2 मई 2018

आशाएं

कहीं धुंधली सी लकीरें सुनहरी
प्रकाश की आशाएं बिखेरती है ,
नन्हे बच्चे की मासूम मुस्कान
खुशी की लहर बिखेरती है ,
प्रकृति का रूप बदलता
अचंभित कर आश्चर्य की सीमाएं बिखेरती है.
कड़कती बिजली का बेखौफ नर्तन
भय का आवर्तन का सृजन कर
कपकपी फैलाती है .…
चाँद की चाँदनी में तकना आकाश को
मन मे सुकूनभरी स्निग्धताका लेपन करती है ....
पर कहाँ देख पाते है इसे हम वक्त के मारे
घंटो तक आभासी रिश्तों में व्यस्त एक डिबिया में भरे ,
ढूंढते रहते है सुकून का एहसास
जलजीवन से भरी गगरिया में भी हमें
कसकती प्यास ....

1 टिप्पणी:

  1. सब कुछ होने के बाद भी कुछ खालीपन सा हमेशा रहता है मन में...
    इसी को सुंदर शब्दों में पिरोया है आपने.

    स्वागत हैं आपका खैर 

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