6 जून 2015

तवारीख के सफों पर

वक्त के गुल्लक से रोज
एक सिक्का निकलता है दिन बनकर  ,
बस इस सिक्के को खर्च करते हुए
जिंदगी बन जाती  है   ....
उस सिक्के को खर्च किस तरह किया
वो हिसाब तो हर रोज  लिखा जाता है  ,
पर कभी उस पर नजर ही नहीं जाती है
 जो हर दिन लिख नियति बन लिखे  जाता है   …
न दिन आता है हमारे पास मनमांगी मुराद लेकर  ,
न कभी दबे दर्दको खरोंचने की ख्वाहिशें लिए   …
वक्त के गुल्लक से दिन का सिक्का लेते हुए
हमें भी एक सिक्का उसमे डालना होता है  …
उस दिन के हर कर्म का हिसाब लिए हुए  ....
बैंक में जमा पूंजी न इसमें काम आती है  ,
यहाँ तो काफिरों ने की हुई
सच्ची दुआएं भी असर कर जाती है  …
इस गुल्लक को बाहरी सजावट की जरुरत नहीं
जो हम रोज उस पर करते जाते है  ,
उसकी अंदरुनी सफाई भुलाई जाती है
जो इंसानी जज्बातोसे
तवारीख के सफों  पर लिखी जाती है  

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