4 सितंबर 2009

देखो तो जरा सा ...

गली के नुक्कड़का वह मकान

थो वो मेरी निगाहों का एक मकाम ...

हरदम बंद खिड़की रहती थी उसकी ,

वहां रोज नए रंग रूपमें खामोशी बसती थी ......

एक रोज खुली खिड़की वो

मेरी नजर भटकने लगी ,

सामनेकी दीवार पर मेरी ही तस्वीर थी .....

कांच पर जमीं धूल पर

ऊँगली से लिखा हुआ था नाम मेरा ही ....

मुझे इंतज़ार था उसके दीदार का ही ....

चोंक गई मेरी नज़र इस नजारेसे ,

उसकी नज़र को भी इंतज़ार था मेरा ही .......

3 टिप्‍पणियां:

  1. चोंक गई मेरी नज़र इस नजारेसे ,

    उसकी नज़र को भी इंतज़ार था मेरा ही .......
    zindagi kabhi kabhi aise hi chauka deti hai,kuch hadse bahut haseen hote hai.sunder rachana.

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  2. बहुत खूब --- अकस्मात भान तो हुआ

    उत्तर देंहटाएं

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