23 अगस्त 2010

एक सर्द हवा का झोंका था

एक सर्द हवा का झोंका था ,
ठिठुरता हुआ आता था मेरी खिड़की पर
दस्तक देकर मांगता था थोड़ीसी अंगीठीकी आंच ,
मैं उसे गर्म कम्बलमें लपेट कर
मा की लोरी के कुछ लब्ज़ याद कर सुलाता था ...
कमबख्त वो सोता ना था कभी ,
शायद इश्क के बुखार का मारा होगा वो भी ,
रात को रतजगेकी बीमारी होगी ,
उसकी सांस बर्फसी जम जाती होगी ....
नब्ज़ देखी जब उसकी साँसे ठंडी होने लगी ,
मेरी गर्म हथेलीको उसके हाथोमें थमा दिया ...
सुबह जब जगा दुसरे पहर तो मेरी जलती दिए की लौने
उसको जिन्दा कर दिया था .....

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