कलसे मौसम कुछ गुनगुना रही थी ,
हौलेसे जैसे किसीसे प्यारका इज़हार कर रही थी ,
नज़्मसी बहकीसी बुँदे ,
पानीसे एक आग लगाकर चली गयी ,
सारी फिज़ाओमें कुछ इश्किया नशा महसूस महसूस किया ,
बस एक पुरानीसी तस्वीरसे धुलकी परतें उतरती गयी ....
वो बारिशकी बुँदे , वो खुशबु भीगी मिटटी की ,
वो दिये जलते हुए आँखोंमें उनके इंतज़ार के ...........
एक ख्वाहिश गुनगुनाती हुई ,
एक ख्वाहिश इस सावनमें भीग जाने की ....
धीरे धीरे धीरे जैसे चढ़ता नशा ......
मौसमका या इश्क का !!!!!
जिंदगी मेरे लिए ख्वाबोंके बादल पर उड़नेवाली परी है .!! जो हर पल को जोड़ते हुए बनती है, और उन हर पलोंमें छुपी एक जिंदगी होती है ....
8 जुलाई 2011
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