26 अप्रैल 2013

बंदिशें बनती है

बंदिशें बनती है धूपमे भी कभी ,
सरगम बनकर बिछ जाता है धूप का हर टुकड़ा ,
उसके सूरसे नर्तन करते हुए किरणों के बाण
आग चुभाते है नश्तरों के निशान छोड़ते हुए .....
सबा चुप ,हवा चुप ,
जमीं चुप ,आसमां चुप ,
चाँद चुप ,सूरज चुप ,
चुप चुप से है तारे सारे ....
तब वो टीसके कसक
एक कराह बनकर निकल गयी ,
धूपके टुकड़े की लालटेन सी रौशनीमें देखा ,
वो तो टुकड़ा था दिल का .......

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (27 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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    उत्तर
    1. vandana ji , aap hamesha meri hausala afjaai karte hai is ke liye ham aap sab log ke bahut bahut shukr gujar hai ...aap ne haal me hi bahut se samman paye hai un sabhi ke liye aapko bahut bahut badhaiyaan ....!!!

      हटाएं
  2. बंदिशें बनती है धूपमे भी कभी , bahut umda abhivyakti

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर लिखा है प्रीती जी....
    शुभकामनाएं.

    अनु

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर रचना! मेरी बधाई स्वीकारें।
    कृपया यहां पधार कर मुझे अनुग्रहीत करें-
    http://voice-brijesh.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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