15 फ़रवरी 2015

कहीं से गुजरती थी

कहीं से गुजरती  थी एक डगर ,
जो तेरे दर से होकर जाती थी  ,
ये किस्मतकी लकीरें जैसी थी  ,
जो मंज़िल सामने आते ही पलट जाती थी   ....
तेरा ख़याल न छोड़ा हमने कभी  ,
तेरा दीदार  न किया हमने कभी  ,
तेरे से सहर होती रही इस शहरमें  ,
पर तेरा जिक्र न किया हमने कभी  …
न कसम थी न किया कोई वादा  ,
बस ये ख्यालोंमें पका था इश्क़ कभी  ,
तेरे दिलको न टटोला था कभी  ,
बिना कुछ शर्त कोई वादा खुद से किया कभी  ....
मेरा इश्क़ मुकम्मिल है  ,
गर दुनिया न करे कुबूल इसे  ,
फिर भी हमें उस पर रश्क है  ,
रब का दीदार न किया कभी हमने
फिर भी दुआओमें तू कुबूल है  .... 

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