असली जिंदगीसे ही लिया जाता है ..और फिल्मोमें हम अपनी जिंदगीके कई अंश देखते है ....
आज का युग कहाँ है उसका सबसे अच्छा उदहारण फिल्मे ही होती है ..निरी कल्पना लगने वाले द्रश्य कभी हकीकत भी बन जायेंगे ये यकीं हो जाता है ....
कुछ गिनी चुनी फिल्मे मैं सिर्फ इस लिए देखने जाती हूँ की वर्तमान युवाकी समज को उनकी समज से समज सकू ...उसी तरह में मैंने देखी कोकटेल .....एक बिंदास जीवन पसंद होते हुए भी बीवी के रूपमें तो भारतीय युवा एक सुल्ज़ी हुई लड़की को पसंद करता है ....
मेरी माँ जब मैं पढाई करती थी तब उसे कुछ नहीं आये तो एक सही दलील जरुर करते : बेटे हम ज्यादा पढ़े लिखे तो नहीं है ,सातवी कक्षा पास की है बस .....
लेकिन आज मैं कुबूल करती हूँ की मेरी और मेरी माँ की परिस्थितिमें कोई फर्क नहीं ....मैंने 1985 में एम् कोम की पढाई की थी ..आज मेरी बेटी भी एम् कोम कर रही है ...पर मेरी परिस्थिति मेरे माताजी जैसे ही है ..मुझे कहना पड़ता है बेटे अपने सर से पूछ लेना ..मुझे ये नहीं आता है ....अपनी माँ से कहती हूँ की आप तो पढ़े नहीं थे और कह देते थे पर मेरी तो डिग्री भी मुझे अभी आउट ऑफ़ डेट लगने लगी है ....
हमारे समाजने देश ने दुनियाने कितनी तरक्की की है पर शायद हम उसके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाए ...सतत बहार जाना बेहद जरुरी , नेट पर अपडेट रहना भी जरुरी ...काम करना भी जरुरी ...हर चीज़ दौड़ती फांदती नज़र आती है ..और हमारे पांव धीमे लगते है ..या फिर रुके रुके से .....फिर सोचती हूँ की हम जिन्दा है या नहीं ....?? हमारे वक्तमें पढाई कभी बोज़ नहीं लगी और अब पढाईके बोज़से लदे  हुए कोमल कंधे देखकर बच्चो पर तरस भी आता है ...ये भागना किस लिए ?? मकसद क्या है ?? ये सोचने के लिए कोई कभी रुका नहीं और रुकेगा भी नहीं .........
बहुत आराम भरी जिंदगी हो चुकी है फिर भी आराम नहीं ...मशीनसे कपडे धोते है और कसरत के लिए जिम की फीस भरनी पड़ती है ....माइक्रोवेवमें फटाफट खाना तो बन जाता है पर चूल्हे और तंदूर का खाना खाने होटल जाना पड़ता है ....तंदूर से किसी और घरका चूल्हा भी जलता है .....मोबाइल पर पति पत्नी का संपर्क बना रहता है पर दोनोंका शहर ,ऑफिस और शिफ्ट अलग होते है ...लेकिन बेडरूममें थके  हुई अधमरे इंसान सिर्फ आराम फरमाते है .....बच्चो के लिए खिलौने का ढेर होता है ..पर जिसका पल्लू पकड़कर रो सके वो माँ का पल्लू नहीं ...मोम तो जींस पहनती है फिर भी मोम ही है पर उसके पास भी बच्चों के सुखद भविष्य को लेकर सपने होते है और उन्हें पूरा करने के लिए वो स्कूटी लेकर ऑफिस जाती है ..बातें एस एम् एस और मोबाईलसे होती है पुरे जहाँ से ....दोस्तों से ,रिश्तोसे ,पर वो चाय की कितली पर कटिंग चाय गूम है ....अतिथि तुम कब जाओगे का फंडा  है ....
और डॉक्टरोंके फोन नंबर है स्ट्रेस मेनेजमेंट के लिए , गुमराह बच्चोंको राह पर लाने के लिए ....
लगता नहीं की हमें हफ्ते के एक दिन सचमुच रुकना चाहिए ???????

9 जून 2012

.."चिल्लर पार्टी "...

कल रात  एक फिल्म आ रही थी दूरदर्शन पर देखने बैठ गयी .."चिल्लर पार्टी "...
सच कहूँ तो बहुत दिनोंके बाद इस फिल्म को खूब एन्जॉय किया ...छोटी छोटी खुशियों और शरारतसे भरा हुआ बचपन ..और उन पंछियोंके पर को बांधकर  रखने की कोशिशमें माँ बाप ....एक कुत्ते के लिए लड़ जाते अड़ जाते बच्चे खूब मजा आ गई .......उनके नाम बोले तो साइलेंसर ,जांगिया ,एन्साय्क्लोपिदिया ,सेकण्ड हेंड ..मजेदार केरेक्टर .........
सच कहूँ तो खुदका बचपन याद कर लिया ...हम सायकल रिक्शामें स्कुल जाते थे ...एक लड़का हमेशा लेट करता था ...हमेशा हमें देर तक रिक्शा उसके घर के पास रोकना पड़ता था ...तो गुस्सेमे मैंने उसका नाम न" नवाब सिकंदर " रखा था ...फिर कहा सिकंदर तो बहादुर था तो फिर उसका नाम " नवाब मरघी '(मुर्गी ) रखा था ....मैं सायकल रिक्शा को चलाकर दूर तक ले जाती थी और चाचा और वो बच्चे को दौड़ना पड़ता था ....हा हा हा ...!!!स्कुल में एक टीचर को फेशन परेड कहते थे .....और जब बारहवी कक्षामें थे तो एक पटेल सर आते थे कोमर्स पढ़ाने के लिए ..देव आनंद की तरह जुल्फोमे पफ बनाकर ..और थोड़ी सी लड़की सी आवाज तो उन्हें हम "चकली " बोलते थे .......पड़ोस में बंगाली फेमिली थी ...उनकी एक छोटी सी कहानी आंटीने हमें कही तो हमने उनकी बेटी को पोद्दी पोद्दी जा जा  खोल कहना शुरू कर दिया ....किसीको पप्पू विरजी कहते थे तो एक अंकल जिनके सर पर चाँद था उनके लिए " मेरे सामने वाली खिड़की में एक टालका टुकड़ा रहता है गाते थे ........
बाप रे कितनी शरारतें खुद की भी याद आई .......
अब हम बड़े हो गए तो भी पकाऊ लोगोके नाम रखते है ...किसी विचित्र  लोगो के भी नाम रखते है ...उनकी मजाक बनाते है ...थोड़ी देर का मनोरंजन करते है ...पर उसमे कहीं इर्ष्या ,जलन कुढ़न  होता है ..निर्दोष मजाक और फिर दिलसे अपनाने की बात बहुत कम होती है ...
हम क्यों खुदमें बैठे बचपन को मार देते है ????

7 अप्रैल 2012

महेंगाई डायन...

मुझे अपने बचपनके दिन याद आते है ...डेरीके दूध की ५०० मिलीलीटर की बोटल सिर्फ पचास पैसेमें मिलती थी ..पापा की तनख्वाह महीनेकी १८० रुपये थी ...१०० रुपये वो घर पर मम्मी पापाको भेजते थे और ८० रुपयेमें बचतके साथ पुरे महीने का खर्च भी चलता था ....नमक १० पैसे किलो ...और सिंग तेल मिलता था १ रूपये का एक किलो ...नहीं ये बिलकुल गप्पे नहीं है ये सचके दाम ही है ...सोना तब मिलता था ८० से १०० रूपये तोला....
आज के दाम लगा दो तो केल्क्युलेटर लेकर कितने प्रतिशत महेंगाई बढ़ी वो गिनती करने मत बैठना ....
चलो आज इस महेंगाई डायनके बारेमें कुछ अलग अंदाजमें बात करते है ...
 तब हमें पैदल जानेमें कोई शर्म नहीं थी ....घरके काम खुद करनेमें कोई शर्म नहीं थी ...संयुक्त कुटुंबके कारण थोड़ी प्लस माइनस कमाई वाले भाई का भी आसानीसे समावेश हो जाता था ...स्कूलमे तो पढाई के साथ दुनियादारीकी भी सिख मिलती थी ....शिक्षककी पढ़ाने की रीत ऐसी होती की ट्यूशनकी जरुरत ही नहीं पड़ती थी ...और ट्यूशन बहुत ही कमजोर बच्चे के लिए विकल्प होता था ...उसकी मजाक बनाई जाती थी ....माँ बाप को बच्चे कौनसी कक्षामे पढ़ते है ,कितने नंबर आये कुछ पता नहीं होता था ....उनको जो पढना लिखना हो वो आज़ादी थी ...उसमे उनकी रोकटोक भी नहीं थी .....टी वी या आधुनिक उपकरण थे ही नहीं ...वेकेशन मामा या चाचा के घर गुजरते थे ...दादा दादी की कहानियांसे कल्पना खिलती थी .....स्कुल जाने को लक्जरी चीज सायकल थी वर्ना पैदल ...वो अम्बिया पर चढ़ना और पेडोके पीछे छुपनछुपी खेले है हम भी ....एक बीमार पिल्ले के इलाजमें पुरे मोहल्लेके बच्चे लग जाते थे ...हर घरसे एक रोटी मिल जाती थी ...माँ पहली रोटी गाय को देती थी ....तो गाय को प्लास्टिक की थेली नहीं खानी पड़ती थी ...शादी ब्याह घर आँगनमें होता था .......
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अब ये जो ऊपर लिखा है उसके साथ आज के जीवन की तुलना तो आप साथ साथ कर ही रहे है ..मुझे पता है ...और जरा गौर से सोचे तो किस वजह से ये महेन्गाइने हमारा जीवन दुश्वार कर दिया है उसका ख्याल आ गया होगा ...अर्थ शास्त्रमें पढ़ा था अगर मांग ज्यादा हो और उस चीजकी कमी हो तो भाव बढ़ते है ...जब पुरवठा बढ़ जाता है तो दाम कम होते है .......
खुद का घर और गाडी ...स्टेटस के लिए जूझता हुआ इंसान इनकी किश्तोंमें अपनी कमाई का कितना हिस्सा खर्च करता है ...कितनी चीजे उसने किश्तों पर खरीदी है ..उसमे महीनेका एक बड़ा हिस्सा चला जाता है ...बच्चे के ट्यूशन और स्कुल ( पब्लिक स्कूल  स्टेटस के लिए बेहद जरुरी ,चाहे बच्चा समज रहा हो या नहीं ) की फीस ,कार का पेट्रोल , काम वाली बाई की तनख्वाह ...अब क्या है फिर फिटनेस के लिए जिम की तगड़ी फीस भी भरो ...एल इ डी टी वी पर पुरे दिन पोप कोर्न खाते हुए फैलते रहने के बाद जिम तो जाना लाज़मी है ...और मोम और डेड तो नौकरी कर रहे है ...केसेरोलमें रखे खाने को लेकर पुरे दिन कार्टूनमें मन लगाने वाले बच्चे को दादा दादी की कहानी तो नसीब नहीं ..ट्यूशन तो कम्पलसरी ...और बचपनसे कार स्कुल छोड़ने आती है या रिक्शा या अपना वेहिकल तो कसरत की गुंजाइश ही कहाँ है ?? तो मोटापा , चश्मे तो युही मिल जाते है इन आरामशुदा जिंदगीके साथ .....खुले मैदानमें खेलना तो सपना है ...अब  तो प्ले स्टेशन ही साथी अपना .......महेंगे क्लब की फी तो भरनी पड़ती है सोसिअलाईट  बननेके लिए .....अब छोटी उम्र में आते हार्ट एतेक और मधुमेह के कारण एक मेडिक्लेम पालिसी और डॉक्टर की फीस भरनी भी लाजमी है ...
अब हिसाब लगाओ ये महेंगाई सचमुच  ही है न !!! की हमने ही खुद को सस्ता बना दिया है .....
सादगी की जिंदगी हमें स्वास्थ्यके साथ कम प्रदुषण ,कम टेंशन ,और स्नेह प्यार का जीवन हमारे परिवार को आज भी दे सकती है ....पिज़ा इन के पिज़ा की जगह माँ के हाथ के सरसों की सब्जी  और मक्के दी रोटी आज भी सस्ते ही  है ...आपकी मासिक आय चालीस हजार है तो सोने के दाम अट्ठाईस हजार है ...आय के साथ हर चीज बढ़ी है पर हमारी मांगने हमें मार डाला है ...

6 अप्रैल 2012

तस्वीरों का आल्बम.....

हमने कई सपने सजाये होते है ,कुछ तो हमें पता होता है की पुरे नहीं होने है ,और कई सपनो के बारेमें पूरा होना आसान होता है ...फिर भी हम सपने देखना नहीं छोड़ते ...ये हमारी कल्पना है जो पूरा करने का सामर्थ्य हमें ही जुटाना है ....कुछ भी नामुमकिन नहीं होता पर परिस्थितिकी डोरमें हम कठपुतली बनकर रह जाते है ...और कभी आधे अधूरे से सपने पुरे हो पाते है .......
वास्तविक जीवन और सपनोकी दुनियामें फर्क होता है ...एक हकीकतके साथ साथ चलती है ..और एक हकीकत होती है हमारे अंदरकी जिसकी दुनियाको खबर नहीं होती ...
आप क्या सपने देखते हो ?? एक बड़ी गाडी ,सुन्दरसी लाडी, बहुत बड़ी हो बाड़ी , और दो बच्चे नटखट थोड़े अनाड़ी...बस मिल गया तो जिंदगी सफल ...न मिले तो जितना मिला है उससे मन मना लो....सुबह उठो ,खाओ पीओ सो जाओ ....काम करते हो पेट भरने जिसमे दिनका लगभग सारा हिस्सा निकल जाता है ...
कंप्यूटर पर लेखा जोखा तो रोज करना पड़ता है हिसाब टेली रखना पड़ता है ...
पर एक बार रुको ...एक जगह बैठो ..जिस राह पर गुजरकर आये हो उसे थोडा देखो ....कुछ खोया या पाया .....हाँ जो पीछे छुट गया है वो कुछ बेहद खुबसूरत रिश्ते ...कुछ जनमके साथ मिले और कुछ खुदके बनाये ...कितने का हाल का पता आपको मालूम है ,कितनो के नाम याद है ?? कितनोसे आप आज भी मिल पाते हो ?? अगर मिलते हो तो ये सवालका जवाब खुदको पूछना बेहद जरुरी है की आज उस रिश्ते की व्यवसायिक जरुरत है या फिर आप अपने बचपनके वही निस्वार्थ भावसे मिलते हो ???
वो नुक्कड़ पर खिड़कीके पास नजर टिक जाती है वो सोणी सी कुड़ी का क्या ठिकाना है ??कुछ भी ??? नहीं ये सब  जगह पर जाने की जरुरत नहीं ...बस यादोंके सहारे थोड़े उस गलीसे गुजरकर देखो ...एक हलकी सी मुस्कान और एक निर्मल आनंद तुम्हारे चेहरेसे छलक जाएगा ....जिसके लिए आपके मौज शौक के कोई साधन जुटा नहीं पाते ...बहुत धनी और अमीर है वो लोग जिसके पास ऐसे खुबसूरत रिश्ते आज भी कायम है जिन्हें ये संभालना जानते है ...क्योंकि जब आप अकेले हो जाते है तो ये ही रिश्ते आपके साथ याद बनकर चल सकते है ...अगर आपकी जिंदगीमें ऐसे नायाब रिश्ते मिले है तो उन लोगोका हाथ हमेशा थामकर रखना ...आज के ज़माने में ये वाकई निहायत जरुरी है ......क्योंकि इनके पास वो सारी तस्वीरों का आल्बम है जो हमने सपने सजाये थे और इनके साथ स्कुलसे सायकल पर आते आते बांटे थे .....हमारे सपने के असली हक़दार ये लोग ही है ...

29 मार्च 2012

बस आज यूँही ...

रोज आती हूँ यहाँ डेशबोर्ड पर और बिना कुछ लिखे लौट जाती हूँ ...पता नहीं क्यों ऐसे लगता है की मैं शब्दोके साथ इन्साफ नहीं कर पाउंगी ...तो बस शट डाउन ...ऐसा नहीं की खयालो की कमी है पर उससे कोई टेस्टी पुलाव नहीं बन रहा ..और सादे चावल परोसने अच्छे नहीं लगते ...जिन्दगीको बहुत ही करीब से देखा इन दिनों ...बस चुपचाप एक नकशा बन रहा है उन राहोंका जिसपर चलना है मुझे .....हम इंसान खुदको खुदसे अलग करके क्यों नहीं जी सकते ?? हमेशा हर काम जिसमे खुदका वजूद गँवाकर जीना पड़ता है ...क्यों ??? न वर्तमान हो ,न भविष्य न कोई भूतकाल हो ऐसी कोई मनोस्थितिमें नहीं जी सकते ???? क्यों जिंदगी खींचते चले जाते है ..हम क्यों ऐसे जीना चाहते है जैसे लोग जी रहे है ???
लेकिन एक बात है की जब अपनी राह खुद बनाकर चलते वक्त हम लोगोको अनदेखा करते है तो उनको चुभ जाता है ...और बिना कोई बात ही हमें बदनाम करने की भरसक कोशिश भी की जाती है .......लेकिन इस वक्त में मैंने सिखा हर हालतमें लड़ना .....लोगोकी नहीं खुदकी परवाह करो क्योंकि आप अगर सच्चे हो तो लाख कोशिश जूठ कभी नहीं जीत सकता ....कल भी ये सच था ..आज भी है और हमेशा रहेगा ..बस थोडा धैर्य चाहिए ...वक्त आपका होगा......

हाँ आज एक बहुत ही बढ़िया ब्लॉग पढ़ा ......
आपसे जरुर शेयर करुँगी उसकी लिंक :
jiahh.blogspot.in


9 मार्च 2012

I ,ME ,AND MYSELF ............

कल होलीके साथ आंतरराष्ट्रीय महिलादिवस भी  था ,पर होलीके रंगोके  नशेमे चूर इस दुनियामें बसी हर नारी के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं व्यक्त करना मैं एक नारी होकर नहीं भूल सकती ....और मैं ये भी नहीं मानती की नारीका महत्त्व सिर्फ एक दिन का है ...वो तो इन्सानके जन्मसे मरण तकका है .....


I ,ME ,AND MYSELF ............
if I look back in my past ...
I love to remain behind the curtain always
MY PRESENT ...
though I m not actor performing on the stage ...
But I m still on the back stage ..AS A DIRECTOR ...
Life of not only myself but for the people connected to me
My role is d most important ......
whether its as a daughter ,sister ,mother or wife ....
My action affects the lives of others directly or indirectly ....
THE WORLD KNOWS THIS FACT ...
BUT SELDOM RECOGNISE PUBLICLY AND
FROM THE BOTTOM OF HEART  ....
but it doesnot affect me or my dedications ....
BECAUSE I KNOW MYSELF BETTER THAN ANYONE ELSE !!!!
I gossip too much but acts speaks more than gossip ...
I  cry a lot but not for me but for my loved ones ...
I laugh when my loved ones are happy ....
I never sisses ....but I silently fight with the circumstances
without looking for the help by others ...
BUT STILL I WANT A GIFT ON THIS OCCASSION
A DAY I WANT TO SPEND WITH ME AND MAKE MY SELF HAPPY IN MY WORLD ...

2 जनवरी 2012

जिद्दी बन जाओ...

जिंदगीमें एक अलग दिनकी चाहत करनी है तो मुश्किल नहीं होती ...बस उस चाहतके कदको तय मत कीजिये ....
वैसे तो कविता और शायरी की महफ़िलको कल नए सालमें एक दिन के लिए मैंने रुखसत दे दी ....सुबहमें पांच बजे ही नींद खुल गयी ...इकत्तीसका कोई सेलिब्रेशन नहीं किया ...पर सुबह जल्दी उठी तो फेसबुक खोली ....एक दोस्त है मेरी ...अपने पति और बच्ची के साथ एक सालके लिए न्यू योर्क गयी हुई है ...वैसे हम एकदूसरे से कभी मिले नहीं ..पर दोनों पति पत्नी बहुत आदर करते है ..और भारत लौटते ही मुझे मिलना चाहते है .....मेरे शहरके के ही है ....सबसे पहला न्यू यर विश उनसे मिली ....
फिर पूछा उस दोस्तने : कोफ़ी पियेंगे ??/
मैंने कहा : येस आज तो जरुर पियेंगे ....उसने तुरंत एक कोफ़ी का चित्र भेज दिया ...मैंने उसे गाजर का हलवा खानेकी दावत दी ....और हम दोनों उस पल हंस ही रहे थे ...वो भी उधर न्युयोर्कमें हंसी वो मैं बिन देखे कह सकती हूँ ...
पतिदेव को कहा ये बहुत सालोमें हुआ की पहली जनवरी रविवार को है ...तो ये तय रहा हम बड़े भाई जो वड़ोदरा के नजदीक पादरामें रहते है हम वहीँ चलेंगे ..और हमें शाहरुख़खान की नयी फिल्म डोन २ जरुर देखनी है वहां पर ही .....यहाँ पर इस वक्त बहुत ही ज्यादा ठण्ड है ...और मोटरसायकल पर ठंडी हवाके तीर झेलने की जो मजा आई क्या कहने ??/ वहां पर फिल्म भी देखने गए ...सच कहे तो मेरे और मेरी बेटी को छोड़ किसीको इस फिल्ममें कोई दिलचस्पी नहीं थी ....और कहा ये बोर है : तो हँसते हँसते कहा जिसे न देखना हो वो घर लौट जाओ ..बाकी मैंने तो देखनी है है ...पूरा होल खाली था ...और हम सब अलग अलग सिट पर बैठे ...कोई सो गया तो कोई बक बक कर रहा था ...पर मैंने तो फिल्म को खूब एन्जॉय किया ...बड़े दिनोंके बाद यूँ एक्शन पेक फिल्म देखने का मज़ा आया ...बहार जाकर भी मुझे कहा गया : बेकार फिल्म ..तो मैंने खूब हँसते कहाँ पहले ही ऑफर था तो घर क्यों नहीं चले गये .......मेरे पीछे पीछे सब क्यों बैठे रहे .......??
सच कहूँ यूँ डोनगिरी करने का मुझे बहुत ही मज़ा आया ...फिर रात को एकदम ठंडी हवामें मोटरसायकल पर लौटना ...भाई वाह !!! क्या मस्त शाम गुजारी ???
सच कहूँ ..बस इतना कहना है ...कभी कभी जिंदगीके आगे जिद्दी बन जाओ ..औरों के लिए तो हम जीते है पर कभी अपने लिए भी जीना सिख जाओ ...क्योंकि हमारी जिंदगी पर सबसे पहला अधिकार हमारा है ये कभी भूलना नहीं चाहिए ...और ऐसे थोड़े पल गुजार देना कोई गुनाह नहीं !!!!!

7 दिसंबर 2011

जिंदगी एक अजीब दास्ताँ है ...

जिंदगी एक अजीब दास्ताँ है ...कब कहाँ किस मोड़ पर लेकर जाए पता ही नहीं चलता ......जब सब कुछ मनमुताबिक ठीकठाक चल रहा हो तो एक छुपा हुआ डर सामने आता है ,कहीं कुछ बुरा तो नहीं होगा न ??!! ये शंका बहुत ही गहरी चीज है ..और कभी सच हो तो ये वहम हो जाती है ....एक जैसी गुजरती जिंदगीसे बोर हो जाना भी लाज़मी है ...परिवर्तन उस वक्त हमें चाहिए होता है जो मिलता नहीं ..और जब कोई परिवर्तन होता है तो हम तैयार नहीं होते उसके लिए .....
जब अचानक कुछ बड़ा बदलाव आये तो मैं उसे हंसकर स्वीकार करती हूँ ....मुझे शंका कम ही होती है ...स्थिति नयी होती है इस लिए सफलता और विफलताका डर भी नहीं होता ....प्रवाह से अलग पगडण्डी पर चलना मेरा एक शौक है ...क्योंकि वहां पर एक नयापन होता है ....
हम मनुष्य पहले हमें हर बातमे कुछ मुनाफा है या नहीं ये पहले सोचते है उसके बाद हम देखते है की इस राह पर कितनी कम मुश्किल आएगी ...उसके बाद निरिक्षण करेंगे की उस राह पर चलने वालोंके साथ क्या क्या होता है ??? उनकी राय भी जानेंगे ...फिर कदम बढ़ाएंगे .....इतनी देर लगानेमें उस चीजमें जो आकर्षण होता है वो समाप्त हो जाता है ...जिंदगी का साहससे जूझनेकी ताकतका ह्रास हो जाता है ....फिर भी एक चैन की सांस लेते है हाश हमने कुछ खोया नहीं ......
किसीभी जाने पहचाने रस्तेमें भी अनजान और आकस्मिक मुश्किलें भी तो आती है पर उन्हें औरोंके अनुभव और सलाहसे दूर करने की कोशिश करते है ...
कभी कभी हमारी पसंदकी राह हमारे परिवार को पसंद नहीं आती ...एक प्रचंड विरोध भी उठता है ...और हमारा परिवारके प्रति प्रेम और उनसे जुडी संवेदना के कारण हम किसी भी बड़े बलिदान देते हुए नहीं हिचकिचाते ...हमें एक संतुष्टि मिलती है की हमने हमारा कर्तव्य अच्छी तरह निभाया ....
पर यहाँ पर एक सवाल आता है मेरे जहनमें :
क्या हम बिना बलिदान दिए सबको भी राजी करके अपनी इच्छा पूरी हो इस तरह कोई प्रयत्न क्यों नहीं कर सकते ??क्यों ऐसा नहीं सोच सकते ??? क्यों हम किसीकी सोच बदलकर उसे अपनी सोच समजानेकी कोशिश क्यों नहीं करते ??? हम भी इस दुनियामें एक अलग व्यक्ति है और ये जरुरी नहीं की हर बार हमारी सही बातको भी दबा दिया जाय तो हम झुक ही जाए !!!! ये सब हम पर निर्भर करता है ...और यहीं पर इंसान की काबिलियतकी परीक्षा होती है .....
हमारे आइन्स्टाइन ,न्यूटन जैसे वैज्ञानिक , खलील जिब्रान और सोक्रेटिस जैसे महान चिंतकोको उनके युगके लोगोने पहले गलत ही करार दिया था ...पर गुजरते हुए वक्तने ये साबित किया की हां वो सही थे ......ट्रेनके डिब्बे से एक सुनसान स्टेशन पर सामानके साथ मिस्टर गाँधी को दक्षिण आफ्रिकामें बहार फेंका गया था ...पर उनकी हिम्मतने पुरे गुलाम भारतको आज़ाद करवाया और आज भी लोगोके उनकी निति और विचारधारामें अपार श्रध्दा है ........क्योंकि अपनी सही बात साबित करनेके लिए उन्होंने कौन साथ है या नहीं उसकी परवाह नहीं की ...एक अकेला आगे बढ़ा नयी सोच के साथ  और कारवां बनता चला गया ............
बस मुझे गूंगे समर्पणमें विश्वास नहीं जब हमारी बात सही हो ...मैं कभी डिगनेमें विश्वास नहीं करती ...जहाँ तक हो सके अपनी स्थितिसे लडती हूँ बिना घुटने टेके ...और इसी लिए मेरे साथ वाले लोग भी जानते है की सोच समजकर जो कुछ करती हूँ इसके लिए मैं हार नहीं मानूंगी और विरोधकी मात्रा कम होने लगती है ...कभी आज़माकर देखना ...सफलता आपके कदम चूमेगी ...

14 नवंबर 2011

बालदिवस मुबारक हो ....!!!!!

आज सुबह सुबह में मोर्निंग वोकसे घर वापस आ रही थी ....मेरे घर के ठीक बाजुमें एक स्कुल है ...रिक्शासे उतरकर एक छोटी सी बच्ची रो रही थी ...उसकी दो दोस्त उसे समजा रही थी ...रिक्शावाले भैया भी कह रहे थे की तुम्हे आज पता नहीं था इस लिए तुमने नए कपडे नहीं पहने .....कोई बात नहीं ...
एक बात देखी...बच्चेका रोना सिर्फ उसकी माँ या उसके पिता नहीं पर उसकी उम्र के दोस्त और वह हर व्यक्ति जो उसकी जिंदगीके रोजमर्रा के हिस्से है उन सब को असर करता है ...हर कोई अपनी बातसे उसको शांत करने के प्रयासमें जुट जाता है .....एक मासूमसी बात देखी आज सुबह बाल दिवस के दिन ..........
आज हर बच्चे को अहमियत दी जायेगी ...उसे लाड दिए जायेंगे ....सब पत्र पत्रिकामें कल मजदूरी करते बच्चोकी तस्वीर छापी जायेगी ...समाजको सन्देश दिए जायेंगे ...फिर कल से वही ढांचेकी जिंदगी फिर शुरू .....
वो झोंपडपट्टीके बच्चोकी जिंदगीकी दुर्दशा भी दिखाई जायेगी .....
पर एक बात जो कहना चाहूंगी की आपके घरमें भी एक बच्चा है .....जिसकी मुश्किल रोटी कपडा मकान या शिक्षा नहीं ...पर कुछ ऐसी चीजें जो इधर बता रही हूँ वो जरुर हो रही है ......ये बात गरीब या अनाथ बच्चे की नहीं ये एक समजदार और उच्च वर्गके कहलाते बच्चे की ही है ....
१. मोडेलिंग करते बच्चोको पैसे क्या होते समज नहीं होती पर उनका बचपन कहाँ घूंट जाता है ...पैसा और प्रसिध्धि के चक्कर में ...!!!!वो प्यारेसे बच्चे की जिंदगीके बारेमे हम जानते है पर उसके अभिभावक उसकी और ध्यान नहीं देते की उसका बचपन कहाँ ????
२.रियालिटी शो में आते बच्चे .....बहुत कुछ छप चूका है इस के बारे में ...पर प्रसिध्धि और पैसेके मोह में माँ बाप द्वारा उस मासूमकी जिंदगी को बलि चढ़ाया जाता है ....हार जीत के मायने जिसे समज न आये हो उसके लिए अभिभावक द्वारा उसे वक्त के पहले बड़ा कर दिया जाता है .......
३. महंगाई बहुत है ...पति पत्नी कमाने जाते है ....क्रेशमें , या विडिओगेमके हवाले , नुडल्स और पिज़ा के हवाले होता बचपन ..मोटापे और उससे जुडी बिमारियोंका वरदान बचपनमें ही देने लगा है .......बड़ी उम्रके बुजुर्गके लिए ये बच्चे एक जिम्मेदारी होते है ...और उसके बचपन को वो एन्जॉय नहीं कर पाते ....
ऐसे माँ बाप अकेलेपनका तोहफा बच्चो के देते है जिसका हर्जाना शायद बुढ़ापेमें वृध्धाश्रम  में जाकर उन्हें चुकाना पड़ता है ...ड्रग एडिक्शन के केस में शुरुआत ये एकेलेपनसे ही होती है ......
४. बच्चोके कंधे पर पुस्तकोंका ढेरका बोझ  लादकर सुबह स्कुलमें जाते है ...लौटते है होमवर्क का बोज लेकर ....मम्मी पापा का इंस्ट्रक्शन का बोज ....होबी क्लास के बोज में ....
वो मस्ती वो तूफान जो हमने किये थे अपने बचपनमें वो सब गुम हो गए है ......
इस बाल दिवस पर हम अपनी अपेक्षा का बोज उनके नाजुक कंधेसे हटाने का गिफ्ट देकर उन्हें कह पाएंगे ????
बालदिवस मुबारक हो ....!!!!!

3 अक्टूबर 2011

शायद जिंदगी छू कर चली गयी ........

कभी कभी जिंदगीसे प्यार करने की वजह नहीं होती ,
फिर अचानक जिंदगीसे क्यों प्यार हो जाता है ....
बस यही जद्दोजहदसे गुजर रही हूँ आजकल ....यहाँ पर नवरात्री महोत्सव अपने पुरे शबाब पर है ...और एक बड़ा गरबा मेरे घर के ठीक सामने हो रहा है .....शनिवार शाम मेरे घर पर मेहमान इस गरबे में हिस्सा लेने आये ....मेरे परिवार के सदस्य ही ....मम्मी को गरबा खेलना बहुत अच्छा लगता है और बेटी को नहीं खेलना था ...मेरी बेटी बहुत शौक़ीन है और मैं खेलती ही नहीं ...मैं और उस बेटी के साथ और उसकी मम्मी मेरी बेटी के साथ ...दोनों तैयार हुए ...तो एक लम्बा फोटो सेशन किया ...एकदम क्रेजी सा ....मैंने उनकी बेटी के साथ खिंचवाए और उन्होंने मेरी बेटीके साथ ...फिर दोनों खेलने चले गए और हम दोनों सामने फ्लेट के चौथी मंजिल के फ्लोर पर टेरेस में ...लगता था आय एम् ओन ध टॉप ऑफ़ ध  वर्ल्ड ....नीचे सितारे जमीं पर लगते थे ...खूब लोगों का जमघट ...और ऊपर एक तन्हाई ....शायद जिंदगी छू कर चली गयी ........
कल वैसे नियमानुसार देवीके मंदिर पैदल गयी ...वहां एक चारेक साल की बच्ची ...खूब सुन्दर गोरी ,नीली आँखे , मम्मी की तरह जैसे बड़ी औरतें पहनती है सलीकेबंद साडी पहनकर आई थी ...इतनी इतराकर चल रही थी ...मुझे हंसी आ गयी ...मैंने उसे पीछे से पुकारा ...मेडम ,गुड इवनिंग ....वो इतना खुबसूरत हंस पड़ी ..और जवाब दिया ...उसकी मम्मी से पूछा ..तो कहा ऐसी साड़ी सिलवाई है .....वो भी खुश हो गयी ...फिर एक बार निकलते वक्त मुझे वो मिल गयी ...मैंने कहा : बाय बाय मेडम !!! तो हँसके बाय बाय भी कहा ...नाम पूछा तो कहा श्रध्दा ......हाँ ...श्रध्दा  भगवानमें ...शक्ति में ...एक अनजान रिश्ते में ...एक बेनामी  के रिश्तेमें झलकते  सच्चे प्यारे में ...एक अनछुए एहसास में ...दो पलकी सच्ची ख़ुशी में ....
लगा जिंदगी मुझे छूकर निकल गयी ...श्रध्दा के रूप में ...पता नहीं फिर मुलाकात होगी भी या नहीं पर मेरे मस्तिष्कमें तो ये ताज़ा फूल की तरह याद रह जायेगी ...
बाय श्रध्दा .......

29 सितंबर 2011

बस एक पल अपने लिए ...

बस एक पल अपने लिए ....
जिंदगीसे चुराना मेरे लिए मुश्किल जरुर हो जाता है कभी कभार पर नामुमकिन कुछ भी नहीं ...और खुद पर और परमशक्ति पर श्रध्दा हो तो कुछ भी हो सकता है ..कल इस बात की अनुभूति भी हो गयी ....
पिछले दस सालसे नवरात्रीके दिनोंमें गायत्री माँ के अनुष्ठान और सुबहमें बहुचराजी देवी के दर्शन करने जाना मेरा अटूट नियम था ...पर इस साल मेरी तबियत कुछ ज्यादा ही नासाज़ रहने लगी ....मैं कुछ भी नहीं कर पायी इसी ख्यालसे मुझे बेवजह रोना आ गया ....
पिछले साल तो मंदिर तक पैदल जाकर आने का संकल्प लिया था और पूरा भी किया था ...पर काफी कमजोरी के कारण इस साल मेरी हिम्मत ही नहीं हुई ...पुरे दिन सोचने के बाद ...शक्ति की तस्वीर के आगे बस इतना ही कहा : माँ मैंने क्या गुनाह किया ?? क्यों तू मुझे नहीं बुलाती ???
शाम को बस तैयार होकर पैदल निकल गयी ...पति देव को फोन किया आप उधर रहे ताकि मैं आपके साथ लौट सकू ....मेरे पडोसी ने मुझे टोका भी : अरे आज तो आप नयी साडी पहनकर जा रहे हो ???
तो मैंने कहा : देखो बहनजी ,हम किसी फंक्शन पर जाते है तो पार्टी के लिए तैयार होते है और ये तो खुद माँ शक्ति का उत्सव है तो क्यों नहीं ??? और मैं गयी ,दर्शन करते हुए आँखोंमें आंसू थे ....
मेरे सहेली ने रात गरबा वक्त मुझे कहा : कल सुबह मेरे साथ आना स्कूटर पर चलेंगे .......
कहते है भगवान परीक्षा लेते है और रस्ते भी खुद ही दिखाते है ........
मैं गरबे तो नहीं खेलती पर सामने देखने जरुर जाती हु ...हमारे फ्लेट का एक छोटा सा बच्चा तक़रीबन एक सवा साल का ...निसर्ग ...बहुत ही चंचल ....कल कम्पाउंडमें उसके साथ खेलने का बहुत ही मजा आया ...मैं छुप जाती और वो मुझे ढूँढने आता ...सब औरतें गोसिप कर रही थी तब मुझे उसके साथ खेलने में मज़ा आ रहा था ....दोनों घर जाते वक्त तो दोस्त बन गए ....
कहते है बच्चे में भगवान होता है ...और भगवानको अपने हर बच्चे की चिंता भी होती है ....
बस एक चीज लगी की आप अपने आप को जब भी कभी भी बहुत मजबूर समजो एक बार ऊपरवाले को याद कर लेना हिम्मत अपने आप आ ही जाती है .....
जय माता दी ....

5 सितंबर 2011

आज शिक्षक दिवस है .....

आज शिक्षक दिवस है .....
आज मैं ये लिख सकती हूँ और आप ये पढ़ सकते है इसके लिए जिस व्यक्तिके हमें शुक्रगुजार होना चाहिए वो व्यक्ति .....
मेरी पाठशालाके प्रधानाचार्य जो एक महिला थे उनसे मुझे बहुत डर लगता था ...उनकी आभा ही कुछ इस तरह की थी ....लेकिन कहीं न कहीं उनके जितने ज्ञानी होने की आशा थी ....मेरी पहली टीचर पहली कक्षाके थे श्रीमती भारतीबेन .....मुझे क ख ग सिखाया .....लेकिन मुझे श्रीमती अनुमतिबेन आचार्य बहुत पसंद थे और आज भी है ....
पिछले माह हमारे प्रधानाचार्यश्री की ७५ वी वर्षगांठ पर अपने सारे पुराने विद्यार्थियोंको किसी भी तरह से कोंटेक्ट करके आमंत्रित किया ....लगभग दो सौ जितने विद्यार्थी उपस्थित रहे ....लगभग इकत्तीस साल के बाद उसी प्रार्थनासभा के होल में उसी माइक पर मैंने फिर सबको संबोधित किया जहांसे लगभग अंतिम छ साल तक मैं समाचार पढ़ती थी , स्पर्धामें हिस्सा लेकर गीत भजन गाती थी और वक्तृत्व स्पर्धा में सबकी तालियाँ बटोरती थी ...मेरे कुछ शिक्षक अब इस दुनियामें नहीं थे ...और कुछ थे जो बहुत ही वयस्क थे ...जो शिक्षकोंने मुझे पढाया था वो सब मेरे खड़े होते ही बोल उठे अरे ये तो प्रीति गोहिल ( मेरा शादी के पहले वाला नाम ) है ...मेरे साथ पहली कक्षा से पढ़े लगभग हम दस विद्यार्थी थे ...वो सभी मुझे तुरंत पहचान गए .......हमने अपनी यादें बांटी.......
मैं कह सकती हूँ की मेरी जिंदगी के जो सबसे अच्छे साल थे वो उस पाठशालाके आँगनमें आज भी अंकित है ....और उस वक्त ये पता नहीं था की ये वक्त दोबारा नहीं आएगा ....आज भी हम सब जब अपने सबसे खुबसूरत पलों को याद करते है तो वो सारे स्कुल से जुड़े होते है ....
और उस स्कुलको जान अगर विद्यार्थी है तो शिक्षक उसकी आत्मा है ....
आज सारे शिक्षकों को मेरी और से शिक्षक दिवस मुबारक हो ......

31 अगस्त 2011

गणपति बाप्पा मोरिया ...



आज ईद है ...कल संवत्सरी और गणेश चतुर्थी का त्यौहार है ......ये सिर्फ हमारे भारत देशमें ही हो सकता है की हर धर्मके त्यौहार ख़ुशी ख़ुशी मनाये जाते है .....


हमारे वड़ोदराको अब नए साल तक ये जश्नसे फुर्सत नहीं मिलेगी ...तीन दिन से पंडालमें गणेश मूर्ति की स्थापनके जुलुस चालू हो गए है ...डीजे के साथ गणपति आते है ....कल यूँही शामको छत के झूले पर बैठी कुछ लिख रही थी ....सड़क पर से गणेश सवारी निकली ....उसमे गाना बज रहा था ...झूम बराबर झूम शराबी ...कलम रुक गयी ....ये धार्मिक भावनाएं शायद किस तरह बिखर रही है .....कहाँ पर गयी हमारी आस्था .....


हमारे यहाँ नीचे बड़ी सी मूर्ति लाकर रखी गयी है ....पर मुझे सिर्फ छोटे बच्चे के उत्साहमें गणेश नज़र आ रहे है ...जो गाने बजाये जाते है शायद गणपति को मन करता है की चलो कहीं शांतिमें चले जाए ......दस दिन तक ये त्यौहार चलेगा ......मुझे लोगो को देखने की मजा आती है .....बहाने ढूंढते है हम खुश रहने के लिए ...तो ये भी एक बहाना है ....


पर मेरे लिए गणपति विघ्नहर्ता है ......मुझे उनकी कहानिया याद आती है ...टी वी पर आते छोटे बच्चे की गणेशजी की कार्टून कहानिया देखनी पसंद है .........मोदक पसंद है ....और उनकी छोटीसी आँखे और बड़े कान ...दुनिया की सबकुछ सुनो और उसे बुध्धिमानीसे ग्रहण करो ...छोटी छोटी आँखों से दुनिया देखो ...कोई छोटा बच्चा गिर जाए तो उसे संभालो ...उसे ठोकरसे गिरने से बचा लो ...उसके जीवन की राह का छोटा सा विघ्न हरो ...गणेश हमें भी मौका देते है ........बस येही मेरे लिए सच्ची आस्था है उनके लिए .....राह है कलसे शुरू होते हुए डेढ़ महीने तक उत्सवों के उस सफ़रका ....शायद ख़ुशी मेरा पता पूछती हुई कहीं से आ जाए .......



जय गणेश ...गणपति बाप्पा मोरिया ....

16 अगस्त 2011

क्या हम स्वतन्त्र है ??????



कल स्वतंत्रतादिवस का जश्न देखा टी वी पर ........मुसलाधार बारिश के बीच ध्वजवंदन हुआ लालकिले पर ....हजारो स्कूली बच्चे रेनकोट पहनकर बैठे हुए ....राजघाट गांधीजीकी समाधी पर सिर्फ प्रधानमंत्री उनके गार्ड्स के साथ गए और लौट गए ....प्रधानमंत्रीके भाषणका हर लब्ज़ जूठा लगा ....जिसके हाथमें सत्ता है वो नपुंसक हो गए है और हम प्रजा हम तो है ही ऐसे नेताओ के हाथ से मार खाने के लायक .....हम अपनी नौकरी अपनी तनख्वाह सेक्योर कर लेते है और बड़ी बड़ी बातें सिर्फ ट्विटर या फेसबुक या एस एम् एस पर कर लेनेसे कुछ नहीं होगा ......


पहले हमारी जंग अंग्रेजोके खिलाफ थी ...वो तो विदेशी थे ...हमने कल ही आज़ादीका ६५ जन्मदिन मनाया ...और आज हमारे वाणी स्वत्रन्त्रय के हक़ पर जिस तरह ताराप मारी गयी है ...वो नाकाबिले बर्दाश्त है ......लोगो की भ्रष्टाचार के खिलाफ की आवाज को सत्ता नायको द्वारा यूँ कुचल देना ........अब जंग अपने चुने गए लोगो के खिलाफ ही लड़नी होगी .....


सिर्फ एक दिन इस देश का हर नागरिक अपना काम छोड़कर सड़क पर आ जाए तो सरकार की आँख खुलेगी और नींद भी उड़ेगी ......देश के मुड़ीवादी के हाथ बीके हुए सत्ता वाले तभी हिल सकते है ....अब की बार कुछ ठोस करने की जरुरत है ....जब आवाम ,देश की आम जनता सड़क पर उतरती है तभी क्रांति हो सकती है ........और कोई भी जुल्म करने वाला फिर टिक नहीं सकता .........


अस्तु ....


एक आम भारतीय जो आज अन्ना के साथ है ......

6 जून 2011

एक सवाल

कल पूरा दिन मिडियामें बाबा रामदेव छाये रहे...वैसे तो मैं राजनीती पर ज्यादा कुछ लिखना पसंद नहीं करती पर कल एक मंत्री महोदय की टिप्पणी पर कुछ कटाक्ष वाली हँसी आती रही ....
उन्होंने कहा की बाबा योग गुरु है उन्हें सिर्फ योग ही सिखाना चाहिए और उन्हें पोलिटिक्सके आसन नहीं सिखाने चाहिए ....
बस मेरा एक ही सवाल है इस देश के शासकोंको करने को मन किया है :
हमने इस देश की धुरा बागडौर आपके हाथ में इसी लिए दूसरी बार भी सौंपी थी की आप सुशासन करे ....और आपको येही करना चाहिए था तो फिर आपकी सरकारमें बैठे लोगोने ये इतने बड़े पयमाने पर भ्रष्टाचारके आसन क्यों किये ??? इतने किये की आम आदमी के लिए तो अब दो जून की रोटीभी मुश्किल हो जा रही है ...और जेल के अन्दर से ज्यादा बाहर भ्रष्ट लोग घूम रहे है .....
आपको भी सिर्फ लोगोका भरोसा कायम करना होगा और गलत लोगो को उनकी सही जगह जेल पहुंचाना होगा ...

15 अप्रैल 2011

वेकेशन

वेकेशन .....!!!!!!
एक खुबसूरत अल्फाज़ जो अपने में बहुत कुछ समेटे है जिसकी हमें चाहत होती है ....
अपनी रोजाना जिंदगीसे हटकर कुछ अलग सा ...विश्राम सा ....
वैसे इससे पहली मुलाकात तो स्कुल से हुई थी ...एक दीवाली का वेकेशन और दूसरा गर्मी का .......ढेर सारी छुट्टियाँ और पढने की किट पिट से छुटकारा ...यारो दोस्तों की टोलीमें बहुत सारे पल गुजारे जो आज करोडो रुपये देकर भी वापस नहीं मिलते ......वो कंचे ,वो गुल्ली डंडा , दोपहर में एक घर में बैठकर खेले जाते लूडो ,सांप सीडी ,व्यापार ,केरम और ताश तो कैसे भूल सकते है ,नेपोलियन बनने की ख़ुशी ....इन सब की जगह आज कुछ अलग चीजों ने ले ली है ...हमारे वेकेशन में माँ बाप की दखल बहुत कम होती थी ...
और अब ????
यूरोप टूर ,या विडिओ गेम , डी वी डी ,और कितना कुछ !!!!! पर सिर्फ बच्चो को नहीं हम सब को अपनी रोजाना दौडभाग से थोड़े छुटकारेके पल की आशा होती है ना ??
बिलकुल हाँ .....एक दिन खाना नहीं बनाना पड़े ...एक दिन अचानक छुट्टी डिक्लेर हो जाए ...ऑफिस पहुंचते बिजली गुल और शायद वो तीन चार घंटे तक ना आये तो काम ठप्प और उस वक्त थोडा किया गया सैर सपाटा ....किसी दिन एक दोस्त का जबरन अपने घर ले जाना और हमारे परिवार को भी उधर ही बुला लेना ...फिर किया गया हुडदंग .....रस्ते पर कोई पुराना दोस्त या सहेली मिल जाती है उसके साथ किसी नजदीक की कोफ़ी शॉप या चाय की कितली पर जाकर वो चुस्कियां लेते हुए की गयी गपशप ...... एक दिन अचानक से बारिश का आ जाना , और पैदल भीगते हुए घर जाना ......
अपने घर की बालकनी में खड़े होकर आसपास की घटनाओ को एक नयी नजर से देखना ...... हमारे घर के सामने एक बड़ा सा बंगला है ...वहां आजकल उनकी बेटी अपनी नवजात बच्ची को लेकर मायके आई हुई है ...हर रोज सुबह एक नजारा होता है ....झूले पर वो बेटी बच्ची को लेकर आती है और फिर घर का हर सदस्य उसे बारी बारी से खिलाने आता है ...ये नज़ारा पंद्रह से बीस मिनट तक जरुर चलता है ...मैं उस वक्त सोचती हूँ की वो बच्चा उस वक्त किस भाषा में सोचता होगा ...हमारे जो बचकाना नखरे होते है उसे देखकर उसे क्या खयाल आते होंगे ??? उदाहरण : बच्चू जब नए कपडे पहनकर मुझे उठाकर तो देख ...उस पर सु सु नहीं की तो देखना ....और बिना कुछ कहे मेरे रोजाना कामकाज से एक हँसी और कुछ पलों का वेकेशन अनायास ही मिल जाता है ....
हाँ बस एक ऐसा ही छोटा पंद्रह दिनों का वेकेशन मैं भी लेने जा रही हूँ ....कुछ पल मेरे अपनों के लिए मेरे अपनों के साथ ........
बिरह ये समजा गया की मिलन का वजूद क्या था ???
तेरे से जुदा होकर भी तेरे खयालो में जीते रहे हम .....

2 अप्रैल 2011

ओल ध बेस्ट धोनी ....

आज पता है सबके दिल में धोनी धड़क रहा है ....और सचिन सांस ले रहा है ...तो ये पोस्ट कौन पढ़ेगा ???? आज बीवीकी बनायीं सब्जीके बारेमें कोई कम्प्लेन नहीं होगी पर जब मिसफील्डिंग होगी तो शायद ये क्या किया ऐसे सब चिल्लायेंगे ....टी वी स्क्रीन पर देखते देखते टिप्पणी देना शायद आसान है पर उस बाईस गजके विकेट पर सामनेसे आ रहे गेंद का सामना सबसे मुश्किल ......
बस जिंदगी भी कुछ ऐसे ही होती है ना ??? हम एकदम आसान काम को नहीं करते पर किसी गुगली पर जो बड़े बड़े दिग्गजोंको समज ना आई हो उस पर छक्का मार सकते है ...जब जिंदगी क्रिकेटकी पिच पर बेट पकड़कर खड़ी होती है तब ग्यारह खेलाडी जैसी परिस्थितियां हमें घेरे खड़ी होती है ...एक चुक और हम आउट ....और इसके निर्णायक दो ग्राउंड पर होते है ...और दो ग्राउंड के बाहर ..हरपल को जांचा परखा जाता है और दुसरे लोग हमारे आउट या नोट आउट के निर्णय लेते है ....पर जिंदगीकी मेच में येही होता है ....जब शायद आधी से ऊपर की टीम पेवेलियन लौट चुकी हो और सारे दिग्गज खिलाडी आउट हो चुके हो तब कोई नया नौसिखिया खिलाडी बल्ला लेकर आता है और उसके बीस पच्चीस रन जीत का तोहफा दे जाते है ...जो काम दिग्गज की सदी नहीं कर पाती वो नन्हा सिपाही कर देता है ....और वो मेन ऑफ़ थे मेच हो जाता है .....क्यों ???? ये सवाल आज आप अपने आपसे जरूर पूछना ...
चलो अब जिंदगी की बोलिंग सीखते है ......अब जिंदगी सामने बेट लेकर खड़ी है ...और हमारी सारी शक्तियां हमारे सारे गुण अवगुण ग्यारह खिलाडी बनकर हमारे साथ होते है ....ये हमारे हाथमें होता है की ऐसी हालात पैदा करे की जिंदगीके सारे अवरोध हम क्लीन बोल्ड या हमारी कोई शक्ति के द्वारा केच आउट ,रन आउट ,एल बी दबल्यु ,या स्टंप आउट करा दे ....और जिंदगी का हर चेलेंज का हमारी शक्तियों का सही उपयोग करके काममें लाकर उसका ना सिर्फ सामना करे पर सारी मुश्किलोंको हराकर पेवेलियन वापस भेजे ....
हार हो या जीत हो जिंदगी भी एक खेल है पर उसे अंतिम ओवर तक खेलने की क्षमता ,खेलते रहने की क्षमता ,हार या जीत को ठन्डे दिमागसे पचाने की क्षमता ,हार से हमारी कमी को जानने की और सुधारने की क्षमता ,और जीत के नशेमें ना लड़खड़ाने की क्षमता ....ये क्रिकेट हमें सिखाता है ... जो लीग क्वार्टर सेमी और फायनल तक टिक जाता है वो ही सिकंदर कहलाता है .... ओल ध बेस्ट धोनी और उसके धुरंधर ............

16 फ़रवरी 2011

कुछ अलग से एक दिन

कभी दिन जो निकलता है वो कुछ ऐसे निकलता है की उसे हमारे सारे प्लान की धज्जिया उड़ानी ही हो ....पर दिन के अंत में आप अगर सोचे तो कुछ अलग से गुजारा दिन हमें वो बहुत कुछ देकर जाता है जैसा हमने कभी सोचा था ...और रूटीन जिंदगी में इस बात की कोई सम्भावना हमें नज़र ना आई थी ....
मेरा कल का दिन कुछ ऐसा ही रहा .....
एक करीबी रिश्तेदार की मरणोत्तर उत्तरक्रिया में जाना था ...पर पिछले तीन दिन से शहर में रिक्शा की हड़ताल चल रही थी ...मैं के नजदीक के रिश्तेदार के घर गयी और वहां से हमें शहर के दुसरे छोर तक जाना था ....पौने घंटे के बाद भी रिक्शा नहीं मिली तो मैं और वो लेडी उसके घर बैठ गए ...वहां उसके घर ही खाना भी खा लिया सिर्फ सब्जी रोटी....ना हमारे दोनों के पतिदेव साथ थे ना ही बच्चे ....उन दो घंटे में हमने इतनी ढेर सारी बाते की वो भी बेफिक्र हो कर बिंदास ...खूब हँसे और कुछ दिल का गुबार भी निकला .....बाद में पतिदेव को फोन करके बताया की हम यहाँ है ...तेज धुप में चलकर घर वापस गयी .......कुछ रिश्तेदार बिच रस्ते इंतज़ार करके लौट गए ......पर ये जो एक तरह से बगावत कर ही ली वो मुझे सचमुच खुश कर गयी ...सब कुछ भूलकर कुछ पल अपने लिए भी ....

हमारे परिवार में सिर्फ महिलायें ही होती है जिसका जीवन बाकी लोग के पीछे चलता है और वो अपनी राह तक खो देती है कभी कभी गृहस्थी में खोकर ...पर ऐसे पल जी लेने चाहिए ठंडी हवा के झोंकोंकी तरह .......

कल मुझे सच मुच लगा मेरे ब्लॉग का शीर्षक यथार्थ : जिंदगी : जियो हर पल ....

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...