31 मार्च 2009

नकाब .....

नकाब ओढे आती है जिंदगी ,

छूने जाते हैं तो रेत सी फिसल जाती है जिंदगी ...

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सूखे दरख्तों पर फूल कहाँ ?

गमगिनसे माहौलमें पनपेगी जिंदगी कहाँ ?

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कानोंमें पूछती है क्यों तू हरदम मुझे सवाल ?

पढ़ ले किस्मत आज इन सफों पर मेरे जवाब ......

शबनम का कतरा

एक ठहरा हुआ सा शबनमका कतरा ,

सूखे पत्ते पर बनाकर आशियाँ ,

ठंडी हवाके झोंके पर होकर सवार ,

अनजान सफर पर उड़ चला ...........

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सुबहकी लालीसी मुस्कराहटको लबों पर सजा लिया ,

बंदगीमें जब हाथ उठे तो आपके लिए सजदा कर लिया ,

हरकतमें हर साँसकी आपके वजूदको जिन्दा रख लिया ,

न कभी कहा किसीको ,ये राज़ दिलमें छुपाकर रख लिया ......

30 मार्च 2009

कभी अनकही एक कहानी सी ....

हर वक्त मौजूद रही तस्वीर तुम्हारी नजर के सामने रही ,
तुम जो कह ना पाए वो प्यारकी हर बात हमें समज में आई .....

आज हवाओमें घुला मौसम प्यार का है ,
फ़िर क्यों मेरे आशियानेमें आलम तन्हाई का है ???

मिलेंगे आपसे तो कहेंगे क्या शब्दोको एक एक करके दिलमें संजों रहे है ...
फ़िर भी यकीं है हमें कल जब मिलेंगे तब लब्ज़ होठोंमें कैद ही रहेंगे ......

तुम्हारी वफाकी शिद्दत हमें आज समज में आ गई ,
तुम्हारे आने के इंतजारमें जब हमारी आँखें भर आई .....

29 मार्च 2009

हिमालय के हँसी नजारे : यमुनोत्री

अबकी बार हरिद्वार से टाटा सूमो किराये पर लेकर एक और परिवार के साथ हम निकल पड़े है . गर्म कपडे अबकी बार एक एक करके धीरे धीरे बाहर आ रहे है ...
अब हम सब जा रहे है श्रीकृष्णलीला में अपना नाम अमर कर जाने वाली और हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक हिमालय के चार धाम में एक धाम यमुनोत्री ....यमुना नदी का जन्मस्थान ...एक बार फिर मसूरी की वादियों से होकर हम कम्प्टी फालवाले रस्ते होते हुए गुजर रहे थे . पहाडों का कद अब बड़ा होने लगता है . कभी अपने घने जंगलों के लिए मशहूर हिमालय के पेड़ विलुप्त हुए दिखाई दे रहे है .कम्प्टी फाल से १५ किलोमीटर दुरी पर यमुना पुल से गुजरते हुए हम पहली बार यमुना नदी का दर्शन कर पाते है .चंचल बच्चों की तरह उछलने वाली और पहाडी राग में अपना गाना गति हुई नीले रंग के पानी वाली यमुना का जल श्रीकृष्णके सांवरे रंगसे मेल खाता दिखाई देता है .हरी भरी वादियाँ बस्ती से दूर जाते ही फिर लौट आती है . यहाँ के पेड़ पौधों की भी हर जगह अपनी अलग ही पहचान है . बर्फसे ढंके हुए हिमशिखरसे हम अभी बहुत दूरी पर है ...
यहाँ पहाडोमें रात्रि के आठ बजे के बाद ड्राइविंग वर्जित है . उस वक्त हम वहां के छोटे से कसबे बारकोट में पहुँच गए . यहाँ यात्रिओं के ठहरने के लिए होटल एवं धर्मशालाओं का पुख्ता इंतजाम है . रात्रि विराम वंही पर हुआ .यहाँ पर एक खास बात मैं उन लोगों के लिए बताना चाहूंगी जो मैदानी इलाकों से पहली बार पहाडों में आ रहे है .यहाँ का वातावरण मैदानी इलाकों से बिल्कुल भिन्न किस्म का होता है .यहाँ मोटर मार्ग से जाना पड़ता है और उस वक्त ऊंचाई पर जाते हुए घुमावदार रस्ते पर जब वाहन चढ़ते है तब कई लोगों को उलटी , वायु प्रकोप या जी मचलने की शिकायत हो जाती है . उसके लिए आप यात्रा के प्रारंभ से ही अपने फेमिली डॉक्टर से योग्य दवाएं आदि साथ रखे .सुबह के वक्त थोड़े नाश्ते के साथ वे दवाईयां लेले और रस्ते में खाना टाल दे .फ़िर रात्रि मुकाम के वक्त ही भरपूर भोजन कर लें .क्योंकि पहाड़ की आबोहवा से संतुलन बनने में हमारे शरीर को तकरीबन दो दिन का वक्त लग जाता है . अपने साथ पोलीथिन की बैग का बड़ा पैकेट ले ले ताकि अचानक ही उलटी आते वक्त आप उसमें ही उलटी कर सकें और बाहर फेक दे ताकि दूसरे यात्री को असुविधा या गंदगी न होने पाए .बारकोट से बड़ी सुबह हम लोग नाश्ता करके हम छोटी छोटी पहाडियों से गिरते हुए और निचे बहती यमुनामें मिलते हुए छोटे छोटे जरनोंको देखते हुए आगे बढ़ने लगे .हम एक जगह पर हम रुके . वहां एक छोटा सा प्रपात था जो ऊँची पहाडी से गिर रहा था . थोड़ा ऊपर चढ़कर हम उसके पास गए . चारों और पहाडोसे घिरे उस जरनेकी शोभा कभी न भुलाने लायक थी .वहां पर एक छोटी सी झोपडी में वहां के लोगों ने झरने के पानी को मोड़ दिया था और उसके प्रवाह से एक आटा पीसने की घंटी को चलाया जाता था . क्या कमाल था ये इंसानी दिमाग और उसके इस अनुठे उपयोग का !!
हरी भरी वादियों के साथ जूमते हुए हम पहुंचे स्यानाचट्टी नाम की जगह पर . वहां रुकने की व्यवस्था भी है . थोडी ही दूरी पार करने पर अब हम लोग पहुँच चुके है हनुमानचट्टी नामक जगह पर . ये बड़ी बसों के लिए अन्तिम स्थान है . यहाँ से १४ किलोमीटर की दूरी पर यमुनोत्री है . यहाँ से यात्रीओं के लिए टट्टू, जीप की सुविधा है . अगर आप निजी वाहन से जाते है तो और ७ किलोमीटर तक आप वाहन से जा सकते है . यहाँ एक और बात बताती हूँ की निजी वाहन किराये पर लेते वक्त आप यह जरूर तय कर लें की गाड़ी जानकीचट्टी तक जायेगी वरना ड्राईवर लोग यहांसे आगे जाने के लिए अतिरिक्त पैसे ऐंठते है . यहाँ से सात किलोमीटर पर जानकीचट्टी है . वहां पर रहने की सुचारू व्यवस्था होती है . मोबाइल धारक के लिए सिर्फ़ यहाँ पर बीएसएनएल टावर की सुविधा उपलब्ध है . यहाँ पर कोई नेटवर्क काम नहीं आता है . एस टी डी बूथ हर जगह होते है ...
हम पहुंचे उसके दूसरे दिन यमुनोत्री मन्दिर के द्वार अक्षय तृतीय के दिवस पर खुलने वाले थे . हम वहीं पर रुक गए . पास में ही यमुना नदी एक तूफानी झरने के समान बह रही थी उसे भी देखने चले गए . यहाँ के घर इस तरह से बने है की उसके अन्दर कम से कम ठंड लगे .लोग भी काफ़ी सीधे और मिलनसार होते है .इधर आते वक्त रास्ते में पहली बार बर्फ से आच्छादित हिमशिखर के दर्शन हुए . कैमरे बाहर आने लगे थे . कमरे के बरामदे से ही बड़े हिमशिखर के दर्शन हो रहे थे . जगह चारों और से ऊँचे पहाड़ से घिरे हुई थी . उस नयनाभिराम नजारों को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द भी कम पड़ रहे है. वह बन्दर पुच्छ की चोटी थी .यहाँ पर आप व्यक्ति दीठ कमसे कम तीन से चार गर्म कपडे रखे तो उचित होगा ...
आप किस्मत को मानते हो ? यहाँ पर मैंने अपनी जिन्दगी का सबसे अदभुत नजारा रातके वक्त देखा .ठंड बहुत ही थी .मेरे पतिदेव की नींद रात में अचानक खुल गई .वे बाहर गए और थोडी देर में वापस आकर मुझे जगाकर बाहर ले गए .वहां पर हमने जो आसमान का अदभुत नजारा देखा वह शायद में कभी भी भुला न सकूं !!! सारे सितारें जैसे सिर्फ़ एक एक फ़ुट की दूरी पर ही सजाये गए थे .उनकी चमक भी बहुत ही ज्यादा थी और वे हमारे एकदम ही नजदीक नजर आ रहे थे . हम जैसे सितारों की इस बारात में ही शामिल हो गए थे .पीछे बर्फ के आच्छादित हिमशिखर भी एकदम स्पष्ट नजर आ रहा था .मध्यम रौशनीवाली इतनी सुंदर रात मैंने कभी भी न देखि थी न देखूंगी शायद !!!! सिर्फ़ एक शब्द ही जुबान पर था !! लाजवाब !!
हम दर्शन के लिए सुबहमें रवाना हुए . मेरे पतिदेव और बेटीने पैदल जाने का फ़ैसला किया और मैंने आगे चलकर कंडी ले ली .सात किलोमीटर तक की ये चढाई बिल्कुल सीधी है .रास्ते की चौडाई सिर्फ़ पांच फीट तक की है .इसी में से टट्टू , पालखीवाले , कंडीवाले , और पैदल यात्री आने और लौटने वाले गुजरते रहते है .सरकारने पेवर ब्लाक वाले रस्ते बनाना तब शुरू कर दिया था .बीचमें पानी से भीगे पत्थरवाले चिकने मार्ग पर भी चढ़ना पड़ता है .ये चढाई को चारों धाम में सबसे कठिन चढाई गिना जाता है. अंत में हम यमुनोत्री पहुँच ही गए . ग्यारह बजे उत्तरांचल के राज्यपाल पहली पूजा के लिए आनेवाले थे . वे सब हेलिकोप्टर में आए थे .मन्दिर के ठीक बाहर गर्म पानी का तप्त कुंड सूर्य कुंड था जिसकी अभी सफ़ाई हो रही थी .यहाँ पर भाप निकालता पानी नजर आता है जिसमे आप चावल पका सकते है और पुडी तल सकते है .हमने नजरों से देखा था .कुदरत का एक और करिश्मा भी यहाँ है . यमुना नदी का मुख्य प्रपात तो अभी बर्फ की तरह जमा हुआ ही था किंतु उससे सिर्फ़ दस फीट के दूरी पर ही उबलते दिखते गर्म पानी का झरना बहता था जिसमे सभी स्नान करके दर्शन के लिए जा रहे थे . पर इसके स्पर्श से हमे जलन बिल्कुल ही नही होती है .ये जगह ६ महीनों तक बर्फ से ही ढकी रहती है तब माताजी की मूर्ति को नीचे जानकीचट्टी ले जाकर पूजा की जाती है .हमारे सामने ही ६ महीने के पश्चात् मन्दिर के द्वार खुले . दर्शन से हम धन्य हो गए ...ये जगह समुद्रतल से १०००० फीट की ऊंचाई पर है . अगर आप ब्लड प्रेशर या एनिमिक है तो दवाई का इंतजाम साथ ही रखे . यहाँ पर साँस में लेने वाली ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम होती है इसी लिए कभी कभी साँस लेते हुए दिक्कत पड़ सकती है .यहाँ पर कुछ हल्का फुल्का खाते रहना चाहिए ..अब अचानक ही साफ दिखनेवाला मौसम बदलने लगा . बादल घिरने लगे . हम दर्शन कर चुके थे इस लिए लौटने लगे . वापसी में थोड़े दूर पहुँचते ही शुरू हो चुकी थी बर्फ की बरसात .बर्फ के टुकड़े मेरी ढंकी हुई कंडी पर छोटे छोटे पत्थरों के समान महसूस हो रहे थे .मज़ा तो मेरे पतिदेव और बेटी ने खूब लिया इस बरसात का . दोनों रास्ते में बर्फ के गोले बनाकर खेलते हुए ही आए . आप सिर्फ़ कल्पना ही कीजिये हमारा कितना सुंदर अनुभव रहा होगा ये!!!! हम लौट चले थे जानकीचट्टी सुंदर और थोड़े भयानक भी लगने वाले रस्ते से गुजरकर !!!!!!!!अब जायेंगे ....थोड़ा और इंतज़ार कर लो ...यात्रा अभी जारी है ...!!!!

28 मार्च 2009

छोड़ आए हम वो गलियां ..??!!!


देखो मैंने एक रुपहला चांद्का खेत बनाया है,
उसमें एक टोफीका पौधा लगाया है,
ये देखो रेत का नहीं आईसक्रीमका पहाड बनाया है,
और सूरजको इसका पहरेदार बनाया है......

इन सितारोंके कंचे बनाकर आज खेलते है,
और मम्मीके बेलनसे रोकेटकी गिल्ली बनाकर टुल्ला मारते है,
दुनियाके लट्टू पर सपनोंकी डोर लपेटकर इसे गोल गोल घूमाते हैं,
मम्मी जब आवाज लगाये तब छत पर जाकर छूप जाते है......
( हमारी गिल्लीसे पडोसीकी खिडकीका कांच जो टूटा है...)

मेरी गुडीयाकी सोनियाके गुड्डेसे आज शादी तय की है,
भूने चने और चीनीका हलवा बना लेते है,
गुड्डेको नया पाजामा और गुड्डीको नई चुडिया पहनाते हैं,
आप भी आओ इस शादीमें शामिल होने और हलवा खाने............

27 मार्च 2009

एक साज़ एक आवाज .....



दिलके तहखानेमें आज कुछ ऐसे जाना हुआ ,
गर्दसे लिपटी सिमटी एक कोनेमें ,
वो भुलाये वक्तकी दहलीजमें ,
एक खामोश दिलरुबा का पाना हुआ .....

अंगुलीको छू जानेसे उसके तारको
जैसे सारे सूर आजाद हो गए .....
पहले प्यार की तरह छुपकर बैठे
सारे तराने फिजाओंमें बह चले .......

26 मार्च 2009

मैं गोपा देसाई....

मेरा नाम गोपा देसाई है ॥

मैं अभी ललितकला अकादमी की ओर से मुझे मिले प्रथम पुरस्कार को ग्रहण करने के लिए एक खास समारोह में जा रही हूँ ।दिवार पर लगे हुए इस चित्र को आप गौर से देखिये .जी हाँ ,इसी चित्र के सामने मैं आज से ठीक दो साल पहले अनिल से मिले थी .दरअसल ये चित्र अनिलने ही खरीद लिया था . मुझे ये बहूत पसंद आया . एक औरत जिसे अपने किसी की प्रतीक्षा है ......

अपने दोनों हाथों को व्हील चेर पर टीकाते हुए मैं एकटक उसी चित्र को निहार रही थी और अनिल मुझे ।ढाई साल पहले की बात है .महाबलेश्वरसे लौटते वक्त हमारी कारकी दुर्घटना हो गई जिसमे मेरे माता, पिता एवं इकलौते भाई को ईश्वर ने अपने पास बुला लिया .इस भरी दुनिया में मैं तनहा रह गई . मेरे दोनों पैर दुर्घटनामें में खो चुकी थी और तबसे ये व्हील चेर ही मेरे पैर बन गई है ....

उस वक्त अचानक ही अनिलने मेरे पास आकर मेरे हाथ में ब्रश,रंग और केनवास थमा दिए और मेरी जिन्दगी में एक सुनहरा पृष्ठ खोल दिया ।वह मेरे जीवनपथ पर रौशनी बिखेरता चला गया और मैं चित्रकला में दिन ब दिन नई ऊंचाई पार करने लगी . मुझे अनिल ने जीने की एक ठोस वजह दे दी थी .उसने मेरी प्रेरणा बनकर मेरी जिन्दगी को एक नया अर्थ दिया. और हमारा यह साथ न जाने कब केनवास पर से उतरकर हमारी जिन्दगीमें भी रंग भरने लगा ये बात से हम दोनों ही बेखबर थे ...

अब मेरे दिलमें एक उलझन एक कश्मकश पैदा हुई ।मैं तो अपाहिज हूँ और मुझे ये हक़ नहीं की मैं अनिल की जिन्दगी में प्रवेश करूँ .कई दिनों तक ये बात सोचने के बाद एक दिन अचानक ही मैं बिना किसीको कुछ कहे ही मुम्बई छोड़कर एक गुमनामी की चादर ओढे कहीं दूर ओज़ल हो गई ....

अनिलने मेरी बहुत खोज की। वह मुझे बेतहाशा ढूंढता ही चला गया . किंतु मैं भले छिप गई पर मेरी कला ने मेरे अस्तित्व का पता ठिकाना बता ही दिया . इस चित्रकारी के प्रदर्शन के आयोजकों से मेरा पता लेकर अनिल ने आखिरकार मुझे दोबारा ढूंढ ही लिया . अब वह हमेशा के लिए मेरी जिन्दगी में वापस आ चुका है ....

कल मेरी शादी है , अनिल के साथ , मुझे आशीर्वाद दोगे ना ?

( मेरी मूलत: गुजराती में लिखी इस कहानी को गुजराती दैनिक दिव्यभास्कर के साप्ताहिक लघुकथा प्रतियोगिता में श्रेष्ठ लघुकथा के रूप में चुना गया था जिसका मैंने ख़ुद ही अनुवाद करके आप के लिए यहाँ प्रस्तुत किया है )

मौसम एक तपिश ,एक सिहरन ,एक फुहार

गर्म गर्म राहों पर चलकर ,
तिल तिल पाँवके छालोंको चूमकर ,
सहरा का मौसम रंग लाता गया ,
झुलसती तपिशमें पसीनेकी बूंदोंमें जैसे नहाता गया .....

कण कण बर्फकी जमती गयी ,
सतह सतह एक पर एक तह लगाकर जमती गयी ,
बैठ गए बर्फके कम्बल ओढ़कर ,
देखो इस कोनेमें मेरे कांपते हुए अरमान .....

कागज़की कश्ती पर सरपट दौड़ता,
सड़कके पानीमें तेजधार बहता हुआ ,
देखो मेरा ये बचपन बूंदोंमें नाचता गया ,
इस पहली बारिशमें जवान होकर गाता चला ..........

25 मार्च 2009

एक नायाब दुआ ....

आरजूमें जिसकी एक सितारोंसे भरी शाम होती है ,
जलवे उनके दीदारके होने पर जैसे एक नायाब दुआ कुबूल होती है .....
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चलो आज हम ही चलकर उनसे मिलने चले जाते है ,
रूठे लगते है ,कुछ खफासे भी लगते है ,आज उन्हें मनाकर आते है ....
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मोमकी पिघलती बूंद बर्फसी जम गई शमा पर ही ,
पलकोंकी चिलमन उठते ही उनकी रोशन महफ़िल कर गई .....
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रेतके बादल बह कर हवामें समां ये धुआं धुआं कर चले ,
उभरी उसमें जो लकीरे कुछ जो हमें आपके चेहरे सी ही क्यों लगी ???
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24 मार्च 2009

गुजारिश आपकी .....

एक महकती गुजारिशको एक हँसी अंजाम देते है ,

ख्वाहिशको आपकी लब्जोंके लिबासमें लपेटकर उसे कुबूल करते है .......

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नाजुक कोंपलोंको नर्म किरनका स्पर्शभी लगा कुछ तो सहमा सहमा ,

औसकी बुंदोसे नहाने गुलने पंखुडियोंको खोला था अभी तो जरा जरा ....

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23 मार्च 2009

सजाओ जिंदगी भी मेरी ....!!!!!

जहाँ ये सारा बना फलक मेरा ,

तुम्हें सजा दूँ संवारूं बनाकर गीत मेरा ..........

सूर बनेंगे तेरे पायलकी झंकार ,

धून होगी तेरे कंगनकी खनखनाहट ,

मुस्कराहट तुम्हारी जायेगी बनकर गीत मेरा ,

अबके सावनमें फिजा भी गुनगुनायेगी फुहार बनकर .............

झुमका डोले जैसे बांसुरीमें सूर कोई मनभावन डोले ,

तुम्हारे नयन जब झांकते है पलकोंके झरोखोंसे ,

तुम्हारी बिंदिया भी सरगम सुना रही है बेताबीसे ,

धानी चुनर भी लहरा रही है उड़ उड़ भीग जाने को बरसातमें .........

पिघलती हुए आसमानको हथेलीमें सजा दो ......

कड़कती इस बिजलियोंसे मांग सजा दो ,

शोलोंसी बहकी हवाएं दे जाओ सर्द शाममें ,

भीगे हुए इस मौसममें यादमें मेरी पलकोंको नम न बनाओ .....

22 मार्च 2009

ये जिंदगी के रास्ते ......कहाँ से कहाँ तक !!!!!

"सभी हालातको मद्दे नजर रखते हुए और दोनों पक्षों की दलीलें सुनते हुए अदालत इस नतीजे पर पहुँची है की श्रीमती नीला कामदार जो एक हालात का शिकार हो चुकी थी और एक हादसे में उनके हाथों उनके पति का ही कत्ल हो गया है । लिहाजा ये अदालत श्रीमती नीला कामदार को बा इज्जत बरी करती है ."॥
नीला पथराई हुई आँखों से उस कठघरे में ही खड़ी रह गई ।लेडी कोंस्तेम्बल ने आकर उसकी हथ कड़ी खोल दी .नीला के जहन में बस एक ही सवाल गूंज रहा था ...उसके लिए तो सजा तय हो ही चुकी है चाहे वो जेल की चार दीवारों में हो या बाहर की इस दुनिया में ....वह धीरे धीरे कदम बढाती हुई पैदल ही अपने घर पहुँची .घर !!!!?? अब ये घर कहाँ रह गया था ?मासुमी उसकी तेरह साल की बेटी तो इस दुनिया में ही नहीं रही थी . और सुजीत -उसका पति -जिसे वह अपने ही हाथों से मौत के घाट उतार चुकी थी .उखड कर गिरे हुए रंगों की परतें उसके जीवन की परत भी एक के बाद एक खोल रही थी .दरवाजे को खाली ही टिका कर वह पलंग पर घंटो तक गुमसुम सी बैठी ही रही ...
सुजीत के साथ भागकर शादी करने के बाद दोनों बनारस से मुम्बई आ गए थे ।भाग्य से नीला को जल्द ही एक राष्ट्रिय कृत बैंक में नौकरी मिल गई .जोगेश्वरी में घर के बिल्कुल नजदीक . सुजीत कोम्प्यूटर इंजिनियर था . थोड़े संघर्ष के बाद उसे भी नई मुम्बई में अच्छी नौकरी मिल ही गई .शादी के तीसरे साल उनकी जिन्दगी में पहला फूल खिला मासुमी नाम का ॥मासुमी जब दस साल की हुई तब सुजीत की कम्पनी बंद हो गई और उसकी नौकरी छुट गई .बहुत कोशिश के बावजूद उसे दूसरी नौकरी नही मिल पाई .बेरोजगार सुजीत को हताशा , शराब और जुए की आदत ने घेर लिया .नीला की सारी तनख्वाह उससे छिनी जाने लगी और उसे शराब और जुए की भेंट किया जाने लगा . अब तो माँ बेटी को भी पिटने का सिलसिला शुरू हो चुका था ....
नीला नए ज़माने की औरत थी । उसने नारी निकेतन का सम्पर्क करके पुलिस में अपने पति के खिलाफ रपट लिखवा दी . पति को अपने घर से बाहर निकाल दिया .पुलिस के डर से सुजीत अब उनको परेशान नहीं कर पाता था .दोनों माँ बेटी अब उनके अपने फ्लैट में रहते थे .एक बरसात की रात थी .....बिजली गुल हो चुकी थी .अंधेरे में नीला रसोईघर में पानी पीने के लिए गई . उसी वक्त खिड़की के रस्ते शराब के नशे में धुत्त कोई उनके घर में घुस गया . अचानक नीला ने मासुमी की चीख सुनी .अंधेरेमें मासुमी को उस ने अपने हाथों में जकड लिया था . नीला अंधेरे में ही किचन से बड़ा सा चाकू लेकर आई और उस अजनबी को पीठ पर लगातार दस बारह वार कर दिए .थोड़ा छटपटने के बाद वह शांत हो गया .पर उसके हाथ में मासुमी की गर्दन आ गई थी .जिस पर अत्यधिक दबाव आने पर मासुमी की जीवन लीला भी समाप्त हो चुकी थी .तकरीबन एक घंटे के बाद जब बिजली आई तो नीला की जिन्दगी में हमेशा के लिए अँधेरा हो चुका था .मासुमी इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी थी और खिड़की के रस्ते घुसने वाला शराबी और कोई नही पर उसका पति सुजीत ही था .जिसे वह मौत के घाट उतार चुकी थी ....
प्रायः नीला ख़ुद ही पुलिस थाने में हाजिर हो गई । नीला को दूसरे दिन हालात के बलबूते पर जमानत भी मिल गई .केस चला . बैंक से उसे सस्पेंड कर दिया गया .नीला के सारे पहचान वालों ने उसीके पक्ष में गवाही दी थी .और वह बा इज्जत बरी हो भी गई .बैंक ने पूर्ण सहानुभूति के साथ उसे पुनः नौकरी पर रख लिया.लेकिन अब क्या ????!!!ये सवाल उसको परेशान कर रहा था .....
नीला ने मेनेजमेंट को कोई दूर दराज के इलाके में ख़ुद का तबादला करने की गुजारिश की । उसका तबादला उसीकी मर्जी से दार्जिलिंग में हो गया .नई जगह नए लोग और प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य !!! दिल के घाव जरा जल्द ही भरने लगे .नीला के घर पर रोज सुबह जमुना घर का सारा काम करने के लिए आती थी .उसकी आठ नौ साल की बेटी भी उसके साथ आती थी .उसके साथ बात करते पता चला की उसके दो बच्चे थे .बेटा स्कूल में पढ़ता था .पर आमदनी कम होने के कारन बेटी का दखिलाल नहीं हुआ था .एक सुबह नीला अपने छोटे से बागीचे में नए पौधे लगा रही थी .छोटी सी श्रीना -जमुना की बेटी साथ में आकर अपनी छोटी छोटी आँखों से सब गतिविधियाँ देखने लगी .नीला ने उसे पानी देना सिखाया .नीला के साथ श्रीना थोड़ा थोड़ा खुलने लगी . अपनी प्यारी सी आवाज में जब वह नीला के साथ बातें करती तो नीला को अपनी मासुमी की याद बरबस सताने लगती.नीला ने एक बात पर गौर किया की श्रीना अपनी उम्र के बच्चो के मुकाबले बहुत ज्यादा होशियार थी . नीला ने जमुना से कहकर उसे सुबह में जल्दी उसे अपने पास बुला कर पढाने का शुरू किया ....
एक साल में तो उसने तीसरी कक्षा के समकक्ष बच्चे की पढ़ाई पुरी कर ली । वहां के स्कूल में प्रधानाचार्य से मिलकर दूसरे साल नीला ने उसका स्कूल में दाखिला करवा दिया . जमुना और उसके पति को समजा कर उसके सारे खर्च की जिम्मेदारी नीला ने अपने सिर ले ली .नीला को अपने जीवन का जैसे मकसद ही मिल गया !!!!स्कूल की हर प्रवृत्ति में श्रीना ही अव्वल आती थी . पढ़ाई में भी उसका कोई मुकाबला नहीं कर पाता था .श्रीना तमांग अपने स्कूल का ही नहीं दार्जिलिंग शहर का सितारा बन चुकी थी .खेलकूद में उसने अपने राज्य पश्चिम बंगाल का राष्ट्रिय स्तर पर कई बार प्रतिनिधित्व किया और कई मैडल भी जीते . बड़ी होकर वह एक होनहार डॉक्टर बन गई .....
उसने देश की सेवा का प्रण लिया । वह सेना में भरती हो गई . उसने बाकायदा सैनिक प्रशिक्षण भी ले लिया .सियाचिन की सरहद पर एक बार उसने अकेले ही दुश्मनों का मुकाबला करते हुए बंदूक उठाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया . उस बहादुरी के लिए उसे "वीर चक्र " से नवाजा गया .....
टेलीविजन पर यह दृश्य देखते हुए आंसू पोंछ रही नीला से उसकी पड़ोसी श्रीमती शर्मा कहने लगी ," नीला ,अगर तुमने श्रीना को बचपन में गोद ले लिया होता तो आज वह तुम्हारी ही बेटी कहलाती ।और तुम्हारा सर फक्र से ऊँचा हो जाता न ?!"नीला ने कुछ देर बाद बड़ी ही शान्ति से जवाब दिया ," किसीभी पौधे को उसकी जड़ से उखाड़कर अपने बगीचे में लगाना मुजे उचित नहीं लगा .बस मैं तो उसे ठीक से सिचना ही चाहती थी और वही मैंने किया . मैं तो उसकी किस्मत का एक निमित्त मात्र ही हूँ .उसके माँ बाप की खुशी तो मुझसे कई गुनी अधिक है .और श्रीना ये सब कर पाई क्योंकि वह अपनी जड़ों से जुड़ी रही थी ......
"दूसरी सुबह नीला के घर के आँगन में एक जीप आकर खड़ी हुई .आर्मी के युनिफोर्म में दो फौजी उसके घर के दरवाजे पर खड़े होकर नीला को सलाम कर रहे थे . एक थी डॉक्टर श्रीना तमांग और दूसरे थे डॉक्टर शिवम् जोशी ..एक सजीला नौजवान जो श्रीना का होने वाला मंगेतर था ....दो घंटे के बाद रुखसत लेते वक्त शिवम् वहां पर दो पल अकेला ही रुक गया .उसने नीला का हाथ चूमकर कहा ,"माँ ,मैंने बचपन में अपने माँ बाप को खो दिया था .शादी के बाद आप हमारे साथ ही रहोगी. लेकिन श्रीना की नहीं मेरी माँ बनकर ....वादा ??!!!"एक खिलाती हुई हँसी की गूंज एक सुनहरे वादे के साथ फिजा में बिखर गई ....

21 मार्च 2009

एक शमा जलाकर रख देना ......

अपने दर पर एक शमा जलाकर रखना ,

अपने इस दिलमें एक कोना हमारा भी रखना ,

नहीं ख्वाहिश तुम्हारी हमें दिलमें बसानेकी उम्रभर ना सही ,

बस कभी तन्हाईमें एक बार कोरे कागज़ पर हमारा नाम लिख देना .........

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सफरके हर कदम पर साथ चलते रहने का लुत्फ़ याद आया ,

जमीं का चलना ,आसमांका रुकना हमें याद आया ,

महोब्बतके जामको एक ही घूंट में पी तो लिया हमने ,

खाली इस पयमानेमें भी आपकी बातों का नशा याद आया .........

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ख्वाबोंको पकनेमें शायद वक्त अभी बाकी है ,

जिंदगीकी शामसे रात का सफर अभी बाकी है ,

रातकी दहलीज़ पर एक कदम अभी बाहर बाकी है ,

जिंदगी का सफर शायद थोड़ा ही सही ख्वाबों की लम्बी डगर अभी बाकी है ...

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उनकी वफाकी शिद्दतमें कभी कोई कमी न थी ,

खता ये हमारी ही है की हम ही कभी प्यार कर न पाये ........

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चलो आज हम ही उनके पास मिलने जाते है ,

रूठे लगते है कुछ खफा भी लगते है तो उन्हें मनाकर आते है ........

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20 मार्च 2009

तुम्हारे चंद शब्द .....!!!!


तुम्हारे चंद शब्द एक नयी दास्ताँ लिख जाते है ,
चलो आज तुमभी सुन लो जो मेरे लब आज कह जाते है :

शब्द कहते कहते रुके है आज कलमकी नोक पर ,
अल्फाज़ आकर ठहरे हुए है लबोंकी दहलीज़ पर ....
वो कोमल हाथके स्पर्शमें भी है एक अनसुनी कहानी ,
पलकों पर आकर रुक गया है जो पढ़ लो प्यार का इज़हार .......

सदा -ऐ खामोशी सुनकर भी बना है एक अफसाना ,
याद है वो उल्फतका मंझर और वो मौसम भी सुहाना ,
हौले हौलेसे कदम रखते हुए आपकी पायलका वो खनकना,
जैसे कह रही है हमें आप यूँ ही हमारे रहना .......

चलो आज मिलबैठकर कुछ अफ़साने आपसे सुनते है ,
गुजरी थी कैसी सितारोंसे भरी शाम वो किस्से भी सुनाते है ,
ताबीर देखते है आँखोंमें आपकी हम हमारे ख्वाबोंकी ,
चलो इसी वक्त मांग लेते है आपसे उम्रभरके लिए आपका साथ भी ........

19 मार्च 2009

सागरकी गोदमें

छोटी है कश्ती नन्हा है नाविक ,

सागरकी लहरों पर चल पड़ा है ,

अकेला वो मुसाफिर .....

सागरके तरंगों पर उछल रही है लहरें ,

कह रही है जैसे दिल की हर बात तू कह ले ,

मैं ही हूँ वो खारे पानी का सागर ,

जिसने सहेजके रखा है अश्कों को दुनियाके .....

ग़मों के दरियाओं को समेटकर ख़ुद में ,

फ़िर भी हरदम खेलता रहता हूँ उछलते हुए ,

नहीं बुज़ती है कभी मेरे इन पानीसे कभी ,

मेरे भीतर की वो आग जो जन्मोंसे है लगी .......

चलता दौड़ता आया हूँ मैं किनारों पर ,

तो रेत जैसे कानोंमें कह जाती हैं ,

अय मीत लौट जा इधर से ही मुड़कर ,

क्योंकि बाहर तो दुनिया फानी है .....

लहरों को उछालके अपनी ,

कोशिशमें लगा रहता हूँ ,

अय आसमान तुज़े छुनेकी ,

लोग कहते हैं देखो वहां अम्बर धरती से मिले है ,

सिसकता है ये दिल ,

की मिलते तो दिखते हैं पर कभी मिलते नहीं ......

आज मैं बहुत खुश हूँ ,

भले ही तू है छोटी सी पर ,

पहलू पर मेरे चलकर तू ख़ुद ,

मुजसे मिलने आई है ...

अय नन्हे से नाविककी प्यारी सी कश्ती ...

18 मार्च 2009

जुदाई

इस पलके अगले पलमें इस पल की जुदाई है ,
इस दिन से गुजरे दिनकी और आने वाले दिन में इस दिनसे जुदाई है ...

इस जुदाईकी जडोंको सींच सींच कर
पनपता है जो दरख्त वो यादों का होता है ...
इस दरख्त को कभी पतझड़ नहीं छू पाती,
हर गुजरते पलके साथ नयी कोंपल फूट जाती है ...

कुछ शाख पर पत्ते है ,कुछ पर खिले है फूल ,
कुछ बचाने खुदको कांटोका जामा पहनकर है आते ...
किसी शाख पर होती है पंछियोंकी कूक ,
और देखो हर शाख पर घरौंदे बन ठहर जाते है ये रिश्ते .....

ये जुदाई के लम्हे कभी हंसाते है ,कभी रुलाते है ,
दुआएं खुशियोंकी देते तो है कभी गम भी छूकर जाते है ....
तरोताजा रखा है इस दिलमें ये यादोंके दरख्तको
न मिलनेका न बिछड़ने का गम है ,याद बनकर आप जो संग चले है .......

रेखाओंकी जाल दोनों पर बुनी थी ......

एक हथेली पर पत्ता रखा और दूसरी हथेलीको भी देखा ,
रेखाओंकी जाल दोनों पर थी बुनी हुई .....................
हथेलीमें उसे हमने तक़दीर का नाम दे रखा है ,
पत्तेमें जीवनकी संजीवनी बनकर सज रही थी .........
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समुन्दरकी बालू पर हमारे क़दमोंके है ये निशान ...
थोड़े से गिले थोड़े से सिले बालूसे हमारे पाँव थे ......
हाथमें हाथ डालकर दूर तक यूँही आप संग चलने की ख्वाहिश लिए ,
वो नाचती कूदती लहरें बार बार हमें भिगोये जा रही थी साहिल पर ......
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एक पंछीके पर तोलना और उसका उड़ जाना ऊँचे ,
एक तक देखती रहती थी ये निगाहें उसे ,
मन ये बावला उसके पर सवार होकर उड़ता है .....
आसमांको साँसोंमें भरने और सूरज को पीने के लिए ...
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17 मार्च 2009

और फ़िर सिलसिले चल पड़ते है ......

दिनकी हर किरण से तुम्हारे मिलनेकी आस बंध जाती है ,
तुम्हारा जब दीदार नहीं होता तब ख्वाबोंमें मिलने के सिलसिले चल पड़ते है ....
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ये दिल की दास्ताँ भी अजीब है ,
ये यूँ ही कभी गुस्ताखी पर उतर आता है ,
मौसम जब छाया था बहारोंका तुम्हारे आने पर ,
और वह तब हिजर के नगमे सुना रहा था .....
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तुम शायरी हो कोई या हो कोई नाजुक सी ग़ज़ल ....
न जाना तुम्हे क्योंकि हम तो सिर्फ़ अल्फाजोंके कायल है .....
नगमा बनकर आ जाओ या रुबाई बनकर ये हमें नहीं पता .....
हम तो तुम्हारी आवाज़में डूब जाते है इस कदर की होश गूम हो जाते है ..........
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16 मार्च 2009

तलाश फ़िर जारी है ......

खुशियों का पता पूछ रहे थे हम फिजाओंसे ,
सूखे कुछ पत्ते आकर बिखर गए बहती हवाओंसे .....
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जिंदगीका खास होना एक आम बात हो जाती ,
तुम जो रुक जाते जिंदगीमें तो ये जिंदगी सौगात हो जाती .........
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कुछ कहना कुछ सुनना ये सिलसिला बना था ,
अचानक छाई खामोशी तब बातें तुम्हारी तडपाने लगी ........
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तुम्हारी खामोशीने कुछ ऐसा हमें तडपा दिया ,
कोसा हमने अपने आपको क्यों हमने तुम्हे न बोलने की कसम दी थी ???....
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15 मार्च 2009

चलो एक बार फ़िर से .....

प्यासका आखरी मकाम एक पयमाना था ,

बूंदोंका ठहरना वहां एक आस का ठिकाना था ....

ये किस्मतकी बात थी की लब तक आते जाम छुट गया ,

गला प्यासा ही रहा और आंखोसे दरिया छलक गया ....

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चलो फिर इश्कको आजमाया जाय ,

कांचकी इस दीवारके उस पार अपने दिलकी धड़कन को सुनाया जाय ,

दीदार करने भरसे ये दिल कभी भरता ही नहीं है ,

आज उनकी ये तस्वीरको उसमे कैद करके एक अफसाना बनाया जाय ......

14 मार्च 2009

फ़िर एक नई सुबह ....

आज सुबहमें उठते हुए एक प्यारी सी अंगडाई ली थी ,

चुनरको हटाते हुए रातने धीरे धीरे आँख खोली थी .....

नींदमें ऐसे लगा जैसे किसीने ख्वाबोंमें जगाया था ,

यादोंको सुबहकी लालीने आँखोंमें सुरमेसा सजाया था .....

उड़ते हुए पंछीमें से एक आकर हमारी खिड़कीमें बैठा ,

फ़िर एक प्यारा सा संदेसा हमें सुनाया था .........

जागकर देख लो जरा सूरज फ़िर निकल आया है ,

देखो आज तुम्हारे लिए कितने सारे तोहफे लाया है ..!!!!

13 मार्च 2009

ये हँसी वादियाँ : मसूरी ...!!!

ये मन बहुत चंचल होता है ...जाना था जापान पहुँच गए चीन समज गए ना ...!!!
देहरादून पहुँच कर हम ऋषिकेश, मुनी की रेती और देवप्रयाग तक घूम कर फिर वापस आ गए है अपने अगले पड़ाव पर जाने के लिए ...देहरादून के पहाडों में जाने वाली बसों के अड्डे से हमने मसूरी जाने के लिए बस ली । इस सुंदर शहर देहरादून को छोड़ते हुए हम कब पहाडों के रस्ते पर चल पड़ते है उसका पता ही नहीं चलता .हरी भरी वादियों में बहती हुई ठंडी हवाएं हमारे कानों में जैसे कुछ कहने लग पड़ती है .प्रकृति के गीत गाने लगती है .जिग जाग बनाते हुए सड़क पर गुजर रही बस की खिड़की के बाहर नजारा हरदम बदलता है... कभी दिल को जोरों से धड़का देने वाली खाई की गहराई नजर आती है तो कभी बादलों को चूमते हुए पहाडों की ऊँचाई ... मैदान का दामन छोड़ कर कब हम पहाडों की आगोश में आ जाते है कुछ पता ही नहीं चलता .अगर आप निजी वाहन से जा रहे हो तो रस्ते में एक बड़ा सा सुंदर मन्दिर पड़ता है जहाँ आप थोडी देर रुक कर वादियों से मन ही मन में कुछ संदेश दे सकते हो ......
धीरे धीरे छोटी छोटी बस्तियों को पार करते हुए हमारी बस मसूरी पहुँच ही गई ।ये वृतांत मेरे २००१ के दौरे का है . मेरी कम्पनी में से आबंटित होली डे होम में हम रुके . हमारा कमरा होटल के सबसे ऊपर वाले मजले पर था . खिड़की से परदा हटाते ही बाहर दूर देहरादून वेली नजर आई . रात में जब पूरे देहरादून की बत्तियां रोशन हो चुकी तो ये नजर कुछ ऐसा लग रहा था की चाँद पुरी सितारों की बारात लेकर जमीं पर आ गया था . यादें कितनी सुहानी हुआ करती है ना ? हम सुबह में ही वहां पहुँच चुके थे . फ्रेश हो कर नीचे माल रोड की सड़क पर के बाज़ार में टहलने निकल पड़े . महीना मई का होने के बावजूद यहाँ की सर्दी वडोदरा की दिसम्बर की सर्दी के बराबर थी . इस में आइसक्रीम या सोफ्त्टी खाने का मजा कुछ और ही है . कसमसे बिल्कुल सर्दी नहीं होगी ...
कैमल बेक और मॉल रोड की सड़क की खास विशेषता ये है की एक और ही मकान है और दूसरी और सुंदर और मजबूत रैलिंगें बनी हुई है जहाँ से आप पुरी वेली का नजारा ले सकते हो . एक खास अन्तर पर बैठ के देखने के लिए भी सुचारू व्यवस्था है . हर जगह से दृश्य लगातार बदलते नज़र आयेंगे ..बड़ा साफ सुथरा ,ध्वनि और वातावरण के और प्रदुषण से मुक्त एक सुंदर खामोशी का एक अलग ही अंदाज़ देखा गया ...महसूस किया गया ...कभी साफ सुथरी दिखती पहाड़ की वादी पल भर में ही जैसे बादलों की चुनर से अपना चेहरा छुपा लेती है । अभी तेज चमकती धुप होती है तो दोपहर बाद जोरदार बारिश भी हो सकती है . पहाडों के वातावरण की ये तासीर आप सभी जगह पर महसूस कर सकते हो ...हो सके तो बड़ी सुबह ही घूमने निकल जाओ और दोपहर तक वापस भी आ जाओ ...
दूसरे दिन हम साइकिल रिक्शा में बैठ कर मुनिसिपल गार्डन गए ।तकरीबन दो तीन किलो मीटर की दूरी पर यह सुंदर उद्यान है . जिसमे एक ग्लास हाऊस है . सुंदर पेड़ पौधे लगे है . बोटिंग की भी सुविधा मौजूद है .लेकिन सबसे रुचिकर तो यहाँ तक पहुँचने का रास्ता ही है .बस्ती पीछे छुट जाती है . इक्के दुक्के प्राइवेट बंगलो ही दिखाई देते है .होती है सिर्फ़ हरी भरी वादी और उसकी बोलती हुई खामोशी ...शाम एक फिर टहलते हुए गुजारी ...मकानों की बनावट गौर करने लायक है .पहाडों की ढलान पर ऊपर से नीचे तक बने मकान बहुत सुंदर लगते है .जिग जाग सडकों पर गुजर रहे वाहन यहाँ से खिलोनोके समान छोटे दिखाई देते है .....
यहाँ पर मुख्य राज्य परिवहन के बस अड्डे से दो छोटे प्रवास की सुविधा है । एक कम्प्टी फाल के लिए है . दिन में दो बार जा सकते है . सुबह में आठ बजे जो दोपहर तक वापस ले आती है . दूसरी दोपहर में चलती है जो शाम को वापस ले आती है . हम सुबह में ही चल दिए .मसूरी से तकरीबन १५ किलोमीटर की दूरी पर और समुद्र की सतह से ४५०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित ये जल प्रपात हम देखने के लिए चलते है .मसूरी तक आता हुआ नजारा यहाँ कुछ अपनी तासीर बदल लेता है . इस चकराता मार्ग पर पहाड़ थोड़े बड़े होने लगते है और पेड़ थोड़े कम .पहाड़ की चोटी से छलांग लगाकर एक जरना सीधे नीचे गिर रहा है ...यही है कम्प्टी फाल .काफी नीचे तक चल कर जाना पड़ता है .अच्छी खासी पैरों की कसरत हो जाती है . नीचे एक बड़ा सा तालाब बन जाता है और नीचे जाकर फिर वह यमुना नदी में विलीन हो जाता है . नहाने के शौकीन लोग यहाँ ये शौक भी फरमाते है . किराये पर स्वीमिंग के कपडे मिल जाते है ॥अब ऊपर चढ़ते हुए समज आती है कि हम कितना नीचे गए थे जब साँसे फूलने लगती है ..ब्रावो आगे कदम बढाओ .....
बेक टू पवेलियन मसूरी ...शाम को माल रोड के केबल कार में बैठ कर मसूरी कि सबसे ऊँची जगह गन हिल पहुंचे ...चारों दिशाओं से मसूरी का विहंगावलोकन किया . ये हँसी वादियाँ ये खुला आसमान ...आ गए हम कहाँ ?....दूसरी सुबह उसी परिवहन कि बस से हम जा रहे है एक कम जाना माना पर अलौकिक सौंदर्य कि मिसाल धनौलती.मसूरी से २५ किलोमीटर पर स्थित इस जगह से हमें हिमालय क्या चीज है उस चीज का सही मायने में परिचय होता है . सब कुछ मानों कि विशाल हुआ चला जाता है चाहे वो पहाड़ हो या गहरी खाई या पेड़ ....हर मोड़ पर धड़कनें तेज होने लगती है .यहाँ मौसम की सबसे पहली बर्फ पड़ती है . सेब के बागान है .बिल्कुल शांत फिर भी रमणीय ,बिल्कुल भीड़ भाड़ नहीं ...नितांत सौंदर्य की बौछार ..निजी वाहन में यहाँ पर आकर दो तीन दिन रुक सकते है ...यहाँ से १० किलोमीटर दूर एक और स्थान है . सुर खंडा देवी का मन्दिर . पहाडी पर स्थित है . तीन किलोमीटर पैदल चलकर जा सकते है . घोडे भी उपलब्ध होते है . चलो वर्जिश का एक और मौका मिला .चोटी पर पहुँच कर एक और सुंदर नजारा देखिये . यहाँ से बर्फ से ढकी बन्दर पूंछ जगह साफ दिख जाती है अगर वातावरण साफ हो ..हम गए तो बादल हमें छू कर जा रहे थे और ऊपर तो हम ऊपर थे और बादल नीचे थे ...सोचो ..सोचो ज़रा ...बादल की बूंदों की ठंडक हमारे गालों को सहला कर भाग रही थी ..लेकिन जब नीचे पहुंचे तो वातावरण एकदम साफ ....वापसी में जोरों की बारिश हो रही थी .धीरे धीरे चलती हुई हमारी बस मसूरी की तरफ़ बढ़ रही थी . प्रकृति का ये अनुपम सौंदर्य आँखों में समाकर हम पहुंचे मसूरी जील ..एक मनोरम स्थान . बोटिंग की सुविधा है . सुंदर पिकनिक स्पॉट है .यहाँ के गर्म कपड़े बड़े ही स्टाइलिश होते है .यहाँ बोर्डिंग स्कूल भी बहुत है . होटल्स की तो भर मार है .केमरेमें कैद करके जो ख़ूबसूरत पल में लायी थी आज फिर आपके साथ एक बार फिर सहला रही हूँ ........हम कितने प्रदुषण युक्त वातावरण में रहते है , कितनी ज़हरीली सांसे लेते है ,और प्रकृति ने हमारे लिए बनायी हुई इस दुनिया की विकास के नाम पर हमने क्या दुर्गति की है उस भूल को आप महसूस कर सकते हो धनौलती में ....कम जानी पहचानी होने के बावजूद दिल में बस गई है ....

उफ़ ये दिल ....

क्या करे इन आंखोको ख्वाबोंकी आदत सी हो गई है ,

ना ना कहते हुए भी हमें किसीकी चाहत हो गई है ...

हमारा ये दिल किसी और की अमानत हो गई है ,

ये क़यामत नहीं तो और क्या है की हमें भी किसीसे मोहब्बत हो गई है ....

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रोशन से चेहरे पर ये कैसा हिजाब आया है ?

जिसे देखने भरसे मुझे ये ख़याल आया है ....

पूनम के चाँद पर जैसे झुल्फों का बादल छाया है ....

शर्माकर कभी यूँही वो चाँद भी चिलमनके पीछे से झांक गया है ....

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6 मार्च 2009

सफ़ेद बर्फ की चादर

सफ़ेद बर्फकी चादर पर लिखा है ,

अँगुलियोंसे अपनी एक नाम ,

अय जिंदगी लेकर आजा एक बहार ,

बितानी है साथ उसके हमें आज एक शाम ......

ढलती हुई शाम के आँचल पर ,

फैली होगी सात रंगोंकी लकीरें ,

एक छोटी से आग के सामने बैठकर

लिखनी है अब हमें कुछ तकरीर ....

पंछियोंका लौटकर जाना होता है घरौंदें में ,

रातकी सुर्ख स्याही तब लिखती है

सितारोंकी दवात लेकर चाँद पर ....

एक दास्तान जो आने वाले कल की होती है .....

1 मार्च 2009

आगोशमें आपकी महफूज़ है हम ....

चलो आज फ़िर आसमांकी आगोशमें कुछ ऐसे खोकर देखें ,
पलकोंके धागोंसे ख्वाबोंकी चादर प्यारी बुनकर देखें .....

बीते वक्तकी आगोशमें कुछ ऐसे हम समा गए थे ...
कुछ अनकहे कुछ कहे से ऐसे अफ़साने याद आने लगे थे ....

आपकी आगोशमें रहकर क्यों हम महफूज़ हो जाते है ?
ढूंढती रहती है नजरें जब आप इनसे कुछ देर ओज़ल हो जाते है .....

लब्जोको आज कलमकी आगोशमें समाना है ,
बेखुद होकर अपनी महोब्बतको फ़िर एक बार फ़िर जताना है ......

तुम्हारी तस्वीरको आज ये नजरोंसे चूम लेना है ,
तुम्हारे कोट की सिलवटोंमें खोकर उसे थोड़ा सा प्यार जताना है .......