26 फ़रवरी 2012

अब जीना रास आएगा फिरसे ....

चलो चलो कहीं दूर भाग चलते है ,
भागते भागते रुकी जब सांस -
 तो देखा 
इंसानोकी बस्ती दूर कहीं पीछे छुट रही थी ,
घने तने लिए ये दरख्त सदियोंसे
अपनी जगह रोककर खड़े थे ,
उनके शाखें और पत्तियां फ़ैल जाते
सूख जाते या टूट जाते ,
फूल खिलते या फल बनते ,
उन पर कभी घरौंदे बनते या पंछी चहकते
कोई मौसमका उनपर कोई फर्क नहीं ,
वो तो बस ध्यानस्थ योगी की तरह
अपनी जगह पर खड़े हुए ,
न आंधी न तूफान ,न धूप न बरसात ,
न कड़ाकेकी ठण्ड न बहारों-पतज़दका मौसम ...
क्या फर्क पड़ता है इन संन्यासियोंको ???
हाँ ये तो हमें खुद तय करना है कि:
कि हमें किन बातोंसे फर्क पड़ना चाहिए !!!
और हम लौट चले इंसानों की बस्तीमे 
फिर से पर एक सोच साथथी ...
वही दरख्तोंवाली !!!! अब जीना रास आएगा फिरसे ....

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