31 जनवरी 2010

चलो एक कार लें .....

कल टीवी देखते हुए एक नयी कार का इश्तिहार आया ...मेरी एक सहेलीने कहा ये अच्छी कार है ...सस्ती भी है ...ले लेनी चाहिए ..मैं उसका चेहरा देखने लगी .....क्यों ????

पता है मेरा घर बहुत सादगीसे सजा है ...उतना सब कुछ है जो सुकूनसे लिए जरूरी है ...इस लिए मुझे उसका सुजाव कुछ अनमना सा लगा ...

मैंने कहा अगर स्कूटर पर जाये तो मेरी ससुराल सिर्फ १५ मिनटमें पहुँच सकते है ...और मायके जाना होतो पच्चीस मिनट काफी है ...उस पर रोड पर प्रतिदिन बढ़ रहा ट्राफिक देखो ...अगर कार होती है तो हमें कितनी देर ट्राफिकजाममें फंस जाना पड़ता है पर ये छोटा सा स्कूटर एक चूहे की तरह छोटी गली से निकल कर शोर्टकटसे हमारी गति को रोकता नहीं ...जहाँ पर हमें जाना हो वहां से कहीं दूर कार पार्क करो और फिर बाज़ार जाकर सामान खरीदो ....तुम्हे नहीं लगता कार कुछ कमाल नहीं कर पाती ऐसे हालमें ...और अगर दुसरे शहर जाना हो तो कुछ रुपये प्रति लीटरसे टेक्सी मिल जाती है ...तो ये सफ़ेद हाथी मैं क्यों पालू ??ऊपर से जंगल की आगसे बढ़ते हुए पेट्रोल के दाम !!!!! बेंकसे लोन लेकर इसे ले तो ले पर फिर किश्तें चुकाते हमारे रोजमर्रा के कितने खर्चे पर कहाँ पर कटौती कर पाएंगे ???? अब तीन चार साल के बाद बेटी का ब्याह करना हो तो ये रकम काम आ सकती है ...

बस आज ऐसे सोचो की हमारी जरूरतकी ना हो पर शान के लिए कर्ज लेकर ये चीजें हम ख़ुशी ख़ुशी बसा लेते है उसकी सचमुच व्यवहारमें अहमियत है ????

ये सब बातोंसे मुझे एक फायदा जबरदस्त हुआ की हमें रात को सोते वक्त नींद की गोली नहीं लेनी पड़ती ...चैन और सुकून की नींद तुरंत आ ही जाती है .....

निष्कर्ष : दूसरोको देखकर नहीं पर अपनी जरूरत देखकर चलते है तो हम कई मुश्किलों से बच सकते है ....

30 जनवरी 2010

ये परीक्षा .......

आज शहीद दिवस है ..महात्मा गांधीजीकी मृत्यु जयंती ....

आज सुबह में अखबारके पिछले कोई पन्ने पर एक खबर पढ़ी तो दिल दहल गया मेरा ...एक आघात लगा ...अहमदाबादमें अठाईस जनवरी को तीन बच्चोने आत्महत्या की ...इसमें एक बच्चा सिर्फ सातवी कक्षामें पढता है ...शायद वर्तमान शिक्षण प्रथा की वेदी पर ये बलि चढ़ी है ...बहुत ही प्रसिध्ध फिल्म थ्री इडियटमें से ये युवा लोग ने बच्चे ने ये सिख ली ये सोच कर दिल दहल गया ....क्या जिंदगी अब शिक्षण संस्थाके दिए गए सच्चे जूठे ग्रेड की मोहताज हो गयी है ?????

आजकी मेरी ये पोस्ट आप अपनी पहचान के ऐसे लोगों को जरूर भेजे जिसके बच्चे बोर्डमें पढ़ाई करते है ...

२००६ में मेरी बेटी १० वी कक्षा में थी ...पढ़ाई में बिलकुल मामूली ...मैंने उसे कोचिंग क्लास में जाने को कहा तब उसका जवाब सुनकर मेरा दिल एक बार बैठ गया ...उसने कहा माँ तुम मुझे पढाओ ..,मुझे कोई क्लास करना नहीं है ...मैंने फिरसे दसवी कक्षा की सारी पुस्तकों को घर में बैठकर पढ़ा ...गणित और विज्ञानं के लिए मुझे निजी ट्यूशन लगाना पड़ा क्योंकि मुझे वो ज्यादा समजमें नहीं आता था ...बाकी के सारे विषय मैंने घर पर पढ़ने शुरू किये ...मैंने १९८५ में पढ़ाई छोड़ी तब के बाद ये पढ़ाना मेरे लिए एक चुनौती साबित हो रहा था ...पहली टेस्ट में उसके ४९ % आये ....पास तो हो गयी ...मेरे पड़ोस वाले मुझ पर हंसने लागे ..जहाँ पर लोग तीन से चार ट्यूशन लेते थे वहां पर मेरा ये पढ़ाना !!!!! दूसरी टेस्ट में ५२ % ....मेरी बेटी को मैंने कभी भी पढ़ाई के लिए या परसेंट के लिए कहा ही नहीं ...मैंने कहा बेटी ये बोर्ड की एक्साम ही जिंदगी का सही परिमाण नहीं है ...जितने भी तुम महापुरुष को देखोगी वो कभी बोर्ड के टोपर नहीं रहे ...औसत विद्यार्थी ही थे ...कई बार फ़ैल भी हुए थे ...बिलकुल डरना नहीं ...जितना आये उतना लिखना ...तुमने मेहनत की है तो जो भी परिणाम होंगे वो चलेंगे ....

गणित में वो काफी कमजोर थी ...विज्ञानं उसके पल्ले नहीं पड़ता था ...गणित से वो घबराती थी ...पर मैंने उसे दिलासा दिया बेटे २० पाठ मेंसे तुम्हे १० तो थोड़े बहुत आ ही जायेंगे ...पास तो हो ही जाओगी ...ना हो तो भी कोई बात नहीं ...और बोर्ड के पेपर छोटे से गाँव का सामान्य विद्यार्थी भी देता है तो उतने मुश्किल नहीं होते ...

उसकी पूरी नींद और भरपेट खाना उसका मैंने पूरा ध्यान रखा ...मैंने कभी उसे ये महसूस नहीं होने दिया की ये बड़ा तीर मारना है ...बिलकुल नोर्मल तरह से वो रेडियो सुनती और फ़िल्में भी देखती ....रात आठ बजे सोकर रात दो या ढाई बजे जागती ...और बादमे रात में नींद पूरी करके तीन घंटे पढ़ाई करके फिर दो घंटे सो जाती ....जब बोर्ड का रिजल्ट आया तब वो बिलकुल निश्चिन्त थी ..पर मैं काफी घबरा रही थी ....उसके ६९% आये ...

और उसने गणित में सबसे ज्यादा नंबर पाए थे ...उसने अपने डर पर विजय पा लिया था ...जब बारहवी कक्षा के बोर्ड के एक्साम थे तब हम उसे पंद्रह दिन पहले ही के कोमेडी फिल्म देखने सिनेमा होल ले गए ...उसके पास रहे उसे एक पल के लिए भी कोई तनाव में नहीं पाया .....बारहवी कक्षा में वो ४९% वाली बच्ची ने ७३% मार्क्स पाए तब मुझ पर हंसने वाले लोगो की जुबान बंद हो गयी ...

फिर उसकी पसंद की लाइनमें उसने आगे पढ़ाई शुरू की और अब वो खुद ही लगन से अभ्यास करती है ....

आशा है की अपने बच्चेके प्रति हम माँ बाप की ये मनोवैज्ञानिक फ़र्ज़ है जो हमें बखूबी निभाकर ऐसे हादसे होने से रोकने होंगे ....

29 जनवरी 2010

एक सुबह ऐसी भी ....

कभी कभी हम रोजमर्रा की जिंदगी मशीन की तरह जीने से बोर होते है पर हमें फिर उसी ढर्रेमें मजबूरीमें चलना पड़ता है ...और ये सिर्फ हमारी नहीं हर इंसान जो आजके युग में सांस लेता है सबकी ही है ...लेकिन अगर थोडा नजरिया बदले तो मुश्किल भी आसान बन जाती है ....

बस ये कल ही मेरे साथ हुआ ....

मेरी बेटी को कोलेज जल्दी जाना था ..सारा घर का काम छोड़कर उसे कोलेज ले गयी ...मेरी काम वाली भी तब तक नहीं आई थी वो भी एक चिंता ...!!!वैसे तो अपना टू व्हीलर स्टार्ट करने से पहले ही मैं पेट्रोल चेक कर लेती हूँ पर कल जल्दी में नहीं किया ...कोलेज से लौटते वक्त आधे रस्ते में पेट्रोल ख़त्म हो गया ...अपने पर्स में पेट्रोल जितने पैसे ही पाए ...अब रिक्क्षा करके घर जाना भी शायद मुमकिन नहीं था ....थोडा सा खिंचकर ले जाए तो पेट्रोल पम्प पास ही था मैंने गाडी खींचकर ले जाना शुरू किया ...सारे वेहिकल तेज रफ़्तार से दौड़ रहे थे ...सबकी नज़र सिर्फ आगे के रस्ते पर ही ...मुझे एक लड़का मिला अपनी मोटर साइकिल ठीक कर रहा था ...आगे एक पुल पड़ता था वहां पर एक सुमो गाडी का ड्राईवर अपनी गाडी के साथ उधेड़बुन कर रहा था फिर मोबाइल मिला रहा था ...कुछ बन्दे रोंग साइडसे आ रहे थे ...तब मेरे जहन में एक गाना चल रहा था :

बहती हवा सा था वो ,उड़ती पतंग सा था वो ,

कहाँ गया उसे ढूंढो ...

हेवी ट्राफिकमें जैसे तैसे रोड क्रोस किया ..पेट्रोल पम्प के बाहर ही एक बड़ा सा होर्डिंग लगा था ...थ्री इडियट फिल्म का ...आमिर और करीना स्कूटी पर बैठे ...आल इज्ज़ वेल कहते हुए ....मुझे वो देखकर ही जोरों की हँसी आ गयी ...

बस यूँही कितनी भी देर हो रही थी उसकी चिंता छोड़कर इतने सारे मिनट मैंने हर लम्हे को जी भर के जी लिया ...दौड़ती जिंदगी में रुकी सी मेरी जिंदगी मुझे एक बेहतरीन ताज़गी दे गयी ...मुझे ये फ़िक्र नहीं थी की कोई देखेगा तो क्या कहेगा ....

बहुत आम यानी की मेंगो पीपल की बात है ...पर शायद ऐसे बेतुके पलोंको भी जी भर के जी लेना इसी का नाम जिंदगी है .....लाखो पल ऐसे आते है सभी की जिंदगी में पर ऐसे कुछ पल को चुरा लो ...

अपनी गाडी का पंक्चर बनवाते वक्त वहां बस सड़क को देखो ...उस मेकेनिक का काम देखो ...वहां पर जो घट रहा है उस नज़ारे को देखो ...

सच कहूँ कल ऐसी भी कल्पना आ गयी की ऐसा गर रिमजिम गिरती बारिश के वक्त होता तो शायद मैं आधे घंटे तक यूँही ये नज़ारे को देखती रहती ...

28 जनवरी 2010

नज़र नज़र से

शब्द नि:शब्द थे

नज़र नज़र को ढूंढ रही थी

जिसका नज़रको था इंतज़ार आखिर वो मिल ही गयी

बस थोडा ये हुआ

वो हमें नज़रसे नहीं अँगुलियोंके स्पर्श थे देख रही ....

दिल को एहसास ना स्पर्श का गुलाम है ना नज़र का

दिल की धड़कन पनपते प्यार की गवाह होती है ...

27 जनवरी 2010

सपनो का घर

कल जहाँ टूटे थे सपने मेरे

किरचें बन सरेराह बिखरे हुए ,

वहां कुछ अरसे बाद फूल उगे नज़र आने लगे

हवाओंमें खुशबू ये संदेस लाये है ....

गर फूलोंके लिए है ये मंज़र जरूरी पनपनेके लिए

हम रोजमर्रा अपने सपने तोड़ यूँ राहोंमें बिखेरे जायेंगे ......

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चंद रूपों में बिकते नज़र आये कफ़न

कब्र को भी इंतज़ार अरमानोंकी लाश का .....

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ये आलिशान इमारतको लोग मेरा मकान कहते है ,

ना जाने कोई नींवमें उसकी मेरे सपने दफ़न है .....

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26 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस मुबारक हो

गणतंत्र दिवस की सभी भारतीयों को हार्दिक शुभकामनायें ....

देशकी तरक्की में हर भारतीय का योगदान हो ...

हरियाली हो मेरे देशकी जमीं और साफ़ नीला आसमां हो ...

सांस लेने हो साफ़ हवाएं और पिने मिले शुध्ध जल हमें ....

हर भारतीय के पास पढ़ेलिखे होने का विश्वास हो ....

दूर हो भ्रष्टाचार के काले बादल और स्वच्छ शासनकी अब आस हो ....

25 जनवरी 2010

भगवानने किया मजाक एक ....

एक दिन भगवान को भी एक अच्छा मजाक सुझा...
इंसान को पुतला बना दिया और ??!!
पेड़ पौधोंको चलता फिरता कर दिया ...
देखो देखो उस दिन क्या मजा आये है ....
पेड़ पौधे भी सुख दुःख अपने दिन पुरे बतियाये है ....
आम और नीम मोटरसाइकिल पर होकर सवार मुंबई घुमने जाए है ....
हाथी के दो जुंड प्लेन को पीठ रख कर पालतू जानवरों को
प्लेन की मुफ्त में सवारी कराकर जंगल दर्शन करवाए है ...
ऐ देखो ये नटखट नारियली कैसे हिमालयका पहाड़ देखने जाए है ....
बर्फ के गोले बनाकर नारियल में छुपाये जाए है ....
वो हिमालय के पेड़ भी है बड़े शैतान ,
दरिया किनारे जाकर रेत में घर बनाये है ....
खजुरी का पेड़ भी कम थोड़े है ही है ...
वो गंगा स्नान करके पुन्य कमाने अलाहाबाद को आये है ....
ये छोटे छोटे पेड़ोंके ट्राफिक पुलिस बने है शेर और फिर
देखो गधों कुत्तोंसे कहकर शहर के सारे वाहनके पहियों में छेद बनाये है ....
ए ले इंसान तु भी चख मजा कहकर
पुतले इन्सानको खुजली का पेड़ गुदगुदी करे जाए है ....
भगवान को भी अपनी ये लीला खूब सुहाए है ....
अवार्ड देने हमें कल खुद हमरे पास वो आये है ....
सबने हमें थेंक यु कह कर हमें ताड़ की फली भी खिलाये है ...

24 जनवरी 2010

सेकंड हैण्ड एस एम् एस

आप ...

हाँ ..आप ही

आवारा कुत्ते

गटरके सुवर

नाली के कीड़े

गली के गोबर

मलेरिया के मच्छर

........से दूर रहना

वर्ना बीमार पड़ जाओगे .....!!!!!

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दो बार लिप्स पर

दो बार गाल पर

एक बार माथे पर

दो बार आँखों पर

...................कोल्ड क्रीम लगाना मत भूल जाना ....

विंटर चल रहा है ......

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बनता ने फोन लगाया ....

बनता : हेलो कौन है ?

सामने से : मैं गीता ,आप कौन ?

बनता : जी मैं गुरु ग्रन्थ साहब ....

दोबारा फोन जोड़ा >॥

बनता : हेलो जी आप कौन ?

सामने से : जी मैं सीता ....

बनता : सोरी जी रोंग नंबर मैं चंडीगढ़ लगा रहा था जी

पर अयोध्या लग गया ....

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फ्री है ? नीचे देखो ...

...

...

...

....

....

...

...

अभी फ्री हो तो ऊपर देखो ....

ये तो जस्ट टाइम पास जी ....

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23 जनवरी 2010

ये दिल भी ना ....

देखो -टटोला फिर भी आज नहीं मिला ,

कमबखत ये दिलवा भी आज जिसम छोड़ कहाँ चल दिया ....

इधर ढूंढें उधर ढूंढें फिर सोचा क्या ये भी अपने ससुराल गया ????

तभी चटखनी खटकी और दरवाजा खुला .....

वो हमें हाथमें एक चिठ्ठी थमा कर चली गयी ,

हाथमें हमें हमारी अपनी ही दवात छोड़ गयी ....

उस दवात में हमें धड़कने की आवाज आने लगी ,

ये लो ढूंढ रहे थे बड़ी सुबह ये दिल भी दवातमें कैद था ,

देखो उनके छूते ही ये दवात को धड़काने लगा .....

22 जनवरी 2010

खिड़की का टुटा कांच ....

आज एक बेगानासा हो गया था

वो एक लिफाफा मिला ,

लिफाफेके अन्दर गुजरा हुआ जमाना मिला ,

अन्दरसे निकला एक ख़त पहचाना सा

उसके हर अल्फाज़में बचपनका सुनहरा फ़साना मिला .....

बहुत सादे शब्द थे और बहुत कम पंक्तियाँ थी लिखी उस पर

पर मुझे कागज़ के पश्चादभूमें उसका चेहरा मिला ,

खिड़की का कांच तोड़कर डाली थी चिठ्ठी पत्थरके साथ बांध

उसकी महबूबाको हमने मिलकर ,

आज उसकी और हमारी भाभी बनी महबूबाकी बेटी की शादी का न्यौता था

पर हमें तो उस ख़तमें ख़ुशीकी अश्क उसकी आँखमें

सरकते हमारे चेहरे से ये धुंधला मंज़र गिला सिला हुआ मिला ....

21 जनवरी 2010

नज़रों का कुसूर ....

जजबातोंको लौ को जलते रहने दो

तुम्हारे जिन्दा होने का सबूत है वह

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ना पास आओ इतने की हमारे

जो बंध रहे है तार हमारे दिलोंके दरम्यां

बस उलजकर रह जाए ...

ना दूर जाओ इतने हमसे की

हमारी नज़रों के दरम्यां के ये

तार यूँ चटख कर टूट जाए ....

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ये लम्होंकी सौगाद है ये ख़ामोशी ,

दिलकी सदाओंसे इसे बहला दो .....

जुकी हुई नज़रको उठाकर

हम पर एक बार निगाहें करम कर दो ......

20 जनवरी 2010

रौनके लगी थी

एक पेड़की ठूंठ पर एक छोटे से पत्तेने सदा दी

जिंदगीका गला खुद घोंटनेके लिए जो फंदा बनाया था

उस निराश आदमने ,

रस्सा ले वापस लौट गया .....

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उम्मीदके उजालेकी प्रतीक्षामें

पिछले पहर आँख लग गयी ,

नींद खुली तो शाम फिर ढलने लगी थी ....

सूरजने कुछ रौशनी दे दी थी ,

जहनमें नए ख्याल की रौनकें लगी थी ......

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इब्तदा करने का इंतज़ार ना कर जानम ,

तेरे क़दमों को हरारत दे दे ,

इंतज़ारकी इन्तेहाँ खुद ब खुद

मंजिल पर मिल जानी है .......

19 जनवरी 2010

बिना कोई मिलावट ....

फूलोंसे खेलते हुए कुछ अनमना हुआ है मन ,

चलो इन काँटोंको चुनकर हथेली सजा लेते है ,

खूंकी बूंद भी चमक जाए उस पर तो

हाथों पर कुछ लालिमा आ जाएगी .....

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तेरी मांग सितारोंसे भरने का वादा ना कर पाउँगा ,

जमीं का एक अदनासा इंसान हूँ ,

तुमसे बस प्यार कर पाऊंगा ,

बिना कोई मिलावट किये ....

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तुम्हें यकीं ना होगा मेरी मोहब्बत पर

कुछ गिला नहीं ,

हर दिलकी किस्मत

मिलनेकी रेखा हाथ में लिए नहीं आती ये हम जानते है ......

18 जनवरी 2010

रश्क था हमें भी

धुलसी उड़ाती हवाओंसे बचपनसे जवानी चुराकर लाते है ,

आँखों आँखोंमें सपने देखते हुए ये भी कट जाती है ,

खुबसूरत लम्होंको बांधकर दामनसे

यूँ ही एक उम्र कट जाती है .........

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रश्क करते थे दोस्ती पर अपनी ,

तुम्हे दोस्त कहते हुए गुरुर आ जाता था ,

बस रहे गये तनहा हम ये दास्ताँ बयां करने ,

हमारी मौतको तुम खुद पर ले गए ....

17 जनवरी 2010

लिख ना पाए तक़दीर ....

आज तक़दीरने मेरे हाथोंमें कलम दवात थमा दी

कहा लिख ले अपनी किस्मत खुद ही खुद को आजमाकर ,

लिखती गयी मिटाती गयी ,

कागज़ कोरा ही कर दिया फिर सुपुर्द उसके ,

गर जान लुंगी खुद तक़दीर तो जीने का मज़ा खत्म हो जाएगा ,

तु लिखती जा मुझे बिन बताये जो भी लिख सके.....

कुछ तु अजमा ले हमको कुछ हम तुम्हे भी आजमाएंगे ....

16 जनवरी 2010

आओ प्रोफेशनल से इंसान बने ...

पिछले तीन दिनोंमें त्यौहार का माहौल रहा ..सबने जमकर मज़ा भी किया ...कुछ नहीं तो घरमें बैठकर आराम तो जरूर किया ...पर कुछ चीजोंने मुझे एक बात सोचने पर मजबूर कर दिया ...

छोटी थी तब दीवाली के दिनों में ही छोटे बच्चे पतंग उड़ाना शुरू कर देते थे ...अब सिर्फ दो ही दिन ....बच्चे थोड़े तीन चार दिन पहले ...क्यों ???इस क्यों का जवाब हमारे पास है पर हमारे विचारमें ये बिलकुल प्रेक्टिकल नहीं है इस लिए अनदेखा कर दिया गया है ....

हम अब प्रोफेशनल हो गए है ...प्रोफेशनल लेखक ,अदाकार ,मेनेजर , उद्योगपति , नौकरी करने वाला हर व्यक्ति जो उपरी बैठक को सजाता है और हाथ नीचे काम करने वालोंसे भी यही अपेक्षा करते है ...जहाँ पर इमोशनल होनेवाला कभी कभी ही सफल हो पता है ..प्रोफेशनल होने से रुपयेके पेड़ से अधिक फल मिल जाते है ....

उदहारण देती हूँ :

कंपनीने ऑफिस के काम से तीन महीने अमेरिका भेजा ...दिवाली का त्यौहार आ रहा है ...पर इस त्यौहार पर घर के व्यक्ति का दूर होना अखरता हो जरूर है पर पैसे और अनगिनत शोपिंग का नशा ये गम भुला देता है ....ना जाने वाले को गम है ना घर पर अकेले रहने वाले को ...अगर पत्नी या पति इस बारे में फ़रियाद करें तो येही जवाब होता है तरक्की के लिए ये सब करना ही पड़ता है वर्ना पीछे रह जायेंगे ...

बोलो किससे पीछे रहोगे ? अपने आप से ये छलावा ये प्रोफेशनालिस्मकी भेंट है ....जिंदगी की छोटी छोटी खुशियाँ हमसे छिनकर ये बड़े बड़े सपने दिखता है और हमें खुद से ही बेगाना कर देता है ...बड़ी पगार के बाद बड़ी रेस्टोरंट में काँटा छुरी पकड़कर खाने से शान तो बढती है पर ठेले पर पानी पूरी चटकारे लेकर खाने की मजा है वो छीन जाती है ...पेट तो भरता है पर संतुष्टि नहीं मिल पाती ...और मजे की बात तो ये है की हमें इस बात का एहसास भी हमें नहीं होता ....नौकरी करने वाली माँ के बच्चे का पहला कदम भरना और माँ की उस बात की साक्षी रहना ......शायद अब मुमकिन नहीं ...और ये बातें हमें खुश नहीं रहने देती और जब ये बातों से दिल भर जाता है तब सोचो ये जो रोग है वो दिल की बीमारी से जुड़े और मधुमेह वगैरह ..जो स्टेटस सिम्बल के लिस्ट में नजर आते है वो हमारे किरायेदार बन जाते है जो मकान खाली करते ही नहीं .......

कल शाम वासी उत्तरायण थी, हमारे अपार्टमेन्ट में रहने वाले कुछ "बड़े" लोग ऊपर छत पर तशरीफ़ ले आये ...और एक दुसरे से जैसे कोई जान पहचान भी ना हो इस तरह का बर्ताव भी देखा गया ....मैं अपने घर लौट गयी क्योंकि ऐसे पंचायत करने वाले लोगोंकी फितरत मालूम है ...जो आकाशमें पतंग नहीं देखते पर एक दुसरे को झूठी तारीफों से बहलाते है और जो हाजिर ना हो उसकी पतंग काटने लगते है .....अरे भाई इसकी जगह भले किसी और की पतंग कटी हो पर उस पर जोरों से चिल्लाते हुए ,बिगुल बजाते हुए आनंद लो ...सच बच्चे बनकर देखो ...ये आनंद आपके कोई क्रेडिट या डेबिट कार्ड पर नहीं मिलता ....

मैं नीचे लौटी ..पतंग तो उडानी आती नहीं पर मेरी छत पर आई एक बहुत बड़ी पतंग को खिड़की में टांग दिया ...और रात में कंदील को भी ऐसी ही बाँध दिया ...एक फटी पतंगका तीर कमान बनाकर एक छोटी बच्ची के साथ खेली ...सच बहुत मज़ा आया .....

कभी कभी पैसेकी जगह ख़ुशी की अहमियत समजने का वक्त आ चूका है ....संचार माध्यम को चलाने वाले लोग भी इंसान ही होते है उनको एक दिन छुट्टी दे दो ....उनकी दुआ आपको तरक्की देगी ....प्रोफेशनल बनने से पहले इंसान बनो ....येही गुजारिश है ...

15 जनवरी 2010

इल्तजा अय खुदा तुझसे आज ...

अय खुदा उसकी जिंदगीमें ख़ुशी की रौशनी दे दे ,

मेरी ये दुआ कुबूल कर ली खुदाने भी ,

चुपके से कहा तेरी एक ख़ुशी को कुर्बान करनी होगी ,

जाँ हाज़िर है अय खुदा तेरे दीदार तो हो जायेंगे....

अय खुदा फिर पता चल ही गया

मुझे भी तेरे दस्तूर का ........

तेरे खजानेमें भी कमी है खुशियों की हमारी तरह ही

तब ही तुझे भी किसीको ख़ुशी देने के लिए

किसी को ग़मों के हवाले करना पड़ता होगा .....

तु तो दयालु है बड़ा यकीं है मुझे तुझ पर

ये करते वक्त तु भी एक बूंद आंसू का लिए रोया होगा ........

14 जनवरी 2010

जश्नकी तलाश ...

शामका बहेका बहेका सा मौसम था ही ,

बिलकुल बर्फसे सिली हवाओंका दौर था ,

ना हुआ था कभी फिर भी आज

उत्तरायणके दिन हवाओं का जोर था ....

पतंग को घसीटके ले जाती थी अपने संग

और उँगलियों पर खून के निशाँ भी बना देती थी मांजे के संग ....

मेरी नज़र का पेच लड़ा उस वक्त एक पेड़से ,

अरे कितने सारे लाल हारे नीले पीले पतंगों का मुकुट सजाकर

इतरा रहे थे जनाब !!!

कहे रहे थे देखो जनाब हम भी जश्न मनाते है तुम्हारे संग

घोंसलों में कैदी परिंदे आज के दिन उनको पतंग देते है

और बहलाते है ,सहलाते है कटे पंखो के दर्दको भी .....

दिवाली तो नहीं थी फिर भी रोशन हो रहा पूरा आकाश

जैसे रात को भी थी आज एक जश्न की तलाश .....

13 जनवरी 2010

उत्तरायण ....

देखो ये पतंग में इस साल कितने चेहरे नज़र आते है ?

महेंगाई बनी है पतंग हरदम ऊँचे बढे जाती है ....

भ्रष्टाचार बढ़ रहा है ना कट रहा है उसका पतंग ...

गरीबोंको नसीब हुआ है सिर्फ देखकर खुश होना इस उत्तरायणको ,

लूंटे धागेसे पकड़ी पतंगसे दिल बहला पाने की ये जंग .....

कौभांड़ोकी भरमार मची है हर एक पतंग एक से बढ़कर एक है

ये है भारत का राजकारण ....

ये सोच रही हूँ बैठकर किचनमें चलो चिक्की की तस्वीर उतार लो ,

उन्धिया और जिलेबी का वीडियो बना लो

कल जो महेंगाई के मारे ये भी ना बना पाए कभी

तो इन तस्वीरों से मन बहलाएँगे ...

कोई ऐसा मांजा सुतवा कर लाओ

पतंग बनाकर इन भ्रष्ट राजसेवकों की

उसे सब मिलकर काटो ..........

12 जनवरी 2010

लुकाछिपी .......

शब्द आज लुका छिपी खेल रहे है ,

कलमकी नोक पर नजर आते है

और उठाते ही कलम वापस कहीं छुप जाते है ....

ये नटखट हवाएं भी वो कोरा कागज़ उड़ाकर ले जाती है ,

पता नहीं ये पुरवैया भी अपने संग उसे क्यों उडाती है ,

लिखी होती है उस पर भी कुछ अफ़सानेसी दास्ताने

रुक जाती तो पढ़ लेते उसे

और हमें भी अपने गुमशुदा शब्दों के पते ठिकाने मिल जाते ......

11 जनवरी 2010

चलेंगे साथ मिलकर ...

जब आओ ख्वाबों में रात को

चलेंगे सैर पर साथ ही

तुम चप्पल पहनकर ही आया करो ...

रोज दरवज्जेसे मेरे पिताजी की चप्पल ना चुराया करो ....

नंगे पैर राहों पर चलने का मजा भी चख लो जारा ......

कांटे चुभेंगे पाँवमें और पहले से आदत तो हो जाएगी ,

समज लेना ये तो सिर्फ ट्रेलर ही है ,

पूरी बनेगी जब बाद में शादी के फिल्लम ,

तो घावसे पहचान तो हो ही जाएगी ......

10 जनवरी 2010

मेरे महबूब ,मेरे दोस्त .....

आज फिर वही सुबह ,

आज वही पुराना मंज़र !!!

चलते चलते रुकते कदम

मूड मूड कर पीछे देखती निगाहें

जाने हो किसीके आने का इंतज़ार बेसब्रीसे ,

फिर भी ऐतबार भी शायद ना आये फिर .....

जिसका हम इंतज़ार कर रहे ,

सब्र का पयमाना छलकाए ,

आँखोंको राहों पर अपलक टिकाये

हर वक्त सोचके जहाँमें यादों को फिर फिरसे सहलाए ,

शमासे उठती लौ में उसके चेहरे को उजागर पाए ,

बुझती शमाके आखरी बूंदको अपनी आँखोंमें छलकाए ,

एक बार मुआफ करदे ...

दस्तक देते जाओ हमारी जिंदगीकी किवाड़ पर

हमें जीने की वजह देते जा ...

मेरे महबूब ,मेरे दोस्त ....

8 जनवरी 2010

पा ......

एक औरत जुडी रहती है हर इंसानके जीवनमें किसी भी रूप में ...

कल फिर एक फिल्म देखी ...पा ..अमिताभ बच्चन की प्रोजेरिया पर आधारित बहुचर्चित फिल्म ..फिल्म में अमिताभ थे तो एक चीज पर शायद ही किसीने गौर किया होगा ..एक किरदार उसमे और भी था ...विद्या बालन की मा का किरदार ...

औरत क्या है और उसका रुतबा क्या है और ये हासिल करने में एक औरत कितनी अहम् हो सकती है उसकी मैंने कहीं पर चर्चा नहीं पढ़ी या सुनी ...थोडा दुःख हुआ इस बात को लेकर ॥

विद्या बालन बिन ब्याही माँ बनने जा रही होती है ..जब पता चलता है उसके बॉय फ्रेंडको तो चिलाचालू संवाद भी सुनने मिले ..पर जब उसकी माँ के सामने वह रोती है तो माँ एक ही सवाल उसको चार बार पूछती है :

"क्या तुम इस बच्चे को जन्म देना चाहती हो ?" बेटी सब मुश्किलोंको बारी बारी कहती जाती है ,कहती है की इस बच्चेकी वह अकेले ही कैसे परवरिश कर पायेगी जब की उसकी तीन साल की पढ़ाई भी अधूरी है ...और वह सिर्फ येही सवाल दोहराती है ....

उसके बाद का जो उस माँ का जवाब है वह काबिले तारीफ था ....

" बेटी जब तु सिर्फ दो साल की थी तब तेरे पिताजी का देहांत हो गया था और मैंने तुझे अकेले ही पाला था और डॉक्टर भी बनाया ...और तेरे साथ तो मैं हूँ ...ये बच्चे को हम दोनों पालेंगे ..."

और एक औरत एक सशक्त सहारा बनकर बेटी के साथ खड़ी होती है और उसके सपने को पूरा भी कर देती है ...औरो उसे बम कहता था ...माँ से ज्यादा उसे नानी माँ समज सकती थी ...जब किसी औरत का देहांत छोटी उम्र में होता है तो आदमी किसी भी कारण बता कर दूसरी शादी कर ही लेता है चाहे वो बुढापेमें अकेलापन ही क्यों ना हो ...पर अब तक तो देखा गया है की औरतने हर मुसीबत झेल कर ना सिर्फ फिल्म में पर वास्तविक जीवन में अकेले ही जीवन बिताने की क्षमता रखी है ...अब जमाना बदल रहा है ...शादी के बाद रिश्तो को निभाना भी आधुनिक औरत की सहनशीलतासे परे होता जा रहा है ...आधुनिकता ने कई परिमाण बदले है ...तलाक कोई शर्मनाक घटना नहीं गिनी जाती ...लेकिन फिर भी अगर एक औरत औरत के साथ खड़ी हो तो आधी मुश्किलें तो वैसे ही हल हो सकती है ...

आज बलात्कार हो या और किसी समस्या से कोई औरत जूझ रही हो तब सबसे ज्यादा फिटकार उस पर औरत ही बरसाती है ...काश एक माँ खास करके भारतीय माँ , जो अपनी दूसरी बेटी के जनम पर मिठाई बाँटने की पहल कर पायेगी उस दिन सचमुच ये दुनिया का इतिहास बदलने की और ये पहला कदम होगा ...

फिल्म देखी अच्छी मूवी थी ..पुरे हाल में पुरे पचहत्तर लोग भी नहीं थे ...और उसमे लोगोने प्रोजेरिया से पीड़ित अमिताभ के किरदार को ज्यादा सराहा है ..अगर संवेदनशील फिल्म देखनी पसंद हो तो जरूर देखें ...ऐसी फिल्म जब देखते है तब लगता है :

दुनिया में कितना गम है ....

मेरा गम कितना कम है ...

7 जनवरी 2010

नो कोमेंट ....
















चुप्पी ...

चुप था सूरज

चुप था रातको चाँद भी

चुप थी वादियाँ

चुप थी ये मयकशी सी शाम ,

बस आज की शाम बहुत कुछ बोल गयी

यूँ ही खामोश रहकर ....

इंतज़ार जिसका रहा हर पल हमें ,

प्यारके इजहार भरी नजरकी जो हसरत पल रही थी दिलमें

ख़ामोशीके आलमकी बहती हवामें हमें वो मिल गयी ...

6 जनवरी 2010

उलझन .....

क्या प्यार करने की उम्र होती है कभी ?

हाँ हाँ ये तो कच्ची उम्र के नाबालिग लोगोका काम है ,

ये कौन बोला ? इस प्यारी सुबहके धुंधमें ?

ये तो जरूर कोई दिलजले का काम है ....

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जिससे प्यार किया दिलोजानसे वो तो हमें मिले नहीं ...

पर प्यार को जाना हमने जब हमको प्यार हो गया

उनसे जो हमें ही दिलोजान से चाहा करते है .....

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क्या सुबह सुबह में लोगो को उलझा दिया हमने ???

बस जिनकी ख़ुशी के लिए हँसते हँसते जान्निस्सार करने को जी चाहा ,

बस उम्र वही है जिसने प्यारकी परिभाषासे हमें मिलवा ही दिया ....

जो होता है जिंदगीमें एक बार ही वो पल से तार्रुफ़ करवा दिया ....

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5 जनवरी 2010

जुगनू ......

रात को जुगनूको ढूंढना था ,

मुझे क्या पता वो पत्तोके दरीचो पर आरामसे सोया था ,

ढूँढते हुए उसकी रौशनी पर पांव पड़ा ,

चीखा वो जुगनू मुझ पर अय अंधे ! दिखाई नहीं देता ?

आश्चर्यसे मैंने पूछा तुम भी सिख गए क्या इंसानोंकी भाषा ???

फिर रुक कर कहा मुझे उसने क्या करें

मोटर की हेड लाईट में हमारी रौशनी दब जाती है ,

होरन्न की आवाजमें कहाँ हमारी मरण चीख सुनाई देती है ???

बस इक्के दुक्के तुम जैसे कभी मिल जाते है

तो हम भी इन्सानोको उनकी भाषामें संदेस पहुंचा देते है ,

देखो ये जमीं ये धरती ये दुनिया सिर्फ तुम्हारी मिलकियत नाहीं ,

वसीयतमें ईश्वरने हमारे नाम भी की है कुछ भाग बंटाई .......

बस्ती खुद की बढ़ाते रहते हो और हमारी मिलकियत में घुस जाते हो ....

और फिर हम पर धौंस जमाते हो ?

याद रखो आप अकेले नहीं जी पाओगे

गर हम नहीं रहे तो नामोनिशान खुद का भी तुम खुद ही मिटाओगे ????

4 जनवरी 2010

थ्री इडियट : एक फिल्म समीक्षा ...

कल एक मूवी देखी जिसकी आज कल सबसे ज्यादा चर्चे है : थ्री इडियट ...

आमिरखान ,शरमन जोशी और माधवन की बेहतर अदाकारीने इस मूवी को इस सफलता एक बड़ी सफलता का स्वाद चखाया है .... हमारे देश की शिक्षण व्यवस्था पर एक करारा तमाचा मारा है इस कहानी ने ... वैसे देखे तो आमिर की फिल्म तारे ज़मीं का एक्सटेंशन ही है ये फिल्म ...जहाँ पर पहले एक बच्चे की कहानी थी तो यहाँ नौजवानों की जिन्हें अपनी पसंद की राह चुनने का हक़ या मौका नहीं दिया जाता है ...

नौजवानोंकी मस्ती भरी हुडदंग तो अच्छी ही है पर शिक्षण के साथ जुडी करुण वास्तविकता आँखों को गीला कर देती है । एक बेहतरीन प्रयोगशील युवक कुछ नया बनानेके चक्कर में आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है ...हाँ इस फिल्म के अंत में शरमन जोशी का केम्पस इंटरव्यू दिखाया है उसे ध्यान से सुनना ...सच ये लड़के का काम भी काबिले तारीफ ही है ...और फोटोग्राफर बनने के सपने संजोने वाला माधवन ..तीनो की बढ़िया केमेस्ट्री है ...और चिलाचालू समाज की तस्वीर जैसे साय्लेंसर और वायरस ...एक अच्छा मेसेज है हम माँ बाप हो या अब नोटों को छापने वाली मशीन बन गयी है वो शिक्षण संस्थाए ....

मैंने कितने सालों के बाद एक ऐसी मूवी देखी जो हाउस फुल थी और उसमे वही पुरानी सिटी बजाने का माहौल हो शोर और तालिया .......

पैसा वसूल फिल्म है .....दिमाग को लेकर जाओ और हंसो ...दोनों एक साथ .....

थ्री इडियट ......

3 जनवरी 2010

हम तुम तुम हम ......

मैं हूँ धरती ...

थक गयी पक गयी मैं भी एक से जीवन से ,

मैंने भी कमाल किया ,

कुछ अलग सा श्रृंगार किया ...

ओढ़ ली धुंधकी ओढ़नी और बादल का लहंगा पहना ,

बर्फकी कढाई किये दुशाले से अपना सर ढंका .....

और देखो मुझे भी कुछ दिन का सुकून तो मिला ....

ठण्डसे सिकुड़ते ये मानवका वाहन अब कुछ देर मौन हुआ ,

हवा में काले धुंएका फ़ैल जाना भी बंद हुआ ....

ठण्डमें सिकुड़ते मानव और जिव ठहर के बैठे अपने आशियाने में

चलो लम्बे अरसे के बाद अपनों के बीच कुछ चाय की चुस्की

उसके साथ खट्टी मीठी गपशप और प्यारी नोक झोक तो हुई .....

मैं भी खुश हूँ ...तुम भी खुश हुए ...

इस ठन्डे ठन्डे मौसममें चलो एक बार हम तुम और तुम हम हुए .....

2 जनवरी 2010

दिल पूछे है मेरा ....

ये कविता मेरी नहीं पर ये मेरे ईमेल के इनबोक्समें आई किसी की बेहतरीन रचना है ....मूलतः ये गुजराती रचना है जिसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है ....

दिल पूछे है मेरा

अरे कहाँ जा रही है तेरी डगर ????

ज़रा देख तु सामने नजर आ रही कबर !!!!!!!!!!!!

ना संभलता है कोई व्यवहार ,ना याद आता है कोई त्यौहार !!!

हो होली या दीपावली ,सब ऑफिसमें मनाया जाता है ....

ये सब तो ठीक है पर हद हो जाती है जब

मिलता है किसीकी शादी का न्यौता तो वहां पर

गोद्द भराईकी रस्म तक जाने का वक्त मिल पाता है ....

दिल पूछे है मेरा ,अय दोस्त तु कहाँ जाता है ??????

पांच आंकड़ेकी पाते हो पगार

पर पांच मिनट फुर्सतके अपने लिए कहाँ निकाल पाते हो ???

पत्नी का फोन तो काट देते हो दो ही मिनटमें ...

पर क्लायंट के फोन को कहाँ काटा जाता है ???

फोन बुक भरी है दोस्तोंकी लिस्ट से

पर किसीके घर कौन जा पाता है ???

अब तो घरमें आये ख़ुशी के मौकेको भी हाफ डे में मनाया जाता है ......

दिल पूछे है मेरा ,अय दोस्त तु कहाँ जाता है ???

कोई ना जाने ये रस्ते कहाँ तक जाते है ??

थके हारे है सभी फिर भी उस पर ये लोग बस चलते चले जाते है .....

किसीको सामने रुपैया तो किसीको डॉलर दिख जाते है ...

अब आप ही कहो दोस्त क्या इसे जिंदगी कहा जाता है ?????

दिल पूछे है मेरा ,अय दोस्त तु कहाँ जाता है ???

बदलते इस प्रवाहमें हमारे संस्कारकी गरिमा भी धुले जाती है ,

आने वाली पीढ़िया पूछेगी हमें

क्या येही संस्कृति कहलाती है ??????

एक बार तो दिल की सुन लो कभी

वर्ना ये मन तो हमेशा से दुविधामें घिरे रहता है

चलो जल्दी फैसला कर लो क्योंकि

मुझे तो अभी कुछ वक्त बाकी नजर आता है .....

दिल पूछे है मेरा

अरे कहाँ जा रही है तेरी डगर ???

जरा देख तु सामने नजर आ रही है कबर !!!!!

1 जनवरी 2010

हे भगवान ...!!!


"हे भगवान !
मेले मम्मी पापा को एक दिन के लिए छोटा बना दे औल मुझे बड़ी बना दो ..तो मैं भी उनको होम वल्क नहीं क्लने के लिए उनको भी पनिश कलूँगी औल उनको त्ठेलने के लिए मना कल दूंगी ....."

और ये मेरी प्रार्थना सब के लिए :

बस इन बच्चों का बचपन उनसे मत छिनिये ,उनको किताबोंके भारीभरकम बेगो से मत लादिये , उनको अपनी महत्वाकांक्षा की बली मत चढाओ , उन्हें शुध्ध पर्यावरण ,पौष्टिक खाना ,और खेलने खुलने और पनपने के लिए अवसर दे दीजिये इस नए दशक की शुरुआत येही कहती है .....

आमीन ...................!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!