28 फ़रवरी 2009

कुछ जो साथ चला साँसोंके ......

जब आस पास मेरी कुछ भीड़ जम सी गई ,

सांसोमें मेरी घुटनसी हो गई ....

कुछ रिश्तोंको जो पुराने हो चुके थे ,

उन्हें मैंने फ्रीज़में जमने रख दिए ...

जमें नहीं वो बर्फ से ,

रखते ही फ्रीजमें वो पिघलकर बह गए .....

उन रिश्तोंको मैंने आगमें डाला ,

राख बनकर वह मेरे सामने पड़े रहे ...

राखको बहा दिया दरियामें

और हल्का सा होने पर घर पर लौट आया .....

ना वो जमे ,ना राख हुए ,ना वो दरिया में बह गए ,

उन रिश्तोंको मैं दिलसे न निकाल पाया था ......

रातको तकिये पर चैनसे न सो पाया ,

बहते हुए अश्कोंमें मैंने उन रिश्तोंको जिन्दा ही पाया ........

27 फ़रवरी 2009

आज कोरे कागजको एक ख़याल आया ...

सूरजकी रोशनी थी आगमें झुलसती ,

चीरकर उसे कभी किसीने भीतर झाँका नहीं .....

नितांत अँधेरा गहरी तन्हाईके गर्भमें समाया था ,

क्या वो सूरज था या उसका साया था ???

अय दीपक ,सूरज के भीतर आज समां जाओ ,

उसे भी आज अपनी रौशनी से रोशन करते जाओ .....

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एक कोरे कागज़का खयालथा कभी उसे कुछ लब्जोंका साथ ,

कलम थिरक जाती थी स्याहीमें डूबी हुई ,

आज तन्हाई में उसे कोई ऐसे ही याद आ गया ,

थोडा सा वो मुस्कुराया ,थोडा सा फिर रो दिया .....

आज एक कोरे कागज़ को एक ख़याल आ गया .....

ओ अजनबी हसीना ....


कारे कजरारे बालों की ये लट,

चान्दसे चेहरे को छू गई ॥,

उस लट को तुम्हारी ऊँगलीने

छूकर जब चेहरेसे हटाया ॥,

मन कुछ यूं बोल उठा यूं ,

लो पूनम का चाँद निकल आया .....

आंखोंके समुन्दरमें ,

उछल रही थी सपनोकी लहरें ऐसे ,

लहरोंके उस खुमारको जैसे तुम्हारी चिलमन पलकोंकी,

आँखों पर गिरकर संभाल रही थी .....

सांसोकी गर्माहटसे ,

तुम्हारे कमल की पंखुडियोंसे ये लब ,

शर्माकर यूं लाल हुए

और गूंजे उसमें से उठकर जो तुम्हारे अल्फाज ,

तो लगा जैसे विरानियोंमें कोयल हो कुक उठी .....

ए अजनबी हसीना ,

ठहर जाओ मेरी जिंदगीमें हमेशा के लिए .....

एक सपना बनकर ही ,

तन्हासी रातोंमें ,

ए जिंदगी तुमसे ,

कुछ गुफ्तगू करनी है ......

25 फ़रवरी 2009

कोई मेरे पास आता है ......

जाने क्यों इस जिंदगीको आज बहलाना चाहा,

जाने क्यों इस जिंदगीको आज सहलाना चाहा .....

फिरभी इस जिंदगीको बहलाना सके ,

उसे पलभर के लिए गोद में बिठाकर सहला ना सके .......

और कोई मेरे पास आता है,

चूपकेसे इन कानोंमें कुछ कह जाता है .....

साथ मेरे चलोगी ?

और साये सा चला जाता है .........

मेरे ख्वाबो को समेटकर खुशियाँ दे जाता है ,

और फ़िर हाथोंसे फिसल कर रेत सा सरक जाता है ,

क्या कहूँ उसे मैं ? चुपसी खड़ी रह जाती हूँ ...

जाना होता है साथ मगर वहीं पर रुक जाती हूँ ........

ये कोई ख्वाब था या प्यारा सा ख्याल !!!

नजरसे ओज़ल होकर जैसे कोई साथ चलता गया !!!!

जैसे जिंदगी रुक गई है मंजिलके पास ,

मिल रही हूँ आज उसे जिसे मिलने की युगोंसे थी प्यास !!!!

24 फ़रवरी 2009

दहकती है मय फ़िर भी ....

रास नहीं आती पतझड़को बहार कभी कभी ,

दिल को टूटकर बिखरना है तेरी राहमें अभी अभी ,

बुलाने पर मेरे तुम दौडे आए हो जब भी जब भी ,

पर आज दिल अपना छोड़कर जाओ मेरे पास आज और अभी अभी ........

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कुछ सिलवटोंकी तह मत खोलो ,

कुछ जज्बातोंको दिलकी कैद से आझाद करने की चेष्टा मत करो ,

कुछ खयालोको सुलझानेकी कोशिश मत करो ,

कुछ ख्वाबोंकी ताबीरकी ख्वाहिश न करो ,

ये सिलवटें हमारी अमानत है,

दुनियासे छुपकर बैठी ख़ुदसे ख़ुद की पहचान है .........

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थिरकती है साँस कभी बुलबुलोंसी ,

महकती है आस कभी खुश्बुओंसी ,

दहकती है प्यास कभी शोलोंसी ,

बहकती है मय खाली पैमानोंमें भी कभी कभी .....

आस जब साँसमें कुछ ऐसे घुलती है जो ......

दहकती है मय फ़िर भी वह बहकती प्यास बुझाती है ......

23 फ़रवरी 2009

क्यूं ..??क्यों ???

ये इश्कका मकाम ही तो है ,

फूलोंके तोहफे जहाँ हमें मिले कई ....

पर आपके फुल हमें लगे कुछ ख़ास है ,

'क्यूँ कि ' आपके फूलोने ही हमें दिए थे जख्म ....


जख्मसे टपका लहू आँखोंसे अश्ककी तरह दरिया बन ,

जब तुमसे बिछड़कर् तनहा जिया करते थे ....

कोई चेहरा तस्वीर बनकर दिलमें नही उभरा कभी ,

"क्यूँ" आपकी तस्वीर आज हमारे रूबरू उभरकर आई है ??


कसक है मीठी प्यारकी जो दर्द बनकर साँस घुल रही है शायद ,

आप सवाल बनकर ही सजी रहे सामने हमारे ,

आपका न हमें कोई भी जवाब मिले ...,

"क्यूँ " जुडा रहेगा जिंदगीसे तो ,

और शायद बनी रहेगी कशिश जीनेकी .....!!!

22 फ़रवरी 2009

"बनारस "

नहीं ये कोई जगह का वर्णन नहीं है ..आज मैं आपके साथ बांटना चाहती हूँ एक फ़िल्म को जिसका नाम बनारस है ...ये फ़िल्म कल रात दूरदर्शन पर प्रसारित हुई थी ...
गंगा नदी के तट पर एक विशाल और भव्य हवेली की सुन्दरता जो देखने से ही हमें अभिभूत कर देती है ..उसमें एक बालकनी थी जिसमेसे कई बार उगते सूरज के दृश्य को फिल्माया गया था .उर्मिला मातोंडकरकी उत्कृष्ट भूमिका देखने मिली जिसे देखकर ये लगा की इस किरदार को उससे बेहतर और कोई निभा नहीं सकता था .राज बब्बर और डिम्पल कपाडिया साथी किरदार थे ....
बात मुझे इस फ़िल्म की नहीं करनी है पर उसका एक संवाद जो इतना गहन है उस पर मैं कुछ अपना विचार कहना चाहूंगी :

"जो सरल है वह सत्य है ..."

ये बात जितनी दिखती है उतनी सरल नहीं है । एक आम इंसान के लिए इसका सार समज पाना शायद अत्यन्त कठिन है ...क्योंकि इसे समजने के लिए एक इंसान को ख़ुद को एक ऊंचाई तक पहुंचना पड़ता है .उस ऊंचाई तक पहुँचने के लिए उसे अपना गर्व ,अहंकार ,व्यक्तित्व का ,ज्ञान का गुरुर इन सबको छोड़कर इस लिबास से बाहर आना पड़ता है .ये सत्य उस छाया की तरह है जो बहुजन समाज के लिए केवल भ्रम या एक पागल सा ख्याल हो सकता है ,पर जिन्हें इस चीज का साक्षात्कार हो जाता है वह इंसान हर पीडा ,हर दर्द ,हर गम ,हर खुशीसे मुक्त होकर एक अनंत आनंद की अनुभूति को अपने में पा लेता है .वह इंसान इतना ऊपर उठ जाता है की उसे पीडा देनेवाला हर इंसान पश्चातापकी आग में जलता है ,इस बात का वह इकरार करता है और वह इंसान उन सबको इतनी सरलतासे माफ़ कर देता है जो शायद आम इंसान के लिए कभी मुमकिन नहीं हो सकता ...ये इंसान दुसरे के हर पीडा दर्द को बिना कुछ कहे ही महसूस कर लेता है .......
नसीरुद्दीन शाह एक ऐसी ही सच्ची आत्मा है जो हर वक्त उर्मिला और उसके मित्र को नजर आती है ..बाकी के सभी इस बात का इनकार करते है यहाँ तक की एक मनोवैज्ञानिक होता है जो ब्लड कैंसर के अन्तिम दौर में होता है वह उसे मानने से इनकार करता है ,पर ये पराशक्ति की बात वह उर्मिला से सुनता है और उस सच्चाई पर यकीं हो जाता है । वह साधुओंकी एक समूह के पीछे जाता है उसे जिस वक्त नसीरुद्दीन शाह की आत्मा का दर्शन होता है उसकी हर पीडा गायब हो जाती है ........

ये बातसे कई लोग तार्किक रूप से सहमत नहीं होंगे ...वे दलील भी करेंगे पर जैसे मैंने पहले है कहा ये हर आम इंसान के समज से परे है ...दर्शनशास्त्र के अभ्यासू भारतीय ग्रन्थ का अभ्यास होने पर भी नहीं पर ख़ुद के अनुभव से ही ये बात का स्वीकार सम्भव हो सकता है .....ख़ुद से ऊपर उठकर ही ...

क्योंकि :
"जो सरल है वह सत्य है ...."

21 फ़रवरी 2009

यहांसे मेरा नाम गंगा है :देवप्रयाग



हमारा प्रोग्राम कुछ ऐसा बना की दो दिन के बाद दिल्ही जाना है ।अब क्या किया जाय ? हमारे पास एक नकशे की किताब थी .कुछ नया ॥कुछ अनसुना सा ..मन्दिरवाले महाराज से भी पूछ लिया .जगह तय हो गई जाने के लिए . सुबह थोड़ा नाश्ता साथ लेकर पहुँच गए पहाड़ों में जानेवाली बसों के अड्डे पर .इन बसों में बैठने का नशा भी अनोखा होता है . जब ऊँचे नीचे जाते रास्तों पर चल पड़ती है ,बल खाती है तब हम पूरे के पूरे इधर से उधर हिलने डोलने लगते है .गर अगली सिट का हैंडल न पकड़ा हो तो लुढ़कना तो लगभग तय ही है . लेकिन ड्राइवर बहुत ही चौकस और होशियार होते है . पहाडियों की ये बसें काफी छोटी होती है .उनमे जीतनी सीटें हो उतने ही यात्री लिए जाते है ...


मुनीकी रेती से बदरीनाथ वाले रस्ते पर हम आगे जा रहे थे ।यहाँ से अब सचमुच हिमालय की गोद में आ जाने का एहसास होता है . ठंड महसूस होती है .रस्ते की एक और है हरेभरे पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ और दूसरी और है गहरी खाईमें नीचे लचकती , बल खाती चाल से चलती हुई गंगा नदी ॥कभी ऊपर तो कभी नीचे देखते हुए प्रकृति के इस नज़ारे को देखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे .रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमियों के पड़ाव बीच बीच में आते रहते थे .यहाँ गंगा और दूसरी कोई और पहाड़ी नदी में खास अन्तर नहीं नजर आता है .उछलते कूदते पानी की तरंगों से जो ध्वनि उठती है उस ध्वनि का अनंत गान सुनते हुए हम आज जा रहे है देव प्रयाग ....


बदरीनाथ केदारनाथ की यात्रा पर जाने वाले सभी पंच प्रयाग के नाम से परिचित होते है ।उन्ही में से एक है देवप्रयाग . इन प्रयागों में विभिन्न नदियों का संगम होता है जो सब आगे चल कर गंगा नदी में विलीन हो जाती है .तीन घंटे का बस का सफर अब समाप्त होता है .बस से उतरकर हमने गाँव में जाने का रास्ता पूछा .वहाँसे नीचे की ओर जाने वाली एकदम छोटी -संकरी गलियों में हम चलने लगे .एक छोटी सी पुलिया आई . वहां पर खड़े रहकर नीचे की और जरा देखो ...हमारे ठीक नीचे थी भागीरथी नदी और उसका तुफानी समुन्दर की तरह उछल के वादियों में गूंजने वाला रौद्र गान .....उस प्रचंड ध्वनि और प्रचंड गति वाली दूधिया सफ़ेद रंग की भागीरथी वही है जो गौमुख से निकलकर अपने में रास्तें में मिलने वाली कई और नदियों को समाकर इधर तक आई है .प्रतिमाके समान ! इस नज़ारे को देखकर मैं स्तब्ध ही रह गई और अनिमेष नयनों से उसे ताकती रही ...वहां से हम दुसरे छौर की और बढ़ गए .सुबह का नाश्ता तो बल खाती बस में कबका हजम हो चुका था . एक छोटी सी दुकान में चाय नाश्ता करके पतले रस्ते पर गुजरते हुए हम आगे बढ़ने लगे ...


उस पतली गली के छौर पर एक बहुत नीचे उतरके जाने वाला घाट का रास्ता आया ।उसकी बहुत ही बड़ी सीढियाँ उतरते हुए हम नीचे triangle जैसे स्थान पर पहुंचे तो हमारे दायीं ओर थी रुद्र स्वरूप भागीरथी और बायीं ओर थी उसको आके यहाँ मिलने वाली अलकनंदा ॥दूर से तो ऐसा ही भ्रम हुआ की यह कोई नदी नहीं है पर एक हरा सपाट शीशे की सतह की तरह एक जगह है . दोनों ओर काले ऊँचे पहाड़ .बिल्कुल स्थिर दिखने वाला पानी का प्रवाह जिसकी गति शायद भागीरथी से भी तेज थी .दोनों नदियाँ मिलती नहीं है पर प्रचंड वेग से यहाँ पर टकराती है .दूध जैसे सफ़ेद झाग वाली प्रचंड वेग से उछलती हुई भागीरथी और प्रचंड वेगको अपने गर्भमें समाकर सतह पर चिकने घड़े की तरह शांत दिखती हुई अलकनंदा यहाँ पर मिले और ये बन गया देवप्रयाग ....


किसी गुजराती दानवीरने यहाँ पर पक्का घाट बनवाया है । यहाँ पर आप अपने पितृओं का तर्पण भी कर सकते है . यहाँ का गंगाजल शायद सही मायने में शुद्ध गंगाजल की तरह आप किसीको प्रसाद की रूप में दे सकते है .बद यहाँ से दोनों गले मिलकर ( या एक दूसरे से भिड़ कर ) हंसते हुए आगे बढती ये हमारी नदियाँ ...वहां पर तिकोने घाट पर बैठकर दोनों को लिपट के आगे जाते हुए देखना एक विरल अनुभव है .ये जगह सड़क से काफी नीचे उतरकर आती है .सड़क पर चलने वाले वहां यहाँ से खिलौने की तरह नजर आते है . आगे बड़ी सी बस्ती भी है .यहाँ पर दोनों प्रवाहों के मिलन के स्थान पर पानी पैर रखकर दो घंटो तक हम बैठे रहे तब जैसे हमें आनंद की समाधि सी लग गई .यहाँ लोगों की ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं होती है ...


किंतु मैं ये कहूँगी की दिखने में बिल्कुल आम नजर आनेवाली इस जगह पर मुझे वह खुशी मिली जिसे शायद शाश्वत शान्ति , या अलौकिक आनंद कह सकते है . सबसे अहम बात यह है की उदगमस्थान से यहाँ तक गंगा को सिर्फ़ भागीरथी के नाम से ही पुकारा जाता है और इस संगम स्थान के बाद उसे गंगा के नाम से पहचाना जाता है जो कोलकातामें गंगा सागर से मिलती है .(कोलकाता में इसे हुगली कहते है ) .इस जगह पर सुभाष घई की फ़िल्म 'किसना' का एक गीत भी फिल्माया गया है .वापसी में ढलती हुई शाम के साथ फिर वोही अदभुत नजारोंको देखते हुए हम ऋषिकेश की और लौट पड़े .नक़्शे में देखकर हम इस जगह पर गए थे . हमारे प्रवास में यह एक सीप में छुपे मोतीकी तरह बंद हो गई जैसे की मैंने आपको मुनी की रेती वाले अंक में बताया था .एक सुखद अनुभव , एक शांत परिचर्या ,एक अदभुत और अलौकिक आनंद की अनुभूति ..........

एक सांस .....

पहली सांससे आखरी सांसका सफर है ये जिंदगी ,

कभी महक फूलोंकी बनकर सांसमें समाती है ....

कभी आसमांकी भीगी बूंदोंसे ये सांस नहाती है ...

कभी जाडेके मौसममें रजाई ओढ़कर ये सांस सो जाती है ...

कभी गर्म धूपकी तपीशमें कड़कती धूपमें ये सांस पिघल जाती है .....

कभी किसी एक खास मौसममें ये सांस किसीका प्यार का संदेशा लाती है ....

कभी खयालोंमें किसीको बुलाकर ये सांस बहक जाती है .........

आसमां ये सारा अमानत है मेरी ये बात सबको ये सांस बताती है ...

कभी किसी गैर को मिलकर अपनापन ये सांस जताती है .....

जब थक जाती है ,पक जाती है तब ये सांस रुक जाती है ....

ये पूरा सफर है जिंदगीका जिसे ये सांस बनाती है .........

20 फ़रवरी 2009

खामोशीका गीत .........

तुम मिले तो क्या मिले ,चलते रहे कुछ सिलसिले ,
हवाओंमें,फिजाओमें ,रंगत घुल गई ,प्यार परवान चढ़ गया ...

साँसोंमें ,खयालोमें ,पलकोंमें तुमने आशियाना एक बनाया ,
मेरी जिंदगानी के बंद दरवाजे पर चुपकेसे दस्तक दे दिया ....

बंद दरवाजेके दूसरी और तुम्हारी साँसे सुनाई देती थी ,
हवाओमें हम दोनोकी खामोशी जैसे प्यार का गीत गाती थी .....

शब्दोको सहलाने,मैंने साँसों का संगीत सुनने बंद दरवाजा खोल दिया ,
तुम्हे देखने से कबसे तरस रही थी आँखें ,दीदार करते बंद हो गई ....

बंद होते पलके ,अहसासने कुछ घुटन महसूस हुई तो लबोंको खोल दिया ,
रुक जाओ मेरी जिंदगी में जिंदगीभर के लिए ये हौले से बोल दिया .......

19 फ़रवरी 2009

ओ ख्वाब तुने क्या किया ???

कोई कसर रखी बाकी अय जिंदगी तुने रुलानेमें ,

बस मैं ही बेशर्म हूँ जो तेरी इस अदा पर हंसती चली गई ....

ऑंखें देखती रही ख्वाब फूलोंके ,

पैर मैं तू काँटों के नश्तर बनकर चुभती रही ,

ख्वाबोने मेरे मुझे गहरी नींद जब सुला दिया ,

अय शमा !! तू क्यों रात भर रोती रही ???

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यादोंके दरख़्त पर छाई है बसंत,खुश्बूसे भरले आज अपनी सांसोंको,

कल जब परछाईं घेर लेगी हमें फिराककी,चाहतमें जियेंगे तेरे दिदारकी

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तुम्हारी तस्वीर को हमने दिलमें बसा लिया है ,

यादों को तुम्हारे साथ जिए लम्होकी गले से लगा लिया है ,

हमें प्यार तुमसे है कितना बताने की जरूरत नहीं पड़ी ,

तुमने जो हमको अपनी धड़कन बना लिया है

बचपन की मीठी यादें


बचपन ...!!!


कैसा भी हो पर है हर एकके जीवन का ये खुबसूरत सा लम्हा होता है ..आज बात कर रही हूँ बचपन की ..मेरे अपने कुछ पन्ने बचपन के बांटना चाहूंगी ...पर ये लिखने से ज्यादा ये महत्त्व उसका होगा जो मैंने नहीं लिखा ....आज के बच्चे ,आज के युवा के स्ट्रेस का कारण भी है और उपाय भी ......


मेरे मानसपट पर अंकित है ये युग बचपनका जिस पर राखी जाती है ये जिंदगी की इमारतकी नीव ॥!!!


लगभग तीन सालके बाद की यादे कुछ याद है ..वडोदरा के एक इलाके में रहने के बाद मेरे पिताजी को ओ एन जी सी कालोनी में मकान मिला .यहाँ से मैंने अपनी स्लेट पर १,२,३ और क,ख ,ग लिखना सिखा ।


हमारे पास पड़ोस में सिर्फ़ हमारा परिवार ही गुजराती था । पास पडौस में कश्मीरी से कन्या कुमारी तक के लोग आते जाते रहे ..तबादले के तहत ...पञ्जाबी ,बंगाली लोगों के साथ रहना और उनके तौर तरीके ,त्यौहार वगैरह जानने का मौका मिला ..मुझे घर में और स्कूल में गुजराती भाषा का प्रयोग करना होता था .घर के आसपास मैंने हिन्दी हो बोली है ..इस लिए गुजराती और हिन्दी लगभग साथ साथ ही पढ़नी लिखनी सीखी ..इस कारण आज भी जब मैं हिन्दी बोलती हूँ तब मुझे कोई गुजराती हूँ ऐसा नहीं मान सकता ।


पड़ोसमें बंगाली आंटी जब मछली बनाती तब उसे कटते वक्त मैं उसे देखती उसके बारे में पूछती .हालाँकि हम शुध्ध शाकाहारी थे पर मुझे इसे देखने की बहुत मजा आती ..हमारी कालोनी बनी उससे पहले वहां खेत हुआ करते थे । साँप ,नेवले ,छिपकली ,स्यार तो यूँही देखने मिल जाते ..मुझे साँप को देखने का मजा आता था ..अकेली होती तो उसके पीछे पीछे चलती रहती ...घर में ये शैतानी किसीको नहीं बताती .मैंने एक इंच से लेकर १० फिट तक के साँप देखे है .ऊँची घास में चलना तितली पकड़ना ,छुपन छुपी खेलना ,पेड़ पर चढ़ना ,फुल तोड़ना ,बारिश में पेड़ की डालिया हिला कर पानी से खेलना , भरे हुए पानी में छापक छाई खेलना , गित्त्ते ,कंचे ,गुल्ली डंडा ,यहाँ तक की मेरी मम्मी के कपड़े पीटने वाला डंडा लेकर क्रिकेट खेलना ......मस्ती ही मस्ती .....सब बच्चे ऐसे ही ...साथ में बस में बैठकर स्कूल जाना ..कभी देर से बस मिले या ना मिले तो पैदल तीन किलोमीटर तक पैदल जाते ताकि देर से आने की सजा न मिले और सीधे क्लास में जाकर बैठ जाना ......


वेकेशनमें सूरत चाचा के घर जाना ..दीवाली हो या गर्मी की छुट्टी हर वेकेशन वहां ही गुजरा .सभी बहने मिलकर हुडदंग मचाना ,मम्मी से पैसे लेकर बर्फ के गोले खाना ,किराये पर सायकल लाकर सूरत की छोटी छोटी गलियों में सरपट दौड़ना और कभी कभी चोट लगा कर चुपचाप वापस आना ...एक दीदी अहमदाबाद से आती , मैं वडोदरा से जाती और दो बहने सूरत की ...स्कूल में हुए हर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आदान प्रदान यानी की पुरे दिन नाटक और नृत्य करते रहते ...चाची चिल्लाती तो भागकर चले जाना ..और फ़िर थोडी देर में शुरू ...आज ये याद करते हुए आँखे भर आती है ॥


सच कहूँ तो दुनिया भर की दौलत भी आ जाए तो भी अपना बचपन को कोई वापस नहीं खरीद सकता ।


इम्तिहान क्या होता है वो चौथी कक्षा तक मुझे पता ही नहीं था .पर अपने पाठ्यक्रमकी सारी पुस्तकें पढने की बहुत मजा आती थी ..मैंने स्कूल में बारहवी कक्षा तक हमेशा प्रथम क्रमांक ही कायम रखा पर मुझे याद है जब मैं आठवी कक्षामें थी तब दुसरे इन्टरनल एक्जाम में एक शादी में जाने के कारण चार मार्क्स से मेरा दूसरा रेंक आया .टीचर्स रूम में भी उसका चर्चा हुआ .एक सर ने मुझे ताना दिया : नीचे उतरना शुरू हो गया ? मैंने कहा सर अभी वार्षिक परीक्षा बाकी है ...मैंने तय किया पुरे चालीस मार्क्स से अपना स्थान वापस ले लुंगी ...वार्षिक परीक्षा में पुरे चालीस मार्क्स से मेरा प्रथम क्रमांक पुनः प्राप्त कर लिया ..ये था मेरा अपने आत्मविश्वास से पहला सामना .... पढ़ाई के साथ हमेश वक्तृत्व स्पर्धा ,निबंध स्पर्धा , सुगम संगीत की स्पर्धा हमेशा हिस्सा लेती और इनाम भी जरूर से जीतती । अपनी स्कूल को मैंने शहर कक्षा तक राज्य कक्षा तक भी प्रतिनिधित्व किया .सभी शिक्षकों की लाडली थी ...घर जाकर पढ़ाई करना ...मम्मी पापा को कुछ कहना नहीं पड़ा ...


मेरा पढ़ाई का तरीका कुछ अलग था ...नियमित गृहकार्य करती थी ..और परिक्षाके अगले दिन पढ़ाई करके परीक्षा देती थी ...बारहवी कक्षा में भी मैंने न कोई ट्यूशन लिया न कोई कोचिंग क्लास गई ...फ़िर भी बारहवी कक्षा कोमर्स प्रवाह में मेरे ७२% के साथ अपने शहर में तीसरा स्थान पाया । उस वक्त ७८% से राज्य में प्रथम क्रमांक आया था ...ये बात है १९८० की ...


पढ़ाई के साथ मैं वडोदरा के आकाशवाणी के रविवार को आने वाले बच्चो के कार्यक्रम में भी हिस्सा लेती थी .उसकी संचालिका ने मुझे वहां का ऑडिशन टेस्ट देने के लिए प्रोत्साहित किया । जब ये परीक्षा थी उस दिन मेरी मम्मी ने देखा की वहां खूब पैसे वाले लोगोंके बच्चे कार में बैठ कर आ रहे थे ...हम बिल्कुल साधारण घर के थे ...मम्मी को उम्मीद नहीं थी ...पर ये टेस्ट मैंने पास कर लिए और ६ साल तक नाटकमे भाग लेती रही ...वो थी मेरी पहली कमाई थी ......


कुछ ऐसा भी होता है बचपन में की वो यादें हमें दुखी कर देती है ...पर अगर खुश रहना हो तो ये यादें भुला कर अच्छे किस्से को याद करो और खुश रहो ये मेरा उसूल रहा है ....


ऐसा था मेरा बचपन ........


आपको भी मेरे साथ बहुत कुछ याद आ रहा होगा ...उसे प्यार से याद कर लो आज ...आज कलके सुनहरी यादों में जी लो .....

18 फ़रवरी 2009

चलो जिंदगी तुम्हे तक़दीर से मांगते है .......

बेसुध हो जाते है ,होश भी कुछ खो से जाते है ..
अल्फाज़ हमारे उस वक्त जैसे सो जाते है ,
सपने भी पलकोंसे वापस चले जाते है ...
ये करिश्मा तेरी कलम का ही है महकती है गुलजार सी जो ,
हम शब्दोंमें लिपटे अफसानोंमें हमारी दिलरुबाका दीदार करते है
होश खो जाते है जब तसव्वुरसे तुम्हारे तो तुम्हे तक़दीरसे मांग कर देखते है ...
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जज्बात हममें छुपे हुए ऐसा रंग लाते है ,
दबी हुई ख्वाहीशोंको कलमकी स्याही बनकर उजागर कर जाते है .
कभी कभी किसीका साथ होते हुए हम भीड़ में भी तनहासे हो जाते है ..
तन्हाईके आलमसे गुजरते हुए कभी हम यादों के मेलेमें घूम आते है ...

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आंखोमें कुछ सपने सो रहे है जगाना नहीं ,

नींद तुम्हें थोडी देर बाहर जाना नहीं ,

चलो नींद आज इन सपनोंको मेरे पास छोड़ जाओ ,

तुम्हे गर जाना है तो रात कुछ और सपनोंको साथ लेकर आ जाओ ................

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17 फ़रवरी 2009

आधा वो चाँद मुझे बुलाता है ......

रातके पिछले पहरमें
एक शीतल स्पर्श मुझे जगाता है....

आंखे खोलकर जब देखा
खिडकीके बाहर आसमानमें
आधा वो चांद मुझे बुलाता है.....
कुछ अपनी सुनाता है, कुछ गुनगुनाता है...
अनकही अनसुनी बातोंका दौर यूं ही चलता है....
वो सुननेके लिये दबे पांव सूरज भी आ जाता है
तब चांद शरमाकर उसकी रौशनीके दामनमें
फिर आनेका वादा करके
एक बार और छुप जाता है......

इंतजार है मुझे फिर उसके आनेका,
पर नींद पर ऐतबार नहीं,
शायद वो अपने दामनसे मुझे छोडे ही नहीं,
चांद आकर भले बुलाता रहे ,
मेरी आंखोसे अपना कबजा वो छोडे ही नहीं......

चिंता छोडो जो भी हो ...
बस याद को वो चंद लम्होंकी
जहनमें सजाता है.....
फिर एक बार हम भी चांद
तुमसे मिलने यूं ही आयेंगे.........

16 फ़रवरी 2009

चलो प्यार का खुमार था उतर गया.....

एक बात निगाहोंके इशारों में थी ,

एक बात लब्जोकी नजाकत में थी ,

एक बात खामोश जज्बातोंमें थी ,

पर याद नहीं आ रहा वो बात क्या थी ?

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कल शाम उनसे आंखों आंखोंमे गुफ्तगू हो गई ,

शायद सोये नहीं होगे मेरे ख्यालों में रात भर तो आँख उनकी लाल हो गई ,

दूसरी सुबह जब चेहरे को ख़ुद के देखा तो राज़ पता चला लाल आंखोंका ,

हमसे नजरे मिलकर हमें conjuctivitis देकर चली गई ......

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15 फ़रवरी 2009

अनदेखी अनजानी सी : शमा

मैं संजय सूरी....
मेरे शहर श्यामपुरके दैनिक अखबार " जागरण्" का एक पत्रकार...
उम्र है सिर्फ ३२ साल, पर मेरी कलमकी तेजी और जादूने मुझे जल्द ही एक ऊंचे मकाम पर पहूंचा दिया है. इस सालका श्रेष्ठ नवोदित पत्रकारका पारितोषक मुझे इस बार मिलने जा रहा है, किन्तु इस बातका मुझे जरा भी उत्साह नहीं है.....क्यों???
इसके पीछे एक कहानी है......
आजसे आठ साल पहलेकी बात है. नया नया आया था इस शहरमें अपने वतन बिहारसे..अब इस श्यामपुरके पोश इलाके के.के.रोड पर पिनाज सोसायटीमें किराये पर मकान ले रखा है. सोसायटीके सबसे पीछेकी कतारमें कोमन प्लोटके पास... मेरे कामके हिसाबसे यहां सिर्फ शान्तिका माहौल होता है. यहांसे मेरा दफ्तर भी पास पडता है.
रातको कोमन प्लोटमें सोसायटी के सभी उम्रके लोग यहां इकठ्ठा होकर गपशप करते है. सभी अपने रस और रुचिके अनुसार टोली जमाकर बैठकर वहां हरे भरे लॉन पर बैठ जाते है. मेरे हमउम्र आठ दस युवकभी है. शोएब उसमेंसे एक है. वह रोज वहां आता है. और उसके साथ मुझे शायद सबसे ज्यादा मजा आता है. रीपोर्टींगके अलावा मैंने एक अपना एक कोलम भी लिखना शुरू किया. यहांके विविध लोगोंकी जिन्दगीसे जुडे कई किस्से यहां सुनता तो था ही . उस पर से प्रेरणा लेकर एक संदेशके साथ लिखा गया कॉलम पहले ही हफ्तेसे काफी लोकप्रिय हो रहा था. इसे लेकर मेरे अखबारके वाचकोंकी संख्याका भी काफी इजाफा हुआ . इससे खुश होकर मेरे तंत्री एवम मालिकने मेरे वेतनमें भी काफी इजाफा कर दिया. बडा ही खुश था इन दिनों मैं................

एक दिन एक अजीबसा सिलसिला शुरू हुआ मेरे साथ. रोज एक गुलाबी लिफाफेमें मेरे लिये एक खत आता था. मेरी कोलम जिसका नाम था " जीना इसीका नाम है" उसकी तारीफ सिर्फ आठ दस पंक्तिमें लिखी हुई होती थी. उस पर न किसीका नाम होता था ना पता...
आठ दस दिनके बाद मैंने डाक विभागके मिश्राजीसे इस बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि ये डाक तो सुबहमें लेटरबोक्ससे ही उन्हें मिलती है. कौन डाल जाता है कुछ पता नहीं....
खैर ये खत आने का सिलसिला यूंही चालु ही रहा.
अब इन खतोंमे तरह तरह की जिन्दगीसे जुडी बातें भी लिखी रहती थी. मुझे तो जैसे अपनी कॉलमका सारा मसाला बैठे बिठाये मिलने लगा.लेकिन ये खतके रहस्यकी गुत्थी मैं सुलजा नहीं पा रहा था. मैने एक तरकीब निकाली . इस खतकी बातोंकी जमकर आलोचना करनी शुरू कर दी. खूब मजाक भी उडाने लगा. पर ये खतोंका सिलसिला फिर भी न रुका.........
अब मेरे दिमाग पर ये रहस्यमय व्यक्तिका पता लगानेकी धून सवार हो गई. छोटेसे सील परसे मैं उस कुरियर कंपनीके पास जा पहूंचा. उन्होंने भी मिश्राजी वाली बात दोहराई. और पैसे तो कैशमें हर वक्त जो व्यक्ति ही आकर दे जाता है वह बहरा और गूंगा है.

एक दिन ये सिलसिला टूटा...
एक ..दो...तीन.... पंद्रह दिनों तक खत नहीं आया. मेरी बैचेनी दिन ब दिन बढने लगी...
एक महिना बीत गया. आज् मैं सोसायटीकी रात्रिसभामें बिलकुल खामोश सा बैठा हुआ हूं. मेरे जहनसे वह खत नहीं हट पा रहे है. शोएबने मेरी खामोशीकी वजह पूछी. मैने पूरी दास्तां बताई. उसी वक्त शोएबके मोबाइलकी रींग बजी. शोएबने मुझे अपने साथ चलने को कहा. मैं उसके साथ चल दिया.घर पहूंचते ही शोएबने बताया उसके जीजाजी का एक्सिडेंट हुआ है. मैं अम्मीजान को लेकर होस्पिटल पहूंच रहा हूं. और तुझे एक जिम्मेदारी सौंप रहा हूं. मेरी बहन शमा अंदरके कमरेमें सो रही है. मेरी चचेरी बहन नजमा आपा एकाध घंटेके भीतर यहां पहूंच रही है. तुम उसके आतेही घर चले जाना. और शमा कुछ मांगे तो फ्रीजसे निकालकर उसे दे देना.
मैं कमरेमें इधर उधर घूम रहा था.शोएबके राईटींग टेबल पर एक डायरी देखी. उसका एक पन्ना पलटा. एकसे बढकर एक खूबसुरत शेर, शायरी, नजमें और गजलोंका जैसे नायाब खजाना हाथ आ गया. मैं तो बस मदहोश होकर पढने ही लग गया...

अचानक अंदरके कमरे से आवाज आयी. शमाकी आवाज थी," अम्मीजान जरा पानी देना तो..." ऐसा लगा जैसे कोयलकी कूक सुनी हो. मैं जल्दी ही फ्रीजसे पानीका जग लेकर पहुंच गया. एक अजनबीको अपने कमरेमें देखकर वह चौंक पडी. मैने हकीकत बताकर अपना परिचय दिया. जब वह सोने लगी तो मैंने देखा ये तकरीबन अठारह उन्नीस सालकी इस लडकीके दोनों पैर पोलियोग्रस्त थे. पर उसकी आंखे जिन्दगीकी चमक लिये हुए थी. चेहरा एक जीती जागती गजलका शब्द रुप था. वह सोने लगी तो मैं कमरे से निकल गया...
मैने डायरी फिरसे पढनी शुरू की. अब चौंकनेकी बारी मेरी थी. मैने डायरी का नाम पढा. शमा बख्तावर... लिखावट वही जो मेरे पर आये उन अनगिनत खतोंमें हुआ करती थी.
अब मेरी नजर बाजुमें पडी हुई एक डाक्टरी रिपोर्टकी फाईल पर पडी. जिसपर भी शमा बख्तावर लिखा हुआ था. मैने पलटकर पढा. उसके दिलमें जनमसे ही छेद था. उसके जीवनका अंत कभी भी हो सकता था. जो बीते वह दिन ..कब ये डोर टूटे उसे कोई न जानता था. मौतकी आगोशमें सोई इस लडकीने मुझे जीवनकी उंचाई तक पहूंचा दिया था. मैं उसका कर्जदार बन चूका था.
डायरीके अंतमें एक पोस्ट न किया लिफाफा मिला. जो शायद कल ही लिखा था.
" आप मेरी खोज खबर कर रहे होंगे पर अब मैं ऐसे छूप जानेवाली हूं जहांसे मुझे कोई ढूंढ
नहीं पायेगा. मैं तो आपको पहचानती हूं .आप शोएबभैया के दोस्त हो. मैने आपके बारेमें सुना है पर आपको कभी देखा नही है.अल्लातालासे दुआ करुंगी मरनेसे पहले मेरी आरझू पूरी हो जाये आपको एक बार देखने की. डॉक्टरोंने जिस लडकीकी आयु सिर्फ ५ से ७ साल तक बताई थी उस लडकीको आपकी कॉलमने आज तक जिन्दा रखा है..शुक्रिया मेरे दोस्त.......मैं शमा हूं और जल जाना मेरी फितरत..अलविदा...."
कमरा छोडते वक्तकी उसकी हल्की सी मुस्कराहट इस पहचानका सबूत थी....
नजमाआपा आ गई और मैं अपने घर लौट आया हूं पर नींद अब कहां आयेगी????
दो दिन के बाद ही शमाका इन्तेकाल हो गया. शायद मुझे देखने की इच्छा पूरी जो हो चूकी थी. वह दिन मेरी कॉलमका आखरी दिन बन गया....

इनामकी रकम मैने शमाके नाम एक चेरिटेबल ट्रस्टको दानमें दे दी. और शमाकी उस खूबसुरत डायरीको पुस्तकका रुप देकर दुनियाको पहूंचाया उसकी बिक्रीसे मिली पूरी आय गरीब परिवारके दिलके मरीजोंके मुफ्त इलाजके लिये खर्च की जाती है.....

ये मेरी उस अनजानी प्रेरणा बन जानेवाली प्रशंसकको श्रध्धांजलि थी............

ये एक काल्पनिक कहानी है इस कहानी का कोई जीवित या मृत व्यक्ति के साथ लेना देना नहीं है ।

मेरे विचारों में जो सकारात्मकता है वो किसी एक व्यक्ति की प्रेरणा ही है जिसके विचारोंने मुझ पर सबसे बड़ा असर छोड़ा है .

14 फ़रवरी 2009

चलो इश्क का मतलब समज ले ....

जान फ़ना कर दूँ ये मेरे प्यार की रुसवाई होगी ,

दिलमें छुपा कर याद तेरी बस यूँ ही जिए जाऊँगा ....

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करम कर दो आज इस नाचीज पर जरा सा ,

पलके उठाकर इक निगाह हम पर निसार कर दो ,

राहों पर बैठे हुए है हम नजरें बिछा कर कबसे ,

बस इन लबों से प्यार का इजहार करके हमें जिंदगी इनायत कर दो .....

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रस्मोवफ़ा के मायने तो हमें मालुम नहीं ,

हर साँस हमारी उनके नाम है ये उनको बताना है ,

इस वीरान दिलमें जिसकी दस्तकने इसे धडकनों से भर दिया ,

दिल के इस कोरे कागज़ पर बस उनका नाम ही लिखना है ....

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प्यारके मायने ढूँढने मैं सब किताबें खरीद लाया ,

पर तेरे एक दीदार से धड़का जो ये दिल मुझे प्यार का मतलब समज आया ...

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दो मुलाकातोंमें चार मीठी से बातमें ,

जरूर कोई प्यारी सी कशिश रही होगी ,

रात भर नींद का आंखों से ओज़ल हो गई ,

और तुम्हारी याद मेरे दिल के आशियाने को शमा बनकर रोशन कर गई ...

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क्या यही प्यार है ???

आज सुबहकी चाय के कपमें चाय की जगह चिठ्ठी पायी ,

आज इस कपमें प्यार भरा है आज इसे जी भर के पी लो ....

नाश्ते की डिशमें चिठ्ठी ही पायी लिखा ये था ,

प्यार तो महसूस करने की दास्ताँ है ये दिखेगी नहीं ......

लंच बॉक्स लेकर ऑफिस रवाना हुआ ,

वहां भी दोपहर को हर डिब्बेमें चिठ्ठी का पाना हुआ ,

यहाँ प्यार रूप बदल कर मौजूद रहा ,

लाल हरी पिली चिठ्ठी में रंग और स्वाद मिला रहा ...,

आधे दिन की छुट्टी थी घर आया तो ताला था ,

खोलकर दरवाजा अन्दर गया तो डाइनिंग टेबल केसेरोल से सजा था ,

इतना स्वादिष्ट खाना पहले कभी नही लगा क्योंकि ये प्यारकी गार्निश थी ,

पानी के ग्लास के नीचे दो सिनेमा की टिकेट थी ....

हँसता हुआ मैं तैयार होकर रवाना हुआ ,

वहां पर मेरी हमसफ़र हमनवा खड़ी थी बाहर ,

पहनकर मेरी सबसे ज्यादा पसंदीदा साड़ी ...

दोनोने हाथमें हाथ डालकर हॉलमें एंट्री ले ली .....

और फ़िर देखी भी क्या ये सिनेमा ,

नाम था जिसका रब ने बना दी जोड़ी ..........

13 फ़रवरी 2009

प्यार के मौसम में आज फ़िर ...

कहते है सच्चा प्यार किस्मतवालोको मिलता है ,

चलो इस बार प्यार के लिए इस किस्मतको आजमाया जाए .....

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खिले हुए फूलोंमें बहारका नजारा कर लिया ,

गुजरते हुए राहों पर हमसफ़रका इंतज़ार कर लिया ,

बड़ी ही शिद्दतसे चाहते हुए हमने भी प्यार कर लिया ,

जिन्हें ख्वाबोंमें देखा था आज उनसे प्यार का इज़हार भी कर लिया ......

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बरसातकी बूंदे कुछ जमीं थी उस चेहरे पर ,

लगता था जैसे औस सज रही थी गुलाब पर ,

बसंत के इस दिलकश मौसममें बस कुछ ऐसा कर जाऊं ,

जिंदगी बनी हो तुम तो तुमसे एक बार जी भर के प्यार निसार कर जाऊं .....

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उल्फतमें हमने एक सपनोंकी दुनियाको सजा रखा है ,

कुछ नाजुक कांच सा दिल सीनेमें छुपा रखा रखा है ,

चलो आज आपकी खिदमतमें ये दिलका नजराना पेश हो जाए ,

दुआ करते है रबसे उनको भी हमसे प्यार हो जाए .......

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देखा था तुम्हे ख्वाबोंमें ,चाहा था तुम्हे , माँगा था तुम्हे रबसे ,

दीदार किया है आज जो चाहत है मेरी ,पर आज कुछ मांगना नहीं ,

तुम्हारी निगाहों के आयने में अक्स देखा जो हमारा ,

शर्मोहया के परदे हटा कर कहते है दिलोजानसे तुम्हे प्यार करते है ......

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12 फ़रवरी 2009

चलो फ़िर आया एक प्यार का मौसम .....



प्यारकी बसंत बहारमें एक दिलकश मंझर पर ये दिल खड़ा है ...

सामने गुलिस्तान खिला है ,बाहर लिखा है अंदर आना मना है ......

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शर्तों पर किया गया था ये प्यार एक बार ,

उन शर्तोंने ही तोडा था मेरा दिल बार बार ,

माँगा था ,चाहा था उनकी वफ़ा को हरदम ,

पर दे न सके हम प्यार का लम्हा एक बार .........

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ये हाथ में है एक लाल गुलाब ,

ये आंखोंमें है किसीका इंतज़ार ,

ये राह जा रही है उनके घर तक ,

ये लबोकी चाहत है कर दूँ आज प्यार का इज़हार .......

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प्यार का मौसम आया है तो

एक प्यारी सी गुस्ताखी हमें भी करने दो ...

तनहा खड़े रह कर एक दरख्तकी छाँवमें ,

निगाहोंसे हमें उनको प्यार करने दो ........

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आज तुम्हे मैं क्या नाम दे दूँ ?

कह दूँ ये दोस्ती है या इसे प्यार का नाम दे दूँ ?

कशमकशमें दिल उलज कर रह जाता है ,

चाहत है कदमोंमें आपके आज मेरा ये दिल रख दूँ ........

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11 फ़रवरी 2009

वेलेंटाइन डे : समज लो प्यार का ये मतलब ...!!!!

कहते है संत वेलेंटाइन की यादमें प्यार करने वाले ये दिन मनाते है । तो आज एक ख्याल आया :प्यार को सही मायनेमें समज पाना क्या मुमकिन है ???प्यार को अभिव्यक्त करने का सिर्फ़ एक ही दिन १४ फरवरी ?मैंने जिस रूप में प्यार का अहसास किया है उसकी एक झलक :

=पहले प्यार का एहसास हुआ माँ के पहले स्पर्शमे... आज तक रूप बदल बदल कर वही प्यार आज तक बह रहा है ...

=प्यार का एहसास हुआ पिताजी के लाडमें आज तक कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई ....

=प्यार का एहसास भइया के प्यार में आज तक बरक़रार है ......

=प्यार उन हर रिश्तोंसे मिला जो मेरे जन्म के साथ मुझे सौगात मिलकर मिले ....

=प्यार उस पल से मिला जब किसीको देखकर मेरा दिल पहली बार एक अनूठे एहसास के साथ जोरों से धड़का ॥

=प्यार उस प्रतिकृति में देखा जो मेरे शरीर का ही एक अंश बनकर इस दुनिया में आई और प्यार का मायना ही मेरे लिए बदल गया ....

प्यार को सही मायने में मैं तब ही समज पाई .प्यार जो देनेके लिए ही बना है ..बिना किसी से कोई उम्मीद किए प्यार देकर देख लो ...सबसे ज्यादा खुशी और सुकून आपके उस पल से मिल जाएगा ...

बस इस प्रवाह को निरंतर प्रवाह को बह जाने दो जी भर के ...

सबसे पहले प्यार करो अपनी इस जिंदगी को जो हमेशा किसी न किसी रूप में आपके साथ हर कदम चलती रहती है ।

=प्यार करो हर गम और हर दर्द से भी जिसने आपको ये महेसूस कराया की आप भीतर से कितने मजबूत है ??

=प्यार करो मुस्कानोंसे जो आपके होठों से निकल कर दूसरों के होठों पर फूल की तरह खिलती है ।

= क्या प्यार सिर्फ़ एक दिन का मोहताज है इस तेज रफ्तारसे भागती हुई दुनिया में ??!!प्यार तो शुरू होता है आपके जन्मसे और उसका अंत तो कभी नहीं होता क्योंकि शरीर पंचमहाभूत में विलीन होने के बाद भी वह प्यार किसीके भी दिलमे जिन्दा ही रहता है ..प्यारको अमरत्व का वरदान जो मिला है ...!!!

==== लेकिन शुक्रिया करना चाहूंगी मैं उस रब का जिसने एक आज़ादी दे दी मुझे दोस्त बनाने की और एक नि:स्वार्थ प्यार मुझे इस खुबसूरत रिश्ते से मिला ....मुझे बहुत ही प्यारे और खास दोस्त मिले जिन्होंने जी भर के मुझे प्यार दिया और मेरे हर गम और खुशी में मेरे हमसफ़र बनकर साथ चलते गए ........

**** प्यार करो जिंदगीसे , हर उस रिश्तेसे ,हर जाने -अनजाने व्यक्ति से जो आपसे कहीं न कहीं संलग्न है ।

*** दुनियाके हर जर्रे से ,हर जिव से जिसने इस दुनिया को इतनी खूबसूरती बख्शी है ..हर दम ...हर पल ...

=प्यार हर पल जिलो , उसे एक दिन का मोहताज मत बनाओ ।

आज आप एक गैर को अपना लो जिसे प्यार की जरूरत है ,

खुशियाँ उन्हें देकर देखो ,क्योंकि उनको भी प्यार की आप जीतनी ही जरूरत है .......


10 फ़रवरी 2009

ये जिंदगी की दास्ताँ भी अजीब है ....




मेरी खामोश निगाहों को जो पढ़ लेते तो तुम्हारे दिल में ये ख्याल ही न आता ,

तुम किसी ओर के न होते ,गर तुम्हे अपने दिल पर ही पूरा ऐतबार होता .......

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इश्क में तो काम कर जाती है ये कातिल नज़रों की जुबान ,

लब यहाँ खामोश ही हो जाते है ,

ज़ुकती है निगाहें तुम्हारा तसव्वुर हो जाने पर ,

तुम्हारी फुर्कत में बहे हुए आंसू हाले दिल बयाँ कर जाते है ।

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जिन्दगी की दास्ताँ भी कुछ अजीब है ,

वोही हमसे दूर है जो हमारे करीब है ,

सारी दुनिया से जीत के भी अपनों से हार जाते है ...

क्योंकि हम दिलसे मजबूर है,उसके आगे जूक जाते है ,

आखरी फ़ैसला रहता है यही हम हारकर भी जीत जाते है ....

प्यारसे भरी इस कश्मकशको मुकाबला तुम न समजो,

हम चाहे ग़ैर क्यों न हों तुम हमें चाहो तो हमें अपना समजो


और ऐसा मकाम था .........



एक रात थी ,एक चाँद था ,

वो साथ था और मैं अकेली रह गई ....


एक इब्तदा थी ,एक मकाम था ,

चलने की ख्वाहिश थी और मैं रुक गई ...


एक आरजू थी ,एक कशिश थी ,

हसरतोंकी शमा जली और मैंने आँख मूँद ली ......


एक चाहत थी ,एक आस थी ,एक प्यास थी ,

करीब हमारे उल्फत थी पर मेरे लिए नायाब क्यों हो गई ???????

9 फ़रवरी 2009

चाहत ...बस एक बार हो जाए .....



सहरसे शाम तक मशरूफीका आलम था ,

शाम से रात तक खुशफहमी का आलम था ,

रात जवां होते ही अंधेरेने कुछ उजागर किया ,

तब समज पाया की इस जिंदगी में सिर्फ़ तन्हाई का आलम था .....

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किसीकी चाहतमें फ़ना होना एक गुनाह है ,

किसीकी चाहतको ठुकराना एक गुनाह है ,

किसी की चाहत को चाहना एक गुनाह है ,

किसीकी चाहत में चुप रहना भी गुनाह है ....

तो ....

चाहत जो गुनाह है तो उसे खुदा क्यों समजा ?

चाहत जो फ़ना हो जाना है तो उसे उम्र क्यों समजा ?

चाहत जो बंदगी है तो उसके धनीको काफिर क्यों समजा ?

चाहत जो जिंदगी है तो उसे उसे आखरी मकाम क्यों समजे ???

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8 फ़रवरी 2009

कारवां ये सफरका था एक तलाशमें ..........




साहिल पर वो निशां बाकी है अभी

दो कदम तुम्हारे थे दो कदम हमारे थे ....

साथ साथ बहते रहे ,चलते रहे यूँही हम ,

पैरोंमें सागर की मौजे सहलाती रही हरदम ,

ठंडी हवाओके नर्म झोकें जुल्फोसे तुम्हारी खेलते रहे .....

साथ साथ रहकर साथ साथ चलकर भी

तनहा तनहा से हम यूँही मिलते रहे ......

कारवां ये सफरका न जाने किस तलाशमें है ???

दरिया को तैर कर आ गए और साहिल पर हम डूबते रहे ........


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आपकी राहोंमें फूल बन कर बिछ जाने की चाहत थी हमें ,

गम नहीं की फूल चुनते हुए हथेली ये काँटोंसे लहूलुहान हो गई .......

7 फ़रवरी 2009

तुजे मेरी उम्र दराज हो ......




न साज है न श्रृंगार बस है तो एक सीधी सी बात ..


हर रात तेरी नन्ही सी आँखे देखे जो ख्वाब ,

सूरजकी पहली किरण आए दबे पाँव ,

और तेरे ख्वाब पुरे करती जाए .....

सर्दीकी धूपसा हो नर्म नर्म तेरा असर ,

बारिशकी बूंदों जैसी बरसे तेरी हँसी छम छमा छम ,

कड़ी धूप बैसाखकी भी भली सी लागे ,

तेरे कानोमें वो कोयलकी कुक ही सुनाये ............
और क्या मांगू मेरे रबसे यारा ?

बस तुझे मेरी उम्र लग जाए ...........
जाते जाते मेरा आज का ख्याल :

मेरे ख़यालका तुम ख़याल कर लेते हो ...

मेरी निगाहों के सवालको भी पढ़ लेते हो ...

मेरी कुछ अनकही भी सुन लेते हो .....

वाह ! और क्या कहूँ तुम तो कमाल कर लेते हो ........

पैगाम भेजा है जब हमने ......


नजरें मिली जब नजरसे तो कुछ यूं नजारा हुआ.....

नजरके उठते ही नजरके मिलते ही चराग ए मोहब्बत जल उठे,
महफिल दिलोंकी उन शमाओंसे रोशन हुई...
शर्मों हया से बोझल ये नाजुक पलकें जुक गई जब नजर नजरसे यूं टकराई थी,
झुकते ही नजर हयाकी यूं हवाएं चली ,शर्मोंसार हम होते रहे नजर जमींमें गाढकर...
ये नर्मों नाजुक होठों पर कुछ अफसानें आने लगे, पर शब्द रुके रहे जबां पर ही,
मेरी तेज धडकनोंकी अनसुनी आवाज गूंजती रही फिजाओंमें.....

एक पयगाम भेजा नजरने नजरको और वादा ले लिया उससे,
रात ख्वाबोंमे फिर मिलनेका.................................

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माहताबको देखकर आपने दागका जिकर फरमाया था शायद,
नजर बदलकर देखीये इस माहताबको, ये दागसे ही वो ज्यादा खूबसुरत लागे हैं....
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उनके आनेकी आहटके अहसाससे धडकनें तेज हो गयी,
विसाले यार होने पर ये नाचीज दिल धडकना ही भूल गया.......
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6 फ़रवरी 2009

कैसे कह पाएंगे ......


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी





सजाया था हमारे दीदार को ख्वाबों में ,

पर हमतो सिर्फ़ इंतज़ार ही है ....

किसीने चाहा था अंजाम इस शब्बे फिराक का ,

पर हमतो सिर्फ़ एक ख्वाब है तनहा से ....

किसीने ख्वाबों की दुनिया बसा ली हमारे साथ ,

कैसे कहे उसे हम की हम तो सिर्फ़ इंतज़ार है .....

किसीकी वफ़ा को हमारा इंतज़ार भी है गवारा ,

पर कैसे समजा सके उन्हें की तसव्वुर में सिर्फ़ यादे ही बाकी है .....

किसीकी इस दीवानगीके इस खुमारने हमें घायल कर दिया ,

पर उन्हें बता न सके हर कतरे पर हमारे खून के बस तुम्हारा नाम बाकी है ...

किसीके प्यार की ये इन्तेहाँ नहीं तो क्या है ??

उनके दिल में अब भी हमारी धड़कन बाकी है .......

किसीकी मोहब्बत हम पर चढी कुछ इस कदर चढी परवान ,

लब हमारे बोल उठे वादा अभी तो सात जन्मों का बाकी है .....

किसीकी बे-इन्तहा चाहत पर हम हुए यूं जांनिसार ,

कह बैठे मंजिल तक चाहे न सही और दो कदम तक साथ बाकी है .....

5 फ़रवरी 2009

ऋषिकेश : २ (मुनि की रेती )






चलो दोस्तो आज हम ऋषिकेश की मुख्य सड़क पर अब आ गए है और हमारा अगला पड़ाव होगा मुनीकी रेती ॥

यहाँ से हमे डीजल से चलने वाले ऑटोरिक्शा बड़े आराम से मिल जाते है जो पांच रुपये प्रति व्यक्ति किराया लेकर हमे अपने गन्तव्य स्थान की ओर ले जाते है ।आप पहले लक्ष्मण जुला और फ़िर रामज़ुला या इससे विपरीत विकल्प ले सकते है . अब आप दिल को थाम लीजिये और आँखों में गंगा एवं हिमालय के अप्रतिम सौंदर्य को भरने के लिए तैयार हो जाओ .रास्ता अभी एकदम से ऊंचाई तो नहीं पकड़ता दिखता है पर फिरभी हिमालय के साम्राज्य में आप अपना पहला कदम बढ़ा रहें हैं . उसकी हसीं वादियाँ आपको मंत्रमुग्ध कर देगी ...


हम सीधे लक्ष्मण जुला ही पहुचते है ।वहां उतरकर आप अपने आपको सुंदर पहाड़ों से घिरे हुए पाओगे .रिक्शा छोड़कर हम रस्ते पर चल देते है .बीचमे एक बड़ी हनुमानजी की मूर्ति आती है और पीछे भव्य शिवमंदिर है . दर्शन करते हुए हम आगे चलते है .आजुबाजू कतारों में दुकाने लगी हुई है .पहाड़ के चढ़ते उतरते रस्ते पर आगे बढ़ते हुए हम पहुँच जाते है लक्ष्मण जुला के एक छोर पर .दिल फ़िर थाम लो नीचे हिमालय पुत्री गंगा का चुलबुला अठखेलियाँ करता ये नए रूप का नज़ारा देखो .कहते है ये पूल गंगा नदी से १५० फ़ीट की ऊंचाई पर बना हुआ है [मैंने मापने की कोशिश नहीं की है !!].ब्लू ॥हेवन ली ब्लू ...बस अब निहारते ही रहो .पूल पर चलने से वह हिलता रहता है और इसीलिये शायद इसका नाम लक्ष्मण जुला है .बराबर मध्य में जाकर तनिक ठहर जाइये . चारो दिशा में एक बार घूम कर देखिये .अपनी आंखों को एक पल के लिए मुंद के ठंडी हवाओं की ताज़गी को अपने अन्दर भर लीजिये .हौले के आंखें खोलो और हिमालय के साम्राज्य के रूबरू होने के इस जश्न में शामिल हो जाओ. ये लिखते हुए भी मैं अभी अपने आप को वहां पर ही महसूस कर रही हूँ ...

यहाँ बन्दर बहुत है .एक शौक़ीन बन्दर तो आइस क्रीम खाते हुए भी देखा गया .आते जाते लोग कुछ न कुछ देते रहते है .पूल के दुसरे छौर पर विशाल मन्दिर खड़े है . बायीं और के चौदह मंजील वाले मन्दिर में आपको भारत देश के सभी भगवान के दर्शन हो जायेंगे . एक बार ये वर्जिश कर लो और ऊपर जाकर गंगा को भी निहारों . आस पास के मन्दिर में दर्शन करते हुए यहाँ से बने सीधे रस्ते पर ही रामज़ुला जाने के लिए पैदल ही चल पड़ते है .गंगाकी गूंज की ध्वनि हमारे कानों में पड़ती रहती है . रस्ते के दोनों तरफ़ आमके बगीचे है .सीधे पहुँच जाते है हम रामज़ुला के पास बाबा काली कमली वाले के आश्रम के पास...

फ़िर वही मन्दिर की कतारें ॥वहां लगभग एक से डेढ़ फ़ीट की सीधी चोटीवाले दो महाशय ऊँची कुर्सी पर बैठे घंटी बजाते हुए नज़र आते है ।शरीर पर सफ़ेद धोती और चेहरे पर जोकर नुमा मेक अप .cool ads का ये नवीनतम तरीका है यहाँ की विख्यात चोटी वाला रेस्तोरा का .भूख लगी हो तो थोड़ा नाश्ता करके आगे बढ़ जाते है .अब शुरू होता है गंगाके किनारे से लगा हुआ रास्ता .जहाँ पर एक से बढ़कर एक भव्य मंदिरों की शृंखला है और विशाल घाट . साफ सीढियोंवाले इस घाट पर आप गंगा स्नानका आनंद ले लीजिये .यहाँ भी ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं है ....

आगे चलकर आता है गीता भवन एक भव्य मन्दिर परिसर । अन्दर जाकर परिभ्रमण करने पर अवश्य आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है .यहाँ अगर आप कुछ दिन ठहरना चाहते हो तो इसका इंतजाम भी है .एडवांस बुकिंग होती है .यहाँ पर बारह बजने से पहले पहुँच जाओ तो सिर्फ़ दस रूपये में शुद्ध शाकाहारी ,सात्विक ,कम मसालेवाला फ़िर भी स्वादिष्ट खाने की थाली मिलाती है . परमार्थ निकेतन बाजु में ही है. उसे में आश्रम नहीं पर एक शांत आध्यात्मिक अलौकिक अनुभव ही कहूँगी .कितनी पावन और शांत जगह है ये .एक सुंदर सीढियों वाला साफ सुथरा घाट .गंगा के प्रवाह के अन्दर बनी शिवजी की विशाल भव्य प्रतिमा .यहाँ पर कुछ घंटों तक बैठ कर आप थोड़ी उछल कूद करती, अंगडाई लेती शरारती गंगा नदी से मूक वार्तालाप भी कर सकते है ....

रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमिओं की नौकाएँ भी आपको लहरों पर उछलती नज़र आएगी ।आप अगर ये शौक रखते है तो इधरसे आपको पन्द्रह बीस मिल की दूरी पर जीप में ले जाते है जहाँ से रिवर राफ्टिंग करते हुए लौटा जा सकता है . बहुत सारे विदेशी लोग यहाँ पर योग विद्या के लिए आते है और शान्ति से यहाँ ठहरते भी है .यहाँ से रामज़ुला लौट आओ और या तो नौका विहार का आनंद लेते हुए सामने के घाट पर जाओ या फिर पैदल रामज़ुला पर चलते हुए . वहां पर गीता प्रेस गोरखपुर की दूकान भी है और पुरा अच्छा बाज़ार भी नौका विहार के दौरान मध्य में गंगा के निर्मल जल को छूने का एहसास अवर्णनीय है .हाँ एक और बात काली कमली वाले बाबा के आश्रम के नजदीक से जीप के जरिये नीलकंठ महादेव के मन्दिर जा सकते है जो बारह किलो मीटर की दूरी पर स्थित है , वैसे हम लोग वहां नहीं जा पाए थे किंतु वहां का महात्म्य भी अधिक है ....

जब हम यहाँ से वापस चलते है तो हमारी आत्मा जैसे इधर ही ठहर जाती है और शरीर ऋषिकेश के और गति करता है .हिमालय और गंगा के इस सफर को जारी रखते हुए अगली बार आपको मैं ले चलूंगी एक सीप में छुपे हुए मोतीके पास . बस थोड़ा और इन्तजार .........

जीनेकी वजह कह दूँ ?!!!!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


मायूस ना हो दोस्त मेरे कभी कभी यूँ भी हो जाता है ,
मंजिलोंसे बेहतर हमें उन तक पहुँचने का रास्ता नजर आता है .....
खुशियोंमे तो शायद हर शख्स भीड़में घिरा नजर आए ,
मगर मंजिलोंकी तरफ़ बढ़ते वक्त वह अकेला ही नजर आता है ....

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इश्कमें फ़ना होना तो सब जानते है ,
पर उनकी यादोंको सजाकर रखना दिल में मुश्किल हो जाता है ,
कब्र की मंजिल तो आसान होती है दोस्त ,
पर यादोंके साथ जिंदगी को जिले जो वह सिकंदर कहलाता है ....

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वो वफ़ा है या बेवफा इस बात पर तवज्जो क्यों दे हम ,
इश्ककी इबादतमें हमने तो सजदा कर लिया उनकी यादमें ...

हम उनकी यादों से कैसे महरूम रहे दोस्त ????

आलम तो ये है मेरी रूह बनकर कैदमें है मेरे दिलमे ,
उसे मैं वफ़ा कह दूँ या जीने की वजह कह दूँ ?????

4 फ़रवरी 2009

एक बार फ़िर ...........


कौन थी वह ?

कहांसे आई थी ?

अजनबी फ़िर भी जानी पहचानी सी लगी ....

बस पलभर का साथ निभाकर चली गई और मुझे जीना सिखा गई .........


एक बार फ़िर मेरी जिन्दगीमें बहार बनकर आ जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी नींदमें सपना बनकर सज जाओ ,

एक बार फ़िर परदे के पीछेसे निकलता हुआ चाँद बन जाओ ,

एक बार फ़िर मेरे अरमानोंको सहला जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी तनहा रातोंमें सितारा बनकर चमक जाओ ,

एक बार फ़िर मेरे दिलमें धड़कन बनकर धडक जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी तक़दीर की लकीर बन जाओ ,

एक बार फ़िर मेरी यादोंमें बस मुझे सुकूनभरी नींद सुला जाओ ,

एक बार फ़िर तुम बिन जीने के लिए तनहा छोड़ जाओ ...........

3 फ़रवरी 2009

धीरे धीरे से .....


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


सुरमई शाम पिघल रही थी धीरे धीरे ...
अंगडाई लेती रात बढ़ने लगी थी धीरे धीरे ...
और फ़िर शमा रोशन हो चली थी धीरे धीरे ...
और एक आरजू मचल चली थी चाँद को छूने की धीरे धीरे .....

उगते सूरजको पिघलाती रही थी एक आह धीरे धीरे ...
सूरजकी आगको पीती रही थी वो दिलरुबा धीरे धीरे ...
आग आफताबकी बर्फसी जमने लगी तन्हाईमें धीरे धीरे ...
ख्वाबमें तुमसे मिलने के लिए पलक बंद हो गई तब धीरे धीरे .....

फिराक का सफर यूँ तो कट रहा था तेरी यादमें धीरे धीरे ...
तुम्हारी यादोंसे भी प्यार हो रहा था अब धीरे धीरे ...
तुम्हारा इंतज़ार भी ख़त्म होना था एक दिन धीरे धीरे ....
तुम्हारी बेवफाई का ये झख्मभी भर जायेगा वक्त के साथ धीरे धीरे ....

2 फ़रवरी 2009

आओ आसमान को छू ले .............



चलो आज मुझे मेरा आसमां दे दो ...


उड़ते रहनेकी ख्वाहिश अभी बुझी नहीं है ,

प्यास अभी एक बूंदकी बाकी रही है अभी ,

मेरे लिए ये जमीं काफ़ी नहीं

अभी तो पूरा आसमां बाकी है ...............


एक मुठ्ठीमें छुपा है मेरी

बादलके दो बूंदोंके बीच छुपकर बैठा है वह ......


भीनी महक लिए लिपटकर बैठा है बूंदोंमें

जमींमें मिटटीके दो जर्रोंके बीच सिमटा है वह ......


अपनी गोदमें एक तिनके को बिठाकर

झुला झुलाए सातवें आसमां तक वह ........


दिल के मकानमें झांक लिया तो

पलते -पकते तो कभी थकते रिश्तोंके बीच प्यार बनकर

जिंदगीको हमेशा सहलाता दीखता है वह ........

1 फ़रवरी 2009

मैं जिंदगी कहाँ ?





मैं कौन हूँ ? मुझे जानने की कोशिश न कर ....

मैं हूँ कहाँ ?मुझे ढूँढने की कोशिश न कर ॥

खुशबू का वह झोका हूँ जो फिजा में है घुल गया ॥

मय का हूँ वो नशा ,जिसने तेरी आँखों को है तर किया ...

खामोशी हूँ , जिसे कोई सुनने की कोशिश है कर रहा ...

हवा की हूँ वह गूंज ,जो तुम्हारी सांसो को छूकर है गुजर रही ...

प्यास हूँ एक बूंद की जिसका पता एक सागर है ...

आस हूँ एक जिंदगी की ,जिसे खुशियों की है प्यास ...

अहसास उस स्पर्श का जो बिन कहे सब बोल उठता है ...

सपना हूँ उन आँखों का जिसका सितारों से आगे है एक जहाँ ...

सफर हूँ एक मंजिल की , थकान का हूँ आशियाना ....

आजाद हूँ उस कैदी पंछी की तरह चाह जिसे है आसमान की ...

पहचान उस अक्स की हूँ जिसमे जिंदगी रोज नया एक रंग है भरती ...

तृप्ति हूँ उस जिंदा प्यास की ,

उभर रही आशा की लहर हूँ ...

पहचाना मुझे ?

मैं जिंदगी कहाँ ?..मैं मंजिल तक का सफर हूँ .....


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मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...