16 जुलाई 2012

कुछ सूखे पत्ते

सहेज कर रखे थे कुछ सूखे पत्ते
डायरीके पन्नोके बीच ....
उनमे फूलोंकी खुशबु नहीं थी ,
पर फूलोंकी सौबतकी असर थी ,
बस एक तेज हवाका झोंका आया ,
डायरीके पत्तोंके नर्तनसे डर कर
वो पत्ते उड़कर चले गए खिड़कीसे ,
बाहर बारिश भी तिरछी चल रही थी ...
और पत्ते नीचे सड़कके किनारे बैठे सुस्ता रहे थे ,
खिड़कीसे देखा मैंने ....
बस बरसोंसे सहेज कर रखे थे
वो लम्हे मैंने छुपाकर
पर आज बस मुझे फिर तनहा छोड़ गए
तुम्हारी तरह .....
मेरे सामने मेरे अरमानोंकी लाशका बोजा
दोबारा उठा लिया ...
और फिर तकिया मेरे अश्कको सहेजने बेताब लगा ...
पर ये क्या ??????
पहली बार ऐसे महसूस हुआ की
चलो एक बोझा ढो कर चली थी जिंदगी अब तक ...
आज अचानक हलकी फुलकी महसूस हो रही है ....
न वाबस्ता है अब यादें तेरी न निशानियाँ कोई .....

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