28 सितंबर 2015

दास्तानें

यादों के तालमें  यूँ ही किसीके दिदारने एक कंकर फेंका  ,
कितनी ही तरंगे उठ रही थी न जाने कब तक ,
हर लहर पर हर लम्हा फिर से सतह पर आ रहा था
जैसे फिर बीती बातें जवां हो रही थी नए लिबासमें  …
फिर वो अलमारी खोलनी चाही फिर से एक बार  ,
ताले पर भी जंग लगी थी चाबी तो गम गयी कबसे ,
एक पथ्थर उठाकर ताला  तोड़ दिया हमने  ,
अंदर से यादों की बारात फर्श पर बिखर गयी  ……
वो कंचा ,वो गुल्ली ,वो तुम्हारी गुडियाकी चुनर ,
वो तुम्हारी कहानी की फाड़ी थी जो किताब ,
वो तुम्हारा छुपाया हुआ कानका बूंदा नयावाला ,
सब अभी भी जवान है , जैसे कल की ही बात हो  ……
एक बार फिर से मिलने का संदेसा मिला है  ,
पुरानी स्कूलमे वही बेंच पर बैठकर फिर से  ,
कागजकी कश्ती बनाएंगे ,और एक नाकाम
कोशिश करेंगे इस तूफान के लिए मुर्गा बनकर   …
कमलेश जा चूका था बिदेस ,गौरी अब दुनियामे नहीं रही  ,
निम्मो तुम आई नज़र का चश्मा पहनकर ,
बालों की सुफ़ेदी को खिजाबों में लपेटे , और मैं ????
वक्त सबके  चेहरों की  सिलवटोंसे दास्तानें कुरेद रहा था  …… 

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