21 जून 2011

कुछ भीतर ...

सूरजसे लड़ लड़ कर थक चूका हूँ ,
पर राख नहीं हुआ अब तक ...
रोशनी जलाती रही तिल तिल कर ,
चांदनी मरहम बन सहलाती रही ...
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एक नज़्म ऐसे ही बन जाती है ,
एक खिली हुई सुबहमें उसकी हँसी गूंज जाती है ....
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तुम्हे प्यार करने का सबूत नहीं मेरे पास ,
जिन्दा सिर्फ तेरे लिए हूँ ये सबब काफी नहीं ???
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आधी अधूरीसी हो जाती है हर शाम ऐसे ,
सूरज के साथ मेरी परछाई भी सो जाती है ....
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तेरा प्यार आंसू पर भी नासूर बन उभरता गया .....
क्या करें दर्दे दिल की दवा ना पी क्योंकि तेरी फुरकतमें भी जीना रास आया .....

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