8 मई 2013

टाट के परदे के पार ...

टाट के परदे के  पार खड़ी है मुस्कुराती हुई  तक़दीर ,
ये पैबंद   ढंके है तेरी ग़ुरबत पर चिलमन बनकर .....
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ये  सूरज का प्यार जब  सिसकता है उसकी महबूबा के लिए ,
राख बिखर जाती है सिसकियाँ  जिसे हम धुप के नामसे जानते है ..
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चुपचाप खड़ी रहती है खलिश गुबार लिए दिल के कोनेमे ,
क्या करे बेजुबान हो जाती है जब उसका दीदार होता है ...
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चाँद और तारे क्या बतियाते होंगे जागते है आसमानमें जब ,
वो पहरा देते है आसमानका जो सोया है अभी अभी ,
कितने दाग बनाये है धुपने आसमान के  दामन पर गिन गिनकर ,
जो नासूर बन गए है रातोमे चांदका मरहम लगाकर बस .....
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नजरोके तीर घायल कर देते है और बेजुबाँ होती है जुबाँ ,
घायल वो दिल जाकर किस को शिकवा करे इंसाफ के लिए ????

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