1 फ़रवरी 2017

दायरे

सोच की लहरों पर एक तस्वीर तैरती रहती है  ,
जैसे समंदर में चाँद की तस्वीर उछलती है  ,
मनके तरंग को क्या कहे वो काबू में नहीं है  ,
एक डूबती सांझकी बातोंमें तेरे जिक्र की तहरीर रहती है  ....
कहीं खुशनुमा रात बनकर सज रही होगी  ,
कहीं तारों की चादर में ढककर रखेगी अपने चहेरे को  ,
एक उलझी सी लट उस दायरे से निकल कर  ,
तेरी हंसी की गवाही देती होगी  ....
इंतज़ार में कटे कितने ही लंबे सालो के फासले  ,
बस तेरे गांव की सरहद पर बेसब्री यूँ बढ़ी  ,
जैसे जान अभी निकलकर जिस्म से  ,
तेरे ड्योढ़ी पर जाकर बैठी होगी  ......

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