18 मई 2011

मत आओ मेरे अंगना यूँ

कल यूँही बस बहती हवाओमें जैसे तुम्हारी सदा सुनाई दी
ना थे पास तुम कहीं भी ,पर तुम्हारी हँसी सुनाई दी .....
चांदनी अहातेमें बैठने आई मेरे ,
ग़ज़ल कुछ काफियेमें बँट कर कुछ गुनगुना गयी ......
बस ये एहसासोंका सैलाब था
जो सिमट ना पाया कुछ शब्दोंकी मुठ्ठीमें .....
बस अश्क बन टपकता रहा मुठ्ठीसे मेरी
और जमीं पर एक नज़्म लिखता रहा .....

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