5 अगस्त 2010

क्या करूँ कुछ कह ना पाऊं

खामोश ,मौन ,निशब्द एक बोल
निगाहोंसे छलक गया पैमानेसे
एक नज़र उठी एक नज़र झुक गयी ,
बचपनसे अलविदा थी उस पल और
जवानीकी देहलीज़ पर छोड़ गया .......
================================
मैं उन्हें ना कह पाऊं की मोहब्बत है ,
वो इंतज़ार करे नज़रें बिछाए बैठे है ,
मेरी राहों पर तकती रहती उनकी निगाहें
मेरे बढ़ते क़दमों पर बेडीसी बन अटक जाती है ....

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

    Sanjay kumar
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...