21 अगस्त 2012

पंख थक गए थे कुछ

बादलोंके पंख थक गए थे कुछ ,
रुक गए एक पेड़की टहनी पर ,
उसकी टहनी वजनसे झुक गयी ,
बादलने कहा मैं तो हल्का फुल्का हूँ ...
तो टहनीने कहा कुछ बुँदे गिरा दो मेरी कोरी जमीं पर ,
बादलने गिरा दी थोड़ी बुँदे ,
फिर रोते हुए बोला ,
यहाँ तो कीचड़ हो गया ..मेरे पैर गंदे हो गए ,
तो जमींने बोला ,
बुध्धू कहीं के तुम क्या जानो प्यारकी रस्मे ???
ये तो जमीं और आसमानके मिलनकी गवाही है ....
तू बूंदोंके बाद भी रह जाते है सुख कर ,
बूंद और जमीं तो मिलकर फिर जुदा न होती कभी .....
बादल पंख लगा कर उड़ चला फिर दुसरे देस ....
अब उसे बिछड़ी बुँदेकी याद आने लगी ....

1 टिप्पणी:

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...