6 जून 2009

दहलीज से लौट गए हम .....

आज रोजकी तरह फ़िर सुबहमें उस दोस्त के घर गया ,

खुली खिड़कीसे झाँखा अन्दर तो कुछ बदला सा पाया .....

खुली आँखोंसे वह छतको था ताक रहा ,

वह था तो जागा फ़िर भी दिल उसका था कहीं खोया सा ......

दो पल के लिए जब आँखें मूंदता तो लब जैसे यूँही उसके मुस्कुरा जाते ,

कोई ख़याल प्यारा सा नाम बनकर किसीका दिल के दरवाजे पर दस्तक दे जाते ....

अकेला था घरमें पर महसूस हुआ तनहा नहीं वह आज ,

ख्वाब वह सजा रहा था प्यारा सा ,चलो आज उसे बुलाना नहीं .......

उसे उसके सपनोंकी दुनिया के साथ बस यूँही तनहा ही छोड़ दिया ,

मैं भी हलके से मुस्कुराकर आज उसके घरके दहलीजसे ही मूड गया........

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