10 जनवरी 2012

बिन बादल

आज मौसम बड़ा बेईमान हो रहा है ,
लगता है इस वक्त भगवानका फ्रीज़र चला है ,
नब्ज़में मेरे अब दौड़ता लहू जम रहा है ,
और मैं कम्बलके भीतरसे ही कुछ कविता लिख रहा हूँ ....
ये स्याही जो कभी जमती नहीं ,
ये कलम है थोड़ी बेईमान भी ,
मेरे चाहते से भी रूकती नहीं ,
उसे सर्दी या गर्मी का कोई फर्क नहीं पड़ा कभी ,
ये तो वो बरसात है जो
बिन बादल भी हरदम फुहार बनती है ......

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