22 फ़रवरी 2012

शरारती कहींकी !!!

आज हवाके साथ उड़कर
एक सफा घरमे उड़कर आया ,
ये तो नज़्मकी आधी कहानी लगी ,
पूरी होगी जिस पर उस सफेकी कोई निशानी नहीं !!!!!!
इस आधी अधूरी नज़्ममें चलो जोड़े जाए ,
कुछ और शब्द अपने लिफाफोंसे ,
जैसे कागज़के आयने पर कुछ अक्स नाच रहे हो !!!
आयनेमें कुछ सजाते खुद पर
आँखोंमें काजलसे ,पैरोंमें पायल से ,हाथोमें चूड़ियोंसे
और माथे पर कुमकुम की तरह सजे सजे से ......
तब लगा ये नज़्म भी एक औरतका रूप लेकर आती है ,
तैयार होनेमें भी कितना वक्त लगाती है ...
लेकिन जब सज संवर कर निकलती है
इस कलमसे स्याहीमें बहती हुई ,
तो कागज़की कोरी कोरी वीरानीसी जिंदगीमें
जैसे एहसासोंकी खुशबूमें लिपट कर बहार आती है ...
हैं ना..!! है ना  !!!है ना  !!!
अरे कहो ना कैसी लग रही हूँ
ये इतराकर पूछती हुई नज़्म !!!! शरारती कहींकी !!!

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