4 जनवरी 2012

कल रात गुजरे होगे

कदम कदम पर ठहरते हुए
हर सपनेको इंतज़ार है तेरा
तुम आकर अपनी हथेली पर
मेरे सपने संभलकर संजोते हुए चलोगे साथ साथ ........
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कल रात गुजरे होगे मेरे शहरकी गलियोंसे तुम
हवाके झोंके तुम्हारी मौजूदगीकी खुशबू लेकर आये थे ....
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ख्वाबगाहके दरवाजे पर बैठकर भी
कोई ख्वाब मेरी देहलीजकी और रुख नहीं करता
तुम्हारी मौजूदगीमें किसी और ख्वाबको
रुकनेकी इजाजत नहीं मेरे वजूदमें !!!!!!
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गमकी चिलम फूंकते हुए
आंखोमे नमीकी कमी कहाँ ?????

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