कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

27 मई 2018

जलती धरती

रात आकर मरहम लगाती,
फिर भी सुबह धरती जलन से कराहती ,
पानी भी उबलता मटके में
ये धरती क्यों रोती दिनमें ???
मानव रोता , पंछी रोते, रोते प्राणी
ढूंढते छांव धूप के तीरो  से बचने को ,
पेडों से घिरी सड़कें अब तो कल की बात है ,
सीमेंट के जंगल मे पेड़ कहाँ मिलते???
वो हमारे ही कर्म थे जो लकड़ी के लिए
पेडों की बलि चढ़ाते रहे हम ,
पैरों से चलने की आदत छोड़ कर,
पेट्रोल के ईंधन के वाहन को अपनाते गए ,
अब फल मिलने लगे है भरपूर,
पारा उष्णता का नहीं उतरता नीचे
करता 40 और 45 सेल्सियस के पार
धरती के वस्त्र स्वरूप वृक्षों को
हम बेरहमी से काटते रहे ..
अब गर्मी से झुलसते हम बेहोश होकर
प्राण खोते रहने की शुरुआत हो रही है ...
वक्त रहे सम्भल जाओ..
पेट्रोल , पानी और पेड़ बचाओ ...
सायकल से सेहत बनाओ ,
सादगी से रहकर धरतीको बचाओ ....

23 अप्रैल 2018

धूप

पहनकर धूप की पायल ,
अंगारोंकी तपिश में नाचती सड़कें ,
तन्हाई में बात कर रहे है सूरज से ....
तुम सुलगते रहे हो सालों से ,
पर राख न हुए कभी ,
तब हाले दिल बयाँ करते बोला सूरज ,
मेरी तनहाई का आलम कौसे करूँ बयाँ??
जो मेरे करीब आता है ,
सुलग जाता है तड़पकर ,
उन सुलगते साथी पर बरबस रोता रहा हूँ,
मेरे आँसू भी सुख जाते है मेरी तपिशसे ,
तकदीर में राख भी नही
मेरी गर्माहट से तो राख भी जल जाती है ,
मेरी राह  तकना तुम ,
बादलों की चुनर में
बूंदोके मोती की गठरिया बांध आऊंगा ,
इंतज़ार करना ...

21 अप्रैल 2018

सन्नाटा

दूर दूर तक भीड़ ही भीड़ है ,
पर कोई कुछ बोल नही रहा .

भीड़ को चीर कर बस बरबस दौड़ रहा सन्नाटा ...
खामोशी भी उसका हाथ थामे है चल रही,
सुनी आँखों में  कितने ही सवाल लिए ...
कोई कुछ बोलता नही ...
हजारों सवालों का समुन्दर लहरा रहा है ,
पर न कोई शोर न आवाज ,
भीड़ में खड़ी एक औरतकी कोख से एक आवाज सुनाई दी इस सन्नाटे में ,
माँ , मैं तेरी कोखसे बोल रही हूँ ,
पहले मैं तरस रही थी इस दुनिया में आने को , उसे देखने को , उसे प्यार करने को....
पर मुझे नही आना अब ,
खौफनाक दरिंदगी की दास्तानों से
डरा हुआ तेरा दिल मैं महसूस कर रही हुँ..
छोटी सी जान भी सलामत न रही
दरिंदगी और वहशत से अब ,
नहीं आना इस दुनिया मे अब इंसान के लिबास में मुझे अब ,
में जा रही हूं तुमसे दूर कहीं ,
कल तेरे गुलाब के पौधे में खिलूँगी
एक गुलाब की कली के रूपमे ,
तेरे आंगन को महकाने को ...
भीड़ से एक धक्का आया ,
वो औरत गिर गयी ,
थोड़े मानुष उस पर से गुजर भी गए ,
जब आँख खुली उसकी ,
उसकी बेटी ने बिदाई ले ली थी ,
एक गुलाब बनने के लिए ,
या शायद एक गोरैया बन चहकेगी ???!!!!! .....

18 अप्रैल 2018

लकीरें

हथेली से गुजरती हुई
वो पतली सी पानी की धार
पथ्थर की तरह
एक लकीर बनाकर चली गई .....
सहर में एक अक्स उभरकर निकला
उस लकीर की गहराई से
एक आवाज भी आई ...
वो आवाज में घुला था मेरा नाम ...
दौड़कर खिड़की खोली ,
एक सर्द हवा का झोंका
मेरे चेहरे को छूकर कमरे में आ गया...
मैं खामोश वो झोंके से उभरा वो
गीत सुनता रहा जो तुम गाती थी...
अक्सर मुझे बुलाने का इशारा देते हुए ,
जब उस झरने पर पानी भरने आती थी ...
लोग कहते है ये झरना नही सूखता
कड़ी धूपों में जुलसकर भी !!!!
कैसे सूखे ??
रातों को तन्हाई में झरने के किनारे
रोते है हम दोनों तुम्हारी यादों में भीगते है ....

17 अप्रैल 2018

जिंदगी

कभी खिड़की से झांखती ,
कभी पलकें बिछाएं करती मेरा इंतज़ार ,
मुझे तेरी तलाश थी ,
तेरा दिल भी था मेरे लिए बेकरार ....
पर नही मिलना था मुझे ,
तुझसे जो किये थे
वादे नही कर पाई पूरे ,
तू समझती बिन पूछे मुझे .....
पर मैं खुद से शर्मिंदा नही हो पाती ....
चल आज गले लग जाए ,
न मुझे कोई गिला तुझसे ,
न कोई शिकवा तुझे भी होगा ,
अधूरे अधूरे से हम फिर भी पूरे पूरे से हो जाए....

28 मार्च 2017

सूरज से लड़ते हुए .....

आज दिन धूप  पहनकर निकल पड़ा है  ,
गर्मी के गहने पहनकर सड़कों  पर   ....
आज भाव भी बढ़ गए दरख्तों के
सड़क के किनारे खड़े रहकर जो
तमाशाई दुनिया को देखते है चुपचाप   ...
क्या चिड़िया ?? क्या जानवर ?? क्या इंसान ???
उसकी छाँव में आज सब महेमान  ....
वैसे तो बारिश के दिनों में अक्सर आते है
थोड़ी देर ठहर तो जाते है  ...
पर सुनसान सड़कों को डामर से पिघलते देखा है  ,
चप्पल भीतर भी फफोलों को उभरते देखा है  ,
तब वो पसीने की बूंदो से मेरी जड़ों को
सींचते हुए रुमाल जटकते है  ,
मीठे पानी को थोड़ा नमकीन सा कर देते है  .....
रुक कर थोड़ी देर चले बाशिंदों को क्या पता  ???!!!
मेरी टहनी का एक एक पत्ता  तुम्हारी छाँव के लिए
जलता रहता है दिनभर सूरज से लड़ते हुए  .....

1 मार्च 2017

तक़दीर कहकर ....

याद  रखना तुम्हें  मुनासिब न था  ,
भूल जाना भी तुम्हें  मुमकिन न था  ..
जिंदगी के एक मोड़ से तुम मुड़े ,
दूसरे छोरसे मेरा आना वाजिब न था  ...
माना जुदा थी तुम्हारी राहें  मुझसे  ,
माना  मेरी मंज़िल के अफ़साने भी अलग  ,
बस चार कदम साथ चलने का बहाना था  ,
अकेले चलते रहे भले एक कारवां साथ था  ...
 तुम्हें  याद रखु तो किस नाम से  ??
तुम्हें  पुकारूँ कभी तो किस नाम से ??
बिछड़ते वक्त तक दूर से सिर्फ निगाहें मिली थी  ,
और आँखों के फलक पर तुम्हारा नाम लिखा न था  ...
 चलो अजनबी तुम अजनबी हम ,
दो पल आँखों से लिखा वो तक़दीर का अफसाना था  ..
तुम्हें याद रख लूंगा तस्वीर  कहकर  ,
तुम्हें भुला दूंगा   तक़दीर कहकर  .... 

23 फ़रवरी 2017

अफसाना

कोई अफसाना कहता है कोई हकीकत  ,
जीते है कुछ लोग अफसानों को ऐसे ,
फितरत ही हो जिनकी जैसे वो हकीकत  ...
सोच से ऊपर उठने वाले सपनों को जी लेते है  ,
सोच कर जो तकते है आसमाँ वो जी लेते है ???
किसी की सोच को दफनाकर क्या दब जाती है वो ???
कल किसी और के जहनमें आ जाती है वो  ...
हकीकत जीते जीते जिंदगी उनकी अफसाना बन जाती है  ,
उनकी सोच सपनों के परवाज़ पर सवार ,
आसमानों को छू जाती है  बनकर फिर हकीकत  ...
तन्हाई बहुत जरुरी है इन लमहों को जीने के लिए  ,
मरने  के बाद अफ़साने जिन्दा रहते है  ,
हकीकत तस्वीर बन दीवारों पर टंगी पायी जाती है  ..... 

20 फ़रवरी 2017

हाय रे इंसान ....

किनारों को शिकायत है दरिया से  ,
हम प्यासे क्यों हमेशा से  ....
पानी ने कहा चुपके से कान में  ,
तुम्हारी मर्यादा तुम्हे रोकती है
मेरी मर्यादाएं मुझे रोक लेती है  ....
फिर भी कभी बारिश के पानी से
नहीं देखा जाता ये ..
आस और प्यास का खेल हमारा
किनारों को तोड़कर मैं भी आ जाती हूँ  ...
 तुम डूब  जाते है और मैं तैर जाती हूँ  ...
सुखे  हुए फूल रौंदे जाते है जमीं पर  ,
रोते  होंगे वो भी पर आंसू सुख जाते होंगे  ,
कैसे प्यार से गले लगाती है धरती उन्हें  ,
वो भी धरती की गोद में घुल जाते है  ....
एक इंसान ही तो है की भरम में जिए जाता है  ,
औरों के सुख को अपना दुःख बना लेता है  ,
और अपने दुःख को दुसरो के सुख के बदौलत है
ऐसा करार देता है  ...

4 फ़रवरी 2017

हमारा मिलना जरुरी है .........

वो दिल थी मैं धड़कन  ,
वो सांस थी मैं गर्माहट ,
वो आयना थी मैं अक्स ,
वो बहार थी मैं फ़िज़ा  ,
वो चाँद थी मैं सितारा ,
वो धरती थी मैं गगन ,
वो आस थी मैं प्यास  ,
वो नदी थी मैं किनारा  ,
वो जान थी मैं जिस्म  ,
वो ग़ज़ल थी मैं काफिया ,
फिर भी
वो अपूर्ण थी और मैं भी  ,
इस लिए पूर्णत्व की खोज में
हमारा मिलना जरुरी है  ......... 

1 फ़रवरी 2017

दायरे

सोच की लहरों पर एक तस्वीर तैरती रहती है  ,
जैसे समंदर में चाँद की तस्वीर उछलती है  ,
मनके तरंग को क्या कहे वो काबू में नहीं है  ,
एक डूबती सांझकी बातोंमें तेरे जिक्र की तहरीर रहती है  ....
कहीं खुशनुमा रात बनकर सज रही होगी  ,
कहीं तारों की चादर में ढककर रखेगी अपने चहेरे को  ,
एक उलझी सी लट उस दायरे से निकल कर  ,
तेरी हंसी की गवाही देती होगी  ....
इंतज़ार में कटे कितने ही लंबे सालो के फासले  ,
बस तेरे गांव की सरहद पर बेसब्री यूँ बढ़ी  ,
जैसे जान अभी निकलकर जिस्म से  ,
तेरे ड्योढ़ी पर जाकर बैठी होगी  ......

20 दिसंबर 2016

ये राज़ तो नहीं ????

डूबता हुआ सूरज सागर के ठीक पीछे जा रहा है  ,
न सागर सूखता है और न सूरज बुझता है  ...
दोनों की तासीर अलग ,दोनों की तस्वीर अलग ,
दोनों के मिज़ाज  अलग फिर भी
दोनों एक जगह मिलने के वादे पर अफर  ...
सागर हथेली खोले हुए सूरज को खुद में समाता है  ,
सूरज भी बुझने से बेख़ौफ़ उसकी हथेली में चला जाता है  ,
दूसरी सुबह दोनों ही अपने वजूद को फिर जिन्दा कर जाते है  ,
दोनों मिलो दूर से भी एक हो जाते है  .... पर
पर ये इंसान एक छत के नीचे भी मिलो दूर दिल से  ,
एक दूसरे के अस्तित्व को खत्म करने की घात  में  ,
एक दूसरे के वजूद को नकारता हुआ  ,
बस खुद के जीने के लिए औरों को मारता  हुआ  ....
इस लिए ही इंसान का अंत है
पर सूरज और दरिया अनंत है ये राज़ तो नहीं ????

15 दिसंबर 2016

गुजरती है .....

लब्ज़ टपकते है लहू की तरह  ,
कलमसे जब आग ज़रती है  ...
इतना छोटा सा दिमाग ,
उससे भी छोटा सा दिल ,
क्यों नहीं थकता उसके दायरों से ???
एक सादा सा कागज़
 एक सैलाब बनकर बहता है  ....
ये छोटी सी कलम तोड़े जाती है
ये छोटी सी कलम जोड़े जाती है  ...
कुछ बनते बिगड़ते रिश्ते
बनकर सैलाब कलम से कागज़ तक  ....
एक जन्म जो तय है  ,
एक मौत जो किसी मोड़ पर इंतज़ार में है  ,
उसके बीच के फासले तय करने का नाम
जिंदगी है  ,जो न कागज़ से  ,
न कलम से  , ना सांस से  ,ना नाम से  ,
बस वो तो सिर्फ तुम्हारे काम से  ,
उससे जुडी हर याद से  ,
होठो पर मुस्कान के साथ आँखमे अश्क़ लिए
गुजरती है  ...बस  ... गुजरती है  ..... 

10 दिसंबर 2016

वर्तमान

वक्त के इस छोर पर मैं खड़ी थी  ,
वक्त उस छोर पर खड़ा था  ...
मैं मुस्कुराई तो वक्त मुस्कुराया  ,
मैंने हाथ हिलाया तो उसने भी हाथ हिलाया  ,
लगा ऐसे जैसे आयने के सामने खड़ी  हूँ  ...
खुद को निहारती हुई  ,
पर ये वक्त का आयना है शायद  ,
कभी मुझे पीछे सैर कराने  ले चलता
और फिर वहां पर छोड़ता जहाँ खड़ी  थी  ,
हर समय एक महसूसियत के साथ एक चुभन होती  ,
उस वक्त में कितनी खुश थी ???!!!!
 पर एक दिन मैंने पलटकर देखा तो लगा
मैं पीछे रह गयी और दुनिया कितनी बदल गयी  ,
आयने के झांसे को तोड़ कर मैं
मुस्कुराते हुए चल दी  ,
जहाँ  वर्तमान खड़ा था बाहें फैलाये  ...!!!

24 जुलाई 2016

शायद..

शायद आज नई बात हो
 शायद आज फिर उनसे मुलाकात हो
शायद उन्हें भी याद आए मेरी वह बातें
शायद बे खयाली में उनके लबों पर मुस्कुराहट हो शायद आज वह बात हो
शायद मुद्दतों के बाद यह फुर्सत के लम्हे मैंने पाए हैं शायद उन्हें जीने की ख्वाहिशों वाले उम्मीदें हो शायद वह आए फिर भी मैं चुप रह जाऊ
शायद आज उनकी तरफ से कोई बात हो
शायद जिसकी बदौलत जिंदा रह पाए हैं हम
शायद वह मिले या ना मिले
 और
 मेरे हाथों में मेरे सपनों के टूटे हुए शीशे के टुकड़ों में चाहत के अफसाने हो.....

18 जुलाई 2016

चुभन

नश्तरो की चुभन
तेरा नाम याद दिलाती है
वह दिन में उठती टीस
तेरे नाम से मुझे तेरा पता बताती है अलग से जहां में चले जाते हैं
हर और
यादों के कब्रस्तान नजर आते हैं
घूमते है यहां अब डर नहीं लगता
यादें गूंगी होती है
आवाज नहीं दे पाएगी हमें
पर नंगे पैर घायल होते हैं कांटो से
काटा बनकर वह दर्द दे जाती है
दर्द ही जब दवा बन जाए तो
डर कहां लगता है??
जब मेरी याद करने की आदत गई नहीं तेरी चुभने की आदत गई नहीं
सोचते थे तेरे जाने से मर जाएंगे हम भी पर क्या करें
यह जीने की आदत गई नही…..

2 जुलाई 2016

वादा है मेरा.

कभी तनहा रहने का बहाना ढूंढते थे ,
तेरी यादों के सफे पर लिखे
हर गुजरे लम्हों को जीने के लिये…..
अब तन्हाई से डर लगता है,
फिर से तेरी बेवफाई
सबब न बन जाए मेरी रूसवाई का …..
न तेरा गम है न तेरी जूत्सजु,
तु सलामत रहे तेरे ख्वाबो के साथ ,
मेरी वो पाक यादों पर
तेरा साया भी ना पडे …..
गर कभी सामना हुआ
जिन्दगी की राह पर चलते चलते,
पहचान से भी मुकर जाने का
वादा है मेरा ...।।
बसर जायेगी ये जिन्दगी तनहा भी ,
तेरी यादों की धून्ध मे
मेरा नाम तक तुझे याद न रहे…..

22 जून 2016

वादा

आज कल थोड़ा सा आलसी बनकर सूरज ,
बादलों में लिपट कर बैठा रहता है ,
वो हवाओं के तो पर निकलकर आये है ,
उड़ती फिरती रहती है यहाँ से वहां ....
बूंदों को छुपाए बादलों को कंधे पर बिठाकर  ,
इंतज़ार कर रही है धरती पर रुख करने का  ....
बादल और सूरज छुपनछुपाई खेलते है  ,
तब हवाएं थम जाती है  ,
 चेहरे पर पसीने की बुँदे जम जाती है  ...
नखरे मत दिखा अब तो  ,
चल आ जा बारिश अब के शाम को  ...
मिलने का वादा चाहिए तुमसे  .... 

4 जून 2016

मौसम

तन्हाई के जंगलों मे यादों के दरख्त पनपते है.
यहाँ पर भी मौसम होती है
औऱ मौसम के मिजाज भी बदलते हुए.
यहाँ भी पतझड और बहारो के काफिले,
यहाँ भी खुद से बिछडे औऱ खुद से जुड़े......

17 मई 2016

फर्क

जलती हुई चाहत दिल में सुलग  रही थी ,
न जाने कहीं से शबनम की बून्द टपकी ,
झख्म पर हुई जलन कराह निकली यूँ ,
वो बून्द आंसू की थी नमक मिली ....
 कौन किसी से मिला है चाहकर कभी  ,
बस हमराही थी की साथ चलते चलते
पहचान हुई और लगा की जानते है हम
एकदूसरे को पिछले जन्म से  ....
क्या देखा की तुम अच्छे लगने लगे सबसे ,
क्या महसूस किया  बुरा तो कोई नहीं ,
मैं भी वही हूँ , हो तुम भी वही ,
फर्क शायद नजर नहीं नजरिये का होगा  ....!!!!

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...