25 मार्च 2009

एक नायाब दुआ ....

आरजूमें जिसकी एक सितारोंसे भरी शाम होती है ,
जलवे उनके दीदारके होने पर जैसे एक नायाब दुआ कुबूल होती है .....
=========================================
चलो आज हम ही चलकर उनसे मिलने चले जाते है ,
रूठे लगते है ,कुछ खफासे भी लगते है ,आज उन्हें मनाकर आते है ....
============================================
मोमकी पिघलती बूंद बर्फसी जम गई शमा पर ही ,
पलकोंकी चिलमन उठते ही उनकी रोशन महफ़िल कर गई .....
=============================================
रेतके बादल बह कर हवामें समां ये धुआं धुआं कर चले ,
उभरी उसमें जो लकीरे कुछ जो हमें आपके चेहरे सी ही क्यों लगी ???
============================================

2 टिप्‍पणियां:

  1. मोमकी पिघलती बूंद बर्फसी जम गई शमा पर ही ,
    पलकोंकी चिलमन उठते ही उनकी रोशन महफ़िल कर गई
    waah gazab ki baat kahi,saare sher bahut sunder.

    उत्तर देंहटाएं
  2. very nice... i like poetry very much... visit my blog... u will like it.

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...