7 जून 2012

हर दिनका इंतज़ार होता है .........

कुछ स्मृतिके सहारे जाते हुए
कुछ शबनमी भीगी यादें
फिर सिरहाने आकर बैठी है ...
गोरा रंग यूँही गुलाबी होता है ,
और बेक़रार आँखे झुकी झुकीसी है ....
वो तब भी खामोश ही थी ,
वो अब भी खामोश ही है .....
इन यादोंका भी क्या है ???
ये तो हर मौसमसे परे है ...
ये तो हर एहसाससे परे है ....
इनको तो जाना है गली
उस रस्ते को बेरोकटोक चलनेकी आदी ...
पर वो रात होती है ,
जब मुझे दामनमें समेटने बैठी नींदको
आँखोंमें आनेकी पाबन्दी फरमाकर
खुद मनचली मेरे मस्तिष्क पर कब्ज़ा जमा लेती है ......
क्यों ???
क्योंकि तुम नहीं मेरी नज़रों के आसपास ,
तुम्हे देखनेको बेताब रहता है दिल ,
दुनिया में रुसवाई न हो तेरी ,
इस लिहाज़में तेरी खिड़कीकी तरफ नहीं तकते हम ,
इस लिए तो यादोमे रहना तुम्हारे साथ
ये तो हर दिनका इंतज़ार होता है .........

1 टिप्पणी:

  1. बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति

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