30 सितंबर 2009

मजबूरी

सजदा कर दिया सरजमीं पर इश्कमें तुम्हारे ,

बंदगी तहे दिल से करते रहे हम ख्वाहिशोंके पूल बाँध ,

इबादत हमारी फ़िर भी कुबूल नहीं की खुदा ने कैसे ?

शायद हमारी मोहब्बत किस्मतमें अधुरा रहना लिखाकर आई थी .....

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मासूम सी जिंदगी बदल जाती है पशो पशमें वक्त की ,

रेत का टीला भी टूट न पाया तेज आँधियों से ,

एक फौलाद का दिल बर्फ की सिली पर भी ,

देखो पिघलता देखते रहे हम मजबूर होकर ......

चुप रहे ...

चुप रहे लब पर क्या करे ?

जब ये खामोशी बोले तो ?

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आज अपने आप से मिलने का वादा किया ख़ुद से ,

आयनेमें लिखे ख़याल ही नजर आए मुस्कान बन कर ...

29 सितंबर 2009

सपना मेरा कल वाला

कल विजयादशमी थी ..दोपहरमें कुछ ज्यादा ही फाफडा और जलेबी खाकर लेटी नींद आ गई ...दिन की नींद थी तो पक्की नहीं थी और मैं सपने में स्वर्गमें पहुँची ...अभी तो दरवाजे पर ही थी और क्या देखती हूँ ? रावण चित्रगुप्तसे कह रहे थे चलो मुझे इतने युगों से इधर हूँ तो कुछ टहलने के लिए पृथ्वी पर मुझे जाने दो ...अब तो मेरे पाप भी धूल गए है ....

चित्रगुप्त खुश हुए । उन्होंने इजाजत भी दी ..पर कहा तुम्हारी दैवी शक्ति है न वो काम नहीं आएगी और तुम्हे अपने दस सर लेकर ही जाना पड़ेगा ....

रावणका तो पुरा गेट अप ही बदल गया ...जनाब पृथ्वी पर आए ...दस माथे पर बीस आँखे और उस पर दस गोगल्स .....हर सर पर एक से बढ़कर एक टोपी ...

अब देखो क्या होता है >>>...........

सीधे मुंबई पहुंचे ...मोह नगरी के बारे में बहुत सुना था ....

लोग हैरानी से देखते है ..और चल देते है ...बस उनके पास वक्त नहीं था ..लोकल ट्रेन में जाना चाहते है पर सर आडे आ रहे है ...लोग सर को मार रहे है ...ट्रेन में जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता ...

भूख लगी खाने पहुंचे एक रेस्तोरांमें ....हर देश की आइटम थी ...एक मुंह ने पंजाबी माँगा एक ने गुजराती ,एक ने चाईनीज़ तो एक ने थाई ...जब दस मुंह से सब एक पेट में जमा हुआ तो क्या हश्र हुआ होगा सोचो ...रावणके शरीर में महाभारत ....!!!!!!

डॉक्टरके पास जाना पड़ा ...डॉक्टरने दस जीभ ,दस कान ,दस गले चेक करने के दस गुने रुपये फीसमें वसूल किए ..दस मुंह से दस अलग अलग दवाई भोजन अनुसार लेनी पड़ी ...पर वहां उनकी दोस्ती एक नर्स से हुई ...वहां से जब वे बहार निकले तो हाथ पकड़ कर रोड क्रॉस कैसे किया होगा सोचो ........

एक मल्टीप्लेक्स में फ़िल्म देखने गए तो दस सीटें रुक रही थी तो दस टिकेट खरीदने पड़े ...सोचा चलो अब होटल ताज में रूम ले लूँ ....इतने थक गए थे की सीधे पड़े बिस्तरमें ...पर नींद नहीं आ रही थी .....अब इनका प्रॉब्लम क्या था बता दूँ ?????? ये हमारी तरह गा भी नहीं सकते थे की

" करवटें बदलते रहे सारी रात हम ...." समजें आप ....

सबके हाथ में मोबाइल देखकर ताज्जुब हुआ ....दसो सर ने अलग अलग माँगा ...अब हमारी इंडियन हिरोइन के मोबाइल चित्रगुप्त की सहायता से लगाये ...एक की बात दूसरी सुन रही थी .....थक गए परेशां हो गए ...... और फ़िर मोबाइल कंपनी का बिल डेली बेसिस पर माँगा था तो बैलेंस एक घंटे में ख़तम ....दसो को मरीन ड्राइव पर जाकर समुन्दर में फेंक दिया ....रस्ते में चलते हुए कितनी ही महिला थप्पड़ मार रही थी ....एक महीने की वेकेशन पर आए रावण प्लेन में बैठकर देल्ही जाना चाहते थे ... राजकारणीओ के बारे में खूब सुना था ...एक ब्यूटी पार्लर में गए ...दस सर की अलग अलग हेर स्टाइल और दस गुना बिल !!!!!! प्लेनमें फ़िर दस सिट रोकी तो दस गुना भाडा ... फ़िर टीवी पर इंटरव्यू रखा गया एक नए नवेले अजूबा जैसे व्यक्ति का ...इंटरव्यू ले रही थी पाखी ....वो इतनी प्रभावित हुई की उसने अपने मंगेतर को तुंरत रिजेक्ट कर दिया और इन्हे प्रोपोस कर दिया ...अब रावण तो स्वर्ग लोक में भी चेनल देखते थे ...तुंरत भागे और चित्रगुप्त को प्रार्थना करके फ़िर वापस लौट गए स्वर्ग में फ़िर से .....

मैं रोकने गई उन्हें तो पलंग से गिर पड़ी और मेरा सपना टूट गया ......

28 सितंबर 2009

बस यूँही ...

अक्ससे हाथ मिलाने जाते है ,

आयना हमें छू जाता है ....

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जर्रा एक जमीं का उडान भर रहा है ,

आसमान को भर रहा है ……

हाथ बढ़ा कर छू लेने को दिल करा ,

और हवा के पंख लगा कर उड़ जाता है ....

बस आप ही ...

जिक्र छिड़ता है महफ़िलमें हुस्नका ,
लब पर सिर्फ़ आपका नाम आता है ,
रंगोंकी महफ़िल गर सज जाए
तो चिलमनमें छुपा आपका चेहरा याद आता है .....
तनहाई का आलम हो तो करीब पाते है आपको ,
भरी महफ़िलमें सिर्फ़ आपका इंतज़ार रहता है .....
कभी फुरकत होती है कभी बेपनाह मशरुफी ,
क्या याद होती है क्या नींद होती है ,
साँसे जब चलती है बस उसे भी आपके दीदारसे आराम आता है ....

दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं .....

27 सितंबर 2009

कोई जो है मेरा

पता नहीं तुम मेरी कौन हो ?

पर जो हो तुम मेरी रूह की तरह हो ....

जब तुम्हारा सामना होता है

लगता है आयने में खुद को देखा

शक्ल बदल गयी है पर

जबां पर थमे लब्ज़ जैसे सुन लिए ....

मेरा मौन भी बहुत कुछ कह गया ....

कुछ पगली सी कुछ दीवानी सी

एक अनजाने रिश्तेसे बंधी

कहो तो कुछ भी नहीं मैं तेरी

पर तुम्हे अपना स्व माना है

एक दीवानीने प्यार को आज जाना है ....

चाँदकी तरह शीतल हो तुम

दाग भी तुम्हारे तुम्हारी सुन्दरता पर देखो चार चाँद लगा गए ....

26 सितंबर 2009

थम गई कुछ और जिंदगी

कभी लगता है जिंदगी थम गई है ...पता नहीं आज एक ऐसा निजी अनुभव आपके साथ बांटने जा रही हूँ ....

जब नवरात्री चालू हुई तब मैं बीमार हो गई ..दो दिन तक मैं यहाँ कुछ लिख नहीं पायी ...दो पोस्ट दी और फ़िर ये इन्टरनेट कनेक्शन बंद हो गया तकनिकी प्रॉब्लमके कारण ...तब सोचा एक कलम से लेकर जब कागज़ पर लिखती हूँ सब तब ये सिर्फ़ मैं पढ़ पाती हूँ ...और ये तकनीक के कारण जब सबके साथ विचार बांटे जाते है मैं भी दुनिया के किसी अनजान व्यक्ति के विचार पढ़ती हूँ तब एक रिश्ता बन जाता है ...और जब ये तकनीक में गडबडी हो जाती है तब हम कितना अकेला अनुभव करते है ??? मेरी डायरी के पन्ने बहुत बोलते हैं...और ये ब्लॉग बोले तो कितना फर्क पड़ जाता है ....

हमारा ये रिश्ता कितना अजीब है ....दुनिया एक छोटे से बॉक्स में समां जाती है ...

काश आकाशके फलक का हो कागज़

और हमारे विचार हम उस पर ऊँगली से लिख जाते

कुछ सूरज की किरणोंसे जल जाते ,

कुछ बारिशकी बूंदोंमें धूल जाते ,

कुछको सहलाता चाँद अपनी बांहों में लेकर

और सितारे कभी पढ़कर कुछ और टिमटिमा जाते .....

अय नादान दिल बस यूँ ही सोचकर हम भी धड़क जाते ....

23 सितंबर 2009

हम सब अमीर है ...

आज खुशियाँ कुछ उधार लेनी है

ये मुस्कराहट पर मैंने लोन पर ली है ,

दिल भी किसीको किराए पर दे रखा है ,

लोन चुकानी जो है .....

फ़िर भी मकान खाली नहीं करता है

और किराया भी अब तक बकाया है ....

चिकने चुपड़े चेहरेसे परते उखड रही है ,

उसके धब्बे और दागोंसे भी कभी घीन आती है .....

लोन पर बंगला लिया जाता है ,

साजोसामान भी किश्तों पर बसाया जाता है ....

फ़िर न दिन दीखता है न रात

इंसानकी कमर भरी जवानी में बूढा हो जाता है .....

देखो नई कारमें बैठकर जो मुस्कान आई है ना

वो भी बैंकके क्रेडिटकार्ड पर ही लायी गई है ......

चलो अब ढूँढते है उस "शान्ति " को भी

जो कहीं "आश्रम "में ही पायी जाती है .....

टैक्स बचानेमें वहां किए गए "दान" की

रसीद भी बड़े काम आती है ......

चलो अब सोने का वक्त हो गया ये नींद भी उधार आती है ,

डॉक्टरके प्रिस्क्रिप्शन पर ये गोली जो दे जाती है .......

22 सितंबर 2009

इबादत

नहीं कोई मजहब का मोहताज ये दिल जब इबादत करनी हो ,

जिस रूपमें मिल जाए वो हर जगह सिर्फ नूरके रूप नजर आता है ,

कुछ अल्फाज़ होते है जो कागज़ पर सिर्फ लिखे रह जाए तो

किसी बेवा के अश्कोंसे सिसकते लगते है ,

जब किसी रूहानी आवाज उन लब्जोंका दामन थाम लें

और दिल के तार छेड़ते हुए कोई साज़ उसका साथ बनकर

आये तो उस आवाज़ में देखो तो अल्लाह या इश्वर की शकल नजर आ जाए ....

21 सितंबर 2009

नवरात्री का माहात्म्य

देर आए दुरस्त आए ...दो दिन के बाद ही सही ये नवरात्री के नव दिन माँ दुर्गा के किस रूप को समर्पित है ये बात आज बताना चाहूंगी ...अगर श्लोक के लिखावटमें कुछ ग़लत है तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ .........

१...शैलपुत्री :

वन्दे वांछितलाभाय चंद्रर्धकृतशेखराम
वृषारुढं शूलधराम शैलपुत्री यशस्विनीम
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पहले दिन माँ दुर्गा का ये प्रथम स्वरूप को पूजा जाता है । पर्वताधिराज हिमालय के वहां जन्म होने के कारण उनका नाम शैलपुत्री रखा गया । इनका वहां वृषभ है .उनके दायें हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथमें कमल है ।

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२...ब्रह्मचारिणी :

द्द्याना करपद्माभ्यामक्षमालाकमंडलम
देवी प्रसिदतुं मयि ब्रह्मचारिन्यनुत्तमाँ
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माँ दुर्गा के दूसरे दिन इस रूप को पूजा जाता है .ये माँ ध्यान के चारिणी है .इनका स्वरूप ज्योतिर्मय है और अत्यन्त भव्य है । इन के दायें हाथ में जपमाला है और बाएं हाथ में कमंडल है ....

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३...चंद्रघंटा :

पिण्डज प्रवरारूढाह चंडकोपास्त्रकैर्युता
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघंटेति विश्रुत
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माँ दुर्गा के ये तीसरे दिन का ये स्वरूप परम शान्ति दायक और कल्याणकारी है । मस्तिष्कमें घंट के आकार का अर्धचंद्र है ....वाहन सिंह है ,दस हाथ ,सुवर्ण रंगी शरीर , दस हाथ में अस्त्र शस्त्र ,घंट जैसे प्रचंड ध्वनी से अत्याचारी दैत्य को सदा के लिए प्रकम्पित रखने वाली ये देवी है ....

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४.... कुष्मांडा:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेवच
दधाना हस्तपद्माभं कुष्मांडा शुभदास्तुमे
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माँ दुर्गा के चौथे दिन का ये स्वरूप है ... आठ भुजा है , सिंह का वाहन है ,साथ हाथ में कमंडल ,धनुष ,बाण ,कमलपुष्प , अमृतपूर्ण कलश , चक्र गदा और सर्व सिध्धि निधि देने वाली जपमाला है ...

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५ ... स्कंदमाता :

सिंहासनगता नित्यंपद्माश्रितकरद्धया

शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी

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पाँचवे दिन का ये माँ दुर्गा का स्वरूप है .गोद में भगवान् स्कन्द विराजमान है ,चार भुजा कमल आसन पर विराजित और वाहन सिंह ही है । ये भगवान् स्कन्द कार्तिकेयके नाम से भी पहचाने जाते है ......

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६... कात्यायिनी :

चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना
कात्यायिनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी
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ब्रह्मा ,विष्णु और महेश को अपने तेज का अंश देकर दानव महिषासुरके विनाश के लिए इनको उत्पन्न किया गया जो माँ दुर्गा का छठे दिन का स्वरूप के रूप में पूजा जाता है ..महर्षि कात्यायन ने इनकी सौप्रथम बार पूजा अर्चना की इस लिए उन्हें कात्यायिनी के नाम से पहचाना गया है । इनका स्वरूप भव्य और दिव्य है ..चारभुजा है .ऊपर के हाथ में अभय मुद्रा ,निचे वरद मुद्रा है ,दायें ऊपर के हाथ में तलवार और निचे के हाथ में कमल सुशोभित है ....

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७...काळरात्री :
लम्बोष्ठी कर्णिकाकरणी तैलभ्यकिशारिरिणी

वामपादोल्लसल्लोहलताकंटकभूषणा

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रीर्भयकुरी

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सातवा स्वरूप सातवे दिन माँ दुर्गा का इस नामसे पूजा जाता है । उनका देह गहरे अन्धकार जैसा ,गले में बिजली सी चमकती माला ,तीन नेत्र ,नासिका में से श्वास और उच्छ्वास में निकल रही अगनज्वाला ,वाहन गर्दभ है ..स्वरूप भयंकर है पर हमेशा शुभ फलदायी है ...सब को वर प्रदान करती है ....

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8...महागौरी :
श्वेतेवृषे समारूढा श्वेताम्बरधराशुची :
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा
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आठवे दिन का ये रूप माँ दुर्गा का इस नाम से पूजा गया है .. वर्ण सम्पूर्ण रूप से गौर है .उपमा शंख ,चंद्र और मोगरे के फूल की उपमा दी गई है ...इनकी उम्र आठ साल की मानी गई है ...चार भुजा है .समस्त वस्त्र और आभूषण श्वेत है । वाहन वृषभ है ...

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९ ...सिध्धिदात्री :
सिध्धगंधर्वपक्षाधैरसुरैरमरैरपि
सेव्यमाना सदाभूयात सिध्धि दा सिध्धिदायित्री

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माँ दुर्गा का ये नौवा और आखरी रूप है । ये सर्व सिध्धि देने वाला स्वरूप है । मार्कंडेय पुराण के अनुसार अनिमा ,महिमा ,लघिमा ,प्राप्ति ,प्राकाम्य ,ईशित्व ,और वशित्व ये आठ प्रकार की सिध्धि है ...ये सिध्धि दात्री आखरी है । उनकी उपासना करने के बाद साधक की हर लौकिक और परालौकिक हर कामना की पूर्ति होती है .और कोई कामना पूर्ण होने के लिए शेष नहीं रहती ....दुनयवी चीजें उनके लिए मायने नहीं रखती ....

18 सितंबर 2009

एक शाम तेरी याद के नाम

मुझे मेरी तन्हाइयों का गम नहीं

गुजरे हुए लम्होंने कभी तनहा ना छोडा मुझे ....

कभी हंसती हुई कभी शरमाती हुई ,

कभी कुछ नाराज़सी कभी सिसकियोंसे सिली हुई ,

यादोंकी बारिश ये रिमज़िम सावनसी भिगो जाती मुझे ,

गर्म सहराकी धुपसी यादें पसीनोंसे तर कर जाती मुझे .......

यादोंके भी कुछ तिलस्मी राग होते है ,अंदाज़ होते है ,

कभी आतिशके शरारे होते है,जो हम जलाकर राख करती है .....

जब तुम्हारी याद मेरी निगाहोंको नम करती है ,

तब तुम्हे भी हिचकियाँ आती तो होगी ,

तुम्हें भी मेरी तरह डूबती शामके रंगोंकी फिजामें

एक तस्वीर नज़र आती तो होगी ..........

हथेली पर सरकता वक्त जैसे फिसलता था रेशमी रेत सा लगा ,

देखो खाली हो गए ये मेरे हाथ ,

पर मेरे दामन पर याद बनकर अनगिनत किस्से बिखरे है ............

17 सितंबर 2009

चलो गरबा जोवा .....

चलो आज हमारे शहर वडोदरा की ही सैर कराती हूँ ...एक छोटी सी जगह है पर एक सुकून सी उसको गले लगाने वालो के लिए ....हम सब जानते है की शनिवार से देवी पूजा का पर्व नवरात्री शुरू हो रहा है ....दुर्गा ,काली, अम्बिका ,वैष्णो देवी और कितने नाम है ...पर जैसे की सब जानते है गुजरात की धरती पर ये गरबा उत्सव के रूप में मनाया जाता है और आज ये गरबा महोत्सव की सैर पर ले चलती हूँ ....

एक छोटा सा छेदवाला मिटटी का घडा ..उसमे एक दीपक प्रगटाकर उसे माँ अम्बा के तस्वीर के सामने रखा जाता है ...इस घडे को गरबा कहते है ...रात को सभी औरत और मर्द इसके इर्द गिर्द गोला बनाकर माँ की स्तुति करते हुए जो गीत गाते है उसे गरबे के नामसे जाना जाता है ...दो एक घंटे तक इस तरह नौ दिन तक आराधना की जाती है ...अंत में आरती होती है और प्रसाद बांटा जाता है ....आज भी गुजरात के छोटे छोटे गाँवमें इसी रूपसे गरबा गाया जाता है ....ये गरबाका प्रारंभिक रूप है ...

लेकिन वर्तमान में ये रूप बदल चुका है ...इसे भी ग्लोबलायिज़शन का रंग चढ़ चुका है ...इसे पुरी तरह कोमर्सिअल कर दिया गया है ...पर फ़िर भी ये गरबा एक जूनून लेकर आता है यहाँके लोगोंके दिलो दिमाग पर ...गणपति उत्सव के तुंरत बाद इसकी तैयारी में युवा जुट जाते है ....यहाँ नवा बाज़ार करके एक खास बाज़ार है जहाँ पर गरबे के लिए खास पोशाक और गहने मिलते है ...लड़कियां हो या औरते यहाँ पर गरबा घुमने के लिए चनिया -चोली और चुनर का परंपरागत पोशाक पहनती है ...और बिल्कुल गांवठी किस्म के गहने पहने जाते है ...लड़के एवं पुरूष कुरता चूड़ीदार पजामा ,या धोती , पगड़ी तक बांधते है .... छोटी सी एकडेढ़ साल की बच्ची से लेकर हर व्यक्ति गरबेमें येही ड्रेस कोड अपनाता है ....बनाव श्रृंगार और ब्यूटी पार्लर वालों की तो निकल पड़ी है .....रोज नया ड्रेस और पुरा माहौल एक रंगों की बारिश सा बन जाता है ...

ये गरबा गाने के लिए भी ग्रुप होते है ...उसके सिंगर्स कई महीनों से नए और प्राचीन गरबोंको सूरों में बांधते हुए नए गरबे गाने की होड़ में लगे रहते है ...जिसका गरबा सबसे सुरीला होता है उस मैदान पर भीड़ गाने वालों की और देखनेवालों की सबसे अधिक जमा होती है ....जिसमे प्रमुख नाम है अतुल पुरोहित और अचल मेहता ...ये लोग भी पॉँच आंकडे में अपना मेहनताना लेते है ...गरबे के स्पोंसरार्स होते है ...वहां पर खाने पिने के भी स्टाल्स लगते है ....रात दस बजे से रात के एक बजे तक ये रात को हम दिन में तब्दील कर देते है ....

ये जो गरबा नृत्य किया जाता है वह स्टेप्स और हिंच कहा जाता है ...उसके स्टेप्स को ताली और बिना ताली के सिर्फ़ एक्शन के साथ सभी खेलने वाले एक ही ले में करते है गरबा गान के साथ साथ ....और एक के अन्दर एक ऐसे कई वर्तुल गोलाकार में गाया जाता है ...अंत में होता है भांगडा और गाड़ी भी ...आज कल ये गरबे बड़े मैदानों में आयोजित होते है ...और बहुत ही देश विदेश तक मशहूर हुए है ...इसमे युनैतेद वे ऑफ़ वडोदरा ,आर्की , अम्बालाल पार्क,मेहसाना नगर ,आदि गरबों में तो एक साथ बीस से चालीस हज़ार तक युवा एक साथ गरबा करते है ....अम्बालाल पार्क का गरबा मेरे घर के ठीक सामने वाले मैदान पर ही होता है ...इस जश्न की मैं हर साल साक्षी बनती रही हूँ ....

वैसे शेरी गरबे यानी की छोटी सोसाइटी या शहर की गलियों के गरबे का भी अपना अलग अंदाज़ होता है ...शहर की सडकों पर भी ऐसे गरबे आयोजित होते है ...जहाँ ड्रेस कोड की पाबन्दी नहीं होती है ....पर ज्यादातर लोग चनिया चोली और कुरता पजामा ही पहनते है ......इसे शेरी गरबा कहते है ...जो प्राचीन गरबों से मिलता जुलता लगता है ...

यहाँ पर छोटे छोटे बच्चों के लिए भी अलग आयोजन का दौर शुरू हुआ है ..जहाँ बिल्कुल छोटे बच्चे जो रात को जग नहीं सकते उनके लिए शाम सात से दस बजे तक ये आयोजन गरबा के मैदान पर होता है ...पता है ऐसा लगता है फ़िर कृष्ण भगवान और गोप ग्वाले और गोपियाँ पधारे है ...ऐसे ही एक मशहूर गरबा अदुकियो ददुकियो का आयोजन मेरे घर के सामने होता है .....

यहाँ मांडवी नाम की जगह है जहाँ पर अम्बा माता का अति प्राचीन मन्दिर है वहां पर शाम आठ बजे से दस बजे तक सिर्फ़ पुरूष ही गरबा करते है ...बिना माइक या ढोल के ...ख़ुद ही गाते है ...वहां औरतों को गरबा करना वर्ज्य है ..यहाँ पर गायकवाड महाराजा ने दो मन्दिर बनवाये है ...एक बहुचाराजी और दूसरा पादरा कसबे के पास रानू गाँव में तुलजा भवानी का मन्दिर ...नवरात्री के दिनों में यहाँ पर बहुत ही भीड़ होती है .....

यहाँ के लोग व्रत अनुष्ठान भी करते है ..नौ दिन तक उपवास और विशेष आराधन और यग्य किए जाते है ...गायत्री माँ के अनुष्ठान होते है ...कई लोग गरबेके घडे का और जवारा का स्थापन करते है ...दसवे दिन उन्हें पुरे सम्मान से विदा करते है ....

भक्ति के रंग के साथ यौवन का उन्माद यानी की विश्व का सबसे लंबा चलने वाला ये त्यौहार नवरात्री ...

हर अच्छी चीज़ के साथ कुछ दूषण आ ही जाते है ...रात को देर तक लड़कियां बेफिक्री से घुमती हुई सिर्फ़ गुजरात में ही नज़र आती है .जो सभी के लिए एक आश्चर्य ही होता है ....जवानी के साथ कुछ जातीय स्वछंदता भी देखी जा सकती है ...उसके दुष्परिणाम भी आते है पर ऐसे कुछ किस्सों के कारण ये महोत्सवको बदनाम नहीं कर सकते क्योंकि ये पुर्णतः भक्ति से भरा होता है ...हमारी परम्पराओं को जिन्दा रखता है ...हमारे गरबे को विश्व के नक्शे पर नाम देता है ...रात को निरंतर तेज गति के नृत्य करने के बाद भी थकन नहीं होती ...दूसरे दिन सभी इतने ही उत्साह में नजर आते है ...ये माँ की भक्ति का ही प्रताप होता है ....

कभी मौका मिले तो इस महा उत्सव को देखने का आनंद जरूर लें ....

केसरियो रंग तने लाग्यो अला गरबा ......

तारा विना श्याम माने एक्लादु लागे ...

बस एक खामोशी ....

कलम तोड़ दूँ ,कागज़ फाड़ दूँ ऐसा गुस्सा आता है कभी ,

अल्फाजों को भी लुकाछिपी खेलने का शौक जगता है ,

बस चुपचाप आसमां को ताक लें बिना कुछ कहें ऐसा दिल करे ,

समज लो एक नए एहसास को जनम लेने की घड़ी करीब है .........

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नवरात्री के उपलक्ष्यमें दो खास पोस्ट आने वाले दिन में .....

इंतज़ार करें ....

16 सितंबर 2009

हाथ की लकीर में लिखा

हाथकी लकीरों पर कल निगाह गई ...

बचपनसे साथ रही है शायद जन्मसे ही है .....

कहते है इस रेखामें मुकद्दर छुपा होता है .....

रेखोमें नहीं लकीरों में नहीं मुकद्दर नहीं होता ,

जो होता है वो तो हमारे हाथमें ही होता है ,

पैरों का साथ होता है और तक़दीर बदल जाती है ,

पर अपनी मायूसी को ,बेबसी को ,नाकामी को

कोसने का कोई बहाना चाहिए होता है

तब अय हाथ की लकीरों हम तुम्हे दोषी बता देते है .....

इस लकीर में ही पढ़ा था हमने तुमसे मिलना है ,

इसी लकीर में लिखा था हमें जुदा भी होना है ....

तुम्हारे मिलने पर हम यूँ हुए गूम की

जुदा होना पढ़ ना पाए थे और दोषी किस्मत को बताये थे .....

15 सितंबर 2009

अलविदा कहते हुए तुम्हे ....

बस ठान लिया था ,कसम उठाई थी ,

याद करेंगे ना कभी तेरे जाने के बाद ,

वफ़ा हमारी दोस्ती की उस कसमको निभाया ,

याद कभी ना किया तुम्हे भुला ना पाए थे कभी जो ......

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बहुत मुद्दतोंके बाद एक चेहरा सामने आकर बैठ गया ,

जाना पहचाना सा ,एक जानी पहचानी मुस्कान लिए ,

लकीरोंमें चेहरे की ढूंढ रहा था एक लकीर उसकी पहचान की ,

उसका बढ़ा हाथ जो थाम लिया ,दोस्तीकी पुरानी सिहरन बदनसे गुजर गई ........

14 सितंबर 2009

चलो आज चलते है कहीं दूर ....

चटख जाता है एक एहसास कभी ,

खुशी के माहौल भी गमकी बदरी लेकर गुजरते है ,

हमारी खता ये होती है की हम गुजरते नहीं उस गलीसे ,

हम पशोपश में पलते हुए वहीं ठहर जाते है ......

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चलते रहना ही जिंदगी है मेरी

फ़िर मैं कहीं क्यों रुक जाता हूँ ....

रुकने पर भी जिंदगी रूकती नहीं कभी ,

फ़िर मैं क्यों किसीके इंतज़ार में ठहर जाता हूँ ??????

13 सितंबर 2009

इंच ,सेंटीमीटर ,किलोमीटर ....

तराजूको देखकर ये ख्याल आता है ,

सब कुछ नाप तोलकर ही क्यों ?

देखती हूँ जब बड़े लोगोंका हुजूम

जो पार्टीके नाम से है जाना जाता ,

नपीतुली आवाज़, और अल्फाज़में होती है बात ,

ग्रूमिंगके नाप पर मुस्कान को भी इंच सेंटीमीटरमें बाँधा है ....

नाप तोल कर जिस्म को भी रखे ,

वजनको भी नाप तोल कर रखो .....

कपड़ेभी फिटिंगमें होना चाहिए .......

और क्या एहसास भी नापतोल को दिखाओ ........

मैयतमें काले चश्मे लगाकर जाओ ,

आंसू को भी नाप तोल कर बहाओ .....

ये स्वार्थकी पट्टी जो हर घर द्वार पर आ गई है ,

स्क्वेर फीट पर घर बनते है और रिश्ते भी रुपये को तोल कर होते है ....

पर ये प्रभु भी बड़ा निराला है ,

जीवन की लम्बाई को कभी अपने हाथ से कहीं और ना डाला है .....

12 सितंबर 2009

मार पड़ेगी मुझे भी

तेरे इंतज़ारमें मेरा दिन निकलता है ,

तू ना आए तो वक्त ही नहीं कटता है ,

तुझे मिलकर जैसे सारी खिड़की खुलती है ,

क्या समजे आप मैं तो अखबारके लिए ये कहती हूँ .....

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एक बक्सेमें हर दम सदायें आती है ,

संगीत के सूर सजाती है और मन को बहलाती है ,

बटन से ओन ऑफ़ हो सकती है बस इसीमे काम आती है ,

जो मेरी हरदम नॉन स्टाप बीवीकी याद दिलाती है .....

और कभी ये गलती भी हो जाती है ,

ये बिना हड्डी की जबान बीवी को रेडियो का नाम दे जाती है ....

11 सितंबर 2009

याद आई किसीकी यूँही ...

देखती रही मैं वक्त को अपनी हथेलीसे फिसलते हुए ,

अभी तो साथ थे ,पास पास थे , हाथसे लेकर मूंगफली खा रहे थे ,

लम्हा लम्हा करके वक्त सरकता सा गया ,

लम्हा घंटे में और घंटा दिनमें तब्दील होता गया ,

दिन हफ्ते में और हफ्ता महीने सालमें बदल जाएगा ,

देखो जिंदगीकी किताबमें कुछ लिखा हुआ कुछ कोरा सा

बस हर पल एक सफा जुड़ता चला गया ....

कल का वो हँसी लम्हा गुजरे वक्त के साथ इतिहास बनता गया ,

जिसने सिर्फ़ यादें छोड़ी है हमारे दिल में इन कोरे सफे पर लिखने के लिए ,

जिसे पहचान न पाए जब साथ साथ थे

वक्त उसे प्यार का चोला पहनाकर चलता गया ....

ये कोई महान व्यक्ति का इतिहास नहीं है

बस हर आम अदने इंसानकी जिंदगीमें

बस बरबस मैं यूँही आज झांक कर चली गई ....

10 सितंबर 2009

कोहरा

कोहरेसे लिपटी हुई इन राहोंने

मुझे अंधेरेको पीना सिखाया ....

लम्बी राहों पर जिंदगीकी मंजिलोंसे नहीं

दो दो कदम पर बिखरे फ़ूलोंसे पत्तोंसे प्यार होता चला गया ......

सारी राहें दिलकश नझारोंसे वाबस्ता थी

कदम दर कदम बढ़ता हुआ हर मंझर पर ये बयां हुआ करता था .....

जिंदगी के लंबे सफरको बरसोंमें नापकर थक सा गया था ,

लम्हे लम्हे जोड़कर गम खुशी के मैं उम्र जोड़ता चला गया ....

9 सितंबर 2009

उडी बाबा ....

जिंदगी कुछ बोर सी लगती है क्या ??? अजी कोई गल नहीं ......

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लड़के ने लड़की से कहा : तू ही तो जन्नत मेरी तू ही मेरा जूनून ...

और कुछ न जानू बस इतना ही जानू तुझमे रब दीखता है यारा मैं क्या करूँ ???????

लड़की : मथ्था टेक और दफा हो जा ....

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फ्लर्टिंग की सबसे वड्डी वाली ऊंचाई क्या है ????

जब लव लैटर शुरू हो : टू हूम सो एवर ईट में कंसर्न ....शब्दों के साथ ...

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लड़की : तुम कुछ ऐसे प्रपोज करो जैसे किसीने ना किया हो ....

लड़का ( उसे जोर से थप्पड़ मरते हुए ): कमीनी , मैं तुझे प्यार करता हूँ ,मुझसे शादी करके मेरी जिंदगी तबाह कर दो ......

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लड़का : ओ बेवफा तुने मेरे दिल को जलाकर राख कर दिया ....

लड़की : तेरी कुर्बानी बर्बाद नहीं जायेगी , राख इधर भेज दे बर्तन मांजने को काम आएगी ....

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पतिने पत्नी से कहा : तुम मेरी जिंदगी हो , और ..............................

पत्नीने पूछा : और क्या ????? मैंने पूछा जी ..और क्या ??????? ( जोर से चिल्लाते हुए ) बोलो ,और क्या ???????

पति : और लानत है ऐसी जिंदगी पर ...........

8 सितंबर 2009

लगी शर्त

उसकी शर्त थी हम सिर्फ़ दो दिन तक ही मिलेंगे
बस फ़िर कभी मिलना ना होगा ,
बस दो दिन में जी ले जितना जीना हो तुम्हे ,
उसके बाद इस राह के आगे का दोराहा होगा ....
दोराहे पर जाकर जिंदगी को थमा दी
दोराहे पर जाकर साँसों को रोक लिया
दोराहे पर जाने से पहले जिंदगी ही रुक गई
दोराहे पर जाने से पहले जुदाई हो गई .......
बस अब तू शर्त हार गया दोस्त
और देखो मेरा प्यार जिन्दा रहा
मैं इस दुनिया में साँस तो नहीं ले पाया
पर तुम्हारे दिल की धड़कन बन धड़कने लगा ....
शर्तो पर प्यार नहीं किया करते
शर्तों पर प्यार करने वाले शर्तों को हार जाया करते है .......

7 सितंबर 2009

चल कहीं दूर निकल जाए ......

कुछ नया दस्तक दे रहा है

दरवाजा खोलने को मन राजी नहीं ....

पुरानी यादोंने घर पर डेरा जमा रखा है ...

अय अजनबी तुझे कहाँ पर पनाह दूँ ?????

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अय दोस्त काश एक एहसान हम पर कर जाता ,

तू तो चला गया हमसे दूर तेरी यादें भी संग ले जाता .......

6 सितंबर 2009

मशरूफ है हम .....

दीवारों पर जम रही थी दिमतकी लकीरें !!!!

क्या घर मेरा इतना पुराना होने लगा है ?

या लगता है इसे मेरी जरूरत नहीं लग रही है ,

या फ़िर मेरे लिए ये ठिकाना ना रहा है !!!!

दुनियाभर की ख्वाहिशो के पोटले को लाद कर पीठ पर ,

दर ब दर घुमने से फुर्सत कहाँ हुई है हासिल दो पल की कभी !!!

ये घर कहाँ रहा है मेरा ये तो रैन बसेरा हो कर रह गया है ......

बच्चे तो सोये से ही मिलते है हरदम ,बीबी का चेहरा भी थका सा देखा है ......

तलाश तो करनी है उन फुर्सत के लम्हों की

चाह भी है दिमत से दीवार को आजाद करने की ,

बच्चोको खिलौने और बीबी को साड़ी दिलवानी है ...

कल फुर्सत नहीं मिलेगी मुझे अब तो अगले रविवार का इंतज़ार रहा है .....

5 सितंबर 2009

चोरी हो गई

कल लगा जैसे मेरी कलमसे किसीने स्याही चुरा ली ,

दावत घिस रही थी कोरे कागज़ पर

और कागज़ भी कोरा रह जाता था कुछ निशान सा बनाकर ,

भेज दिया उसे वैसे ही ,पढने वाला मेरे जज्बात को पढ़ ही लेगा .....

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गममें डूबा था दिल और शाम भी उदास थी

दिल याद कर रहा था किसीको ,

बस फ़िर एक आवाज आई और फ़िर क्या ?

मैं तो नींदमें थी और सपने से जाग गई .....

4 सितंबर 2009

देखो तो जरा सा ...

गली के नुक्कड़का वह मकान

थो वो मेरी निगाहों का एक मकाम ...

हरदम बंद खिड़की रहती थी उसकी ,

वहां रोज नए रंग रूपमें खामोशी बसती थी ......

एक रोज खुली खिड़की वो

मेरी नजर भटकने लगी ,

सामनेकी दीवार पर मेरी ही तस्वीर थी .....

कांच पर जमीं धूल पर

ऊँगली से लिखा हुआ था नाम मेरा ही ....

मुझे इंतज़ार था उसके दीदार का ही ....

चोंक गई मेरी नज़र इस नजारेसे ,

उसकी नज़र को भी इंतज़ार था मेरा ही .......

3 सितंबर 2009

कैसे कहें ???

एक दोस्त से बिछड़ना है कल मुझे ....

पता नहीं कैसे काटेंगे उसके बगैर ये दिन ...

आज कलम भी जवाब देने लगी है मुझे ....

बस उसे भी शब्दों की खोज है कुछ कह पाने के लिए ....

2 सितंबर 2009

उम्मीद

कल मिलने की उम्मीदमें एक शाम ढल जाती है ,

आज तो कुछ कर नहीं पाये तो बात कल पर चली जाती है ,

अगले पल की जिंदगी कोई भरोसा नहीं होता ,

पर ख्वाहिशों के पड़ाव के मकाम पाने की उम्मीद उम्रसे भी लम्बी हो जाती है ....

1 सितंबर 2009

सैलाब

ये मेरी ३०० वी पोस्ट है ....

बस नौ महीने के सफर में मुझे लगता है कितना कुछ छुपा कर रखा था मुझमें और जो ख़तम ही नहीं हो सकता ....

एक छोटी सी तो लकीर थी पानी की ,

और मैंने उसे खरोंच दिया हौले से ....

पानी की लहरें फुट निकली उसमें से ....

और शायद एक सैलाब था आगोशमें मुझमे समाया सा .....

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...