13 जून 2009

ये यादों का नगर .....

मेरे वजूदसे बड़ी एक दुनिया मुझमे समायी है ,

जो मेरे मनके नगरमें याद के नामसे जानी जाती है .....

यहाँ यादों के देश में कोई सरहद नहीं ,कोई मौसम नहीं ,

कोई भीड़ भी नहीं ,या कोई तन्हाई भी नहीं .....

यादोंके सफ़रके रास्ते इस जिंदगीसे भी लम्बे होते है ,

यहाँ पर कहीं घने दरख्त ,फुल पौधे ,हंसी मंज़र भी सजे है ......

यादोंके मुलायम फूल भी कभी नश्तर बनकर चुभ जाते है ,

कभी इसकी तीखी चुभन भी मरहम बनकर आती है ........

वो याद बचपनकी एक गुडिया है या पहले प्यार की निशानी ,

आज बालोंकी सफेदीमें सजी ये यादों के बिन ये उम्र भी अधूरी है ....

पता नहीं किसीके यादोंमें मेरा नाम भी लिखा होगा या नहीं ?

कभी ये सोचते हुए कोई जहनमें सिर्फ याद बनकर ठहर जाता है ..........

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर! अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

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  2. सच में ये यादें ऐसी ही होती है जो रह रह कर पुराने दिन याद दिलाती है और अजीब सा सुकून भी देती है...

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