30 सितम्बर 2010

कुछ अजीब सा

कुछ ना बोलना भी बहुत कुछ कह देता है
और ये शोर भी कभी खामोशसा होता है ,
हर वक्त कोई आह्टका इंतज़ार होता है ,
बस येही जद्दोजहद कश्मकशमें जिन्दा होनेका एहसास होता है ...

29 सितम्बर 2010

माइक्रोवेव ओवनमें पका हुआ ख्याल

अभी अभी मेरे दिमागकी फेक्टरी में
एक नया सोंग मेन्युफेक्चार हुआ है ......
दिलमें दहीवडाने दस्तक दी और मनमें मसालाडोसा सर्व हुआ है
साम्बरकी कितली को प्यास है ...
कहीं एक इडली मिल जाए या मेदुवड़ेसे भी बात बन जाये
राह चलते रतलामीसेवसे मुलाकात हो गयी
चुराकर दिलने तीखा चेवड़ा भी छुपाया है ....
गली गली महक फैली है गुलाबजामुनकी
किटपिट करती काजू कतरीका भी साथ निभाया है
रबडीमें नहाकर आता है पिचका हुआ रसगुल्ला
खूब करता है पेट में रसमलाई बनकर हल्लागुल्ला .............
भागती भागती भेलपुरी तब मेरे पास आई
रोने लगी ये कहते हुए
पूरी में पंक्चर हो गया और गिर गया सारा पानी
छिले हुए थे छोले उस पर खमणढोकलाकी रुई लगाई
भटूरेकी पट्टी बांधकर उसे प्लेटमें पिज़ा के बिस्तर पर सुलाया है ..............

28 सितम्बर 2010

एक अजनबी ...

चलो आज अजनबी बनकर जी ले एक दिन ,
ना ये अपना घर है ,ना कोई पहचान वाला है आस पास ,
एक बंज़र टापू पर छोड़ दिया हो जहाँ कोई ना हो खास ,
बस मेरे साथ सिर्फ मैं ही ,
फिर भी एक दिन जी लिया मैंने ,
बहुत कुछ देखा मैंने जिस पर नज़र ना पड़ी थी कभी ,
क्या कह सकते है ये की समय की थी कमी ,
शाम होते बिस्तर पर सोते है नींद आ गयी गहरी उस दिन ,
क्या मेरे बेचैन रहने की वजह कहीं ये तो नथी ?
बस मुझे अपने लिए ही फुर्सत ना थी ???

27 सितम्बर 2010

सहर की चहल पहल

किसी अजनबी रात की तरह सड़क पर
जाने पहचाने चेहरे गुजर जाते है
देखते नहीं एक निगाह भर कर कभी
पता नहीं ये जिंदगीको क्यों ऐसे ही समेटते है
की बस जीने का आखरी दिन हो और कल सहर ना हो ??????
रोज देखती हूँ अनगिनत चेहरे
ख्वाहिश पलती है की एक चेहरा
बिना पहचानके भी एक बार मुस्कुराकर देख ले ....
पर नहीं महंगाईने तो उसे भी नहीं छोड़ा .....
फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है ,
बिना किसी वजह एक दोस्ती का पल मिल जाए ....

26 सितम्बर 2010

सुनो ....

हर सुबह कुछ कहती है ,
कानोमें फुसफुसाती है ,
धीरे से हंस देती है ,
फिर नाक चिढाती है ,
हर सुबह कुछ कहती है ..........
मीठी आवाजमें गुनगुनाती है ,
कभी शोर मचाती है ,
कभी चुप हो जाती है ,
कभी नगमे छोड़ जाती है ,
कभी आह बनकर सांस रोक जाती है ,
हर सुबह कुछ कह जाती है ...........
जाओ आज इतवार है ,
तुम कितना भी जोर लगा लो ,
आज मेरी भी जिद्द है तुम पर ,
कम्बलके नीचेसे सर नहीं निकलेगा ,
आज हर सपना पूरा होकर ही दम लेगा ,
बैठी रहना मेरी राह तकते,
मेरी इल्तजा सुनकर आज सुबह रुक जाती है ......

25 सितम्बर 2010

शर्मीली दुल्हन ....

जानते हो सपना का पता ?

वो समुन्दरके किनारे के रेत के घरो में रहती है
बस बनती और बिखरती है
संवरकर फिर रेत में घुलती रहती है ....
ये शर्मीली अभिसारिका है ...
एक पर्दानशीं हुस्नकी मल्लिका ...
बड़ी बेदर्द भी है ये ,शर्तो के पुल पर चलकर मिलने आती है ...
आँखों में समानेके लिए
नींद नामकी सहेली को भी साथ लाती है ...
जब समा जाती है नयन की बाँहोंमें
पलकोंकी चिलमन गिराती है ....
जिन्दा करने का जूनून , या मिलन का सुकून !!
जुदाईका गम या मिलन का खुमार !!!!
लजाती ,डराती, लुभाती ,खिजाती,रिज़ाती
ये शर्मीली दुल्हन
दबे पाँव आकर ,दिल में समाकर
चुपके से सरक जाती है ....

24 सितम्बर 2010

कोशिश

एक कोशिश जो दुनिया बदल जाती है ,
दूर खड़ी मंजिल मेरे करीब खड़ी नज़र आती है ,
हाथ लगानेकी कोशिश करता हूँ जब
आयने की तरह एक आभास बनकर रह जाती है .....

23 सितम्बर 2010

दे दीजिये कुछ तोहफा

बस तुम्हारे प्यारमें हमें एक तोहफा दे दो
तुमसे कुछ पल नाराज़ रहनेका मौका दे दो
रूठे रहकर तनहाईमें सोच लेंगे कुछ और तुमको ही ....
दूरियां जब मना लेगी
मुझे प्यारकी बरखामें भीगने का बहाना दे दो ....

22 सितम्बर 2010

बस आज ...

कल मिलने का हँसी वादा कर ले
चलो आज की शाम तुम्हारे नाम कर ले
कल सांसे बंदिश इस जिस्मकी तोड़कर चली जाए ,
इस घडीसे पहले हम तुमसे प्यार का इजहार कर ले .....

21 सितम्बर 2010

बस तुम ..तुम ही

कोई सवाल जिसका जवाब ना हो ...
एक जवाब जिसका कोई सवाल ना हो ....
सुलझी हुई उलझन कोई
बिना छेड़ा हुआ सुर कोई
बस तुम ...तुम ...तुम .....

20 सितम्बर 2010

एक तस्वीर बोल पड़ी ....


हम दूर है
हम फिर भी पास है
हमें डर कैसा ?
जब हाथोंमें तेरा हाथ है
जिंदगी ऐसी ही है ना ???
हर वक्त एक संतुलन !!!!
कहाँ खत्म हो सिरा इसका
कोई पता नहीं ....
फिर भी हमें कोई गिला नहीं ......
तेरा हाथ तेरा साथ
तु जमीं तु आसमां !!!!
चलो इस तनहाई को यादगार बना दे ....
दूर तलक हम आसमां का सिरा ढूंढ कर लाये ....

19 सितम्बर 2010

उफ़ तेरी अदा जिंदगी !!!

रिश्तों का आगाज़ से अंजाम तक का सफ़र जिंदगी
सुबह से दोपहर के दोराहे पर ठहरती जिंदगी
दोपहरसे सांज तक सरकती रहती जिंदगी
थक कर रात की आगोशमें सो जाती जिंदगी ......
हर पल नए रंग लाती जिंदगी
कभी आंसू कभी हँसी के तोहफे दे जाती जिंदगी
कभी खिलखिलाती कभी खामोश खड़ी हो जाती जिंदगी
कभी अनकही दास्ताँ कभी होठो पर हर पल रहता अफसाना जिंदगी
तुझे किस रूप में चाहा किस रूप में सराहा जिंदगी
तुझे किस रूपमें दुत्कारा किस रूपमें नकारा जिंदगी
फिर भी तुम मेरे परछाई बन साथ चलती रही हरदम
अँधेरे में छुप जाती रोशनी में नज़र आती जिंदगी .....

18 सितम्बर 2010

कुबूल कर लो आज .....

ढलते सूरजने एक सलाम भेजा है ,
शब्बा खैर का हँसी पयगाम भेजा है ,
तुम्हारी पलकोंकी हँसी चिलमनके लिए हिजाब भेजा है ,
तुम्हारी आँखोंमें बस जाने के लिए एक ख्वाब भेजा है ,
तुम्हारे दिलको धड़कनेके लिए एक बहानेका आगाज़ भेजा है ,
तुम्हारी नींदे उडा देने के लिए मेरे ख्यालोका तोहफा भेजा है ,
तुम्हारे इंतज़ारको मेरे लौटनेका संदेसे का अंजाम भेजा है ....

17 सितम्बर 2010

वादा रहा ...

एक कोहरेसी धुंधली तेरी छवि
तेरी मुस्कानको ना हल्का कर पायी ,
तुम तो मुंह फेर कर चली गयी
फिर भी वादा खूब निभाती गयी
हर रात मेरे सिरहाने मेरा सपना बनकर आती रही .....

16 सितम्बर 2010

जिंदगी कहाँ तु ???

दौड़ती फिरती उड़ती फिजाओंमें
कुछ इस तरह जैसे खुशबू को तलाश हो फूलकी ....
बारिशकी बुँदे लौट गयी बादलों के पास नाराज़सी
वो आज खिड़की में क्यों नहीं आई ????
हर रंग भरकर वो कुछ ऐसे गुम हो जाती है
हम रह जाते उसकी हँसी में गुम जिंदगी भरी
और जिंदगी खुद हथेली से रेत की तरह सरक जाती है .....

15 सितम्बर 2010

कासे बताऊ ये पीर ???

खिलती कलियोंने तेरा पता पूछा
सूरजकी किरणोंने तुझे ढूँढा
पंछीके परवाजोंने तेरा ठिकाना ढूँढा
कोयलकी कूकने बेसब्रीसे तुझे पुकारा
बादल का काला रंग और गहरा गया तेरे बिन
बारिश भी कुछ कम गीली महसूस हुई
दिन थोडा कम लम्बा लगा
रातें कुछ और लम्बी लगने लगी
नींदोंने मेरी आँखोंमें बसनेसे इनकार कर दिया
इंतज़ारने मेरी दहलीजसे दूर जानेसे मना कर दिया
सबको तेरी तलाश थी
पर मेरे दिल से बाहर आने को तुझे भी परहेज था
कासे बताऊ ये पीर ????

14 सितम्बर 2010

इंतज़ार कब तलक ???

इंतज़ार का लुफ्त जाना मैंने
जब मैंने इंतज़ार किया ....
तुम मेरे सबसे करीब थे
जब मुझे तुम्हारा इंतज़ार था ....
मेरे नयन तुम्हारे रहगुजरसे हट नहीं रहे थे ...
मेरे जहनमें तुम्हारे ही ख्याल थे ...
मैंने उन बातोंमें तुम्हे फिर से जी लिया ....
मेरे कानोमें तुम्हारे कदमों की आह्ट की गूंज थी ....
मेरी आँखोंमें तुम्हारा ही चेहरा था ....
बस तुम ही तुम थे और कोई नहीं ...
मुझमे तुम्हे पा लिया
जब जब मैंने इंतज़ार किया ....

13 सितम्बर 2010

आजकी सुबह गुलज़ार साहब के नाम

पिछला हफ्ते के अंतिम दिन जिसे अंग्रेज लोग वीक एंड कहते है जबरदस्त गुजरा :
मेरी पसंदीदा फिल्म जिसे मैं तक़रीबन आठ बार देख चुकी हूँ दूर दर्शन पर दिखाई गयी और मैंने वो फिर एक नयी फिल्म की तरह देखी ....गीत का डायलोग : असल में तो वही हमें मिलता है जो हम सोचते है .....ये जो वक्त गुजर रहा है ना वो सबसे अच्छा है बाद में हम इसे याद करेंगे और खूब हसेंगे ......मैं अपने आप की फेवरिट हूँ ...ये सब छोटे छोटे डायलोग बहुत ही सरल है जिंदगी में उतारने के लिए कभी ट्राय जरूर करना ....
कल एक शक्ति सामंत की क्लासिक फिल्म देखी : अमर प्रेम : राजेश खन्ना ,शर्मीला टैगोर की बेहतरीन अदाकारी ,और प्यार का एक अलग ही मतलब जहाँ सिर्फ विशुध्ध प्यार ही था ....छोटी थी तब देखी थी मतलब आज पूरी तरह से समज में आया ....फिल्म के अंत में बेबाक आंसू उभर आये ...जिंदगी के कितने रूप !!!!!
और आज सुबह में मुलाकात देखी गुलज़ार साहब की दूर दर्शन पर ......एक बिजली के करंट की तरह उनके शब्द अल्फाज़ हमारे भीतर दौड़ जाते है :
उनके कुछ ख्याल :
==जंगल में चड्डी पहनकर एक फूल खिला ...
==हमारे अन्दरके एंटेना को हरदम खुला रखो ...जिंदगी हर पल उसपर ब्रश करके जाती है ...जितना ग्रहण कर सकते हो पालो उससे ...( शब्द कुछ अलग ही थे उनके अंदाज़ में पर मतलब ये ही था )
==खयालोका कोई वीजा नहीं होता सपनो की कोई सरहद नहीं होती ......हर रात सरहद के उस पार मेहदी हसनसे मिलकर आता हूँ ....
ये सब तो गुलज़ार साहब ही सोच सकते है ...बटवारे के वक्तमें उन्होंने जो सगी आँखों से दर्द देखा वो पच्चीस साल तक उन्हें नाईट मेर बनकर सताते रहे ...वो उस डरसे सोते नहीं थे की ये ख्वाब फिर से शुरू ना हो जाए ....
===कोलकाता में उनकी बिमल दा से मुलाकात जिसके कारण वो फिल्म में लिखने लगे जो वो चाहते ही नहीं थे ...उन्होंने कहा =तु अब मोटर मेकेनिक नहीं बन सकता दोबारा ....और हमें गुलज़ार मिले ....
===आठ नौ साल के गुलज़ार स्कुल से घर और रात में दुकान में सोने जाते थे और तब चिमनी की लौ में जासूसी कहानी की किताबे चार आने में हफ्ता भाड़े पर लाकर पढ़ते थे ...रोज नयी किताब नहीं देने के लिए फूट पाथ के फेरिये ने उन्हें एक दिन टागोर की किताब थमा दी जिस एक किताब जिसका उर्दू में तर्जुमा किया गया था गुलज़ार साहब की जिंदगी और पढने का ढंग बदल दिया और हमें गुलज़ार साहब मिले .....
==मिर्ज़ा ग़ालिब साहब से उनका रिश्ता ..कैसे उन्हें पढ़ा ,समजा ,सिखा ???उनके नाटको के अंश ...सब कुछ अति अद्भुत तरीकेसे वर्णित किया और हमने सुना ...
==
== सूरज बूझ जाए और कहींसे मेरी नज़्म उड़ती उड़ती उसमे जा गिरे और सूरज फिर से सुलग जाए ...कितनी आला दर्जे की कल्पना ....
दूरदर्शन पर आज उनके एक घंटे तक चले "आज सवेरे " के मुलाकात के लम्हों ने मुझे :

हमेशा उड़ती फिरती तितली को एक बुत बना दिया
मेरी आत्माको इस जिसमसे जुदा कर टीवी स्क्रीनमें लटका दिया ....

12 सितम्बर 2010

तेरी तस्वीर


चुपकेसे उसका आना ,

मेरी तनहाईकी ख़ामोशीको तोड़कर ,

मेरे कानोमें कुछ बतियाना ,

फिर खिलखिलाकर हंस देना ,

और हवाओके पंख लगाकर उड़ जाना ,

ये है मेरे प्यार का परिचय ,

तस्वीर बनकर छुपा पलकोंमें

पर आँखोंसे ओज़ल जरा जरा सा ...

11 सितम्बर 2010

वक्रतुंड महाकाय......

आज त्यौहारों का त्रिवेणी संगम आया है ,
गणपति बाप्पा के साथ ईद की सेवैयाँ भी लाया है ,
मिच्छामी दुक्कडम सिर्फ जैन धर्म के लिए नहीं
हम सब के लिए सन्देश देता है
पुराने सब बैर भुला दो ,सुख शांति से समय बिताओ ,
ये जिंदगी तो बस एक बार ही आनी है
उसे आपसी बैर में क्यों सबको गवानी है ?
सिध्धि विनायक खुद विघ्न हर्ता बनकर
साथ सब के आये है ...
चलो आज सब हम गिले मिल जाए ...
मोदक सेवैयाँ साथ खाए ....
दूसरों से क्षमा मांगकर आपसी बैर मिटायें ....
=============================================
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ
निर्विघ्न कुरु में देव ,सर्वकार्येषु सर्वदा ......

10 सितम्बर 2010

कुदरत

कल भगवान एक हाथ में केमेरा
और दुसरे हाथ में ढोलक लेकर बैठे हमरे शहरमें ...
बिजली चमकती रही और बादल गरजते रहे ,
छ घंटे में सौ दिन का पानी का स्टोक भर गये .....
हर गली हर नुक्कड़ भर गया जैसे कोई नदी की नहर हो .....
कारे गराज में खड़ी रही ,स्कूटर ने फ़रमाया आराम ,
पैदल चलके मजे किये और सायकिल के पहिये आये काम ....
इंसान का सब गुमान सर्वशक्तिमान होने का
पल में चूर चूर कर गया ....
कल कुदरत हमरे शहर को कुछ यूँ घायल कर गया .....

9 सितम्बर 2010

क्यों ??

भीगे कपड़ो में भी तन कोरा ही रहा ,
भीड़में भी ये दिल तनहा ही रहा ,
प्यार के फुल तो खिले थे इस बाहरमें भी ,
बस उसकी खुशबूसे क्यों मेरा ही मन कोरा रहा ????

8 सितम्बर 2010

हम या तुम .....

तेरी लिखावटमें हर मोड़ पर मूड जाता हूँ ,
तेरे एहसासको खुद में बारूदकी तरह फूटता हुआ पाता हूँ ,
तेरी हँसीको फिजाओंमें बिखरते हुए पाता हूँ ....
आयने में तेरी तस्वीर खुद की जगह देखता रहता हूँ .......

7 सितम्बर 2010

एक डॉक्टर की शादी

बिचारे डॉक्टर वैसे भी बहुत लेट शादी करते है पर ये कैसे पता चले की कोई डॉक्टर की शादी हो रही है ????
कुछ नुस्खे :
= बारात एम्ब्युलंसमें आये ....
= शादी ओपरेशन थियेटरमें हो ....
=रिसेप्शन ओ पी डी वोर्ड में हो ....
= फोटो एक्स रे में खींचे जाए ....
=मेहमानोंको बुफे में विटामिन की गोलियां दी जाय ....
= पानी और कोल्ड ड्रिंक की जगह ग्लूकोज़ और ओ आर एस दिया जाय ....
= वरवधू एक दुसरे को फूलो के हार की जगह स्टेथोस्कोप पहनाये ....
=और शादी ख़त्म होते ही दूल्हा बोले नेक्स्ट प्लीज़ ......
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6 सितम्बर 2010

याद आती हो ...

कभी चुप रहकर
कभी बोल कर खूब सताती हो ,
फिर भी जाने के बाद
तुम ही तुम याद आती हो ......
===========================
तुम्हारे ख्याल से उठती है सौंधीसी सुगंध
मेरा जर्रा जर्रा महक जाता है .....
बस तुम्हारी दूरी का ख्याल
मुझे अधखिली कली सा कुम्हला देता है ...

2 सितम्बर 2010

जय श्री कृष्ण


बांसुरी की तरह
राधा की तरह ,मीरा की तरह ,
होठों पर लगी सदैव ,
अय कान्हा तुझ बीन अधूरी सी ....



खोखले बांसुरी के देहमें
छेद्की पीड़ाको बिसराकर अधरों पर सूर बन सजी सजी सी
ब्रजकी हवाओंमें घुली घुली सी
कान्हा बस तेरी दीवानगी सी मुझे बना ले .....



बिरहाकी ज्योतमें जली जली सी
तुम्हारे नाममें तुमसे पहले मिली मिली सी
शाश्वत प्रीति की पहली परिभाषा सी
कान्हा तेरी रग रगमें समायी सी राधाकी दीवानगी सम मुझे बना ले ....



दीवानगीकी इन्तेहा बनी बनी सी ,
करताल और एकतारेके रागोंमें बही बही सी ,
विष कटोरेमें तुम्हारी छविको पी गयी सी ,
कान्हा तेरे नामको पदोंमे रिझाती हुई मीरासा मुझे बना ले ....

1 सितम्बर 2010

तलाश मुझे भी है

जिस कदर तनहा गुजरता रहा सफ़र ,हमें तनहाई भी रास आ गयी ,
कहीं घनघोर रातमें भी एक रोशनी की किरन नज़र आ गयी ,
एक उम्मीद पर हम सफ़र करते है की कोई तो हमखयाल मिलेगा ,
मुझे मिलने की उम्मीदमें कोई और भी मेरी तलाशमें होगा ....