18 सितंबर 2010

कुबूल कर लो आज .....

ढलते सूरजने एक सलाम भेजा है ,
शब्बा खैर का हँसी पयगाम भेजा है ,
तुम्हारी पलकोंकी हँसी चिलमनके लिए हिजाब भेजा है ,
तुम्हारी आँखोंमें बस जाने के लिए एक ख्वाब भेजा है ,
तुम्हारे दिलको धड़कनेके लिए एक बहानेका आगाज़ भेजा है ,
तुम्हारी नींदे उडा देने के लिए मेरे ख्यालोका तोहफा भेजा है ,
तुम्हारे इंतज़ारको मेरे लौटनेका संदेसे का अंजाम भेजा है ....

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