16 जून 2009

वक्त...समय...लम्हा ...पल ..!!

वक्तकी रेतघड़ीसे बह रहा है समय अपनी गतिसे ही ,

कभी वो तेज लगता है कभी रुका सा लगता है ,

रफ्तार वही है उसकी और रहेगी वही

बस नजरिया हमारा बदल गया लगता है .......

कभी किसीको चाहा बेपनाह और मिलने गए ,

तो लगता बस पल भर का फासला लगता है ,

एक पल का इंतज़ार करने पड़े अपने प्यार का

तो उम्रभर का इंतज़ार लगता है .......

किसीके पास बैठते है तो लगता है वक्त रुक क्यों गया है ?

उनके पास महसूस आने पर लगता है वक्त इसी पलमें रुकता क्यों नहीं ?

जिंदगीमें कभी मनचाही मंजिल मिले तो ये वक्त की वफ़ा लगती है ,

कभी जिंदगीकी राहमें चलते हार मिले तो वक्त की बेवफाई लगती है ....

कभी मिलते है किसीसे तो लगता है वक्त इस पलमें रुक क्यों नहीं जाता ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह प्रीटी जी ..वक्त को परिभाषित करने की अच्छी काव्यात्मक कोशिश है..सुन्दर रचना

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