11 अप्रैल 2013

दो मासूम आँखे

कभी कभी दो मासूम आँखे
नमीसी जमी रहती है जिसमे ,
वो आँखे यूँ ही मुझे दिख जाया करती है ,
कुछ बिना अल्फाज को इस्तमाल किये
एक दास्ताँ बयां कर जाती है ..
कभी कभी दो मासूम आंखे यूँही नजर आ जाती है ...
उसकी आँखों में मुझे एक रोटी दिखती है ,
जो बुझे हुए चूल्हे की राख पर
सिकने के लिए तडपती मचलती ,
और वो खाली पड़ी थाली ,
आटा  मसलने को तडपती हुई ....
वो पानी का घड़ा जिसमे से
गरीबी के खरोचों के निशान लिए एक छेद  है ,
थोडा सा पानी भरकर लाता है ,
और प्यासके सामानसे भूख मिटानेकी
एक नाकाम कोशिश कर जाता है .....
वहां शादी के मंडपके प्रीती भोज के
वो भरे पेटकी दुहाई देती हुई
थालियोंमें छूटी हुई सामग्री ,
जब फेंकी जाती है बाहर ...
लगता है वो उन मासूम आँखोंकी
बस मजाक उडाती है ....

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बेहतरीन भावपूर्ण प्रस्तुति,आभार.

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  2. वाह! लाजवाब | अत्यंत सुन्दर कविता | नवरात्री और नव संवत्सर की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    उत्तर देंहटाएं

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