12 नवंबर 2009

बेमौसमकी ये बरसात

बरसात मुझे भाती हरदम ,

जभी आए लगे सुहानी हरदम ,

पर अब के ना जाने क्या बात हो गई ,

भरी सर्दीमें बरसात हो गई .........

ठण्डसे काँप रहे थे वैसे ही ,

और ये बादल मंडराने लगे ,

स्वेटर पर रैनकोट पहनकर

सब लोग बाहर आने लगे .....

कागज़की नाव कहीं खो गई ,

अभी तो उठे थे नींदसे सुबह ,

मौसम देखकर यूँ लगा फ़िरसे शाम हो गई ....

फ़िर जम्हाई आने लगी ,

और हमें कम्बलमें लिपटकर बिस्तरकी याद आने लगी ....

ये सर्दीकी बरसात साथमें मेथी ताज़ी लायी थी ,

अब क्या करें चाय के साथ

मेथीके गरमागरम पकोडे खाकर ही सुस्ती उडानी थी ....

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