28 सितंबर 2010

एक अजनबी ...

चलो आज अजनबी बनकर जी ले एक दिन ,
ना ये अपना घर है ,ना कोई पहचान वाला है आस पास ,
एक बंज़र टापू पर छोड़ दिया हो जहाँ कोई ना हो खास ,
बस मेरे साथ सिर्फ मैं ही ,
फिर भी एक दिन जी लिया मैंने ,
बहुत कुछ देखा मैंने जिस पर नज़र ना पड़ी थी कभी ,
क्या कह सकते है ये की समय की थी कमी ,
शाम होते बिस्तर पर सोते है नींद आ गयी गहरी उस दिन ,
क्या मेरे बेचैन रहने की वजह कहीं ये तो नथी ?
बस मुझे अपने लिए ही फुर्सत ना थी ???

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