14 मई 2016

नब्ज़ में लहू

नब्ज़ में लहू नहीं लावा दौड़ता होगा शायद ,
दिलमे जब एक गूंज उठती थी तेरे नाम की ,
झुलसती हुई रातें बेमतलब यूँ ही गुजरती  ,
जब तेरा जिक्र मेरे सपनों  महफिलमें   होता...
बेतरतीब से बिखरे मेरे कागज़ यूँ ज्यों त्यों ,
लब्ज़ उभरते तेरे नाम को बयां करने और बिखर जाते  ....
वो आह थी , वो राह थी , वो चाह  थी यूँ ही सजी ,
मेरे ख्यालों के रेगिस्तानों में आज
जिसे आज भी तेरी ज़लक का इंतज़ार है शायद  ....
नज़्म बनते हुए मेरे आंसू के वो कतरे ,
दर्द को दिल से बहाकर   ले चले कफ़न ओढ़ाकर ,
फिर भी साँसे थिरकती है बेजानसी  जिस्म में  ..... 

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