कभी तडके भी आ जाते है नींदके झोके
बिन मौसम बरसातकी तरह तुम्हारा दीदार लिए .....
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कोई बुलाये मुझे ,कोई भुलाये मुझे ,
जाऊं वहीं जहाँ मन चाहे
किसीके भुलाने या बुलाने से
क्या वास्ता मेरा इस प्यारमें ???
जिंदगी मेरे लिए ख्वाबोंके बादल पर उड़नेवाली परी है .!! जो हर पल को जोड़ते हुए बनती है, और उन हर पलोंमें छुपी एक जिंदगी होती है ....
कभी तडके भी आ जाते है नींदके झोके
बिन मौसम बरसातकी तरह तुम्हारा दीदार लिए .....
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कोई बुलाये मुझे ,कोई भुलाये मुझे ,
जाऊं वहीं जहाँ मन चाहे
किसीके भुलाने या बुलाने से
क्या वास्ता मेरा इस प्यारमें ???
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२०१२ -प्रलय .....
हिन्दीमें डब की गई ये फ़िल्म परसों देखी ...एक कल्पनातीत फ़िल्म ....तकनिकी दृष्टिसे सराहनीय ...और जिस तरहसे पर्यावरणके साथ बेख़ौफ़ होकर हम खिलवाड़ कर रहे है उसका दुष्परिणामका सही चित्रण ....ज्यादातर फ़िल्में हकीकत के बीज पर बनती है ...पर पुरी दुनियाका विनाश हो रहा है ये कल्पनाका इस फ़िल्ममें चित्रण है जिसकी ज्यादातर छूट पुट घटना तो अभी भी हो ही रही है ...ऑस्ट्रेलियाके जंगल की महीनो तक न बुझने वाली आग ...भूकंपके प्रचंड झटके ...और सुनामी ...फ़िर भी हमारी आँखें नहीं खुली है ....
मुझे बात करनी है मनुष्य स्वभाव का चित्रण ...
१.... एक घने जंगलमें एक मोबाइल वान में रेडियोस्टेशन चलने वाला सर फिरा इंसान ...जिसे बचाव के ठिकानो का पता है ...नकशा और सारी जानकारी होने के बावजूद वह ज्वालामुखी के विस्फोटका आंखों देखा हाल देखते कहता है की ये नज़ारे का मैं साक्षी हूँ ....और मौत को गले लगा लेता है ....
२...फ़िल्म का हीरो जिसका तलाक हो चुका है उसका अपनी पत्नी ,बच्चे और पत्नी के नए बॉय फ्रेंड के साथ जान बचाने का जुगाड़ भी दिलचस्प ...कभी कभी आधी अधूरी जानकारी होनी भी जान पर खेल जाते वक्त कितनी उपयुक्त साबित हो सकती है इस बात को उस बॉय फ्रेंडके प्लेन चलानेके ज्ञानसे जोड़ सकते है ...
३...सभी विकसित राष्ट्रप्रमुख का सुरक्षित जगह रवाना होना ...और आम आदमी का हतप्रभ होकर अपने को इस प्रलय में विलीन होते देखना ..हमें विचलित कर देता है क्योंकि हम भी उसी आम आदमीके हुजूममें शामिल है .सिर्फ़ पैसे वालों को ही जान बचाने का हक़ मिलता है ...आदमी का स्वार्थी होना ...और वक्त के अनुसार रंग बदलना बखूबी दिखाया है ....
४... पर हर हाल में जान बची तो लाखों पाये इस उक्तिको सार्थक करता हीरो आख़िर तक जो संघर्ष करता है उसी कारण हमारी सभ्यता बच सकती है .....
अगर हम आज से इस बात को समजें तो आने वाली पीढ़ी को कुछ और साँसे दे सकेंगे ....
देखिये एक बार जरूर ...
करवट ले रहा ये वक्त
जिंदगीके बिछौने पर
कुछ सिलवटे छोड़ता गया
फ़िर भी कुछ पुराने रिश्तोको
यादोंके वीरानेसे जोड़ता गया ....
कुछ कुछ नया भी जुड़ गया है
कुछ जानकर कुछ अनजानेमें
मेरी मर्ज़ीको जाने बगैर ही
ये वक्त बेख़ौफ़ होकर
मुझे हर लम्हे लम्हे गुजरते वक्तसे जोड़ता गया ...
मूड मूड कर देखनेकी चाहत है
वो गुजरे मकामका खाली मंज़र ,
खड़ा है मगरूबीसे एक सूखे पेड़के ठूंठसा ....
मुझे एक कसक बन याद आता रहा
वो बहारोंके मौसमका खिलना ,
उस दरख़्त पर बिखरा
खाली आशियाना पंछी का ......
वो भुला चुके है सब यादे मेरी
भुलानेकी कोशिश नाकाम होती चली गई
जब मैंने भी उनकी यादोंको भुलाना चाहा .....
अब तो ...
मैं भी हूँ .....वो भी है .....
लेकिन वो हम नहीं रहे जिसे ढूँढना चाहा .......
एक जंग लड़ी है खुदसे
तब जाकर उबर पाये है ,
आप क्या जाने इश्क क्या है ?
नींदमें आपके ख्वाब
और जागते है तो आपके दीदार को तरस जाते है ..
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आज छब्बीस नवम्बर है ... मुंबई के आतंकवादी हादसे की पहली बरसी ...
जेड ग्रेड सेक्योरिटी बगैर एक कदम घर के बाहर नहीं निकालने वाले भ्रष्ट राजनेताओंके चेहरे पर करारी थप्पड़ मारनेवाले वो मुंबई पुलिस के जांबाज़ पुलिस कर्मी अफसर ,जवानों की शहादत ,निर्दोष लोगोका आतंककी वेदी पर अपनी जानका बलिदान ,और एन एस जी कमांडो की वीरता भरी कार्यवाही को मेरा सलाम ....
आज आपके देशप्रेम के आगे हम सभी भारतवासीयों का शिर नतमस्तक है ......
आज हमें देखकर आयना भी परेशां सा लगा ,
उसे भी बदले बदले से नजर आने लगे थे ...
अपने ग़मोंको हम एक हँसी के दामनमें लपेटे चले थे ,
क्या कहे जो जीने की वजह थे वो ही मुंह मोड़े जा रहे थे ....
बस हम तो टूटे खिलौनेसे पड़े हैं घरकी फरस पर बिखरेसे ,
खेले थे हमारे जज्बातोंसे खुदका दिल बहलानेको कभी
और मतलब निकल जाने पर
आज अजनबीकी तरह आँख चुरा कर चले जा रहे थे .....
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बंध लब भी अल्फाज़ कैद नहीं कर पाए ,
जुदा होकर भी तुम्हारी यादोंको जुदा न कर पाए ....
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सजदे करते गए तुम्हारी राहोंमें हर
बस खता कुछ हो गई अनजाने में हमसे ही ,
की आप शायद चाहकर भी
हमारी दुआ कुबूल न कर पाये ......
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तुमसे मिलना ,बातें करना एक सपना हो गया ,
वो दिलबर कल तक था हमारा आज गैर का हो गया .....
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कभी दोस्ती कर ली तनहाईसे तो ख़ुदसे दोस्ती हो गई ,
फ़िर कहीं ये तन्हाईयाँ गुम हो गई है ,
जिसके साथ न मिलते कभी उससे भी बात हो गई ,
बस एक अजनबीसे पहचान हो गई है ......
जब प्यार हो गया ख़ुदसे जिस दिन ,
ये दुनिया भी जैसे बदल गई है ,
कभी जो भला ना लागा था दिलको मेरे ,
वो ही आज हमारी पहली पसंद हो गई है .....
ग़मोंने जब थामा कभी दामन मेरा ,
इस तनहाईसे फ़िर मुलाकात हो गई है ,
आंसू पोछकर मेरे उसने अपने दामनसे
बस वो ही अब मेरी सहेली हो गई है .....
दस्तक ना देना कोई मेरे दरवाजे पर कभी ,
मुझे ख़ामोशी के मेलेमें जीनेकी आदत हो गई है ,
कभी इबादत करली है खुदा की तनहाई में ,
जब हम तुम मिले आज तनहाई में तो आज
इजहारे इश्क की भी गुस्ताखी हो गई है ....
एक छोटासा बच्चा
खड़े होनेकी कोशिशमें गिर जाता बार बार ,
न हार का आभास न जीत का
उसे तो बस कोशिश पर था ऐतबार ......
खिलखिलाकर हंस देना ...
और वें वें वें करके रो देना ....
रोटी हो या मिटटी उसके लिए एक समान
नींद आ जाए तो क्या दिन और क्या रात ....
हर सुख या दुःखसे उसके लिए एक समान ,
पानीमें छपाक छाई करनेसे खिल जाए चेहरे की मुस्कान ....
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जब ये देखती हूँ छोटे छोटे बच्चो को खेलते हुए अहातेसे अपने तो सोचती हूँ की क्यों बचपन को जिंदगी का सुवर्णयुग कहा जाता है ? बस हर चीज जरूरत के हिसाबसे ..न कुछ ज्यादा न कुछ कम ....गिरने का डर नहीं और उठ जाने पर अभिमान नहीं ...जिंदगीसे मुस्कराहट की कोई उधारी नहीं ...एकदम स्वाभाविक जीवन ...उसमे कहीं बनावट नहीं ...फ़िर हम क्यों बदल जाते है ? क्यों इतने उलज जाते है ?...क्यों हमें गिरने से डर लगता है ...क्यों हम दोबारा उठ खड़े होने की कोशिश करना छोड़ देते है ???? क्यों महत्वकांक्षाएं हम पर हावी होकर हमारा जीना हराम कर देती है ????
इस क्यों का जवाब सिर्फ़ हमारे पास ही होता है ...कोई किताबमें उसका हल नहीं ....बस कुछ पलki फुर्सत नहीं है ...
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कल उनसे मिलना हुआ ,
जैसे फिजामें अचानक
बहारका आना हुआ ,
बस छोड़ दो हमें अकेले यूँ ही .....
एक सपनेसे हथेली पर
उनके मेहंदी रचा दी ,
उनके नाजुक स्पर्शसे
हमारे हाथमें बिजलीसी कौंध गई ....
समां बंध गया ,
वक्त रुक गया ,
और हम कहीं बहते चले गए ...
दूर............... कहीं दूर ...
ख्वाबगाह पर एक अटारी है ,
वहां एक शाख आई अरमानों की ,
ख्वाहिशोंके फूल भी खिलने को थे ,
माँने आवाज़ देकर जगा दिया
चलो बेटे सुबह हो गई !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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कई सितमसे गुजर चुके ,
रहमोकरमकी ख्वाहिश न थी ,
हर ज़ख्म लगा था एक कुमुदसा ,
क्योंकि ये तो प्यार की कशिश थी .....
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एक पल रूककर हाथमें हाथ ले लिया ,
खामोश हमारी नज़रोंने इजहारे मोहब्बत भी कर लिया ....
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कितना खुबसूरत होगा वो पल जब मेरा दिल भी धड़का होगा .....
बस वो शर्मीले पलमें इस खूबसूरतीको महसूस न कर पाए हम ......
वो एक धड़कन चुक गए थे हम जब दीदार हुआ आपका ....
आपकी नज़रके उठनेके इंतज़ारमें हमारे कदम जम गए थे .....
बस हलके से उठाना उस पलकोंकी चिलमनको ,
अधखुली सी ,
इकरार झलक रहा था ,
इजहार करने को हमें भी ,
चलो इस लम्हेको सजाकर जहनमें
आज मोहब्बत पर आपकी इख्तियार कर लें .....
बस तेरे साथ जी ले इतनीसी इल्तजा करते है ,
कल के सूरजकी हम दीवाने क्यों परवाह करेंगे ??
हमको आनेवाले पलकी नहीं ख़बर कोई ...
फ़िर भी क्यों हम उम्रके संध्या कालकी सोचा करेंगे ???
जी ले जी ले जीनेके लिए येही पल है ...
ना गुजरे वक्तको ख्यालोंमें धर ...
ना आनेवाले वक्तका इंतज़ार कर ....
आज की उषा न रहेगी उम्र भर ...
ये रात भी ना रहेगी सहरके बाद ...
बस ये पल किसीसे प्यार कर
और उसकी आज को उजागर कर दे .....
ये झूठी मुस्कानका नकाब पहने थक गए है हम ,
बस अब तो ये नकाब फाड़ देते है ,
असली चेहरा देखकर दुनिया उम्मीदें बांधना छोड़ देगी ,
ये ही सोचकर हलके महसूस हो जाते है .....
खुले चेहरेसे जब दुनिया को देखा
दंग रह जाना हमारा लाज़मी था ,
हर चेहरा सामने था वो शायद हमसे भी ज्यादा
इस दुनियाके गम झेल चुका था .....
फ़िर क्यों हमें ही गिले शिकवे थे जिंदगीसे ,
ये सवाल हमारा ही था और हम पर छोड़ गए थे .....
शायद ये होती है हमारे मनकी पैदा की हुई तकलीफें ,
बस आयना बदलते ही तस्वीर बदलने लगती है ....
ये हँसते लब कभी बता नहीं पाते तुम्हे ,
कितनी खरोंचे इस दिल की दीवारों पर है ,
लहू रिज़ रहा है ,
घाव नहीं भरने देती दुनिया ,
मरहम तो मुमकिन नहीं तुझसे हासिल ,
बस घाव देना रोक सके हो तो रोक लो .....
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ये भीड़में मुझे तनहा कर दिया ,
हँसी की चाहतमें आंसूके सागरमें डुबो दिया ,
अय जालिम इश्क करने क्या ऐसा गुनाह हमने कर दिया ?
हमें इंसानके नाम पर भी तुमने निकम्मा कर दिया .....
| प्रतिक्रियाएँ: |
dear All,
Enjoy!
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There's only one perfect child in the world
& every mother has it
There's only one perfect wife in the world
& every neighbor has it।
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Three dreams of a man:
To be as handsome as his mother thinks॥
To be as rich as his child believes॥
To have as many women as his wife suspects...
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Husband & wife are like liver and kidney।
Husband is the liver & wife the kidney।
If the liver fails, the kidney fails।
If the kidney fails, the liver manages with other kidney।
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'Next Generation' Motto:
"Na hum shaadi karenge, na apne bachchon ko karne denge।"
What's the diff between Dava & Daru?
Dava is like a girlfriend, that comes with an expiry date
and Daru is like a wife, 'Jitni purani hogi utna sir chad ke bolegi...'
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Wife ko Begum kyon kehte hain?
Kyonki shaadi ke baad saare gum to husband ke hisse mein aate हैं
aur wife Be-Gum ho jaati hai...
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The Japanese have produced a camera
that has such a fast shutter speed it can take a picture of a woman with her mouth shut!
| प्रतिक्रियाएँ: |
बरसात मुझे भाती हरदम ,
जभी आए लगे सुहानी हरदम ,
पर अब के ना जाने क्या बात हो गई ,
भरी सर्दीमें बरसात हो गई .........
ठण्डसे काँप रहे थे वैसे ही ,
और ये बादल मंडराने लगे ,
स्वेटर पर रैनकोट पहनकर
सब लोग बाहर आने लगे .....
कागज़की नाव कहीं खो गई ,
अभी तो उठे थे नींदसे सुबह ,
मौसम देखकर यूँ लगा फ़िरसे शाम हो गई ....
फ़िर जम्हाई आने लगी ,
और हमें कम्बलमें लिपटकर बिस्तरकी याद आने लगी ....
ये सर्दीकी बरसात साथमें मेथी ताज़ी लायी थी ,
अब क्या करें चाय के साथ
मेथीके गरमागरम पकोडे खाकर ही सुस्ती उडानी थी ....
भाषा पर लड़ लेने वालों
आज मुझे तुम पर लाज आती है ,
शूक्रिया अय उपरवाले
तुने मुझे गूंगा बनाया है ....
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बोल बोल कर तुम क्यों इतना शोर मचाते हो ?
शब्दों की अहमियत को यूँ जाया करे जाते हो ....
कुछ पल चुप कर देख भी लो , तुम जो सुनाना चाहते हो ,
खामोशी की सदायें ख़ुद ही ये बता देती है .....
| प्रतिक्रियाएँ: |
आज एक ख़त औरत का ख़ुदके नाम :
प्रिया ,
हाँ ! मैं तुम्हे प्रिया ही कहूँगी ...क्योंकि जब तक मैं ख़ुदकी प्रिया न बनू इस जहाँ की प्रिया कैसे बन पाउंगी ?तुम्हारे जन्म पर माँ के मुख मंडल पर क्या भावः थे ? याद तो नहीं ही होगा पर क्या हो सकते है ये अब जान ही गई होगी ...नहीं ये सब बातें तो पुरानी हो गई सखी ...एक नई बात करें ?
ये दुनिया ढोल पिट रही है औरत स्वावलंबी बननी ही चाहिए ...हँसी आती है ...ये दुनिया हर जगह पैसे के अलावा कुछ सोच नहीं पाती ...पहले तो बेटी को पढाओ ..हाँ अब तो लड़कियां पढ़ लिख रही है ..पर ये हवा शहरों में बह रही है ...गाँव की हवा तो अभी ताजी है पर विचारों की ताजगी कहाँ ? फ़िर शुरू हुआ पैरों पर खड़े होने का सिलसिला ..छोटी बड़ी नौकरी करके आर्थिक स्वावलंबन का मतलब मिला ...अच्छा है ...
पर डियर , क्या हम स्वतन्त्र है ? नहीं दोस्त ...अब तो दोहरी जिम्मेदारी निभाने की ...ऑफिससे आकर पाँव पसर कर चाय पिने की आज़ादी कहीं है ?????किचन की पुकार तो आखरी ऑफिस के घंटे में आती है ...अरे आया को रखा है बच्चे सँभालने को और फ़िर बुढापे में उम्मीदें करेंगे की बेटे बहु सेवा करें ...क्या ये मुमकिन होगा ???
ये भी घिसी हुई कहानी हो चुकी है ...
चल आज एक बात करूँ दोस्त ,
= क्या तुझे आज़ादी है की एक दिन सुबह को दस से बारह बजे के घर के बिजी समय में तू सुस्ताने को किसी अपनी बचपन की सहेली को किसी को बिना कुछ बताये चुप चाप चली जाए ...और फ़िर वापस आए तब ? बस बस ये तुम्हे और मुझे सब पता है ...बिना कुछ कहे कहीं एक दिन भी हम कहीं जाने के लिए आजाद नहीं है ...इत्तिला देनी ही देनी है ...क्या हमारे बच्चे और पति ऐसा नहीं करते ? बस ये हम क्यों नहीं कर सकते ?
= सिर्फ़ एक दिन हम हमारी पसंद की हर चीज़ सुबह से शाम तक के खाने में बनाये जब घर में सभी सदस्य हाज़िर हो फ़िर भी ...एक दिन सास ,ससुर ,पति ,बच्चे कोई नहीं सिर्फ़ मैं और मेरी पसंद .....नहीं ये भी हमने कभी सोचा तक नहीं ? हम ऐसी स्वार्थी कैसे बन सकती है ? क्या एक दिन की ये आज़ादी हमारा स्वार्थ बन गई ? संस्कार सिर्फ़ हमारे लिए ही ??? अगर घर में कहेंगे आज खाना नहीं बनेगा तो होटल से मंगाया जाएगा पर हमारे लिए पति महाशय पका देंगे ? शायद नहीं ....
= कहीं काम से बहार गए ...खूब भूख लगी तो चाय की कितली पर खड़ी होकर अकेले चाय पिने की हिम्मत करेगी ? एक बहुत बढ़िया फ़िल्म लगी है ...घर में बच्चे या पति को साथ आने को मना कर देते है ,सहेली आने से मना करती है , भाई -भाभी सब रिश्तेदार भी मना कर चुके है ..तो अकेले सिनेमा देखने जा पायेगी ???
= मैं घर में सब जिम्मेदारी से थोडी मुक्त हूँ मुझे गाना सिखने का शौक है ....कितने लोग के घर में ४६/४७ साल की महिला को सहर्ष भेजा जाएगा उसका शौक पुरा करने के लिए ....शक के दायरे मैं ये सवाल भी .....
= एक बेटी के बाद कोई संतान नहीं चाहिए ...क्या ये इच्छा सिर्फ़ औरत की हो और इसमे वो सफल हो ????
बस सखी इतना ही कहूँगी पढ़ी हो या अनपढ़ ,शहर की हो या गाँव की औरत अपने लिए एक दिन जीने की आज़ादी पा सकेगी ???
मुझे पता है इस बारेमें महिला ने कभी सोचा भी नहीं होगा ...सिर्फ़ सोच कर ही देखो क्या ये मुमकिन है ???
बस तुम्हारी सखी
एक मानुनी ....
| प्रतिक्रियाएँ: |
एक लंबे साएको हमसफ़र बनाकर
रात चल रही थी एक लम्बी सोयी सड़क पर
चुपके चुपके ताकि दिन भरसे थकी सड़ककी नींद ना टूटे ,
अपने क़दमोंकी आहट सोयी बिल्लीके पंजोमें छुपाकर ,
कुत्तोंके भोंकने पर परेशां सी ,
नींदमें जागकर एक छोटे बच्चेकी रोने की आवाज सुन
जगी माँके साथ जाकर पल भर बैठ बच्चेको फ़िर सुलाती ...
फ़िर चुपकेसे रात
पिछले पहर करवट बदलकर वक्त काटते बुढापेके तकिये पर
बैठकर उसके मनकी बात पढ़ लेती है ....
नव विवाहित जोड़ेके घर वो नहीं जाती
नई जिंदगीको दखल देने ...
पर प्रेमप्रवाहमें बह रहे वो प्रेमीके
जहनमें एक नज़्म बनकर लिख जाने की ख्वाहिश लिए ,
उसकी कलममें बैठकर कागज़ पर उतार जानेका इंतज़ार करती है ।
बस फ़िर सूरजके आनेकी आहट भरसे नंगे पैर भाग लेती है .....
| प्रतिक्रियाएँ: |
आज बुध्धिमानोंकी बात :
दो ज्ञानी बातें कर रहे थे ॥
पहलेने पूछा : चाँद और एफिल टावर दोनोंमेंसे दूर कौन ?
दुसरेने कहा : सिंपल यार ,एफिल टावर ....
पहलेने पूछा : वो कैसे ?
दुसरेने कहा : छत पर जातो तो चाँद दिख जाता है एफिल टावर नहीं ...तो दूर कौन ???
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पहले ने पूछा : मैं एक चीज पन्द्रह रुपये और पचहत्तर पैसेमें खरीदु और उसे सोलह रुपये और पच्चीस पैसेमें बेचूं तो मुझे लाभ होगा या नुकसान ?
दुसरेने कहा : रुपये के मामले में एक रुपये का लाभ और पैसे के मामलेमें पचास पैसे का नुकसान ....
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एक दिन एक चरवाहे के पास एक आदमीने भैंस खरीदी ...दुसरे दिन वापस आए ....अरे मैंने पुरे छ हजार देकर इसे ख़रीदा और इसकी एक आँख तो बंद है ..ये कानी है ....
चरवाहेने ठंडे कलेजे से पूछा : पहले ये बताओ आपको इसका दूध चाहिए या इससे कढाई बुनाई करवानी है ???
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| प्रतिक्रियाएँ: |
कैसे कभी कह पाएंगे हम ?
न कह पाए अब तक की
क्या गुजरी ?किस तरह अलविदा कहा था हमने ?
हमारे लबों पर थी हँसी और दिलमें दुआएं
पर जो पल हम जूझ रहे थे ख़ुदसे ही
की वो सिसकियाँ बाहर ना आ जाए !!!
वो अश्क छुपा रखा था आँखके कोनेमें .....
गालों पर से न सरक जाए ...!!
अब के तो ...
नई दुनिया होगी आपकी
बड़े ही मशरूफ रहते होंगे नए माहौलमें ....
एक पल भी कभी
न इस नाचीज़को ख़यालमें भूलकर भी बुलाया होगा ,
अब तक तो शायद आपने हमें भुलाया होगा ....
जानते है ...जानते है ....
पर एक इल्तजा अब हमें भी करने दो ...
बस अब इस खाकसार पर रहमोकरम कर दो ....
आपकी यादोंकी ज़ंजीरसे
अब एक पल के लिए हमें रिहा कर दो ....
ताकि अब एक रात चैनसे सो पायें हम ...
क्योंकि ख़त्म हो गई है अब सितारोंकी गिनती भी ,
और उन्हेंभी मेरी दास्ताँ मुंहजबानी याद हो चुकी है .....
बस अब की गहरी नींद आ जाए
ख्वाबोंमें डेरा लगाकर रुक जाओ ....
एक गुजारिश है आपसे :
आप तो दिलमें हो हमारे हमेशा से
रहनेको दो पलके लिए ही सही
आपके दिलका एक जर्रा नसीब होने दो .....
अब हमारी कब्र पर आपका भी सजदा होने दो ....
लरज़ते होठों पर मेरा नाम था
पर वो बता ना सके ,
ये हया थी या कोई डर था ,
नज़र उठ उठ कर झुक जाती थी .....
नकाबके पीछेसे नजर आती है सिर्फ़ दो आँखे ,
नमींकी परते साफ़ नजर आती है ,
मोमबत्तीकी लौ में वो चेहरे का नूर बुझा सा जाता है ,
क्या कहूँ तुम्हे ?
बस मेरे प्यार पर ऐतबार कर लो ,
शायद मुझे पानेके लिए ये जहाँ छोड़ना पड़े .....
बस दो राहे है अब सामने ........
या जान को चुन लूँ या जान को चुन लूँ .....
इब्तदाए इश्क को अब अंजाम देकर जायेंगे ,
इन्तेहाके मकामको पाने हर इम्तहान देते जायेंगे .....
नए फुनवाकी घंटी जब बजत थी ,
मन मयूर नाच जाता था ,
बिन मतलब हमार ऊँगली भी ढूंढ़ ढूंढ़के नम्बरवा घुमावत थी ,
पड़ोसी को दौड़ दौड़ बुलावा भेजत थे और सबको हमारा नंबर लिखवाते थे ......
आज वक्त बे वक्त ये फुनवा हमें दौडाता है ,
कभी नींद से जगाता है तो कभी स्नान या शौचालयसे भी निकलवाता है ....
जिंदगीके सारे झूठ बोलना ये हमें सिखा गया है ,
साफ़ सुनाई दे फ़िर भी नेटवर्कवा को भी ख़राब बुलवाता है ,
कभी रोंग नंबर कहकर बात टालते है ,
कभी फोनको दुश्मन कहकर पटक जाते है ...
पर एक आवाज हमें डरा जाती है वो जब सामने बीवी हो ,
ये वही आवाज हुआ करती थी जिसे सुनने हम रात भर जागा करते थे ....
जिंदगी !!!सलाम नमस्ते !!!!
हमारे शहरमें विविध भारतीको मिलकर पाँच ऍफ़ एम् रेडियो है ...आज कल इसकी बोल बाला कुछ ज्यादा ही है ...और संगीत मेरे शौक से ज्यादा मेरी कमजोरी है ...आज का युवा कान में इअर फोन लगाकर गानोंमें डूबा नजर आना ये शहरी जीवन का एक पहलु है ...
ये रेडियो के रेडियो जोकीका एक नया क्रिएटिव करिअर है ...चपर चपर बातें युवा वर्ग को इस करिअर के लिए आकर्षित कर रही है ....एक अच्छी आवाज निहायत जरूरी तो है ही पर वर्तमान पर पैनी नजर रखते हुए सवालों और मुद्दों पर चर्चा भी काफी दिलचस्प होती है ....मुझे भी शौक है ऐसी चर्चामें कभी कभी हिस्सा लेने का ....
हमारे यहाँ ऐसे ही एक ऍफ़ एम् रेडियो सिटीने एक सचमुच मानवीय इंसानियत से भरी मुहीम शुरू की है ...हर १४ नवम्बर पंडित जवाहरलाल नेहरू के जनम दिवस को सही मायने में बाल दिवस के रूप में मनाने की ....
नवम्बर के शुरू होते है "जिंदगी मुबारक " नामक जलसा शुरू होता है ...इंसानियत का जिन्दा मिसाल सा रूप ...रेडियो पर से एक अपील की जाती है की जो बच्चे अनाथ है जिनका इस दुनिया में कोई नहीं , जो जिंदगीमें रोटी ,कपड़ा ,मकान जैसी प्राथमिक सुविधा से वंचित तो है ही पर उन्हें लोगोकी झूठन ,उतरनसे जिंदगी बसर करनी पड़ती है ...शिक्षा तो उनके लिए महज एक सपना है ...ऐसे अनाथ बच्चो के लिए एक नया तोहफा माँगा जाता है ....एक चोकलेट से लेकर एक पेन्सिल से लेकर कुछ भी पर नया हो ...जो उन बच्चोके चेहरे पर मुस्कराहट ला सके ....लोग ब्रांडेड खिलौने ,कपड़े ,साइकिल जैसे कई बच्चो की उपयोगी वस्तुओंसे उनके मेजिक बॉक्स भर देते है ...अनाज ,कैश ,चेक वगैरह तो अलग ....फ़िर इन्हे एक अनाथ बालकों के संस्था में जा कर बांटा जाता है ...उनके चेहरों पर मुस्कानका तोहफा दिया जाता है ....२ नवम्बर से ये अभियान फ़िर शुरू किया गया है ....
कौन कहता है ...रेडियो सशक्त माध्यम नहीं है !!!!! ये छोटी उम्र के रेडियो जोकी हमारी इंसानियत को जक जोर कर रख देते है .....और लोग भी अच्छा रिस्पोंस देते है ......
कभी आप छोटे से बच्चे को बूट पोलिश करते देख लो , चाय की कितली पर कप धोते हुए देखो तो उन्हें एक चोकलेट या बिस्किट देकर उनका चेहरा देख लेना ...लाखो रूपये के दान से ज्यादा संतुष्टि ख़ुद आपको मिलेगी । मैंने ख़ुद अपनी नजर से देखा एक किस्सा बता रही हूँ :
एक छोटी से बच्ची तीन चार साल की । स्कुल ड्रेस में उसके दादा दादी ,मामा पापा के साथ ऐसी एक संस्था में लायी गई ...और उसके द्वारा उस स्कुल में उसके बर्थडे को मनाया गया ...वहां के बच्चोने हैप्पी बर्थडे टू यु गाया और उस नन्ही सी बच्ची ने केक काटी ...ऐसे कई किस्से हम देख चुके है ...बस कभी एक बार अपना के देख लो ...भगवान ऊपर नहीं हमारे अन्दर बसता है बस टटोल कर जगा दो ...
मेरा सलाम ये जिंदगी मुबारक को और ये छोटी उम्र में आकाश से ऊँची सोच रखने वाले ये युवा पीढी के बाशिंदों को ....
| प्रतिक्रियाएँ: |
दो गज जमींके नीचे मिटटी ही थी
लेकिन कुछ नमींसे लदी थी ,
थोडी कम सूखी और पनपनेको आदर्श थी ,
बस वहां पर एक बीज मैं रख आई इंसानियत का ,
उसे रोज पानी देना है ,खाद भी दूंगी ,
और कीडोंसे हिफाजत करनी है ....
ये बीज मैं बो कर जा रही हूँ ,
मेरे बाद आप भी इसकी देखभाल करना ,
अपनी आने वाली पीढी को सुकून की जिंदगी का तोहफा देना .........
अरे रे रे ...
आज हमारे पास ये छोटीसी सोच के लिए भी एक पल नहीं है ,
इससे बड़ी क्या नाउम्मीदी है ????
एक टूटे पेड़ के पत्ते से पूछा गया :
तुम्हे परेशानी नहीं होती क्या ? यूँही टूट गए ...????
उसने कहा थक गया था मैं यूँ ही एक जगह लटके हुए ...
बस अब हवाके साथ दुनियाकी सैर को मन कर गया .......
सूख जाने की न फ़िक्र कोई ना गिला है मुझे ....
जो जिया खूब जिया मैंने ....
बस धरतीकी धूलमें घुलना है मुझे ........
उसकी जड़ोने मुझे सींचा था हमेशा से ,
आज उसकी खुराक बनना है मुझे ....
सारे दिए बुझ चुके है ,
रात करवट ले रही है पिछले पहरमें ,
कहीं चमगादड़ निकला है टहलने
फ़िर उल्टे लटककर सो जाएगा एक रातके इंतज़ारमें ,
जुगनूकी चमक और उल्लूकी चमकती आँख
रातकी कालिखके रोशन दिए मध्धमसे ,
चीख रहा है सन्नाटा कसमसाकर
एक हलकीसी दस्तक भी गूंजती है शोर बनकर ...
करवटकी सिलवटे रतजगे की दास्ताँ दोहराती है ,
कहीं आहें जागती है तो कहीं मिलनका मौसम छाता है ...
सुनी सी सड़क थक गई थी दिन भर वो भी अब सुस्ताती है ,
चाँदकी कहानी और सितारोंकी लोरियां सुने जाती है ....
तभी रोज एक प्रसूतासी रात पिछले पहर दर्दसे कराहती है ,
और फ़िर एक नए दिन को जनम दे जाती है ......