1 जुलाई 2012

आमीन .....


वो मोटेसे ऐनकसे झांकती बूढी आँखे ,
तकती रहती है दरवाजे पर रोज ,
उसके चेहरेके जुर्रियोंमें इंतज़ारकी तस्वीर है ,
बस एक ख़तकी अपने बेटेकी ....
आज भी वो खोजता है डाकियेके क़दमोंके आहट ,
क्योंकि उसके पास मोबाइल नहीं ,
नहीं उसके पास कोई कम्प्यूटर है ,
फिर भी यादोंकी हार्डडिस्कमें उसकी 
लगा नहीं कोई वाइरस है ..........
उसी यादोंकी हरदम ताज़ी वादियोंमें फिर उसका 
मन निकल जाता है घुमने ,
जब डाकिया उसके घरको छोड़ते हुए निकल जाता है ......
बूढ़े हाथमे अभी वो निशान है जिससे उसने 
चलना सिखाया था उसे ....
आज भी उसकी कोपीके पन्ने उसके पास है 
जिसमे पहला क ख ग लिखा था उसने ,
पुराणी तस्वीरोंकी आल्बम आज भी 
ब्लेक एंड व्हाईट यादोंको रंगीन कर जाती है ....
आज भी एअरपोर्ट पर आखरी बार उसके हाथ हिलानेकी याद पर 
आँखे नम हो जाती है .......
एक बात है इस बात में .....
डाकियेने उसका वो टेलीग्राम फाड़ दिया था ,
जो दो महीने पहले डाकघरमें आया था .....
ये सोचकर की चलो इन्हें यादोंमें जीने दो अब ,
क्योंकि उनका बेटा इस फानी दुनियाको 
एक कार एक्सीडेंटमें छोड चूका था ........
पर वो दिलकी धड़कनसे उन्हें पता चल चूका था ....
ये बुज़ुर्ग तो इसी लिए उस दिनसे पगला चूका था ......!!!!!
आमीन .....

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