22 जून 2016

वादा

आज कल थोड़ा सा आलसी बनकर सूरज ,
बादलों में लिपट कर बैठा रहता है ,
वो हवाओं के तो पर निकलकर आये है ,
उड़ती फिरती रहती है यहाँ से वहां ....
बूंदों को छुपाए बादलों को कंधे पर बिठाकर  ,
इंतज़ार कर रही है धरती पर रुख करने का  ....
बादल और सूरज छुपनछुपाई खेलते है  ,
तब हवाएं थम जाती है  ,
 चेहरे पर पसीने की बुँदे जम जाती है  ...
नखरे मत दिखा अब तो  ,
चल आ जा बारिश अब के शाम को  ...
मिलने का वादा चाहिए तुमसे  .... 

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " यूरोप का नया संकट यूरोपियन संघ... " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वाह बारिश से वादा जरूर चाहिये वह भी खुल कर मिलने का। सुंदर प्रस्तुति।

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