30 अप्रैल 2010

गुजरात के पचास साल .....

आज दिल बहुत खुश है ...कल हमारा गुजरात राज्य अपनी पचासवी वर्षगांठ मना रहा है ...प्रगति के पथ पर उसकी पहचान दुनिया को मिल गयी है ...राजकीय बातों से परे उसकी प्रगति पर गुजराती होने के नाते मुझे गर्व है ....

मैं शाम को जब टहलने जाती हूँ तो इस सीज़नमें आम की लारी लेकर बैठी ग्रामीण औरत मोबाइल पर किसीसे बात कर रही थी ...झोंपड पट्टी में भी फ्रीज़ ,टीवी पाए जाते है ये सब समाजके निम्न स्तर तक पहुंचे है ये देखकर ही बहुत ख़ुशी होती है .....

मेरा गुजरात ही नहीं मेरा पूरा देश ऐसी तरक्की करे ये ही मनोकामना ......

28 अप्रैल 2010

चाँद ...

कल रात चौदवीका चाँद

गगनकी सैर को आया था ...

मेरी खिड़की के शीशे में ...

अपना अक्स देखकर वो भी इतराया था ....

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चांदके कागज़ पर सितारोंने एक नज़्म लिखी है ...

ना आये गर समज में हर किसीकी वो ...

उसे समजने बस एक नियामत खुदा से पानी है ,

बस इश्क हो जाए किसीसे तो वो खुद ब खुद समज आ जानी है ....

26 अप्रैल 2010

थको पको और बको ....

थको पको और बको ....

पेपर के पन्ने की दास्ताने ये कहे जाती है ...

कुछ नए की खोज करते है और मिलता नहीं ...

हमें बस ये यूँही पकाती है ....

भ्रष्टाचार की होड़ लगी है कौन जीतेगा मेच

ये बात तो हमें समज ना आती है ....

फिर पता चलता है यहाँ पर तो हर मेच फिक्स हो जाती है .......

जिस टीमके हारने गमने हमें पूरी रात रुलाया था ....

पता चल गया दुसरे दिन

उसके कप्तानने तो होटल में पूरी रात

हार के बाद भी सूरा और सुंदरी के बीच जश्न मनाया था ......

किसे प्यार करें किस पर ऐतबार करे ये जब समज ना आये

तो भैया एक काम कर जाओ अब इडियट बन जाओ

और ओल इज वेल गाओ ......

24 अप्रैल 2010

एक बूंद ...शबनम की ...

मेरे सपने मेरी बन गए प्यास ...

अधरोंसे लेकर मेरी हयात का

एक जर्रा जर्रा जल गया है उस तपिशसे

लागे मै जैसे बैसाखमें तपती धरती ....

सुलग रही हूँ कहीं एक बूंद बारिश मिल जाए ....

वो बूंद नितांत शुध्ध , ना स्वाद ,ना गंध ,ना रंग ,ना चुभन ,

बिना सिलवट का सरक रहा हो जैसे रेशम ....

वो पानी ...

वो पानी में छुपी है एक कशिश

बस वो शबनमकी बूंद

तेरी मुझे तलाश ...

घूंट घूंट बन मेरे अधरोंसे

मेरे जर्रे जर्रे में दरिया बनकर

समां जा ....समां जा ...समां जा ....

मेरे सुलगते सपनोकी प्यास

बुझा जा ...बुझा जा ...बुझा जा ....

22 अप्रैल 2010

एक ख्वाब था

एक ख्वाबगाह में सोयी थी एक राजकुमारी ,

एक सूरजकी हलकी किरणसे उसके गालों को सहला लिया था ,

वो चोरी चुपके से किया वो स्पर्श

मेरी जिंदगी का ख्वाब बनकर ठहरता रहा मेरे ख्वाबगाह में ......

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चंद पलोंके लिए तुम ठहर तो जाओ ,

मेरे दर पर तेरे पैरों के निशाँ है ,

सहेज के रख लेता हूँ अभी ...

क्या पता हवा ये निशाँ को कुछ हल्का ना कर दे

जब हम कल यहाँ फिर मिलने को आये ....

21 अप्रैल 2010

आह ..उफ़ ...

कथ्थई शाखों पर

फूट रहे है वो कोमल पत्ते हरेभरे .....

इंतज़ार उन काँटोंकी कमसिन आँखोंमें भी बसा है !!!

काला सा काजल बन नज़र आ जाता है ...

बस वो कलि के खिलने का ....

वो नाज़ुक कली लाल गुलाबकी ......

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पीली धुप पहनकर आता है सूरज भी

धरती का रंग करने तपते सोनेसा

उस तपिशमें तपकर देख तेरे गालों का रंग भी

हो जाता है जैसे कोई खिलता गुलाब ....

सुभान अल्लाह !!!!!माशा अल्लाह .....

19 अप्रैल 2010

एक सुनहरा नूर थी वो

काली झुल्फोंकी घटा ये लागे जैसे सावनके बादल ,

तेरी झील सी आँखोंमें नीले आकाश को देखते है हम ...

परी हो या हो कोई अप्सरा ये तो हम नहीं जानते ,

जबसे देखते उन्हें हमको दिनमें भी चांदनीकी सफेदी नज़र आये है ...

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सिंदूरी शाम जाते जाते एक पयगाम दे गई ,

मेरी रातकी नींदे तुम्हारे नाम कर गयी ......

18 अप्रैल 2010

रंगोंकी बात

चलो आज अँधेरे के दामन को कुछ देर छोड़कर कुछ रंगों की बात हो जाए ????हाँ मेरे पास अभी भी अँधेरेके कई रंग बाकी है मेरे दोस्त पर कुछ अब अलग भी सोच कर देखूं ???

अब कुछ "रंग "के तराने छेड़े जाएँ !!!!! और वो भी अन्दाजें बयां के अंतर्गत .....

एक बंद आँखने देखे थे सिर्फ दो ही रंग एक श्वेत और एक श्याम ,

देखो खुली आँख ही तो है जो मेघधनु को चुरा लायी है तुम्हारे नाम ......

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कहते है सात रंगके सपनोमें जीवन खो जाता है जैसे बहार ....

कौन बताये तुझे ओ मासूम महोब्बत की सिर्फ तेरे आने पर ही

ये जीवन रंगोसे है भर चला ......

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शर्मा जाना तेरे जानेमन हया की लाली छोड़ जाए इस चेहरे पर ....

तेरा वो जूठा गुस्सा भी लाल रंग खिला जाये इस तबस्सुम पर ...

बिरहा के काले बादल घिर आते है इस चाँद से चेहरे पर ....

मिलने पर तेरे बहार अनगिनत रंग छिड़क जाती है मिलन का रंग बनकर ....

16 अप्रैल 2010

दर्दे दिल ...

वाह !!!

जुड़ जाती है किस्मत किसीकी किसीकी जिंदगी के अंतसे भी

ये जाना हमने जब सुनी कहानी एक अँधेरे की

जब रोशनी का आलम समेटता है दामन खुदका

उसकी जिंदगीकी इब्तदा हो जाती है .....

खामोश है ये अँधेरा

जुबां पर कभी ना गिले है कोई ना कोई शिकवे .....

पर उसके कान खूब तेज पाए है हमने ...

हर आह्ट को बखूबी उजागर करते है बड़ी ख़ामोशीसे ....

शोरगुलसे बड़ा है परहेज इन अधेरों को

उसकी पनाहमें दर्द भी खुलकर पल जाते है ...

उसकी पनाहमें आंसू भी मुस्कुराना सीख जाते है ....

शायद उसे भी तलाश है किसीकी सदियोंसे

कहीं वो उजाले की छुपी हुई किरन तो नहीं ????

15 अप्रैल 2010

मुझे प्यारा तु फिर भी

एक नया सिलसिला है ये ...की किसी एक शब्द को ही लेकर मैं जितनी शायरी या कविता लिख सकूँ ये आजमाईश कर रही हूँ ...और ये मेरी खुद की परीक्षा है जो मैं खुद ही ले रही हूँ ....इस वक्त में अँधेरा शब्द चुनकर उस पर ही कुछ फरमा रही हूँ ...........................................
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अय अँधेरे क्यों बड़ा बदनाम तु ?
क्या निखरता चाँद और क्या जानते हम भी
क्या चीज है ये चांदनी या कितना है चाँद खुबसूरत ???
शुक्र गुजार है ये कायनात की खुद को बुझा तुने रोशन जहाँ किया ..........
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अय अँधेरे क्यों बड़ा बदनाम तु ?
कितने आंसू चुपचाप पोछ लेता है तु !!!!
कितने दर्द को अपने काले दामनमें छुपा लेता है !!!!
जो बिछड़ जाते है दिनमें इस दुनियाके मेलेमें
वो दिल तुम्हारे आँचलमें फिर एक बार मिल जाते है ......

12 अप्रैल 2010

एक चराग ....

एक अँधेरी रातके गहरे काले दामनको

चीर देती है एक किरण ये छोटे से चराग दी ....

अय चिराग बता दे खुदाने क्या की है तेरी उम्र दराज़ ???

चराग बोला हौले से :

कहाँ हमारी उम्र शुरू हुई है ?

पूछो जरा उस चिनगारीकी आतिशसे ...

कहाँ हुआ था इब्तदा इस सफ़र का ?

पूछो जरा उस बातीसे .....

इन्तेहाँकी घडी का इंतज़ार मुझे भी है ,

मेरा पूरा बदल झुलस जाता है जलकर ...

या तो वो एक तेज हवा का झोंका होगा ....

या इस तेल का आखरी जर्रा भी

जब मुझ पर अपना वजूद लूटा चूका होगा ........

11 अप्रैल 2010

सोये हुए से कुछ ख्वाब ...

अँधेरेकी आगोशमें लिपट कर

चुपकेसे कुछ अल्फाज़ सोये है

क्या पता उन्हें की

सोते हुए वो मासूम बच्चेसे दीखते है !!!!!

कुछ ख्वाब पलते होगे यूँ सोते हुए भी

पलकोंके तले कुछ हलचल भी नज़र आ जाती है ...

कुछ लम्हात गुदगुदी कर जाते होगे

नींदमें भी लबों पर एक मुस्कान झलक जाती है ....

कसक की टीस भी जवान होती है गर

चुपके से एक अश्क बनकर अनायास ही गालों पर बह जाती है ....

अँधेरे की आगोशमें लिपट कर

चुपकेसे जो अल्फाज़ सोये है

दिनके उजालोंमें वो कुछ कहनेसे शर्मा गये थे

एहसास उनके आज एक लड़ी में पिरोये है ....

10 अप्रैल 2010

परिवर्तन

पता नहीं इन दिनों खुद को हम खुली हवाके कैदी की तरह महसूस कर रहे है ...जैसे हमें एक ऊँची जगह पर रखा गया है .दुनियाभर की सहूलियत हमें मुहैया करा दी गयी है ...हम पूरी दुनिया को देख भी रहे है पर दुनिया और हमारे बीच एक कांच की दीवार है ...

ऐसी ही हालत हो जाती है जब घर में ऐसे हालात हो जाते है की सब अपने चरम कार्य में डूबे हो और हम बिलकुल निठ्ठले से बैठे रहे ...हाँ , परीक्षा का मौसम है तो संतान अपनी तैयारीमें मशरूफ है ...पतिदेव अपने कामकाजमें ...हम घर के काम के बाद कहीं आ जा भी नहीं सकते क्योंकि पास पड़ोस की कुछेक सहेली के वहां भी यही हाल ...और फोन पर बात और बक बक करना पसंद नहीं मुझे ...

ऐसे हालात को एक शुन्यवाकाश कह सकते है और मन हो जाता है कोरी पाटीसा ...कुछ सुझाता नहीं क्या नया लिखे ??पर शायद ये मन के मौसम का रिचार्ज होने का बहाना है ...उसे भी आराम चाहिए ..बस उसे खुला छोड़ देना ही बेहतर होगा ......आज कल इतने बेहतर आर्टिकल पढने में आ रहे है जैसे जिंदगी की छोटी और सीधी बातों की संजीवनी हाथ लगी हो ...नए विचारों का आयाम होता है तब ये एहसास भी होता है की हमारी कमियाँ कितनी है ???उसे दूर कैसे की जाय ???

खुदमें एक धीरी करवट लेता हुआ परिवर्तन महसूस होता है ..पहले रोज के पोस्ट देना होता था ...पर वो शायद मन को संतुष्टि दे या ना दे !!पर अब जब तक एक गहराई ना महसूस हो तब तक पोस्ट नहीं लिखती ...कहते है की आपको पॉँच पृष्ठ जितना लिखने के लिए पांचसौ हज़ार पृष्ठ पढना आवश्यक है ...तभी आप अपनी बात सीधे दिल तक उतार सकते है ...आपकी कलममें एक सच्चाई की छबि उभर सकती है ......

हमारे मन की शक्ति का एहसास होता है और उस शक्ति का उपयोग भी करना आ जाता है ...एक कहीं भटकी भटकी सी लगने वाली ये पोस्ट भी एक नए मोड़ का एहसास दिला जाती है .....

9 अप्रैल 2010

एक नयी दुनिया

टूटे दिलके टुकड़े समेट रहे थे हम

किरचोंने हाथ में लहू की मेंहदी रचा दी ...

जैसे एक अधूरी दुल्हनके अरमान हो सिसक रहे ...

बस वो तुम्हारा आना हुआ ...

शादीके जोड़ेमें ही हमारे पास ...

सारी दुनियाके हर बंधन तोड़कर

हमारे साथ एक नयी दुनिया बसानेकी हसरत लिए ....

वो टपकता लहू उसकी मांगमें ऐसे समाया

जैसे एक सुहागनकी मांग सजी सिन्दुरसे .....

7 अप्रैल 2010

यादों की वादियाँ

यादोंमें कैद बुलबुलके गाने
तरस गये उसके बोल को ...
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सतरंग चुनर यादोंकी
मैलीसी लागे जब दर्द की कसक जागे ...
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हर फूल खिल जाए मनके आँगन
जब कोई मेरी यादोंमें मुस्कुरा जाए हौले से ....
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बचपन फिर यादों के झरोखोंमें
मीठी मुस्कान बिखेर रहा पाया
एक झूले पर झूलते हुए हमने ...
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इश्क अभी भी ताज़ा महक लिए सहेज रखा है ,
मजबूर सही दूरीसे पर दूर नहीं तुम इस दिलसे ....
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6 अप्रैल 2010

एक कारवां यादों का भी ...

सितारोंसे भरी एक शामका पयमाना था ...

रातको घूँट घूँट कर पी रहे थे हम ...

मदहोशी बढती चली जाता है हर पहरके हर घूँट पर

दिल से भी एक कसक एक आह बुझी शमा की

उठती लौ सी चली जाती है ....

वक्त बे वक्त इस समांमें बंधकर खिंची चली आती है

बदहवासीकी बेनूरी लिए याद उनकी ही ......

बस जिसको भूलने के लिए मयखाने का रूख कर लिया था हमने

हर घूँटमें शराबके उनकी याद घूँट घूँट कर उभरती जाती है .....

4 अप्रैल 2010

शायद मैं ही .....

आज आ ही गए हो तो बस अब क्या गिला जिंदगीसे रहा ?

पर मेरा मन नहीं माना उसकी नम और सूझी हुई आँख ...

दास्ताँ कुछ और ही थी ....

तकियेका गिला पन अश्ककी खाराशका स्वाद लिए था ....

सलवटें चादरमें जागी रातोंमें करवटों का हिसाब दे रही थी ....

ये बिखरे हुए कागज़के टुकड़े जब संजोये हमने

सारा हाले दिल बयां था फुरकत के पलोंका ..........

एक खता कर दी हमने की

आनेमें कुछ देर ही कर दी ....

वर्ना ये गुजरे पलोंमें वो प्यार के बरसातकी शबनम

हमको भिगो देती बेखुदी लिए ...

वो पल सारे मेरी जिंदगीके घाटेके वही खाते में लिखे गए ....

3 अप्रैल 2010

एक कसक ...

कांच का पयमाना ये भी खाली था ,

पर तुम्हारी नज़रसे छलक गया ...

पीते रहे हम ,जीते रहे हम ,बस पीते ही गए ,

ना मय ख़त्म हो रही थी और ना ही जाम थक रहा था ...

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सितारों के आगोश में लिपट कर

औससे भीगी चादरों पर

सपनोंको पीने का मौसम है ये

बस एक ही डर है की कहीं प्यार ना हो जाए !!!!!!!!!!!

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नश्तर चुभोना हमारे दिल पर बेरहमीसे

एक हलकी सी मुस्कान छोड़ जाता है होठों पर

इस ख्यालसे भी की करीब होते हो आप हमारे

एक पल के लिए पर खुद के वजूदको हम आपसे जोड़ पाते है ...

2 अप्रैल 2010

तेरा आना ...

एक मुद्दत के बाद हम इस महफ़िलमें तशरीफ़ लाये है ...

महफ़िलमें इंतज़ारमें पिघल रही शम्मा को पाए है ...

इन मुरज़ाई कलीकी दास्तान भी हश्र हिजर का बयां कर जाती है ....

शायद इनकार कर दिया होगा उसने कुर्बतके समांमें खिलने से .....

आज इस मुरजाए चमनको फिर खिलाने की कोशिश कर ली जाए ....

अपने कलमके स्पर्शकी ताज़गीसे उसे फिर नहलाना है .....

1 अप्रैल 2010

आज आप ये मेनू ट्राई कर लो

आजा आजा हम चावल की रोटियां बना ले
आज दाल बनेगी गेंहू से और सब्जी से चावल बना ले ...
रोटी हम उड़द दाल से बना लें ...
छप्पनभोग में राजा रानी कुछ यूँ खायेंगे जी
हर मिठाई का एक टुकड़ा ले लो खीर से रोसोगुल्ला तक ...
कड़ी पत्तेसे राय जीरे का छोंका मर लो ...
उस पर डाल दो कुतरे हुए महीन प्याज,लहसून और अदरख भी आज ....
अब उसपर सेव और ढोकले का कुतरनसे गार्निश कर लो ...
एक बड़ी पिचकारी लेकर उसमे
लाल चटनी ,हरी चटनी और इमली की चटनी डाल कर
भिगो दो राज को भोग समज कर सजनी ...
अब ये सारी सामग्री मिक्स़रमें डाल कर महीन पीस लो ...
उसे रोटी पर लगाकर
तीनसौ पचास डिग्री पर ओवेन में साढ़े तीन घंटे तक पका लो ...
अब सामग्री को डीप फ्रिज में रखो
और तुम सबके साथ शाम को खा लो ....