23 जून 2012

अब तो घरको चलते है ....

सुबहसे फिर शाम हो गयी
चलो घरको चलते है ,
दिन थक गया है चल चल कर ,
चलो घरको चलते है ....
सुबहसे घूमते रहे हम गैरोंके बीच
चलो अब अपनोंके बीच चलते है ,
ये सफ़ेद कमीज़ पर लेकर नए दाग
चलो अब घर चलते है .....
यहाँ पर तो किसीको मेरा इंतजार न था ,
जहाँ तक रही होगी वो नन्ही आँखे राहें
जहाँ एक गरम चायका प्याला उबल रहा होगा ,
उसको घरके नामसे जानते है हम वहां चलते है ......
चुन्नू मुन्नू अपने कंपास के लिए उतावले हो रहे होंगे
उन्हें समजाती  पटाती हुई रोटी सेक रही होगी वो
एक सीधी सादी  औरत धरकर रूप अनेक
माँ बहेन बेटी भाभी बहु का रूप धरकर बैठी होगी ,
वो मेरी पत्नीके आँचलमें थककर सोते है ,
उसके हाथकी रोटी और दाल खा कर
एक चैन सुकूनसे सोते है .....
सुबहसे फिर शाम हुई
चलो अब तो घरको चलते है ....

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