30 अगस्त 2012

कहीं दूर ...कहीं दूर ........

मेरी चुप्पी ,ये ख़ामोशीके दायरोंकी  एक दीवार ,
अविरत पड़ती है बारिशोंकी रिसती कलम उस पर ,
कितने अफसाने लिखे हुए बह गए है ,
हर रंग लेकर अपने साथ वो जमीं पर एक लकीर बनकर ........
ये इंटकी आँखे नमसी कुछ और गहरी लाल रंगकी ,
सोखे जा रही है बादलोंकी नमी जो बरस पड़ी ,
वो जमीं भी छल छल कर रही ,
वो सरका रही है बहती हुई लकीरोंमें ,
नदीके आँचलको छलक जाने दो ........
नदीसे सागरोंका सफ़र भी तूफानी हो जाता है ,
बस एक एहसास फिर कभी एक सीपीमें कैद हो
उस उम्मीदकी लौमें
अरमानोका एक सफ़ेद रंग मोती बनने की गुंजाइश लिए
चल पड़ा कहीं दूर ...कहीं दूर ...कहीं दूर ........

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