4 फ़रवरी 2012

इन आँखोंमें बैठकर ...

लहलहाते है सपनोके खेत इन आँखोंमें बैठकर 
तेरे आने की आहटसे उनमे बहार जो आती है ...
=======================================
ज़ख्मोको सिलनेके लिए आंसूओके धागे है ,
इश्कके अंजामको सहने रातको नींद भी आँखोंसे भागे है !!!
=======================================
ग़मोंको घोलकर छलक जाते है ये आँखोंके पयमाने
तभी बहते अश्क भी  नमकीन बन जाते है ....
=======================================
रातभर जागा करती है  ये सड़के भी मेरे साथ 
चाँद भी मेरे जख्मो पर मरहम लगाने आता है  ....
=======================================
नयी दुनियाको बसा लेने पर ये दिल दुआएं ही क्यों दे रहा ?
क्योंकि खुदके प्यार को हम कभी बददुआ कैसे दे सकते है?
=======================================
हरदम चलते रहे मेरे साथ ये हवाओंके चौबंद 
आज क्यों बिखरी बिखरी बह रही ये टुकड़ोंमें चंद????

1 टिप्पणी:

  1. हरदम चलते रहे मेरे साथ ये हवाओंके चौबंद
    आज क्यों बिखरी बिखरी बह रही ये टुकड़ोंमें चंद???बहुत सुंदर मन के भाव ...
    प्रभावित करती रचना ...

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...