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17 जुलाई 2009

तस्वीर

बाहें फैलाकर बह रहे थे बादल

शब्दोंके कैमरेमें कैद कर

उनकी एक तस्वीर भेज रही हूँ

इस मौसममें चुपकेसे एक खुबसूरत खता कर रही हूँ ......

हर दिशा मचलकर भूरासा भेस पहनकर

सूरजको समेटकर छुपाकर अपनी पनाहोंमें

एक बिरहनसी अपने आँखोंकी बूंदों से

इस प्यासी धरती पर बेपनाह स्नेह बरसा रही थी .....

लगता है आसमांने भी खुली बाहोंमें

समुन्दरको बादल बनाकर समेटा हो

बिजुरी बनाकर उसकी मांग भरी हो

मेघधनुकी चुनर ओढ़कर गरजकी शहनाई बज रही हो .....

बादलोंकी लकीरोंसे एक तस्वीर

उभरकर आँखोंमें बन आई है

और मुझे मेरे परदेसी पियुकी

फ़िर याद आई है .......

11 जुलाई 2009

कागज़ की नाव

पुराने छातेके छेदसे कुछ बारिश हो रही थी ,
मैंने उस छोटी बारिशमें भीग रही थी ...
अपनी मशरूफ जिंदगीमें कुछ ऐसे छेद बना दो ,
पल दो पल मेरे लिए निकालकर मेरी जिंदगी भीगा दो ....
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बादामी आँखोंका समुन्दरमें हिचकोले लेकर लहरे झूम रही ,
अपने प्रियतम बादलकी बूंदोंको घूंट घूंट कर पी रही ,
आज इस आँखोंके समुन्दर को कुछ सिमटा कर झील बना दी
और उसमे अपने सपनोके कागज़ की नाव बनाकर तैरा दी ......

10 जुलाई 2009

मेरे प्यारे छाते के नाम एक पैगाम ...

छाता पड़ा अलमारी में आज बहुत मुस्कुरा रहा था ,

छुप गया था पुराने कपडों के पीछे मजे से ,

और एक घंटेसे मुझे रुला रहा था ....

रेन कोटके बटन टूटे पाए थे तब हमें छाता महाशय याद आए थे .........

लुका छिपी हमारी फ़िर ख़त्म हुई

कहीं पीछे से छाते महाशय की डंडी दिख गई ...

उत्सुकतासे हमने उन्हें खींचना चाहा

और इसी कोशिश में ढेरों कपड़े अलमारी के बाहर गिरा दिए ...

लो अब एक और काम हमने बढ़ा दिया

और इल्जाम छाते महाशय पर लगा दिया ....

बाहर निकाल कार हमने खोलना चाहा

तो जमीं जंग को बात रास न आई ,

खोलने पर नाराज होकर उसकी तिल्लिया कुछ ऐसे गुर्राई

और तीन तिल्ली तो टूटकर हाथमें आई ....

फ़िर भी हमारी हिम्मत पर फख्र था हमें ,

हमने भी छाते की चेलेंज उठा ली

और टूटी छतरीसे ही काम निकलवानेकी ठान ली ,

आया एक मनचला झोंका तेज हवाका कहींसे बहुत खूब

और हमारी छतरीने अदासे बातें की हवासे कौवा बनकर....

चलो मौसमकी पहली बारिश थी तो हम मन को मना लिए

और भीगते हुए एक ठेले पर चाय और पकोडे खा लिए .....

8 जुलाई 2009

मौसम की पहली बरसात आ ही गई

आज रात बहुत ही आंधी और तूफ़ान के साथ तेज बारिश हुई ...

प्रकृति का हर रंग अपनी उफान पर था , और चाँद पर कदम रखने वाला इंसान लाचार उसका तांडव नृत्य देखता रहा ...बिजली ने जम कर फोटो खींचे इस दुनिया के ..बादल ने गरजकर अपना राग मेघ मल्हार का आलाप कर लिया ...बहुत ही प्रतीक्षा के बाद ये बारिश आई तो सही लेकिन उसने भी मन भर कर नृत्य किया तो इंसान डर सा गया .....जब बारिश थमी तो जरा देर के लिए नींद आ पाई ...कहते है की बहु और बारिश दोनों को कोसा जाता है ...आए तो भी न आए तो भी ...रात को डेढ़ बजे कोयल डर के मारे चीख रही थी ...मोर भी चुपचाप कहीं पेड़ के निचे छुप गया होगा ...मेंढकके मौसम के अभी थोडी देर सी है ...और हरी घास की जमीं के निचे दबी कोंपलको इंतज़ार है बस फुटने का ....

आप कभी बारिश में बहार निकलो एक बार सभी के चेहरों को देखने का लुत्फ़ ले कर देखो ...सबसे अच्छी जगह है ट्रैफिक सिग्नल ..जब वेहिकल रुकते है तब देखो ...मोटर कार बस को छोड़कर हर चेहरे पर जैसे कुदरत अपने हाथों से चेहरा धोने आई हो इस तरह बारिश की बुँदे उसके चेहरे से फिसलती है ..इंसान का एकदम सच्चा चेहरा जो ब्यूटी पार्लर में लिपा हुआ नहीं होता आप देख सकते हो ....कभी बिना रैन कोट पहने रिमज़िम बारिश हो रही हो तब लॉन्ग ड्राइव पर स्कूटर या साइकिल या मोटर साइकिल पर अकेले ही सैर पर निकल जाओ ...अकेले ही ...मैं तो हर सीज़न में एक बार ये जोय रायिद कर ही लेती हूँ ...वापस आकार अदरख की चाय पी लो ...हजारों रूपये खर्च करने के बाद भी ऐसा आनंद शायद ही मिले ....

बस यूँही सुबह छत पर से निचे झाँख कर देखा तो प्रकृति रात के हंगामे के बाद बिल्कुल नि: शब्द थी । उसका हर हरा पत्ता एक नया निखार लिए खुश था ...झूम रहा था ...और हम घर में आए पानी को निकलने मैं व्यस्त थे ...

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...