31 जुलाई 2010

आई एम् सॉरी

अमेरिकाके एक प्रायमरी स्कुलमें बच्चोके साथ हिलने मिलने गए ।
क्लासमें थोड़ी बातें बातें करने के बाद ओबामाने पूछा ,"किसीको कुछ पूछना है ?"
जॉन नामके लड़के ने पूछा :१...अमेरिकाने इराक पर हमला क्यों किया ?
२...जो बेंकने अबजों डॉलर के घोटाले किये उनको अमेरिकन सरकार क्यों मदद करती है ?
३....अमेरिका हमेशा पाकिस्तान की ही फेवर क्यों करता है ?????


ओबामा जवाब दे उससे पहले रिसेसका बेल बज गया ....बच्चे बाहर चले गए ....
रिसेसके बाद बच्चे वापस आये तब ओबामाने फिर पूछा : किसीको कुछ पूछना है ????
पिटर ने हाथ उठाया और पूछा : सिर्फ दो सवाल :
१....रिसेस का बेल बीस मिनट पहले ही क्यों बजाया गया ???
२...जॉन कहाँ है ????
===============================================================
एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट के एक एक उदहारण दीजिये .....
नातू ना कहा : सानिया और सोनिया ...
================================================================
जुबान चुप हो तो आंखे बोलती है
आंखे बंद हो तो साँसे बोलती है
साँसे बंद हो तो धड़कन बोलती है
और धड़कन बंद हो तो ??????...........................
तो डॉक्टर बोलते है आई एम् सॉरी ......

30 जुलाई 2010

तुम आओगे ना ?????

एक लम्बा अरसा हो गया तेरा दीदार किया था ,
एक मुद्दत तक मेरे दिलने तुझे चाहा था ,
उस बेकरारी में भी एक करार था ....
वो हकीकत थी या सिर्फ मेरे मन का वहम था ???
पर जो भी था बड़ा ही लाजवाब था ....
वो गली के नुक्कड़ पर तेरी झलक के लिए
घंटो बेवजह हम खड़े हो जाते थे ...
तेरा दीदार हमारे लिए दिन के वक्त में चांदनी का खुमार था .......
ये मुद्दत का हमें आज भी इंतज़ार है ...
आज भी तेरे लिए ही ये दिल इतना बेक़रार है .....
तुम आओगे ना ????

29 जुलाई 2010

एक तलाश

तलाश है जो पूरी नहीं होती
राह है जो ख़त्म नहीं होती
फिर भी तलाश ख़त्म नहीं होती
ये राह है जो पूरी नहीं होती ....
शायद जिंदगी का पहला पल
जिन्दा रखता है हमें यूँही
क्योंकि तलाश ख़त्म जिंदगी ख़त्म
राह पूरी और मंजिलें गुम .......

28 जुलाई 2010

ख़ामोशी ....एक लहर ...

दिल टूट गया ख़ामोशीसे
किरचे चुभी जब नंगे पाँवमें
लहू के कतरे बहे कुछ
तब जाकर पता
ना वजह पता चली
ना पता चला ये कौन तोड़कर चला गया ???
पर एक हलकी सी मुस्कान लहरा गयी
देखो कितने सारे दिल बिखरे है फर्श पर
जो कभी एक ही हुआ करते थे ...

27 जुलाई 2010

कहीं कोई ...

कहीं कोई खोया सा चाँद मेरे इंतज़ारमें है
कहीं कोई पहली किरण भी मेरे इंतज़ारमें है
कहीं एक सजे हुए हुस्नको भी सजदे का इंतज़ार है
कहीं कोई आशिककी नज़रें महबूबके लिए बेक़रार है ......

26 जुलाई 2010

क्या जानो ???

क्या जानो आप की जुबान किसे कहते है ???
क्या जानो लब्जों को जो बेजुबान रहते है ???
क्या जानो उन सवालोंको जिसके कोई जवाब नहीं होते है ????
क्या जानो उन बंदगी को जो पत्थरसे टकराती है ????
क्या जानो उन आवाजोका गम जो बहरे कानोसे टकराती रहती है ????
क्या जानो उन अश्कका दर्द जो हँसते लबोंसे आते है ????
क्या जानो उन तनहाई को जो मेले में मिल जाती है ????
क्या जानो उन अपनोंको जो गैरोंसे पेश आते है ????
मैंने पा लिया है एक जहाँ वहां जहाँ मेरी सदा आसमांसे टकराती है ........
कांचकी दीवारोंके पार खुले जहाँसे बात कर आती है .....

25 जुलाई 2010

कोई ये कैसे बताएं !!??

कोई ये कैसे बताएं की वो तनहा क्यों है ?????? एक फिल्म अर्थ की ये बेहतरीन ग़ज़ल है ..........
तो शायद इस का जवाब देने की कोशिश की मैंने ............
तलाश एक हाथ की जो साथ दे उम्र भर के लिए
वो प्यास जो अनबुझ ही रहे जाम हाथ में ही लिए
दरियाके किनारे लहर दूर जाती नज़र आये उसे छूते ही
प्यार वो ही ना दे पाए जिससे उम्मीद कर बैठे उसकी
चाह उसको ना हो हमारी जिस पर फ़ना हो जानेकी थी कसम हमारी
दिल तो धडकता हो पर जिसमे उसका नाम ना सुनाई दे
हमारे जनाजे को भी रहे उसका इंतज़ार हो
और वो हमारी अंतिम ख्वाबगाह पर ना आये कभी


फिर भी देखो बड़ी शिद्दत से जी लिए हम ये जिंदगी तुम बिन
तनहाई को भी सजा लिया तेरी फुरकतसे हमने भी
एक उफ़ ना की एक आह ना निकली कभी इस दिलसे कभी
बस ये सोच लिया हम मिले ही ना थे कभी
कोई ये कैसे बताये की वो तनहा यूँ है .....

24 जुलाई 2010

बुँदे टिप ...टिप ...

मेरे घरके अटारी से शुरू होती है आसमां की सरहदें ......
मुठ्ठी बंद करके आसमां को उसमे कैद कर लिया है ...
खुलते ही मुठ्ठी आसमां पर लगाकर उड़ जाएगा ....
आसमां की नमी को कैद कर लिया है इन कोमल हथेलियोंमें ,
खुलते ही शायद मेरे वजूदका अंश वो भी मुझसे लेकर उड़ जाएगा ....
हथेली भीग जाती है बादल की नमींसे पल भर
बहती है बुँदे जब मुझ पर से होकर तब ये रूह उसमे नहाती है .....
मेरे घरकी छतसे शुरू हुई थी जो सरहदें आसमां की
मेरे भीगे गेसुओंसे टपकी बुन्दोंसे जो चुरायी थी बादलसे
देखो इस धरतीको भिगाती चली जाती है .......

23 जुलाई 2010

नौरंगी बारिश

अब साहित्य के नौ रससे रंगी ये बारिश .....
शांत रस बनकर टिप टिप कर बरस जाती है
श्रृंगार रस बन सज जाती है हरी चद्दरसी धरती का आँचल बन ...
गरज बादल की कोई लड़ाकेकी वीर रस की झलक दे जाती है
छिपकर किसी कौनेसे सूरज की नटखट किरन
बादल के केनवास पर मेघधनुषका अद्भुत नज़ारा दे जाती है .....
बचपन गूंजता है गलियोंमें शहर की हास्य रस बनकर
छापक छै करता बचपन नहाता है जब भरपूर सावनमें ....
तोड़ती है किनारों का बंधन ये बहती नदी
सैलाब बनकर इंसानकी आँखोंमें करुण रसमें भीगे अश्क ले आती है .....
सावनके साथ बिजली मेहमान बनकर आती है जमीं पर
उसकी कड़क फिजाओं में भयानक रससे दिल को देहलाती है .....
गिले यौवनको तकती हुई काम लोलुप आँखों में
बीभत्स रस की शर्मनाक छाया भी कहीं नज़र आती है
इस गुस्ताखी पर बादल के जोरों के टकराने में
रौद्र रस की गरज सुनाई देती है .....

22 जुलाई 2010

वो नज़र आया ...

कभी बरसते बरसातमें उसका चेहरा नज़र आया ,
कभी काले बादलोंमें उसका पयगाम नज़र आया ,
कभी अपनोंकी भीड़के बीचमें भी वो झांकता नज़र आया ,
कभी उदास बैठे एक कोने में हम बैठे थे तन्हासे हम
बालोंको सहलाते हमारे गमको बांटता एक साया नज़र आया ..........
खुशियोंके पल में हमारी हँसी की गूंजमें उसका एहसास नज़र आया ...

21 जुलाई 2010

गुस्ताखी मुआफ

ख़ामोशी का आलम बहुत कह गया कल हमें ,
पर ख़ामोशी के अल्फाज़ जब बिखर गए एक सफे पर
लोगों को वो ग़ज़ल नज़र आने लगे.......
सफा उडा हवाके झोंकोके साथ दूर तक ...
इंतज़ारके हर लम्हे याद आने लगे ....
आकर गुज़र गए हमारी गली से आप भी ,
पर हम थे की बस यादों की रहगुज़रसे मुड ना पाए .....
खता गुस्ताखी मुआफ कर देना हमें
गुस्ताख दिल कभी यूँही बेदर्द हो गया हो .....

20 जुलाई 2010

और बात होती !!!!

बहुत साल तक मंजिल दर मंजिल मिले तो क्या मिले ???
बस थोडा बिछड़ भी लेते तो कोई और बात होती .....
तुमसे बात करना तो एक बहाना था
उसमे एक आह सुनाई देती तो कोई और बात होती .....
हज़ार इम्तिहान ले रहा है ये जहाँ हमारे इश्क का
तुम्हारी कामियाबीके लिए हम हरकदम नाकाम होते तो
बस ये ही मेरे इश्क की इबादत होगी .........

19 जुलाई 2010

एक साया ...

कभी ये सोचा ना था
ये साया भी हमसे जुदा होगा ,
जुदा होकर साए से जाना
बिना उसके हमारा हस्र क्या होगा .....
=================================
तुम्हारे साये से लिपटकर हम बरबस रोते क्यों रहे ?
तुम्हारा साया बेवफा ना होगा ये आस रहती होगी .....
======================================
हमारी ख़ामोशी को मत कोसो यूँ जी भरकर ,
तुम्हारी बेरुखीकी ही ये इनायत है .....

18 जुलाई 2010

लौट आये फिर मुद्दतों के बाद

कब कहाँ कैसे हम उलजकर रह चले थे जिंदगी की राहमें ,
जब आया होश तो तनहा ही चल रहे थे एक सुनी सड़क पर ,
कारवां छुट चूका था कहीं दूर और हम बेखबरसे चल पड़े ,
बस तब ये हो गया हमें तुम्हारी यादने सताया यूँ जी भर के
मंजिल को छोड़ हम वापस मूड गए तुम्हारी राहो पर फिर
मदहोश पड़े थे यूँ बावरे से तुम भी हमसे बिछड़कर ,
आज हमने बादलों को घटाओं को निचोड़कर तुम्हारे शाने पर
बस बारिशकी बूंदों से फिर जिन्दा कर दिया .....
लौट आये हम भी अपने दिल के सुकून के पास .....