30 जून 2011

कुछ ना कहो ....

कोई आकर कहींसे हौलेसे छू गया ऐसे ,

जैसे चेहरे को छू गयी बारिश की पहली बूंद .........

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बारिशने क्या कहा धरती से ?

धरती एक सालके इंतज़ारमें कितनी जली तू ????

तेरे जर्रे जर्रे को छूकर मेरी बूंद भी गरमा गयी ,

ये प्यास कुछ घटा गयी या और बढ़ा गयी ???

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एक मुठ्ठी आसमानको कैद करके देखा ,

वो तब भी खाली था ,और अब भी खाली ही निकला ......

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किसीकी याद जब बेक़रार कर गयी हो

तब ही उसका आना इंतज़ारके लुत्फ़का मज़ा ख़त्म कर गया ......

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